हर व्यक्ति की हार्दिक कामना होती है कि वह अपने जीवन में अधिक-से-अधिक धन-सम्पत्ति का संग्रह कर ले। अपने व अपने परिवार के लिए दुनियाभर की सारी सुख-सुविधाएँ जुटा ले ताकि उनका जीवन सुविधा से, बिना किसी कष्ट के व्यतीत हो सके। उसके लिए दिन-रात दीवानों की तरह जुटकर परिश्रम करता रहता है। अन्ततः 'येन केन प्रकारेण' वह अपने लक्ष्य में सफल भी हो जाता है। उस धन से वह अपने व अपनों की खुशियाँ खरीदने का यत्न करता है। अब प्रश्न यह उठता है कि उसका यह श्रम आखिर कब तक फलदायी रहता है? यानी वह कब तक उसका भोग कर सकता है?
किसी ने अपने जीवन में अथक परिश्रम करके सुख-समृद्धि प्राप्त कर ली हो या उसे उत्तराधिकार में धन-वैभव प्राप्त होता है, उस पर उसका अधिकार अल्पकाल के लिए ही होता है। यानी यह सब उसके इसी जीवन काल तक ही सीमित रहता है। मनुष्य की मृत्यु के उपरान्त उसे यह सब कुछ छोड़कर खाली हाथ ही इस दुनिया से विदा होना पड़ता है। बहुत आश्चर्य की बात है कि वह अपने साथ कुछ भी नहीं ले जा सकता। इसीलिए मनुष्य इस संसार में खाली हाथ आता है। उसी तरह खाली हाथ ही चला भी जाता है। ये सब उसकी मृत्यु से पूर्व तत्काल ही उससे विदा ले लेते हैं।
मनुष्य अपने सम्बन्धीजनों अर्थात परिवार, मित्र, भाई-बन्धुओं के बल पर इतराता फिरता है। उनके लिए सुख-ऐश्वर्य के साधन एकत्र करता है। उनके लिए जीता है, उन्हीं के लिए मरता है। वह अपने परिजनों के लिए अपनी जान को बेशक दाँव पर लगा दे पर इसका उसे कोई लाभ नहीं होता। अपने जीवन काल में मनुष्य ने अपने परिवार के लिए कितना कुछ भी क्यों न किया हो अथवा उसके सम्बन्धी उससे कितना भी नेह क्यों न करते हों, परन्तु वे केवल शमशान तक ही साथ जाते हैं। उसके आगे की यात्रा मनुष्य को अपने बल पर तय करनी होती है।
मनुष्य का अपना यह शरीर भी सदा उसका साथ नहीं निभाता। अपने जीवनकाल में मनुष्य अपने शरीर को कितना ही सजा ले या सँवार ले, उसका ध्यान अपने से भी अधिक रख ले, परन्तु दिन-प्रतिदिन इसका निरन्तर क्षय होता रहता है। बीमारी में यह क्षीण होता जाता है। आयु बीतने पर झुर्रियाँ पड़ने के कारण वह कुरूप हो जाता है। इसी प्रकार कई बार दुर्भाग्यवश एक्सीडेण्ट हो जाने पर भी शरीर क्षतिग्रस्त हो जाता है। स्वस्थ शरीर बहुत ही महत्वपूर्ण होता है क्योंकि जब शारीरिक रूप से मनुष्य सबल होंगा तभी वह अपना ध्यान रख सकता है और अपने उत्तरदायित्वों का निर्वहण कर सकता है।
मृत्यु हो जाने के पश्चात अपने प्रियजन भी उसे उसी के अरमानों से बनाए हुए घर में रखने से इन्कार कर देते हैं। वे इसे शीघ्र ही घर से निकलकर अग्नि को समर्पित कर देते हैं। जब इस शरीर को चिता पर लिटाकर भस्म कर दिया जाता है, तब इस शरीर से उसका सम्बन्ध टूट जाता है। फिर वह नए शरीर के साथ अगला नया जन्म लेकर इस संसार में वापिस लौटता है। उस समय उसे सभी पुराने रिश्ते-नाते विस्मृत हो जाते हैं।
इस सम्पूर्ण विश्लेषण के उपरान्त हम कह सकते हैं कि केवल शुभाशुभ कर्म जो वह करता है, वही उसके सच्चे भाई-बन्धु होते हैं। वे कभी उसका साथ नहीं छोड़ते। मनुष्य के कर्म जन्म-जन्मान्तरों तक उसका साथ निभाते हैं। इन्हीं कर्मों के अनुसार ही मनुष्य को भावी जन्म मिलता है यानी वे ही उसका प्रारब्ध बनते हैं। उन्हीं के अनुसार उसे अपने आने वाले जन्म में रंग-रूप, योग्य पति या पत्नी, व्यक्तित्व, सुख-दुख, सुख-सम्पत्ति, आज्ञाकारी सन्तान आदि मिलते हैं। अच्छे कर्मों से मनुष्य की पहचान होती है और वे ही उसके जीवन का आधार होते हैं। इनके फलस्वरूप मनुष्य स्वयं ही शान्ति का अनुभव करता है।
मनुष्य को इस भौतिक संसार में जीने के लिए धन-वैभव, भाई-बन्धुओं, परिवार आदि की बहुत आवश्यकता होती है। इस शरीर को स्वस्थ रखना भी उसका दायित्व होता है। मनुष्य अपने कर्मों और उसके फल के लिए स्वयं ही उत्तरदायी होता है, उसके लिए दूसरों को दोष देना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है। उसे यत्न करना चाहिए कि वह सावधान रहें। अपने कर्मों की शुचिता पर मनुष्य को सर्वाधिक ध्यान देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 25 नवंबर 2018
कर्मों की शुचिता
शनिवार, 24 नवंबर 2018
शाकाहार दिवस
आज पच्चीस नवम्बर को शाकाहार दिवस मनाने की अपील साधु वासवानी जी की ओर से की गई थी। उनका कथन है, "मनुष्य के पास अनेक अधिकार हैं, क्या जानवरों के पास कोई अधिकार नहीं है? प्रत्येक जानवर का पहला मौलिक अधिकार है, जीने का अधिकार।" इसलिए आज शाकाहार के विषय में चर्चा करते हैं।
सदा से ही समाज में यह विषय चर्चा का रहा है कि हमारा भोजन शाकाहारी होना चाहिए अथवा मांसाहारी। कुछ लोग ऐसे हैं जो मांसाहार को पौष्टिक भोजन मानते हुए मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक मानते हैं। इसके विपरीत कुछ अन्य ऐसे लोग हैं जो शाकाहार को सात्विक भोजन कहते हुए मनुष्य के लिए उसकी उपयोगिता पर बल देते हैं।
दोनों पक्षों के लोग अपने-अपने मत को पुष्ट करने के लिए तरह-तरह की दलीलें प्रस्तुत करते हैं। कुछ दलीलें हमारी बुद्धि को मान्य होती हैं और कुछ हमारे हमें नहीं भातीं। शाकाहार निर्विरोध रूप से सभी को स्वीकार्य है। अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे हैं कि शाकाहार ही मनुष्य के लिए उपयुक्त भोजन है। इसलिए बहुत से लोग स्वेच्छा से शाकाहार की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं।
मांस भक्षण यानि मांसाहार के विषय में हमारे मनीषी अथवा हमारे ग्रन्थ हमें क्या समझाते हैं? इसकी हम आज विवेचना करते हैं।
मनुस्मृति में भगवान मनु कहते हों-
मांसभक्षयिताSमत्र यस्य मांसमिहाद्भ्यहम्।
एतन्मासस्य मांसत्व प्रवदन्ति मनीषिण:॥
अर्थात् मैं जिसके मांस को यहाँ (इस संसार में) खाता हूँ, वह भी परलोक में मुझे खाएगा। विद्वान मांस शब्द का यही मांसत्व बताते हैं।
मनुस्मृति में और भी कहा है-
यावन्ति पशुरोमाणि तावन्कृतवोह मारणम्।
वृथा पशुघ्न: प्राप्नोति प्रेत्य जन्मनि जन्मनि।।
अर्थात् जो मनुष्य निरपराध पशु का वध करता है, पशु की देह पर जितने रोम हैं, वह उतनी ही बार जन्म-जन्म में प्रतिघात प्राप्त करता है अर्थात दूसरों के हाथों से मारा जाता है।
मनुस्मृति के इन दोनों श्लोकों में भगवान मनु कहना चाहते हैं कि किसी भी पशु का वध करने वालों को बार-बार जन्म लेकर उसी प्रकार हिंसा का शिकार होना पड़ता है। जब तक उनका प्रायश्चित पूर्ण न हो जाए, उन्हें छुटकारा नहीं मिल सकता।
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है-
भूतेषु बद्धवैरस्य न मन: शान्तिमृच्छति।
अर्थात् जीवों पर वैर का भाव मनुष्य के मन को कभी शान्ति नहीं देता।
भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अन्यत्र कहा है-
निर्वैर: सर्वभूतेषु य:स सामेति पाण्डव!
अर्थात् हे अर्जुन! जो सभी जीवों पर वैर रहित है, वही मुझे प्राप्त कर सकता है।
दोनों ही श्लोकाँशों में भगवान कृष्ण का कथन है कि किसी भी जीव से वैर भाव नहीं रखना चाहिए। किसी जीव का अहित करने पर मन में एक कसक-सी रहती है। मनुष्य में बेचैनी रहती है। वे कहते हैं कि मुझे वही प्राप्त कर सकता है जो मन, वचन व कर्म से भी किसी का अहित न करे।
श्रीमद्भागवत् में बहुत ही सुन्दर शब्दों में आदेश दिया है किया है-
मृगोष्ट्र खरमर्काखु सरीसृप्खगमक्षिका:।
आत्मन: पुत्रवत् पश्येत् तैरेषामनन्तरं कियत्॥
अर्थात् हिरण, ऊँट, गधा, बन्दर, चूहा, सरीसृप, सर्प, पक्षी और मक्खी आदि को अपने पुत्र के समान ही समझना चाहिए। वास्तव में उनमें और पुत्रों में अन्तर ही कितना है?
श्रीमद्भागवद् ने व्याख्यायित किया है कि छोटे-से-छोटे जीव को भी अपने पुत्र के समान मानकर उनकी रक्षा करे। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि जैसे मनुष्य अपने पुत्र का वध नहीं कर सकता उसी तरह अन्य जीवों को भी नष्ट नहीं करना चाहिए।
शतपथ ब्राह्मण का कथन है-
यदु वा आत्मसंमितं तदवति तन्न हिंसति।
यद् भूयो हिनस्ति तत् यत्कनीयो न तदवति॥
अर्थात् जो आत्मानुकूल है वह रक्षा करता है हिंसा नहीं। और जो हिंसा करता है वह तुच्छ होता है।
हिंसा चाहे जीभ के स्वाद के लिए हो, जनून के लिए अथवा शौक के लिए, कभी भी प्रशंसनीय नहीं होती। शेष सुधी जन स्वयं विचार करने में समर्थ हैं।
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शुक्रवार, 23 नवंबर 2018
सौ वर्ष की आयु
ऋषियों ने ईश्वर से सौ वर्ष तक का जीवन देने की कामना की है। इस सौ वर्ष की आयु में हमारा शरीर कैसा होना चाहिए यह महत्त्वपूर्ण बात है। निम्न वेदमन्त्र के माध्यम से वे कहते हैं-
पश्येम शरद: शतं जीवेम शरद: शतम्
श्रृणुयां शरद: शतं प्रब्रवाम शरद: शतमदीना:
स्याम शरद:शतं भूयश्च शरद: शतात्।
अर्थात् हम सौ वर्ष की आयु तक भली-भाँति देख सकें। सौ वर्ष तक स्वस्थ होकर जी सकें। सौ सालों तक ठीक से सुन सकें और सौ वर्षो तक अच्छे से बोल सकें। हम सौ वर्षों तक दीन न बनें। ऐसा जीवन हम जी सकें।
ऋषियों द्वारा इस मन्त्र में की गई प्रार्थना का तात्पर्य यही है कि हमारी सारी इन्द्रियाँ अपना कार्य सुचारु रूप से करती रहे। हम स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट रहें। कोई रोग हमारे पास न आने पाए।
अब विचारणीय प्रश्न यह है कि ऐसा सम्भव हो सकता है क्या? यदि हम अपने जीवन को संयमित कर सकें तो यह सब सम्भव हो सकता है।
हमारा आहार-विहार दोनों सन्तुलित नहीं हैं। हमें अपनी जीभ पर बिल्कुल भी नियन्त्रण नहीं है। तला-भुना, मिर्च-मसाले वाला जो भोजन है, उसे खाकर हम सब आनन्दित होते हैं। अपने शरीर को किसी तरह का कष्ट न देना पड़े, इसलिए दुनिया भर का जंक फूड खाते हैं। होटलों का खाना खाने के लिए मचलते रहते हैं। अभोज्य पदार्थों का सेवन करते हैं।
सादा और सन्तुलित भोजन खाने के नाम पर हमें कष्ट होता है। हम नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, मुँह बनाते हैं। घर में झगड़ा तक कर बैठते हैं। अब आप खुद बताइए कि ऐसी अवस्था में हमारा पेट बेचारा क्या करेगा? यह किसी एक की बात नहीं है, हम सभी ऐसा ही करते हैं। फिर दोष दूसरों को देते हैं। ऐसे दोषपूर्ण और अमर्यादित खान-पान के कारण बीमारियाँ शरीर को गाहे-बगाहे घेरती ही रहेंगी।
हमारी जीभ स्वाद के लालच में आकर लपलपाएगी। हम बस उसी के चक्कर में पड़कर स्वयं को लाचार बना लेते हैं।
हमारे सोने-जागने का कोई समय नहीं है। हम रात को देर से सोते है और फिर प्रात: देर से उठते हैं। जो उल्टा-सीधा मिला, बस उसे ही खाकर अपने काम पर निकल जाते हैं। इसी तरह खाना खाने का भी कोई समय नहीं बनता। जिस भोजन के लिए सारे पाप-पुण्य, भ्रष्टाचार, कदाचार सब करते हैं, उसी को खाने के लिए हमारे पास समय का सदा अभाव रहता है। शेष सभी सांसारिक कार्य हमारे लिए इससे ज्यादा आवश्यक हो जाते हैं।
आजकल अन्न, फल और सब्जियों आदि में डलने वाले कीटनाशक भी हमारे शरीर की प्रतिरोधक शक्ति को और अधिक कमजोर कर रहे हैं। इससे भी अनेक रोगों में बढ़ोत्तरी हो रही है।
इन सबसे अधिक दूषित होता हुआ पर्यावरण, जो हमारी सबकी लापरवाही का परिणाम है, वह भी हमारे बहुत से रोगों का कारण है।
जब हमारा खान-पान और रहन-सहन ऐसा हो जाएगा तो हम डाक्टरों के चक्कर लगाते हुए अपनी मेहनत की कमाई और पैसा व्यर्थ बर्बाद करते रहेंगे। मैं यह तो नहीं कहूँगी कि सभी लोग 'सादा जीवन उच्च विचार' वाली नीति का जबरदस्ती पालन करें। स्वेच्छा से इसका अनुकरण करना श्रेयस्कर होता है।
सौ वर्ष की आयु तक जीने के लिए आँख, नाक, कान आदि सभी इन्द्रियों का स्वस्थ होना बहुत आवश्यक है। यदि ये सभी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाएँगी और शरीर रोगी हो जाएगा, तब तो जीवन भार बन जाएगा। जीने का आनन्द भी नहीं आएगा। उस समय मनुष्य बस दिन-रात, उठते-बैठते ईश्वर से मृत्यु की कामना करता रहेगा। अपने जीवन का शतक पूरा करने के लिए जीवन में पहले आत्मसंयम और आहार-विहार पर ध्यान देना चाहिए। बाकी सब ईश्वर पर छोड़ देना ही बेहतर है क्योकि वह सब जानता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 22 नवंबर 2018
सबका सहयोग अपेक्षित
मनुष्य को अपना जीवन बाधारहित चलाने के लिए उसे सबका सहयोग अपेक्षित होता है। घर-परिवार में शांति बनी रहनी चाहिए यह आवश्यक है। छोटे-बड़े सभी कार्यों को करने के लिए उसे बहुत से दूसरे लोगों की आवश्यकता होती है।
प्राय: घर में काम करने वालों में आया और कामवाली बाई की प्रत्यक्ष रूप से भूमिका होती है। घर की सफाई, बर्तनों की धुलाई, कपड़ों की धुलाई, घर की झाड़-पौंछ आदि कार्य यदि घर में एक दिन भी न हों तो बस तूफान आ जाता है। ऐसा लगता है कि सब अस्त-व्यस्त हो गया है। घर में हर ओर गंदगी का साम्राज्य दिखाई देता है। फिर न खाने का मजा, न बैठने में चैन।
ऐसे समय में बच्चों की मौज हो जाती है क्योंकि प्रायः बाजार से खाना मंगवा कर खा लिया जाता है। जब सारे कार्य स्वयं करने पड़ते हैं तो बुखार चढ़ने लगता है। सारा समय चिड़चिड़ाहट का माहौल बन जाता है घर का सुख चैन मानो छिन जाता है। कहीं जाना हो तो सब कैंसिल।
घर से यदि सफाई कर्मचारी चार दिन तक कचरा लेने न आए तो घर में बदबू आने लगती है और यदि किसी लोकेलिटी से कचरा न उठे तो वातावरण में दुर्गन्ध फैल जाती है। इसी तरह यदि घर का सीवर बंद हो जाए तो सफाई कर्मचारी की सहायता के बिना वह कदापि खुल नहीं सकता। ऐसा ही हाल दफ्तर आदि का भी हाल होता है।
जो लोग अपने ड्राइवर पर निर्भर रहते हैं उसके छुट्टी माँगने पर भड़क जाते हैं। ऐसा करते समय वे भूल जाते हैं कि उसका भी घर-परिवार है और उसको भी तो किसी समस्या से दो-चार होना पड़ सकता है।
धोबी यदि कुछ दिन कपड़ों को प्रेस न करे तो घर में बिना प्रेस के कपड़ों का बहुत बड़ा ढेर लग जाता है। घर से बाहर जाते समय पहनने के लिए कपड़े नहीं मिलते तो कपड़े स्वयं प्रेस करने पड़ जाते हैं।
समय के अभाव में एक झंझट और बढ़ जाता है।
इसी प्रकार इलेक्ट्रिशियन, पलंबर,
कारपेंटर, केबल वाला, माली, नाई आदि के न मिल पाने की स्थिति में भी मनुष्य को अनावश्यक रूप से परेशानी होती है।
वैसे जब तक सब ठीक-ठाक चलता रहता है तो बढ़िया अन्यथा हम स्वयं को दुनिया का सबसे दुखी इंसान समझने लगते हैं। जरा-सी भी परेशानी आने पर हम ईश्वर को दोष देने लगते हैं और उसे कोसते रहते हैं।
अपने गिरेबान में यदि झांककर देखें तो हमें स्वयं पर ग्लानि होने लगेगी। बहुत से ऐसे लोग हैं जो अपने पास काम करने वाले नौकर, माली, ड्राइवर आदि को नाम से पुकारने में भी अपनी हेठी समझते हैं। उनके बिना एक कदम भी नहीं चल सकते पर पैसे का ऐसा नशा है जो उन सबको एक इंसान मानने से भी इन्कार करते हैं जैसे उनका कोई वजूद ही नहीं है।
सभी कार्य करने वालों को उनका मानदेय (हक का पैसा) ऐसे देते है जैसे उन पर उपकार कर रहे हों।
कभी उन सबको उनके नाम से पुकार कर देखिए, उनकी दुख-परेशानियों में उनसे सहानुभूति जताइए, उनके कंधे पर हाथ रखकर यह दिखाइए कि वे भी आप ही की तरह इंसान हैं, वे सब आपके मुरीद हो जाएँगे। आपके कष्ट के समय एक ही इशारे पर भागे चले आएँगे।
किसी भी व्यक्ति को उसके व्यवसाय को आधार मानकर उससे घृणा करना छोड़ दीजिए। ईश्वर की बनाई सृष्टि के जीवों से जो व्यक्ति भेदभाव करता है या नफरत करता है उससे वह बहुत नाराज होता है। जब वह सबको समान दृष्टि से देखता है तो किसी को हक नहीं देता कि वह अन्य जीवों से अन्याय करे।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 21 नवंबर 2018
पुरुषार्थ से कार्य सिद्ध
परिश्रम करने से ही कार्य सिद्ध होते हैं केवल कामना करने से नहीं। इसी विचार को निम्न श्लोक में उदाहरण सहित कवि ने बहुत सुन्दर शब्दों में बताया है-
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगाः॥
यहाँ कवि ने जंगल के राजा शेर का सटीक उदाहरण दिया है। शेर चाहे जंगल का राजा कहलाता है और कोई अन्य पशु शक्ति में उसका मुकाबला नहीं कर सकता फिर भी भोजन के लिए उसे शिकार करना पड़ता है। उनका राजा भूखा है ऐसा सोचते हुए कोई पशु उसके मुँह में स्वयं ही नहीं चला जाता।
इसका अर्थ यह है कि चाहे कोई मनुष्य कितना भी शक्तिशाली या धनवान क्यों न हो उसे परिश्रम करने पर ही सफलता प्राप्त होती है। वह स्वयं चलकर नहीं आती कि भाई लो मैं आ गयी अब तुम ऐश करो।
परिश्रमी व्यक्ति ही अपने लक्ष्य को पा सकते हैं चाहे वह शेर जैसे खूंखार और हाथी जैसे बलशाली पशुओं को वश में करने का कार्य ही क्यों न हो। वह अपनी मेहनत से आकाश की ऊँचाइयों को छूने का हौंसला रखता है। समुद्र की गहराई में पैठकर मोती निकाल कर ले आता है। ऐसा व्यक्ति हम सबके जीवन के ऐशो-आराम के लिए तरह-तरह अविष्कारों से हमें चमत्कृत कर देता है।
जीवन में हाथ पर हाथ रखकर बैठने वाला अर्थात् परिश्रम से जी चुराने वाला जीवन में कभी आगे नहीं बढ़ पाता और न ही सफलता की बुलन्दियों को छू सकता है। आलसी व्यक्ति भाग्य के भरोसे हाथ पर हाथ रखकर बैठता है। वह तो मलूक दास जी के अनुसार बस यही सोचता रहता है-
अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम।
दास मलूका कह गए सबके दाता राम॥
अर्थात् अजगर किसी की चाकरी नहीं करता और पक्षी भी काम नहीं करता फिर भी भगवान उन सबको भोजन देता है। वे सोचते हैं कि ईश्वर उन आलसियों का भी पालन-पोषण करेगा।
ऐसे लोग इस पृथ्वी पर भार की तरह होते हैं जो प्रायः अपना व अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण नहीं कर सकते। इसलिए हर ओर तिरस्कृत होते हैं। ऐसे लोग सारा जीवन अभावों में व्यतीत करते हैं। सारा जीवन असंतुष्ट रहते हैं कभी संतुष्टि नहीं प्राप्त कर सकते। ये लोग भूल जाते हैं कि केवल भाग्य के आश्रित रहकर दुनिया में जीना कठिन होता है।
इसके विपरीत केवल पुरुषार्थ के बल पर भी अपना स्थान बना पाना नामुमकिन तो नहीं कठिन अवश्य होता है। पुरुषार्थ और भाग्य दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। दोनों का संयोग सोने पर सुहागा होता है। वैसे कहा यह भी जाता है कि मनुष्य अपने भाग्य का विधाता स्वयं है या उसका भाग्य उसके अपने हाथ में है। वह जैसा चाहे अपना मार्ग स्वयं चुन सकता है। उसके लिए बस दृढ़ इच्छा शक्ति का होना परम आवश्यक है।
पुरुषार्थ करने वाले व्यक्ति को सभी पुरुषसिंह कहते हैं। वही अपने इस छोटे से जीवन में जो प्राप्त करना चाहता है हासिल करके ही चैन लेता है। यदि जीवन में कभी असफलता का मुँह देखना भी पड़ जाए तो हिम्मत न हार कर चींटी की तरह अपने कर्मक्षेत्र में पुनः उत्साहित होकर पूर्णरूपेण जुट जाना चाहिए।
सफलता प्राप्त करने के दिन-रात एक करके जी तोड़ मेहनत करनी पड़ती है व पसीना बहाना पड़ता है तब जाकर वह हमारे कदम चूमती है। इसलिए आलस्य त्याग कर नव स्फूर्ति व नये उत्साह से अपने लक्ष्य प्राप्ति से जुट जाएँ और सफल बनें।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 20 नवंबर 2018
लोकप्रिय बनने की कुञ्जी
लोकप्रिय बनने की कुञ्जी
जीवनकाल में लोकप्रिय होने वाले व्यक्ति को सदा विनम्र होना चाहिए। उसे अपने ज्ञान, धन-वैभव, सौन्दर्य, यौवन, शक्ति, कुल आदि का घमण्ड नहीं करना चाहिए। अपने लिए अभिमानसूचक शब्दों का प्रयोग करने से भी बचना चाहिए। इसी कड़ी में स्वयं के लिए यथासम्भव ‘हम’ शब्द का प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार हर समय ‘मैं’ शब्द का उपयोग भी नहीं करना चाहिए। ऐसे मनुष्य को लोग अभिमानी कहकर उससे अपना पल्ला झाड़ने का ही प्रयास करते हैं।
बहुत से अपने बन्धु-बान्धव ऐसे होते हैं जो वास्तविक जीवन में दूसरों के साथ तो शतरंज का खेल खेलते ही रहते हैं पर अपनों को भी नहीं छोड़ते। यह बात विचारणीय है कि यदि कोई मनुष्य यह सोचता है कि वह किसी को धोखा देने में सफल हो गया है। इसलिए वह किसी की आँखों में धूल झोंक सकता है तो उसकी यह सोच सर्वथा अनुचित होती है। अथवा कहें तो वह दूसरों को नहीं स्वयं को ही धोखा दे रहा होता है।
इस संसार की अदालत में यदि वह अपने रुतबे या किसी अन्य कारण से सजा पाने से बच जाता है तो यह उसकी जीत हो गई है। इस संसार की अदालत से तो मनुष्य बरी हो सकता है पर उसे ईश्वर की अदालत में न्याय निश्चित ही मिलता है। धोखा देने वाले को भी बदले में कभी-न-कभी धोखा अवश्य खाना पड़ता है। उस समय मनुष्य को जो पीड़ा भुगतनी पड़ती है, वह असह्य होती है।
मनुष्य को हर किसी व्यक्ति पर इतना विश्वास नहीं करना चाहिए कि वह उसे इतना बड़ा धोखा दे जाए कि उसके दिए हुए जख्म से उभर पाना उसके लिए कठिन हो जाए। बाद में उसके पास फिर पश्चाताप करने के अतिरिक्त कोई चारा न बच पाए। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि अपने दिल में किसी दूसरे को उतनी ही जगह देनी चाहिए जितने का पलट वार वह सहन कर पाने की सामर्थ्य उसमें हो अन्यथा जीवन भर रोने का सामान एकत्र हो जाएगा।
मनुष्य को अपना व्यवहार इतना सन्तुलित और सशक्त बनाना चाहिए कि यत्न करने पर भी कोई उसके चरित्र में कमी न खोज सके। उसके विषय में यदि कोई अनर्गल प्रलाप करे भी तो उसकी बात पर कोई भी विश्वास न करे। उल्टे दोषारोपण करने वाले को ही सबके सामने मुँह की खानी पड़ जाए। उसकी किरकिरी हो जाए और वह सबसे मुँह छुपाता फिरे।
वास्तव में मनुष्य को शुभचिन्तक की तलाश सदा करते रहना चाहिए। ताकि वह उससे अपनी हर समस्या का समाधन कर सके। अपने सुख-दुःख उसके साथ साझा कर सके। वह उससे हर प्रकार के विषयों पर बिना हिचकिचाए चर्चा कर सके। ऐसा सहृदय व महान व्यक्ति कभी किसी व्यक्ति को धोखा नहीं दे सकता, वह सदा सबके साथ सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता है।
आजकल समाज में बहुत विचित्र- सा चलन हो रहा है। वह यहाँ असफल लोगों की वह हंसी उडाता है और सफल लोगों से द्वेष करता है, जलता हैं। इस बात को सदा समरण रखना चाहिए कि सफल लोग बिना समय व्यर्थ गँवाए, इधर-उधर देखे अपने लक्ष्य की ओर निरन्तर कदम बढ़ाते रहते हैं। वे न तो किसी को परेशान करते हैं और न ही किसी की अनावश्यक परवाह करते हैं। उन्हें किसी से भी कोई मतलब नहीं होता। दूसरे शब्दों में कहें तो वे न तीन में होते हैं और न तेरह में। वे बस अपनी ही धुन में रहते हैं।
हम कह सकते हैं कि लोकप्रिय होने के लिए अपने लक्ष्य या उद्देश्य में सफल होना भी आवश्यक होता है। सफलता न तो किसी की बपौती है और न ही इसे पाना टेढ़ी खीर है। कोई भी व्यक्ति कुछ छोटी-छोटी बातों को ध्यान रखकर सफलता के सोपनों पर चढ़ सकता है। यदि यह सिर पर चढ़कर बोलने लगे तो मनुष्य का पतन स्वाभाविक होता है। इसलिए सफलता प्राप्ति के साथ ही विनम्रता रूपी आभूषण को ग्रहण करना भी आवश्यक हो जाता है। तभी यह सफलता दीर्घकाल तक साथ निभाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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