शनिवार, 19 जनवरी 2019

शब्दों का प्रयोग

केवल मनुष्य को ही परमात्मा ने वाणी या जिह्वा जैसी नेमत प्रदान की है, उसके कारण ही वह अपने विचारों को व्यक्त करता है। पशुओं को ईश्वर ने यह वरदान नहीं दिया। शब्द जिनका हम सभी मनुष्य उच्चारण करते हैं, वे हमारे कर्म का ही एक रूप होते हैं। जब मनुष्य उन्हें बोलता है तो उसके बोलने से उसके संस्कारों का भी भान होता है। इसीलिए मनीषी समझाते हैं कि अपने हर शब्द को बोलने से पहले उसे तोल लेना बहुत ही आवश्यक होता है। अन्यथा उसका दुष्परिणाम सिर्फ मनुष्य को स्वयं ही नहीं भोगना पड़ता, बल्कि उसका सम्पूर्ण परिवेश उससे प्रभावित होता है।
         संसार में केवल मनुष्य ही एकमात्र ऐसा प्राणी है, जिसका जहर उसके दाँतों में नहीं होता बल्कि उन शब्दों में होता है, जिनका वह उच्चारण करता है। मनुष्य की यही वाणी उसे उच्च सिंहासन पर आसीन करती है अथवा नीचे पाताल में धकेल देती है। मनुष्य का मधुर अथवा कटु व्यवहार उसके उत्थान या पतन का कारण बनता है। उसी के कारण समाज में उसकी पहचान बनती है। उसकी बोलचाल के ढंग से उसके मित्रों अथवा शत्रुओं की संख्या बनती है।
          यदि मनुष्य हर समय व्यंग्य बाण छोड़ता रहता है तो उसके प्रिय साथी भी उससे किनारा करने लगते हैं। ये कटु शब्द सामने वाले के मन पर गहरा वार करते हैं। कोई भी व्यक्ति अपमानित नहीं होना चाहता। सभी लोग उससे घृणा करने लगते हैं। अपनी इस कड़वी जबान के कारण वह समाज से कटकर अलग-थलग पड़ जाता है। जब तक वह अपने शब्दों पर नियन्त्रण नहीं करता, तब तक सब उससे दूर ही रहते हैं। इस वाणी का दुरुपयोग करने से भयंकर उलट-फेर हो सकता है। कविवर रहीम ने उचित ही कहा है -
    रहीमन जिभ्य बावरी, कह गई सरग पाताल।
    आप तो भीतर  ही रही, जूते खात  कपाल।।
अर्थात् जिह्वा अपशब्द बोलकर, स्वयं तो मुँह के अन्दर छिप जाती है, पर जूते बेचारे सिर पर पड़ते हैं।
        कबीरदास जी कहते हैं कि कड़वे बोल शरीर को जलाते हैं-
    कुटिल वचन सबसे बरस, जारी कर तन छारि।
         इसके विपरीत सबसे मधुरता से बोलने वाले व्यक्ति के साथियों की संख्या निरन्तर बढ़ती रहती है। वह सबका प्रिय बन जाता है और लोग उसे अपने सिर-आंखों पर बिठाते हैं। सर्वत्र उसकी चर्चा होती है, लोग उसकी प्रशंसा करते नहीं थकते। इस तरह अनेक हाथ उसका साथ देने के लिए आगे बढ़ने लगते हैं। उसके सुख-दुख में साथ देने के लिए तैयार हो जाते हैं। मधुर वचन घाव पर मरहम लगाने का काम करते हैं। वे उस शीतल पानी की तरह होते हैं, जो भयंकर आग को भी बुझा सकता है।
        इसीलिए कबीरदास जी हमें समझाते हुए कह रहे है -
     मधुर वचन है औषधि, कटुक वचन है तीर।  
अर्थात् मधुर वचन दूसरे के घाव पर औषधि का कार्य करते हैं, परन्तु कड़वे शब्द उसे तीर की तरह चुभते हैं।
          अनुभवजन्य बात है कि तलवार या किसी शस्त्र के वार से जो घाव हो जाता है, वह इलाज हो जाने पर यथासमय भर जाता है। परन्तु शब्दों के वार से होने वाला घाव नहीं भर पाता, उसका तो इलाज भी सम्भव नहीं होता। उस घाव की चुभन या कसक सदा टीस देती रहती है। जब इन्सान विचारमग्न होकर अकेले बैठता है, तब उसके सभी जख्म हरे हो जाते हैं और वे पुराने हुए हुए दर्द पुनः उसे कटार के चुभने जैसी पीड़ा देते हैं। उस समय वह अनमना होकर उन घावों को सहलाने का असफल प्रयास करता है।
          एवंविध इस सम्पूर्ण विश्लेषण का सार यही निकलता है कि समझदार मनुष्य को अपने शब्दों का प्रयोग सदा ही सोच-विचारकर, सावधनीपूर्वक करना चाहिए। मनुष्य को निश्चित ही ऐसे शब्दों का प्रयोग करना चाहिए, जिससे सामने वाले के मन को किसी तरह की ठेस न पहुँचे। उसका अन्तर्मन उसके शब्द प्रहार से आहत होकर तार-तार न होने पाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

सिंगल चाइल्ड

आज कॉम्पिटीशन के दौर में युवा अपनी नौकरी एवं व्यवसाय में इतना अधिक व्यस्त हो गए हैं कि उन्हें अपने लिए भी समय नहीं मिल पाता। प्रात: जाने के समय तो वही होता है, परन्तु घर लौटने का उनका कोई समय नहीं होता। अपने भाई-बन्धुओं से मिलने के लिए भी वे समय नहीं निकाल पाते। इससे भी बढ़कर सामाजिक कार्यों में सम्मिलित होना भी उनके लिए कठिन होता जा रहा है। इस तरह वे समाज से कटते जा रहे हैं।
          चाहे युवक हों या युवतियाँ अपने कैरियर को लेकर सभी बहुत सावधान रहते हैं। इसलिए घर से दूर, अपने देश या विदेश में कहीं भी जाना उनकी मजबूरी बनती जा रही है। संयुक्त परिवार के स्थान पर एकल परिवारों के बढ़ने का यह भी एक प्रमुख कारण है। शायद यही कारण है कि आज भारत में सिंगल चाइल्ड वाले परिवारों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। कुछ युवा कहते हैं कि उनके पास बच्चे पैदा करने का समय नहीं है। यानी वे एक भी बच्चा पैदा नहीं करना चाहते। इन परिवारों को न तो अपने बुजुर्गों का साथ मिल पा रहा है और न ही अपने भाई-बहनों का। घर-परिवार से दूर रहते ये युवा अपने पारिवारिक सुख-दुख में चाहते हुए भी शामिल नहीं हो पाते, इस बात का उन्हें बहुत दुख रहता है।
         कहाँ घर बच्चों की किलकारियों से गूँजता रहता था, वहीं आज शान्ति पसरी रहती है। एक बच्चे का यह चलन हमारी पूरी पारिवारिक संस्था पर ही प्रश्र चिन्ह लगा रहा है। इस तरह भाई-बहन का रिश्ता भी समाप्त होता जा रहा है। यदि परिवार में इकलौता बेटा है तो उसकी आने वाली पीढ़ी चाचा-चाची, ताऊ-ताई और बुआ-फूफा आदि के रिश्तों से हमेशा के लिए अनजान रह जाऐंगी। इसी तरह यदि इकलौती सन्तान बेटी होती है तो उसकी आने वाली पीढ़ी को मामा-मामी और मौसी-मौसा आदि का रिश्ता नहीं मिलेगा। सिंगल चाइल्ड की यह सोच सामाजिक तानेबाने के लिए घातक सिद्ध हो रही है।
          सबसे बड़ी समस्या यह है कि एक पूरी पीढ़ी  बचपन से ही एकाकीपन और असामाजिकता का शिकार होती जा रही है। इसके चलते बच्चों का सम्पूर्ण व्यक्तित्व ही प्रभावित हो रहा है। ये बच्चे आत्मकेन्द्रित और आक्रामक बनते जा रहे है। इन  इकलौते बच्चों को किसी के साथ अपना बिस्तर, खिलौने, पुस्तकें आदि साझा करना आता ही नहीं है। इन बच्चों को अपने बराबर के बच्चों के साथ सामञ्जस्य स्थापित करना भी नहीं आता। घर में यदि कोई मेहमान आ जाए तो ये परेशान हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनकी प्राइवेसी में दखल दिया जा रहा है। बार-बार पूछते हैं कि वह अतिथि कब जाएगा।
       अपने माता-पिता से आवश्यकता से अधिक प्यार-दुलार पाकर ये बच्चे बिगड़ते जा रहे हैं। कहीं बच्चा नाराज न हो जाए, कहीं कुछ कर न बैठे, इस कारण माता-पिता उनकी हर जायज-नाजायज माँग को मान लेते हैं। वे सदा उनकी खुशी में खुश रहना चाहते हैं। स्वयं को इतना अधिक महत्त्व मिलते देखकर ये बच्चे दिन-प्रतिदिन जिद्दी और घमण्डी बनते जा रहे हैं। ये अपने सामने किसी को कुछ समझते ही नहीं हैं। ये सोचते हैं कि जो उन्होंने कहा दिया, बस वही पत्थर की लकीर है। उनकी बात को काटने का किसी को अधिकार नहीं है, फिर वे चाहे उनके माता-पिता ही क्यों न हों।
          इकलौते बच्चों का व्यवहार और उनकी कार्यशैली उन बच्चों से बिल्कुल अलग होती है, जो अपने हमउम्र भाई-बहनों के साथ बड़े होते हैं। भाई-बहनों के साथ रहते हुए उन्हें अपनी वस्तुएँ साझा करनी आ जाती हैं। उन्हें परस्पर सामञ्जस्य स्थापित करना आ जाता है। वे छोटों और बड़ों के साथ कुशलता से व्यवहार कर लेते हैं। बड़े भाई या बहन को देखकर, बिनकहे ही वे बहुत कुछ सीख जाते हैं। लड़ते-झगड़ते वे कब बड़े हो जाते हैं, पता ही नहीं चलता।
         अपने कैरियर के प्रति सावधान आज की युवापीढ़ी अकेले बच्चे के दर्द से अनजान बनी हुई हैं। अकेले बच्चे सारा दिन पुस्तकें पढ़कर, टी. वी.देखकर, वीडियोगेम खेलकर अथवा मोबाइल से अपना मन बहलाने का असफ़ल प्रयास करते हैं। माता-पिता के पास समय न होने के कारण उनका साथ भी उन्हें सीमित ही मिल पाता है और फिर बच्चे कितनी देर तक उनके साथ भी बात कर सकते हैं। ऐसे बच्चे जब समझने लायक हो जाते हैं, तब उन्हें अकेलापन बहुत अखरता है। अपने माता-पिता से बच्चे हर समस्या को नहीं डिसकस कर सकते। वे अपने मन की बात या कोई समस्या किसके साथ साझा करें, उन्हें यह समझ नहीं आता।
          नौकरों के हाथ में पलने वाले बच्चों की समस्याएँ वास्तव में विचारणीय हैं। आज के युवा मस्त-पिता को भी इस विषय पर अवश्य मनन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 17 जनवरी 2019

ईश्वर के नाम की कमाई

तिनका-तिनका जोड़कर मनुष्य अपने जीवनकाल में स्वयं के लिए तथा अपने परिवारी जनों के लिए धन-दौलत, मोटर-गाड़ियाँ और सारे ऐश्वर्य के साधन जुटाता है। वस्त्रों का भण्डार एकत्र करता है। सोने-चाँदी, हीरे जवाहरात के आभूषण खरीदता है। उन सबको देख-देखकर प्रसन्न होता है। पर वही इन्सान जब इस दुनिया से विदा होकर परलोक की यात्रा के लिए निकल पड़ता है, तब उसके द्वारा इस्तेमाल किए गए सभी सामान यानी उसके पहने हुए कपड़े, उसका बिस्तर, उसके जूते-चप्पल आदि उसी के साथ ही तत्क्षण घर से निकालकर बाहर रख दिए जाते है या किसी को दे दिए जाते हैं। उसकी अलमारी में रखे सभी वस्त्र, जूते, चप्पल आदि किसी को दे दिए जाते हैं।
          मृत व्यक्ति को कुछ घण्टे भी घर में न रख सकने वाले बन्धुजन उस व्यक्ति के पहने हुए वस्त्रों के साथ आभूषण तक उतार लेते हैं। परन्तु उसके द्वारा कमाई गई धन-दौलत, उसके गाड़ी-बंगले को किसी को न देकर उसके बच्चे आपस में बाँट लेते हैं। उसके लिए लड़ाई-झगड़ा करते हैं। मरने वाले अपने प्रियजन से अधिक उन्हें उसकी वसीयत चिन्ता सताती है। सब कुछ पा लेने के पश्चात भी वे यही कहते हैं कि 'हमें क्या दिया है?'
          हम समाचार पत्र में, टी. वी. एवं सोशल मीडिया पर बहुत बार ऐसी खबरें आती हैं कि किसी भी प्रकार की दुर्घटना घटने पर लोगों की घड़ियाँ, मोबाइल, पर्स व आभूषण की लूटमार कुछ असामाजिक तत्व करते हैं। उनके मन में शायद जरा भी संवेदना नहीं होती, तभी वे इस प्रकार का दुष्कर्म करते हैं। मृतकों एवं घायलों के साथ किया जाने यह दुष्कृत्य निन्दनीय होता है। फिर भी वे ऐसा करते हैं।
          मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि मृतक कितना भी प्रिय हो, उसे घर में कुछ घण्टे रख पाना भी कठिन होता है, परन्तु उसकी मेहनत से कमाई हुई धन-दौलत व प्रॉपर्टी को उसके परिवारी जन समेट लेते हैं। उसकी बदौलत अपनी इच्छाओं की पूर्ति करते हैं। बड़े दुख की बात है कि वे उसका साथ नहीं निभा पाते। मनुष्य को अकेले ही इस संसार से विदा लेनी होती है। यह विडम्बना ही है कि जिनके लिए वह सारा जीवन खटता रहता है, उनमें से कोई भी उसका साथ देने के लिए खड़ा नहीं होता।
       इसी भाव को लेकर कबीरदास जी ने बहुत सटीक लिखा है -
         हाड़ जले ज्यूँ लाकड़ी,
         केस जले ज्यूँ घास।
         कंचन जैसी काया जल गई,
         कोई न आयो पास।
         जगत में कैसो नातो रे,
         कोई न रह्यो साथ।
अर्थात् मनुष्य का शरीर लकड़ी की तरह जलता है, उसके बल घास की तरह जल जाते हैं। सोने जैसा मनुष्य का शरीर जब जल रहा होता है, उस समय कोई उसके पास नहीं आता। वे प्रश्न करते हैं कि संसार के लोगों से मनुष्य का किस प्रकार का रिश्ता है कि उसके अन्तिम समय में कोई भी उसके साथ नहीं होता।
          इसलिए दुनिया में रहते हुए अपने दायित्वों का निर्वहण सच्चाई और ईमानदारी से करना चाहिए। इस सत्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि जैसे मुट्ठी बाँधे खाली हाथ मनुष्य अकेले ही इस दुनिया में आया था, वैसे ही मुट्ठी बाँधे खाली हाथ इस संसार से विदा भी होना पड़ेगा। मनुष्य इस संसार में वह जो भी स्याह-सफेद करता है, उसे उनका फल स्वयं ही भोगना पड़ता है। उसकी धन-सम्पत्ति को उसके परिवारी जन बाँट लेते हैं, पर उसके किए गए शुभाशुभ कर्मो का साथी कोई नहीं बनता।
          इस सब पर विचार करने के बाद यही विचार मन में आता है कि मनुष्य का ही सच्चा साथी ईश्वर है। वही है जो कैसी भी परिस्थिति हो, उसका साथ निभाता है। उसके नाम का जाप करने से मनुष्य को कभी निराश नहीं होता, बल्कि उसे शान्ति मिलती है। जो भी उपाय उसे पाने के लिए मनुष्य करता है, वे कभी व्यर्थ नहीं होते। इसके लिए उसे पश्चाताप करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रयत्नपूर्वक की गई इस कमाई को न तो कोई छीन सकता है और न ही कोई चुरा सकता है। परिवारी जनों में इसका बटवारा भी नहीं किया जा सकता। यह एकमात्र ऐसी कमाई है, जो जन्म-जन्मान्तरों तक मनुष्य का साथ निभाती है। इस नामधन रूपी कमाई को कमा कर मनुष्य को कभी पछताना नहीं पड़ता।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 16 जनवरी 2019

ईश्वर का निवास हृदय

उपनिषदों, गीता और पुराणों का कथन है कि ईश्वर का परिमाण अंगुष्ठ मात्र है तथा वह हमारे हृदय में निवास करता है। उसका साक्षात्कार के लिए बाहर कहीं भी भटकने की आवश्यकता नहीं है। अपने अन्तस् में जो झाँक लेता है, उसे वह वहीं मिल जाता है। अपने अन्तस् में झाँकना ही सबसे कठिन कार्य है। उसके लिए स्वयं को साधना पड़ता है। यम-नियम आदि का पालन करना होता है। यह तप मनुष्य कर नहीं पाते, इसलिए मालिक से उनका साक्षात्कार नहीं हो पाता।
        इस विषय में एक बहुत ही रोचक बोधकथा कुछ दिन पूर्व पढ़ी थी। पसन्द आई, आप सबसे साझा करने की इच्छा हुई। कहते हैं इस सुन्दर सृष्टि की रचना करने के उपरान्त भगवान दुविधा में पड़ गए। जब भी कोई मनुष्य मुसीबत में घिर जाता है, तभी वह उनके पास भागा-भागा आता है और अपनी परेशानियाँ उन्हें सुनाता है। सब कुछ लेने के बाद भी मनुष्य को सन्तोष नहीं, वह हर समय प्रभु से कुछ-न-कुछ माँगता ही रहता है।
         अन्तत: उन्होंने इस समस्या का निराकरण करने के लिए देवताओं की एक बैठक बुलाई और कहा, "देवताओं, मैं मनुष्य की रचना करके कष्ट में पड़ गया हूँ। कोई-न-कोई मनुष्य हर समय मुझसे शिकायत ही करता रहता हैं। मै सब मनुष्यों को उनके कर्मानुसार सब कुछ दे रहा हूँ। फिर भी जरा-सा कष्ट होने पर इन्सान मेरे पास भाग चला आता है। इससे न तो मैं कहीं शान्तिपूर्वक निवास कर सकता हूँ और न ही तपस्या में लीन हो सकता हूँ। आप लोग कृपया मुझे ऐसा स्थान सुझाएँ, जहाँ मनुष्य नाम का यह प्राणी कभी मेरे पास पहुँच न सके।"
         प्रभु के विचारों का आदर करते हुए सभी देवताओं ने अपने-अपने विचार प्रकट किए। सूर्यदेव बोले, "प्रभु, आप हिमालय पर्वत की चोटी पर चले जाएँ।"   
       भगवान ने कहा, "यह स्थान तो मनुष्य की पहुँच में हैं। उसे वहाँ तक पहुँचने में अधिक  समय नहीं लगेगा।"
       इन्द्रदेव ने सलाह दी, "आप किसी महासागर में निवास करें।"
       भगवान बोले, "वहाँ पर आवागमन करता हुआ मनुष्य नित्य पहुँचा करेगा।"
      वरुणदेव ने परामर्श दिया, "आप अंतरिक्ष में चले जाइए।"
         भगवान ने कहा, "एक दिन मनुष्य वहाँ भी अवश्य पहुँच जाएगा।"
        अब भगवान निराश होने लगे थे। वे अपने मन-ही-मन सोचने लगे, “क्या मेरे लिए कोई भी ऐसा गुप्त स्थान नहीं हैं, जहाँ मैं शांतिपूर्वक रह सकूँ।"
         अन्त में गणेशजी भगवान से बोले, "प्रभु! आप मनुष्य के हृदय में ही जाकर विराजमान हो जाइए। मनुष्य आपको स्थान-स्थान पर ढूंढने में ही सदा उलझा रहेगा। वह अपने हृदय में आपकी तलाश कदापि नहीं करेगा।"
        भगवान को गणेशजी की सलाह बहुत पसन्द आई। उन्होंने ऐसा ही किया और उन्होंने मनुष्य के हृदय में अपना निवास बना लिया।
         उस दिन से आज तक मनुष्य अपने दुखों और परेशानियों को व्यक्त करने के लिए भगवान को मन्दिर, तीर्थस्थल, ऊपर-नीचे, आकाश-पाताल, जंगल, पर्वत सर्वत्र ही ढूंढ रहा है, पर वे हैं कि कहीं भी नहीं मिल रहे हैं। मनुष्य कभी भी अपने भीतर यानी 'हृदय रूपी मंदिर' में बैठे हुए भगवान को नहीं देख पाता। इसीलिए वह इधर-उधर भटकता रहता है। इसी चक्कर में वह तथाकथित धर्मगुरुओं, तान्त्रिकों, मन्त्रिकों आदि के जाल में फँसकर अपना धन तथा समय बर्बाद करता है, अपना जीवन नरक बना लेता है। जब चेतता है तो बहुत देर हो गयी होती है।
         मनुष्य को शान्तचित्त होकर प्रभु का स्मरण करते हुए ध्यान लगाना चाहिए। अपने हृदय में विद्यमान परमेश्वर को खोजने का प्रयास करना चाहिए। अपने कर्मों और विचारों की शुचिता पर उसका ध्यान देना आवश्यक होता है। जब मनुष्य का अन्त:करण शुद्ध और पवित्र होता है, तभी ईश्वर की प्राप्ति की ओर उसका कदम बढ़ता है। वह मालिक हमारे ही भीतर छिपकर बैठा हमारी प्रतीक्षा करता है। आवश्यकता है तो उसे अपने अन्तस् में ही खोजने की है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 15 जनवरी 2019

झूठन नहीं छोड़ें

हमारे शास्त्र एवं मनीषी अन्न को ब्रह्म कहते हैं अर्थात उसे ईश्वर का ही रूप बताते हैं। यह अन्न ही जीवों की जीवनी शक्ति है। इसी से हमारा शरीर पुष्ट होता है। इसी अन्न को पाने के लिए मनुष्य दिन-रात हाड़-तोड़ मेहनत करता है। दो जून भोजन पाने के लिए कोल्हू का बैल बन जाता है। तब जाकर कहीं उसे भोजन नसीब होता है। इतने परिश्रम से कमाए गए अन्न की बर्बादी करना सर्वथा अनुचित है। इस बात का ध्यान गृहणियों को सदा रखना चाहिए कि वे आवश्यकता से अधिक भोजन न पकाएँ, जिसे फैंकने की नौबत आ जाए।
        इसलिए अथक परिश्रम से कमाए हुए अन्न से पकाए भोजन को अपनी थाली में उतनी ही मात्रा में परोसना चाहिए, जितने की हमें आवश्यकता हो। जिसे हम खाकर समाप्त कर सकें। अनावश्यक ही लालच में आकर अथवा दूसरे लोगों की होड़ करते हुए इतना अधिक भोजन थाली में नहीं डाल लेना चाहिए, जिसे हम न खा न सकें। उसे हमें व्यर्थ ही नाली में फैंकना पड़ जाए। ऐसा करने से अन्न का बहुत अपमान होता है। अन्न का यह अपमान हम पर बहुत भारी पड़ता है।
          थाली या प्लेट में झूठन छोड़ना पाप माना जाता है। अन्न को झूठा नहीं छोड़ें, शायद इसलिए उसे पाप की संज्ञा दी गई है कि लोग डरें और अन्न को व्यर्थ ही बर्बाद न करें। फिर भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो थाली में झूठन छोड़ने को अपनी शान समझते हैं। शायद वे इसे अपना स्टेटस सिम्बल मानते हैं। शादी-पार्टियों में अन्न की बर्बादी को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है। लोग अपनी प्लेट को इतना भर लेते हैं जैसे उन्हें फिर खाने के लिए नहीं मिलेगा। ऐसा लगता है कि यहीं पर उन्हें पहली और आखिरी बार खाने के लिए मिलेगा। उतना खा नहीं सकते तो फिर उसे कूड़े में फेंक देते हैं। उनकी इस मानसिकता का कारण मुझे आज तक समझ में नहीं आया।
        शायद इसका कारण हो सकता है कि लोगों के पास पैसा अधिक आ रहा है। इसलिए वे पैसे का महत्त्व नहीं समझते और उसे अहमियत नहीं देते। उनकी मानसिकता यही बनती जा रही है कि वे पैसे से सब कुछ खरीद सकते हैं। यही कारण है कि आजकल लोग अन्न की तुलना पैसे से करने लगे हैं। तभी वे झूठन छोड़ते हैं और उसे फैंकते समय उनके मन को जरा भी कष्ट नहीं होता। वास्तविकता इसके विपरीत होती है। वे भूल जाते हैं कि अपने भारत में ही करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें एक समय का भोजन भी उपलब्ध नहीं होता। इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि कुछ लोग कचरे में से बीनकर खाते हैं। उनकी दुरावस्था को देखकर भी हम नहीं जाग पाते।
         हमारे पास पैसा है और हम अन्न तो क्या दुनिया की हर वस्तु खरीद सकते हैं, यह अहंकार मनुष्य को ले डूबता है। ईश्वर को अच्छा नहीं लगता कि मनुष्य अन्न का अपमान करे। धरती जो अपनी छाती चीरकर हम मनुष्यों को अन्न देती है, वह भी दुःखी होती है। हमारे मनीषी मानते हैं कि अन्न का तिरस्कार करने वालों को अगले जन्म में उसी अन्न के लिए तरसना पड़ता है। दूसरे शब्दों में कहें तो वे अन्न के एक-एक दाने के लिए तरसते हैं। उन्हें खाने के लिए भोजन नहीं मिलता। तब वे अपनी लाचारी पर खून के आँसू रोते हैं। वे दूसरों का मुँह ताकते रहते हैं कि कोई दया करके उन्हें थोड़ा-सा भोजन खिला दे।
         अन्न का अपमान करने वालों को इस जन्म में भी दण्ड मिलता है। उनका शरीर ऐसे रोगों का घर बन जाता है, जिनके कारण सब कुछ होते हुए भी न तो वे अन्न को खा पाते हैं और न ही उसे पचा पाते है। ऐसे समय में उनके अपार धन-दौलत का घमण्ड धरा-का-धरा रह जाता है। सब लोग मेज पर बैठाकर स्वादिष्ट खाना या पकवान खाते हैं और वे मूकदर्शक बने उस खाने को केवल देखते रहते हैं। थोड़ा-बहुत जो वे खा लेते हैं, उसे पचाने के लिए भी उन्हें दवाइयाँ खानी पड़ती हैं।
        आज भी बहुत से लोगों याद होगा, जब कुछ दशक पूर्व पाकिस्तान के साथ हमारे देश का युद्ध हुआ था, उस समय हमारे देश मे अन्न का संकट उत्पन्न हो गया था। गेहूँ, चीनी, चावल, सूजी, मैदा आदि सभी राशन पर मिलते थे। राशन की दुकानों पर लम्बी-लम्बी लाइनें लगती थीं। ओपन मार्किट में कुछ भी उपलब्ध नहीं था। विदेशों से लाल गेहूँ मंगया गया था। जिसका भुगतान बहुत समय तक करना पड़ा था। तत्कालीन प्रधानमन्त्री श्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने उस समय 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया था। उन्होंने देश से अपील की थी कि सप्ताह में एक समय का अन्न बचाएँ। उसके स्थान पर फल, आलू, शक्कर कन्द आदि खाएँ।
          ऐसी स्थिति देश में दुबारा न आए, इसके लिए सबको मिलकर प्रयास करना चाहिए। अन्न को व्यर्थ ही बर्बाद करने के स्थान पर उसे जरूरतमन्द को खिलाना चाहिए। घर में पार्टी आदि के बाद जो भी भोजन बच जाए उसे अपने आसपास गरीब लोगों को खिला देना चाहिए या किसी अनाथ आश्रम में दे आना चाहिए। अन्न का महत्त्व अपने बच्चों को भी समझना चाहिए ताकि उनके मन में गहरे बैठ जाए कि भोजन को व्यर्थ न करें। इस तरह नई पीढ़ी के मन में अन्न का सम्मान करने की भावना जागृत हो जाएगी। बड़े होकर वे अन्न को बचाएँगे।     
चन्द्र प्रभा सूद
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