बाल सुलभ चेष्टाओं को निहारते हुए हर व्यक्ति का मन बहुत प्रमुदित होता है। बच्चे जाने-अनजाने ऐसे करतब कर जाते हैं, जिन्हें किसी भी तरह क्षमा नहीं किया जा सकता। वे जो भी देखते हैं, उसी का अनुभव कर लेना चाहते हैं। यद्यपि उन्हें समझ में नहीं आता कि उनका वह कृत्य उचित था अथवा अनुचित। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि उन्हें हर अनुभव लेने दिया जाए। हम सब जानते हैं कि आग में हाथ डालने से वह जल जाएगा। बच्चा कितनी भी जिद्द क्यों न करे, उसे आग में हाथ डालने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
अच्छे लोगों की परीक्षा कभी नहीं लेनी चाहिए क्योंकि वे पारे की तरह पारदर्शी होते हैं। जब कोई उन पर चोट करता है तो वे टूटते नहीं हैं, लेकिन फिसल कर चुपचाप उसकी जिन्दगी से निकल जाते हैं। ऐसे हितसाधकों को खो देने से मनुष्य की बहुत हानि होती है। निन्दा से घबराकर मनुष्य को कभी अपने लक्ष्य का त्याग नहीं करना चाहिए। लोगों का काम तो कुछ-कुछ कहते रहने का होता है। जब मनुष्य अपने लक्ष्य को पा लेता है, उस समय उसकी निन्दा करने वालों की राय उस व्यक्ति विशेष के बारे में बदल जाती है। इसलिए अपने निर्धारित लक्ष्य पर बिना पीछे मुड़े हुए चलते रहना चाहिए।
कड़वा बोलने और सम्बन्ध तोड़ने में केवल एक पल लगता है, जबकि उन्हें बनाने और मनाने में पूरा जीवन लग जाता है। जहाँ तक हो सके अपने व्यवहार को सन्तुलित बनाए रखना चाहिए। दूसरों की गलतियों पर उन्हें क्षमा कर देना चाहिए। जो लोग दूसरों से प्रेम करते हैं वे सदा उन्हें माफ कर देते हैं। यह सत्य है कि प्रेम सदा क्षमा करना या क्षमा याचना करना पसन्द करता है। इसके विपरीत अहंकारी लोग सदा दूसरों को भला-बुरा कहते हैं और वे चाहते हैं कि लोग बात-बात पर उससे क्षमा याचना करें। इससे उन्हें मानसिक सन्तुष्टि मिलती है कि उन्होंने सामने वाले को घुटने टेकने पर विवश कर दिया है।
जो व्यक्ति किसी निस्वार्थ भाव से दूसरों की भलाई के कार्यों में लगा रहता है। वही दूसरे के चेहरे पर हँसी और उसके जीवन में ख़ुशी लाने की क्षमता रखता है। ईश्वर ऐसे व्यक्ति के चेहरे से कभी हँसी और उसके जीवन से खुशियाँ कभी कम नहीं होने देता। प्रकृति का नियम है कि इस हाथ दो और उस हाथ लो। मनुष्य दुनिया को जो बाँटता है, ईश्वर उसे कई गुणा करके लौटा देता है। कमी है तो हमारी सोच की है, जो मैं, मेरे बच्चे, मेरा परिवार से आगे बढ़ने नहीं देती। अपने हृदय को विशाल बनाकर देखिए बहुत-सी भुजाएँ साथ देने के लिए तैयार हो जाएँगी।
एक नन्हें से बीज के कारण एक महान वृक्ष की उत्पत्ति होती है, अपने उद्गम स्थल से मीलों लम्बी यात्रा करके नदी सागर में लीन होकर अपनी यात्रा पूर्ण करती है। मनुष्य की यात्रा परमात्मा को यानी मोक्ष को पाने पर होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि जो कुछ भी संसार में हो रहा है या घट रहा है, वह सब ईश्वरीय विधान है। उससे हम इन्कार नहीं कर सकते। हम सभी लोग तो केवल निमित्त मात्र हैं, इसीलिए अपने मन में कभी भी कर्त्तापन का भ्रम नहीं पालना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य की उन्नति नहीं अवनति होती है। उसके आगे बढ़ने के रास्ते बन्द हो जाते हैं।
जब तक हमारी जिन्दगी की गाड़ी पटरी पर चलती रहती है, तब तक सोचते हैं कि हम एक कुशल चालक हैं। लेकिन जब यही गाड़ी किसी कारण से पटरी से उतर जाती है, तब यह कड़वा सच सामने आता है कि हमारी जिन्दगी की गाड़ी तो कोई और ही चला रहा है। हम तो बस निमित्त मात्र थे। वह चालक है परमपिता परमात्मा। वह हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार हमारी जीवन की गाड़ी को चलता रहता है। इसलिए उस मालिक को कभी नहीं भूलना चाहिए। जो लोग अपनी जीवन की गाड़ी उस मालिक के सुपुर्द कर देते हैं, वे सदा सुखी रहते हैं। इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने घमण्ड में चूर रहते हैं और जो मालिक को चुनौती देने की गुस्ताखी करते हैं, वे अपने पैरों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का कार्य करते हैं।
यदि अपने जीवन में सुख-चैन का साम्राज्य मनुष्य चाहता है तो उसे अपने स्वार्थ से परे हटकर दूसरों के लिए भी सोचना चाहिए। तभी वह अपने साथ अनेक लोगों को जोड़ सकता है। ये मनुष्य के वे सच्चे साथी होते हैं जो सदा उसके हित के लिए सोचते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 24 मार्च 2019
विचार-बिन्दु
शनिवार, 23 मार्च 2019
बुजुर्गों का ध्यान
ओल्ड होम्स में चैरिटी करने या वहाँ जाकर बुजुर्गों के साथ समय बिताने, उन्हें कपड़े या अन्य जरूरत की वस्तुएँ देना बहुत अच्छी बात है। परन्तु उससे पहले अपने घर मे विद्यमान बुजुर्गो को उनका यथोचित सम्मान देना आवश्यक है। उनकी सारी आवश्यकताओं को बिना माथे पर शिकन लाए पूर्ण करना पहला दायित्व है। यदि घर के बुजुर्ग किसी भी कारण से अपेक्षित रहते हैं तो फिर ओल्ड होम्स की चैरिटी केवल दिखावा बनकर रह जाएगी। उसका कोई लाभ नहीं होने वाला।
घर में बड़े बुजुर्गों को यथोचित सम्मान मिलना चाहिए। उन्हें फालतू सामान या बोझ नहीं समझना चाहिए। उनको भी अपने जीवन में जीवित रहने के लिए कुछ चीजों की आवश्यकता पड़ती रहती है। यह नहीं सोचना चाहिए कि वे घर में रहते हैं, उन्हें खाना हम खिलाते हैं। कपड़ा आदि हम लेकर दे देते हैं, इससे अधिक उन्हें क्या चाहिए? परन्तु यह सोच सर्वथा गलत है। इन्सान जब तक जीवित रहता है, उसे रोटी और कपड़े के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता है।
आयु बढ़ने के साथ-साथ शरीर अशक्त होने लगता है। उसे किसी सहारे की आवश्यकता होने लगती है। ऐसे में यदि अपने बच्चे सहारा नहीं बनेंगे तो फिर उन्हें कौन सम्हालेगा? बुजुर्गो को इस अवस्था में अपने बच्चों के समय में से कुछ पल चाहिए होते हैं। ढलती साँझ में बुजुर्गों को बच्चों का प्यार व विश्वास चाहिए होता है कि वे उनके इस दौर में उनके साथ हैं। अकेले रहते हुए उन्हें गहराते अँधियारे से डर लगने लगता है। पल-पल अपनी तरफ बढ़ रही मौत को देखकर वे घबराने लगते हैं। यह शाश्वत सत्य है कि इस मौत को किसी भी तरह टाला नही जा सकता। इसलिए उन्हें अकेलेपन से बहुत घबराहट होती है। बच्चे जब कुछ पल उनके साथ बैठकर बुढ़ापे का अकेलापन बाँट लेते हैं, तब बिन दीप जलाए ही उनके जीवन की साँझ रौशन हो जाती है।
आज की आपाधापी वाली जिन्दगी में बच्चे अपनी रोजी-रोटी के चक्कर में अपने देश में अन्यत्र रहने लगते हैं या दूर विदेश चले जाते हैं। ऐसे में वर्षों बीत जाते हैं जब माता-पिता अपने बच्चों को मिल नहीं सकते और उन्हें स्पर्श नहीं कर पाते। यह कसक उनके मन में रह जाती है कि एक बार बच्चे बचपन की तरह उनकी गोद में अपना सिर रखें और वे उसे सहला सकें। अपने बच्चों को करीब पाकर वे एक बार फिर से इतरा सकें, खुशियाँ मना सकें।
अपने घर के विशाल हृदय वाले लोग यानी मनुष्य के माता-पिता जीवन के कल्पवृक्ष हैं। उन्हें अभागे लोग बूढ़ा और बुढ़िया कहकर उनका तिरस्कार करते हैं। इस सत्य को सदा स्मरण रखिए कि ऐसे लोग भी शीघ्र ही बूढ़े होने के करीब आ रहे हैं। इसलिए उस अवस्था की तैयारी उन्हें अभी से कर लेनी चाहिए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि जो भी अच्छे या बुरे कृत्य मनुष्य करता है, वे देर-सवेर उसी के पास ही लौटकर आते हैं।
वृद्धावस्था में प्रायः बुजुर्गो की इच्छाएँ न के बराबर रह जाती हैं। शरीर के कमजोर होने से पाचन क्रिया शिथिल पड़ जाती है। इसलिए उन्हें गरिष्ठ भोजन नहीं पचता। सादा भोजन ही उनके लिए ठीक रहता है। अलमारी के कपड़ों को देखकर उन्हें लगता है कि इनका क्या किया जाए? इसी प्रकार अन्य भौतिक वस्तुओं से भी दिन-प्रतिदिन उन्हें वितृष्णा होने लगती है। किसी शादी-पार्टी आदि का निमन्त्रण आए तो उनका प्रयास यही रहता है कि बच्चे चले जाएँ। जहाँ जाना बहुत ही आवश्यक होता है, वहाँ वे जाते हैं।
बड़े-बुजुर्गो को यथोचित आदर-सम्मान देना चाहिए। उनकी सेवा-सुश्रुषा और देखभाल में कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए। उन्हें दिवाली आदि किसी भी अवसर पर कुछ नहीं चाहिए होता। फिर भी जब भी अपने लिए खरीददारी करने जाएँ, उनसे अवश्य पूछ लेना चाहिए कि उन्हें कुछ चाहिए क्या? प्रायः उनका उत्तर नहीं में ही होगा। परन्तु यदि उन्हें कुछ चाहिए हो तो लाकर देना चाहिए। यही उनका मान करना होता है। ध्यान रखने वाली बात है कि बड़े-बुजुर्गो की सुख-सुविधाओं का ध्यान रख करके हम उन पर कोई अहसान नहीं करते बल्कि अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 22 मार्च 2019
सूर्य स्नान
सूर्य स्नान (sun bath) मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक होता है। हमारे देश भारत में ईश्वर की असीम कृपा है कि यहाँ सूर्य के प्रकाश और ऊर्जा की कोई कमी वनहीं है। वेदों में सूर्य की पूजा का बहुत महत्व बताया गया है। सूर्य को हम लोग भगवान कहते हैं। हमारे ऋषि-मुनियों ने मानव जाति को यह सुन्दर सन्देश दिया है कि वह सूर्य से शक्ति प्राप्त करके प्राकृतिक रूप से अपना जीवन व्यतीत करे।
सूर्य मनुष्य को शक्ति देता है। मनुष्य के शरीर को सूर्य की ऊर्जा की बहुत आवश्यकता होती है। शरीर में विद्यमान हड्डियों के लिए यह रामबाण औषधि है। सूर्य विटामिन डी का प्राकृतिक स्रोत है। डॉक्टर के पास यदि अस्थि रोग के लिए जाना पड़े तो वह सूर्य के प्रकाश में बैठने का परामर्श देते हैं। प्रतिदिन सूर्य के ताप का सेवन करने वाले बहुत से रोगों से मुक्त हो जाते हैं। यदि सूर्य का ताप मनुष्य के शरीर को न मिले तो उसे बहुत ठण्ड लगने लगती है।
अथर्ववेद के अनुसार प्रात:काल धूप में स्नान करने से हृदय स्वस्थ रहता है। अथर्ववेद में अन्यत्र कहा गया है कि सूर्योदय के समय सूर्य की लाल किरणों के प्रकाश में खुले शरीर बैठने से हृदय रोगों तथा पीलिया के रोग में लाभ होता है। आयुर्वेदिक चिकित्सक तथा प्राकृतिक चिकित्सक कई आन्तरिक रोगों का उपचार करने हेतु विभिन्न प्रकार के लेप लगाकर सूर्य स्नान करवाते है यानी सूर्य के प्रकाश में बिठा देते हैं।
सूर्य पृथ्वी पर स्थित रोगाणुओं को नष्ट करके प्रतिदिन रश्मियों का सेवन करने वाले व्यक्ति को दीर्घायु भी प्रदान करता है। सूर्य की रोगनाशक शक्ति के बारे में मनीषी कहते हैं कि सूर्य औषधि बनाता है, विश्व में प्राणरूप है तथा अपनी रश्मियों द्वारा जीवों का स्वास्थ्य ठीक रखता है। किन्तु ज्यादातर लोग अज्ञानवश अन्धेरे स्थानों में रहते है और इसलिए वे सूर्य की शक्ति का लाभ नहीं उठा पाते हैं।
आजकल माताएँ नौकरी के कारण सूर्य के प्रकाश का सेवन नहीं कर पातीं। इसलिए प्रायः बच्चे पैदा होते ही पीलिया रोग के शिकार हो जाते हैं। उन्हें सूर्योदय के समय सूर्य किरणों में लिटाया जाता है, जिससे अल्ट्रा वायलेट किरणों के सम्पर्क में आने से उनके शरीर के पिगमेन्ट सेल्स पर रासायनिक प्रतिक्रिया प्रारम्भ हो जाती है और बीमारी में लाभ होता है। इसके अतिरिक्त डाक्टर नर्सरी में कृत्रिम अल्ट्रावायलेट किरणों की व्यवस्था लैम्प आदि जलाकर करते हैं।
सूर्य स्वास्थ्य और जीवनी शक्ति का भण्डार है। मनुष्य सूर्य के जितने अधिक सम्पर्क में रहता है, वह उतना ही अधिक स्वस्थ रहता है। आजकल लोग अपने घर को चारों तरफ से खिडकियों से बन्द करके रखते हैं और मोटे-मोटे पर्दे लगाकर रखते हैं। मानो उन्हें सूर्य के प्रकाश को घर में घुसने ही नहीं देना होता। इसलिए बीमारियाँ भी अधिक बढ़ती जा रही हैं। जहाँ सूर्य की किरणें पर्याप्त पहुँचती हैं, वहाँ रोगों के कीटाणु स्वत: नष्ट हो जाते हैं और रोग उत्पन्न ही नहीं हो पाते। सूर्य अपनी किरणों द्वारा नाना प्रकार के आवश्यक तत्वों की वृष्टि करता है।उन तत्वों को शरीर में ग्रहण करने से असाध्य रोग भी दूर हो जाते हैं।
सूर्य चिकित्सा के सिद्धान्त के अनुसार रोगोत्पत्ति का कारण शरीर में रंगों का घटना-बढना है। 'कलर थेरेपी' से उपचार करने वाले लोग अलग-अलग रंग की बोतलों में आठ-नौ घण्टे तक पानी रखकर उसका सेवन करवाते हैं। उनका मानना है कि इससे रोगों का उपचार किया जा सकता है और रोगी स्वस्थ हो जाता है।
जहाँ सूर्य का ताप उपलब्ध नहीं होता, वे देश तरसते हैं। इसे प्राप्त करने के लिए अनेक उपाय करते हैं। जहाँ यह सरलता से उपलब्ध होता है, वे इसकी कद्र नहीं करते। विश्व में कई देश ऐसे हैं जहाँ पूरा वर्ष सर्दी रहती है, बर्फ का साम्राज्य बना रहता है। सूर्य भगवान के दर्शन उन लोगों को नहीं हो पाते। वे लोग सूर्य के प्रकाश का आनन्द लेने के लिए धन व्यय करते हैं। अवकाश के दिनों में समुद्र के किनारे जाते हैं। वहाँ जाकर वे घण्टों sun bath लेते हैं।
सूर्य मनुष्य जीवन के लिए बहुत उपयोगी है। बिना कुछ खर्च किए हम स्वयं को अनेक रोगों से मुक्त कर सकते हैं। इस अवसर का भरपूर लाभ उठाकर, निस्सन्देह हम अपना शरीर नीरोगी बना सकते हैं।
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गुरुवार, 21 मार्च 2019
सकारात्मकता उन्नतिकारक
इस संसार में भाँति-भाँति के लोग विद्यमान हैं। उन सबकी मनोवृत्ति भी अलग-अलग तरह की होती है। उनमें से कुछ सकारात्मक प्रवृत्ति के लोग होते हैं, जो हर समय दूसरों का हित साधने के उपाय सोचते रहते हैं। ऐसे लोगों को हम परोपकारी जीव के नाम से अभिहित करते हैं। इन लोगों का समाज में सर्वत्र सम्मान होता है। लोग इन्हें सदा अपनी सिर-आँखों पर बिठाते हैं। सभी वर्ग के लोग उनका संसर्ग प्राप्त करने के लिए सदा लालायित रहते हैं। इन्हें समाज का पथप्रदर्शक भी कहना अतिश्योक्ति नहीं होगा।
इनके विपरीत बहुत से नकारात्मक विचारों वाले लोग होते हैं। उनका कार्य दूसरों को कष्ट पहुँचाना होता है। ये लोग दूसरों के जीवन में बहुत तरह की गन्दगी फैंकते हैं। दूसरों को आगे बढ़ने से रोकने के लिए उनके मार्ग में रोड़े अटकते हैं। इनका काम दूसरों की आलोचना करना, उनकी सफलता से ईर्ष्या के कारण व्यर्थ ही भला-बुरा कहना होता है। ये लोग आदर्शों के विरुद्ध चलकर आगे निकल जाना चाहते हैं। इनका वश चले तो ये दूसरे को अड़ंगी देकर गिरा दें और पीछे मुड़कर न देखें कि उसे चोट तो नहीं आई।
ये दुष्ट लोग ऐसे ही होते हैं जो महापुरुषों पर कीचड़ उछलते हैं, उनकी आलोचना करते हैं, उन्हें जहर देने का दुस्साहस करते हैं, सूली पर चढ़ाते हैं, उनकी हत्या जैसे दुष्कर्म करते हैं। इन दुर्जनों से डरकर महान लोग छिपकर नहीं बैठ जाते बल्कि अपने पूरे उत्साह के साथ समाज सुधार के कार्य करते रहते हैं। वे इन लोगों की गीदड़ भभकियों की बिल्कुल परवाह नहीं करते।
इन स्वार्थी और दुष्ट लोगों के ऐसे व्यवहार से हतोत्साहित होकर, यूँ ही निराश और हताश होकर नहीं रहना है। बल्कि चतुराई और योजनाबद्ध तरीके से उनको मुँहतोड़ जवाब देना है। उनकी उस चाल से शिक्षा लेकर, उसे अपनी दाल बनाकर, अपने आदर्शों का त्याग किए बिना निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ाते जाना है। इस बात पर अटूट विश्वास रखना है कि सच्चाई के मार्ग पर चलने वालों की ईश्वर सदा सहायता करता है। उन्हें जीवन में कभी निराश नहीं होना पड़ता।
ईश्वर ने हर मनुष्य को बुद्धि रूपी सम्पत्ति, धैर्य रूपी शस्त्र, विश्वास रूपी सुरक्षा कवच और हँसी रूपी बढ़िया दवा उपहार स्वरूप प्रदान की है। जो इनको अपना लेता है, वह जीवन में कभी हार नहीं मानता। न ही उसे कभी पीछे मुड़कर देखने की आवश्यकता पड़ती है। इसके विपरीत जो इन सब पर मन से विश्वास नहीं कर पाता, वह सदा डगमगाता रहता है।
इस विषय को सार्थक करती एक कथा वाट्सएप पर पड़ी थी। उसे आपके साथ साझा कर रही हूँ। आशा है आपने भी पड़ी होगी। यह कथा सचमुच मनन करने पर विवश करती है।
एक दिन एक किसान का बैल कुएँ में गिर गया। वह बैल घंटों ज़ोर -ज़ोर से रोता रहा और किसान सुनता रहा। वह विचार करता रहा कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? अन्ततः उसने निर्णय लिया कि उसका बैल काफी बूढा हो चुका है, अतः उसे बचाने से कोई लाभ होने नहीं वाला। इसलिए उस बैल को कुएँ में ही दफना देना चाहिए।
किसान ने अपने सभी पड़ोसियों को मदद के लिए बुलाया। सभी ने एक-एक फावड़ा पकड़ा और फिर मिलकर कुएँ में मिट्टी डालनी शुरू कर दी। जैसे ही बैल को समझ में आया कि यह क्या हो रहा है, वह और ज़ोर-ज़ोर से चीख़-चीख़कर रोने लगा। कुछ समय पश्चात अचानक वह शान्त हो गया।
सब लोग चुपचाप कुएँ में मिट्टी डालते रहे। तभी किसान ने कुएँ में झाँका तो वह आश्चर्य से सन्न रह गया। अपनी पीठ पर पड़ने वाले हर फावड़े की मिट्टी के साथ वह बैल एक आश्चर्यजनक हरकत कर रहा था। वह हिल-हिलकर उस मिट्टी को नीचे गिरा देता था और फिर एक कदम बढ़ाकर उस पर चढ़ जाता था। जैसे-जैसे किसान तथा उसके पड़ोसी उस बैल पर अपने फावड़ों से मिट्टी गिराते, वैसे-ही-वैसे वह हिल-हिलकर उस मिट्टी को गिरा देता और एक सीढ़ी ऊपर चढ़ आता। जल्दी ही सबको आश्चर्यचकित करते हुए वह बैल कुएँ के किनारे पर पहुँच गया और फिर कूदकर बाहर भाग गया ।
यह कथा हमें यही समझ रही है कि बुद्धि, साहस और विश्वास के बूते बैल कुँए से बाहर निकल सका और उसके प्राणों की रक्षा हो सकी। इसी प्रकार यदि मनुष्य इनका सहारा अपने जीवन में ले तो कोई कारण नहीं कि उसे असफलता का मुँह देखना पड़े। उसे उत्तरोत्तर उन्नति करने में कोई बाधा पछाड़ नहीं सकती।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 18 मार्च 2019
विवाहेत्तर सम्बन्धों से विनाश
नवयुवक या नवयुवती जब अपने नए जीवन में प्रवेश करने लगते हैं तो वे दोनों अपने भावी जीवन को लेकर मन में अनेक स्वप्न संजोए रहते हैं। विवाह के उपरान्त वे उन स्वप्नों को साकार करने का प्रयास करते हैं। दुर्भग्यवश उस समय किसी एक पर मानो बिजली टूटकर गिर पड़ती है जब दोनों साथियों में से एक कहे, "उसने यह शादी घर वालों के दबाव में आकर की है। उसका तो पहले से किसी दूसरे के साथ सम्बन्ध है। वह इस रिश्ते को किसी भी सूरत में नहीं निभा सकता।"
चाहे युवक हो या युवती, जिसके साथ भी ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटेगी उसके मन में कुछ प्रश्नों का उमड़ना स्वाभाविक होता है। मेरे साथ ही ऐसा क्यों हुआ? यदि कहीं और सम्बन्ध थे तो मेरी जिन्दगी बर्बाद क्यों की? यदि यही हिम्मत शादी से पहले दिखाई होती तो दो घर उजड़ने से बच जाते? किसी की भी जगहँसाई नहीं होती।
पति अथवा पत्नी दोनों में से कोई भी स्वेच्छाचारी हो जाए तो परिवार टूटने की कगार पर पहुँच जाता है। ऐसे लोगों को समाज में हेय दृष्टि से देखा जाता है। कोई भी इन लोगों से किसी प्रकार का व्यवहार नहीं रखना चाहता। इन परिवारों के बच्चों के मन में हीन भावना घर कर जाती है। वे किसी से नजरें नहीं मिला पाते और किसी के सामने जाने से कतराते हैं। उन्हें लगता है कि कोई उनके माता-पिता के बारे में पूछ लेगा तो वे क्या उत्तर देंगे? गलती कोई एक व्यक्ति करता है, परन्तु उसका खमियाजा पूरे परिवार को ही चुकाना पड़ता है।
किसी कवि ने बहुत ही सच्चाई से इस दुष्कृत्य के विषय में लिखा है-
कलत्रं पृष्टतः कृत्वा रमते यः परस्त्रिय:।
अधर्मश्चापदस्तस्य सद्यः फलति नित्यशः।।
अर्थात् अपनी पत्नी के पीठ पीछे (छिप कर) जो व्यक्ति दूसरों की स्त्रियों से अनैतिक प्रेमसम्बन्ध बनाते हैं, अपने इस अधार्मिक कृत्य के फल स्वरूप वे शीघ्र ही सदा के लिए आपदाग्रस्त हो जाते हैं।
कवि के इस कथन में सत्य निहित है। जो पुरुष विवाहोपरान्त अपनी पत्नी के अतिरिक्त किसी अन्य स्त्री के साथ अनैतिक सम्बन्ध बनाता है, उस घर को सुख-शान्ति सदा के लिए छोड़ देती है। वहाँ नित्य कलह-क्लेश, लड़ाई-झगड़ा होता रहता है। परस्पर विश्वास की बलि चढ़ जाती है। ऐसे घर से लक्ष्मी भी किनारा करने में अपना भला समझती है। बच्चे ऐसे पिता का सम्मान नहीं करते। इस तरह वह घर आपत्तियों का अखाड़ा बन जाता है। हर कोई कमर कसकर जूझने के लिए तैयार रहता है।
इसके विपरीत यदि घर की स्त्री विवाहेत्तर सम्बन्ध बना लेती है तो घर में कमोबेश ऊपर वर्णित स्थितियाँ बन जाती हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि कोई भी जीवनसाथी चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, अपने साथी की बेवफाई को सहन नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति बन जाने पर घृर में अबोलापन आ जाता है। वहाँ मरघट-सी शान्ति पसरने लगती है। इसका परिणाम अन्ततः विवाह विच्छेद ही होता है। वे दोनों तो अपने-अपने जीवन की राह में आगे बढ़ जाते हैं। परन्तु सबसे अधिक वे मासूम बच्चे पिस्ते हैं, जिनकी कोई गलती नहीं होती। वे समाज की नजर में बेचारे बन जाते हैं।
मेरे विचार से अकेले पुरुष या अकेली स्त्री को इस विषय में दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अपराध दोनों का ही बराबर होता है। यदि कोई पुरुष विवाहेत्तर सम्बन्ध बनाता है, तो किसी स्त्री के साथ ही बनता हैं। इसी प्रकार यदि स्त्री अनैतिक सम्बन्ध बनाती है तो वह भी किसी पुरुष के साथ ही बनाती है। इस प्रकार दोनों में से किसी एक को क्लीन चिट नहीं दी जा सकती। इन सम्बन्धों के कारण दो हँसते-खेलते परिवार बर्बाद हो जाते हैं। इसलिए दोनों में से किसी के भी अपराध को कम करके नहीं आँका जा सकता और न ही क्षम्य नहीं कहा जा सकता। दोनों ही परिवारों को समाज में नजरें झुकानी पड़ती हैं, शर्मिंगगी का सामना करना पड़ता है।
विवाह एक बहुत पवित्र संस्था है। इसका उद्देश्य समाज को उद्दण्डता, व्यभिचार आदि बुराइयों से बचाना है। इस सम्बन्ध की पवित्रता को बनाए रखने का दायित्व हर पुरुष और स्त्री को है। समाज के ढाँचे को सुचारू रूप से चलाने में सभी का सहयोग अपेक्षित है।
चन्द्र प्रभा सूद
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