मंगलवार, 9 अप्रैल 2019

सेंध लगाते दुख

दुख चोरों की तरह सेंध लगाकर हमारे घर में घुस आते हैं और हमारे जीवन में उथल-पुथल मचा देते हैं। चाहे हम अपने घर को कितना ही मजबूत किले की तरह बना लें या चाहे सारी खिड़कियाँ व दरवाजे बंद कर लें। फिर भी पता नहीं कहाँ से ये घर में घुसने का मार्ग खोज लेते हैं और सबसे छिपते हुए नजरें बचाकर चले आते हैं। घर आकर शांति से मेहमानों की तरह नहीं बैठते बल्कि सारे घर को और वहाँ रहने वाले सभी को अस्त-व्यस्त कर डालते हैं।
        ये दुख बड़ा ही कष्ट देते हैं। इंसान को अपने जाल में ऐसा फंसा लेते हैं कि उससे बचने का कोई रास्ता नहीं सूझता। मनुष्य सोचता ही रह जाता है कि उसे किस गुनाह की सजा मिल रही है।
      कुछ दुख हमारी अपनी नादानियों या गलतियों के कारण हमें मिलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आलस्य, झूठा अहम, अपने दायित्वों का भली-भाँति निर्वाह न करना, लापरवाही बरतना, अनजाने में ही समाज विरोधी कार्य कर बैठना, समुचित आहार-विहार की ओर ध्यान न देना आदि हमारे आने वाले दुखों का कारण  बनते हैं। ये सभी कारण हैं जिनका फल हमें शीघ्र ही यानि तत्काल, कुछ समय के उपरान्त या इसी जीवनकाल में मिल जाता है।
       इनके अतिरिक्त कुछ दुख ऐसे भी होते हैं जो इस जीवन काल में हमें अपने प्रारब्ध अथवा भाग्य के कारण भोगने पड़ते हैं। सृष्टि की रचना अरबों साल पहले हुई ऐसा हमारे सद्ग्रन्थों का कहना है। हमारे इस भौतिक शरीर में विद्यमान आत्मा ने भी न जाने कितने ही रूप धारण किए होंगे।
       हर जन्म में जीव कुछ-न-कुछ अपराध करता है जिसका फल उसे भोगना ही होता है। जिन दोषों का फल वह भोग लेता है वे समाप्त हो जाते हैं। परन्तु जिन दुष्कर्मों का फल हमें नहीं मिलता वे संचित(इकट्ठे) होकर जन्म जन्मान्तर तक हमारे साथ ही चलते रहते हैं।
       ऐसी कपोल कल्पना है कि मृत्यु के देवता यमराज के पास हमारे सारे कर्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए कोई बही-खाता है जो चित्रगुप्त के पास रहता है। ये हम लोगों को अपराध या गलत काम न करने से डराने के लिए रची गई है। खैर, ये संचित कर्म हमारे साथ ही रहते हैं जिनके अनुसार हमारा भाग्य या प्रारब्ध बनता है।
       उसी के अनुसार ही दुख समयानुसार हमारे जीवन में आते हैं और समझाते हैं कि भविष्य के लिए यह चेतावनी है। अब संभल जाओ और अपने जीवन में सत्कर्म करने चाहिएँ।
     अपने दुख हम चाहें भी तो कम नहीं कर सकते। जब तक उनको हम भोग नहीं लेते तब तक उनसे मुक्ति नहीं मिलती। इसका कारण है जो भी कर्म हम करते हैं उनका फल तो भोगना पड़ता है। इसीलिए कहा गया है-
         'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।'
अर्थात अच्छे या बुरे जो भी कर्म हम करते हैं उनको भोगे बिना छुटकारा नहीं होता। ये कर्मफल पवित्र जल में डुबकी लगाने, तीर्थों की यात्रा करने या तथाकथित गुरुओं की शरण में जाने से नहीं कटते।
      दुख के समय कोई भी हमारा सहायक नहीं होता सब लोग नजरें फेर लेते हैं। उस समय ईश्वर की उपासना, सुधी जनों का साथ व वेदादि सद् ग्रन्थों का अध्ययन हमें उस कष्ट से मुक्त होने तक मानसिक शांति और उसे सहने की शक्ति प्रदान करते हैं।
        इसलिए उस कष्टदायक काल में तथाकथित ज्योतिषियों एवं तान्त्रिकों के पास जाकर अनावश्यक धन व समय की बरबादी से बचना चाहिए। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास को ही हमें अपना एकमात्र आश्रय बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 8 अप्रैल 2019

प्रसन्नता दासी नहीं

प्रसन्नता किसी की दासी नहीं कि वह चाहे तो उसके पास सदा के लिए रह जाए। हर व्यक्ति प्रसन्न रहना चाहता है। कोई नहीं चाहता कि कभी दुख-तकलीफें उसके पास फटकें। समस्या यह है कि प्रसन्नता मनुष्य के पास अधिक समय तक टिक नही पाती। वह आती तो है पर मनुष्य के हाथ से उसी तरह फिसल जाती है जैसे रेत से मछली। इससे जो समझ आता है वह यह है कि खुशियाँ जब आती हैं तब मनुष्य उनमें इतना डूब जाता है कि उसे दीन-दुनिया की खबर नहीं रहती। वह सब कुछ भूलकर मस्ती में डूब जाता है। इसलिए वे क्षण मानो आकर उड़न छू हो जाते हैं। उसे लगता है कि खुशी आई भी और पता ही नहीं चला।
            इन खुशियों को समेटने के लिए मनुष्य को लम्बी-चौड़ी योजनाएँ नहीं बनानी पड़तीं। उनके क्रियान्वयन की कोई चिन्ता नहीं करनी पड़ती। बड़ी-बड़ी खुशियाँ मनुष्य के पास यथासमय आती हैं। उसे अपने आसपास तत्कालिक छोटी-छोटी खुशियाँ ढूंढनी चाहिए जिससे वह प्रसन्न रह सके। उसके लिए बस कुछ ठोस कदम उठाकर ही मनुष्य अपनी प्रसन्नता को लम्बे समय तक बनाकर रख सकता है। इस प्रसन्नता को हम तीन श्रेणियों में बाँट सकते हैं।
            सबसे पहले शारीरिक प्रसन्नता की बात करते हैं। मनुष्य का शरीर स्वस्थ रहेगा तो उसे अपने कार्यों को निपटाने में कष्ट नहीं होगा।  काया का नीरोगी होना मनुष्य के लिए सबसे वरदान है, अमूल्य सुख है। इसे रोगरहित रखने के लिए प्रतिदिन नियमपूर्वक पौष्टिक खाना खाना चाहिए। जंक फूड से परहेज करना चाहिए। मैं यह नहीं कहती उसे अछूत मानकर उसका तिरस्कार करो। पर प्रतिदिन के खाने में उसे शामिल न करें। सादा और पौष्टिक भोजन खाने से शरीर स्वस्थ रहता है। शरीर के स्वस्थ रहने से मन प्रफुल्लित रहता है। मन में उत्साह व स्फूर्ति बानी रहती हैं। हर कार्य को करने में मन लगा रहता है।
            इसके साथ ही प्रतिदिन नियमपूर्वक समय से आराम करना चाहिए। समय से सोना-जागना शरीर को शिथिल नहीं होने देता। आजकल जीवनशैली में आया परिर्वतन शरीर में विकार लेकर आ रहा है। इससे शरीर में सुस्ती रहती है, किसी काम में मन नहीं लगता। अपने समय में से थोड़ा-समय निकालकर मनुष्य को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए। इससे शरीर का अंग-प्रत्यंग खुलता है। शरीर की मोटरें ठीक से कार्य करने लगती हैं। शरीर में स्फूर्ति बानी रहती है। उचित आहार-विहार और व्यायाम करके शरीर को प्रसन्न रखने का प्रयास करना चाहिए।
          अब हम मानसिक प्रसन्नता की बात करते हैं। अपेक्षाएँ काम रखने से मन शान्त रहता है, इससे मानसिक प्रसन्नता बनी रहती है। जितनी अधिक अपेक्षाएँ मनुष्य पालता है, उतना ही दुखी रहता है। उसे लगता है कि जितना मैं दूसरों के लिए करूँ, उतना ही वे उसके लिए करें। जब ऐसा नहीं हो पाता तो वह अपने सभी परिवारी जनों और बन्धु-बान्धवों पर चिल्लाता है, उन्हें कोसता है। इससे उसके मन में सकारात्मक विचार दूर होते जाते हैं। उनका स्थान नकारात्मक विचार ले लेते हैं। यहीं से उसके दुखों और परेशानियों का दौर शुरू हो जाता है। वह अपने झूठे अहं के कारण सबसे किनारा कर लेना चाहता है। उसे लगता है कि उसकी हेठी हो गई है जिसे वह सहन नहीं कर पाता। जितना अपने से हो सके दूसरों के लिए करना चाहिए पर बदले में अपेक्षा नहीं करनी चाहिए। मनुष्य को अपने अहं को वश में करके सदा नकारात्मक विचारों से मुक्त होने का प्रयास करते रहना चाहिए। तभी उसे मानसिक प्रसन्नता मिल सकती है।
           अन्त में आध्यात्मिक प्रसन्नता की चर्चा करते हैं। शरीर एक साधन के रूप में मनुष्य को ईश्वर ने दिया है। इस शरीर में विद्यमान आत्मा को प्रभु तक लेकर जाने का यह माध्यम मात्र है। जब मनुष्य शरीर को साध्य मान लेता है तो उसी की सार-सम्हाल में लगा रहता है। सारा समय उसे सजाता रहता है। उस समय वह आत्मा, परमात्मा, जन्म, मृत्यु सब भूल जाता है। जो मनुष्य इस रहस्य को जानकर अपनी आत्मिक उन्नति करते हैं, उन्हें आध्यात्मिक प्रसन्नता मिलती है।
            अन्त में यही कहना चाहती हूँ कि भूतकाल में जो गलतियाँ की हैं उन्हें भूलकर वर्तमान में जीने का अभ्यास करना चाहिए। भविष्य में क्या होगा इसकी चिन्ता नहीं करनी चाहिए। उसे समय के हाथ में सौंप देना चाहिए।
अपनी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक प्रसन्नता की ओर ध्यान देना अनिवार्य है। सदा प्रभु को धन्यवाद देते हुए उससे प्रार्थना करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 7 अप्रैल 2019

छोटी खुशियों की तलाश

व्यस्त और परेशानियों भरे जीवन में इन्सान को छोटी-छोटी खुशियों की तलाश करनी चाहिए। यदि वह हर छोटी-बड़ी खुशी को सहेजने की कला सीख जाएगा तो प्रसन्न रह सकता है। उदासी या अवसाद उसके पास फटक ही नहीं सकेंगे। उसे हर हाल में मस्त रहकर जीना आ जाएगा। इस तरह वह स्वयं तो प्रसन्न रहेगा ही, अपने सम्पर्क में आने वालों के लिए भी प्रेरणा बन जाएगा। उसके आसपास का वातावरण प्रसन्नता तथा स्फूर्ति देने वाला हो जाता है। जो भी उसके पास आएगा, उसे भी आनन्द की प्राप्ति होगी। वह भी प्रफुल्ल हो जाएगा।
          हमें विचार यह करना है कि आखिर ये खुशियाँ कौन-सी हैं? इन्हें मनुष्य कैसे पहचान सकता है? इन खुशियों को मनाने का तरीका क्या होता है? क्या इन्हें ढूंढना इतना सरल है कि हर कोई इन्हें पा सकता है?
          इन प्रश्नों के उत्तर में मैं केवल मात्र इतना ही कहना चाहूँगी कि ये खुशियाँ सदा हमारे इर्दगिर्द ही घूमती रहती हैं। ये भी प्रतीक्षा करती रहती है कि मनुष्य इन्हें पहचाने और प्रसन्न होने के हर बहाने को तलाशे।
           ये खुशियाँ हो सकती हैं- छोटे बच्चे का दाखिला अच्छे स्कूल में होना, कक्षा परीक्षा या अर्धवार्षिक या वार्षिक परीक्षा में बच्चे के अच्छे अंक आना। घर में कोई नई वस्तु जैसे टी वी, फ्रिज, वाशिंग मशीन, फूड प्रोसेसर, ए सी, गाड़ी आदि का आना। घर का फर्नीचर या इंटीरियर बदलना, नए कपड़े खरीदना। बच्चों के साथ देश या विदेश में घूमने जाना। घर के सदस्यों के जन्मदिन, शादी की सालगिरह होना। इनके अतिरिक्त थोड़े-थोड़े समय पश्चात आने वाले त्योहार आदि।
          अब चाहो तो सकारात्मक बनकर इन सबमें खुशियाँ ढूंढकर प्रसन्न हो जाओ और परिवार को भी आनन्दित होने दिया जाए। अथवा नकारात्मक बनकर, पैसे का रोना रोते हुए, बिसूरकर अपना और सब परिजनों का मूड खराब कर दिया जाए। यह मनुष्य की सोच पर निर्भर करता है।
          मनुष्य की मानसिकता के कुछ उदाहरण देखते हैं। बच्चे का अच्छे स्कूल में दाखिला हो गया, उन्हें किसी मित्र ने बधाई दी। वे तो ऐसे भड़क गए जैसे किसी ने उन्हें गाली दे दी हो। तपाक से बोले, "क्या बधाई यार! जिस स्कूल में मैं चाहता था, वहाँ इसका दाखिला नहीं जो पाया।"
          यदि वे उन बच्चों के विषय में सोच लेते जो सरकारी स्कूल में भी नहीं जा पाते तो शायद इस प्रकार न भड़कते। बच्चे का अच्छे स्कूल में दाखिला होने की खुशी मानते कि बच्चा अब नर्सरी से बारहवीं कक्षा तक वहाँ पढ़ेगा। उसका भविष्य सुरक्षित हो गया।
         बच्चे के क्लास टेस्ट में अच्छे नम्बर आए। बहुत खुश होकर उसने अपनी कापी माता-पिता के सामने रखी। कापी देखते ही वे बोले, "क्लास टेस्ट में नम्बर लेकर आए तो क्या? परीक्षा में नम्बर लाकर दिखाना तो कुछ बात होगी।"
         ऐसी स्थिति में बच्चा निराश हो जाएगा। उसे लगेगा कि पढ़ो तो भी और न पढ़ो तो भी मेरे माता-पिता नाराज ही होते है। नाराज होने के स्थान पर यदि बच्चे को शाबाशी दी जाती और भविष्य में ऐसे ही पढ़ने की प्रेरणा दी जाती तो उसका मनोबल बढ़ जाता। साथ ही कहते, "बेटे को गुलाबजामुन पसन्द हैं। चलो आज हम सब गुलाबजामुन खाएँगे।"
        इस तरह के व्यवहार से घर में खुशी का माहौल बन जाता है। इसके विपरीत पहली स्थिति में घर में निराशा का वातावरण बन जाता है।
          अब अन्य उदाहरण देखते हैं। घर में नई गाड़ी लेकर आए। किसी मित्र ने बधाई दी तो महाशय बिफर पड़े, "अच्छी भली गाड़ी थी, पड़ौसी की नई गाड़ी देखकर बच्चे पीछे पड़ गए। बस सारा दिन गाड़ी का रोना-धोना चलता रहता था। अब पहले वाली गाड़ी पुरानी थी तो क्या हुआ, काम तो चला रही थी। क्या करूँ मजबूरी में गाड़ी लेनी पड़ी।"
         इस तरह घर-बाहर बच्चों को कोसने से क्या लाभ? यदि सामर्थ्य थी तो नई गाड़ी आ गयी, यह तो अच्छी बात है। होना तो यह चाहिए था कि गाड़ी में बिठाकर बच्चों को घूमने ले जाते। इससे सबका दिल प्रसन्न हो जाता।
         यदि इसी तरह घर में कोई भी वस्तु लाने पर नाराजगी दिखाना कोई अच्छी बात नहीं है। कुछ नया सामान घर में आया है तो प्रसन्न होना चाहिए। ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि उसने सामर्थ्य दी है। इसी तरह कुछ लोग त्योहारों के आने पर भी खर्चे का रोना रोकर उनका मजा किरकिरा कर देते हैं। दुख और परेशानियाँ तो जीवन में आती रहती हैं। अपनी सोच को बस बदलने की आवश्यकता है, फिर घर खुशियों से भर जाता है। यह सत्य है कि ऐसे सकारात्मक घर में सदा ही सुख और समृद्धि का साम्राज्य रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 6 अप्रैल 2019

व्रत

व्रत शब्द का अर्थ होता है नियम का पालन करना। सारी प्रकृति यानी सूर्य, चन्द्रमा, वायु आदि सभी अपने-अपने व्रत का पालन करती है। हर मौसम अपने समय पर आता है। और तो और पशु-पक्षी तथा सभी जलचर व नभचर भी अपने लिए निश्चित नियमों का पालन करते हैं।
        हम मनुष्य ही इस सृष्टि के ऐसे जीव हैं जो किसी नियम का पालन नहीं करना चाहते। जहाँ भी हमें सुविधा लगती है, हम उसके अनुसार नियमों को मोड़ लेना चाहते हैं। हमारी यही इच्छा होती है कि हम नियमों का उल्लँघन भले ही करें परन्तु हमें कोई रोके या टोके नहीं।
        लोग भूखे रहने को व्रत की संज्ञा देते हैं। सारा दिन भूखे रहकर अपने शरीर को कष्ट देना किसी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता और न ही उसे व्रत कह सकते हैं। इस प्रकार करने से न किसी की आयु बढ़ती है और न ही घटती है। यदि ऐसे व्रतों से आयु बढ़ने लगे तो इस संसार में कोई मरेगा ही नहीं।
        कुछ लोग अपने चारों ओर अग्नि जलाकर, कुछ लोग गड्डा खोदकर उसमें बैठकर, कुछ लोग एक टाँग पर खड़े होकर, कुछ लोग पेड़ पर लटककर साधना करने को व्रत का नाम देते हैं। ये सभी तरीके दूसरों को लुभाने के लिए प्रदर्शन मात्र हो सकते हैं परन्तु व्रत नहीं कहे जा सकते।
         व्रत किसे कहते हैं, इसके विषय मे पद्मपुराण का कथन है-
          हिंसातोSलीकत: स्तेयान्मैथुनाद् द्रव्यसंग्रहात्।
          विरतिर्व्रतमुद्दिष्टं    विधेयं    तस्य    धारणात्।।
अर्थात हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील (दुष्चरित्रता) और परिग्रह से विरक्त होना व्रत कहलाता है। ऐसा व्रत अवश्य ही धारण करना चाहिए।
         वास्तव में मनुष्य यदि इन दुर्गुणों का त्याग करने का व्रत ले सके तो बहुत सारे अपराध करने से बच जाएगा। इससे समाज में होने वाले अपराध कम हो जाएँगे। तब न्याय व्यवस्था के चाबुक की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी।
        व्रतों के विषय में भर्तृहरि जी नीतिशतकम् में कहते हैं -
          प्रदानं   प्रच्छन्नं    गृहयुतगते   संभ्रमविधि:।
          प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं नाप्युपकृति:॥
          अनुत्सेको लक्ष्म्यानिरभिभवसारा: पर कथा:।
          सतां     केनाद्दिष्टं      विषमसिधाराव्रतमिदम्॥
अर्थात दान को गोपनीय रखना, अतिथि सत्कार करना, प्रिय करके भी शान्त रहना, सभा में उपकार का उल्लेख न करना, धन मे गर्व न करना, परचर्चा मे निन्दा को स्थान न देना- ये सज्जनों के विषम व्रत किसने बनाए हैं?
         सज्जनों की प्रकृति में ही होता है इन कठोर व्रतों का पालन करना। बिना किसी प्रयास के ही वे इन नियमों का पालन करते हैं। कहते हैं दान इस प्रकार करना चाहिए कि एक हाथ से दो और दूसरे हाथ को ज्ञात न होने पाए। बहुत ही मुश्किल है पर सज्जन इसे निभाते हैं। परोपकार करके उसका ढिंढोरा नहीं पीटते, सरल व सहृदय होते हैं, उनमें रत्तीभर भी अहंकार नहीं होता है। वे किसी की निन्दा-चुगली करने में रुचि नहीं रखते।
         ये सभी वाकई कठोर व्रत हैं जिनका पालन करना बच्चों का खेल नहीं है। पद्मपुराण में बताए गए और भर्तृहरि जी द्वारा सुझाए गए व्रतों का पालन करना ही श्रेयस्कर है। अनावश्यक रूप से स्वयं को कष्ट देकर, समाज के समक्ष प्रदर्शन करने के लिए रखे जाने वाले व्रतों का कोई औचित्य नहीं है।
        हमारे आदी ग्रन्थों वेदों में तथाकथित व्रतों का विधान नहीं है। पश्चातवर्ती किन्हीं अज्ञ विद्वानों ने अनावश्यक ही शरीर को कष्ट देने वाले व्रतों को अपने स्वार्थ के लिए प्रचारित किया। साथ ही जन साधारण को इनका पालन न करने पर अमंगल होने का डर दिखाया।
        अन्त में सुधी मित्रों से अनुरोध है कि इन खोखले ढकोसलों का त्याग कीजिए। उनके स्थान पर व्रत लीजिए झूठ न बोलने का, चोरी आदि अनैतिक कार्य न करने का, दुर्बलों को सताने के स्थान पर रक्षा करने का, देश, धर्म व समाज के लिए हितकर कार्यो को करने का व्रत लें।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019

प्रभु कृपा

परमपिता परमात्मा आनन्द का अथाह सागर है। वह हम सब जीवों पर अपनी कृपा की वर्षा सदैव करता रहता है। वह ईश्वर एक ही है, परन्तु उसे लोग अलग-अलग नामों से पुकारते रहते हैं। वेद का कथन है-
           एको ही सद् विप्रा बहुधा वदन्ति।
अर्थात् ईश्वर एक है, परन्तु मनीषी उसे भिन्न-भिन्न नामों से पुकारते हैं।
        वह ओंकार भी है और महाशक्ति या सुप्रीम पावर भी है। उस परमेश्वर को किसी भी नाम से पुकार लो, किन्तु वह रहेगा तो एक ही ब्रह्म। वही एक है जो अनन्त सुखों का भण्डार है। यह सर्वथा सत्य है कि ईश्वर रूपी इस सागर में मनुष्य जितना अधिक गहरे गोते लगता रहता है, उतनी ही उसे शान्ति की प्राप्ति होती है। तथाविध उसे आत्मिक बल भी मिलता है।
          भगवान की कृपा निष्काम कर्म करने से प्राप्त होती है। इसका अर्थ है कि जो भी कार्य मनुष्य करे उसे ईश्वर को समर्पित कर दे। मनुष्य को हर कार्य को अपना कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। उसमें से कर्त्तापन के भाव को दूर कर देना चाहिए। इस तरह मनुष्य को संसार में प्रभु की कृपा प्राप्त करने के लिए ही कर्म करना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भगवद्गीता' में कहा है -
      कर्मण्येवाधिकारस्ते म फलेषु कदाचन।
      मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोस्त्वकर्मणि।।
अर्थात् मनुष्य को कर्म करना चाहिए पर फल की कामना कभी नहीं करनी चाहिए। कर्म के फल का कारण मत बनो। इससे कर्म न करने की प्रवृत्ति होती है।
          इसी प्रकार का भाव 'ईशोपनिषद' में भी ऋषि ने लिखा है-
        कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविशेछतं समा:।
        एवं त्वयि नान्यथेतो न कर्म लिप्यते नर:।।
अर्थात् इस संसार में कर्म करते हुए मनुष्य को सौ वर्ष जीने की इच्छा करनी चाहिए। इससे भिन्न किसी और प्रकार का विधान नहीं है। इस तरह कर्म करते हुए ही जीने की इच्छा करने से मनुष्य में कर्म का लिप्त नहीं होता।
         मनुष्य का संसार में अत्यधिक विश्वास होना पतन का कारण बन जाता है। जब उसे यह लगने लगता है कि इस संसार में रहकर यदि उसने  भोग-विलास न किया तो उसका यह मानव जीवन व्यर्थ हो जाएगा। उस समय मनुष्य के उत्थान का नहीं पतन का द्वार खुल जाता है। वह सांसारिक बन्धनों में बँधा हुआ, अपना जीवन व्यर्थ गँवा देता है। अन्त समय में रो-रोकर ईश्वर से क्षमा याचना करता है। सब कुछ समाप्त हो जाने के पश्चात फिर पश्चाताप करने के कोई औचित्य नहीं रह जाता। तब ईश्वर भी उसके लिए कुछ नहीं कर सकता। तब मनुष्य को चौरासी लाख योनियों के चक्कर मे घूमते रहना पड़ता है।
         इसके विपरीत जब मनुष्य को उस ईश्वर में अथक विश्वास हो जाता है कि वही उसका सच्चा मीत है। उसकी शरण में जाने से ही वास्तविक सुख प्राप्त होता है। वही हमारा हितैषी है और रक्षक है। वही इस संसार सागर से पार लगाने वाला है। तब वह मानव के शाश्वत-सुख और परम-शान्ति का मूल बन जाता है। जो भी मनुष्य ईश्वर की शरण में पूरी श्रद्धा और सच्चे मन से चला जाता है, उसे वह कभी निराश नहीं करता। वह उसे अपनी शरण में ले लेता है।
         यदि मनुष्य परमात्मा को पाने की राह की पर चलना पड़ता है तो उसे सांसारिक सुखों से वितृष्णा हो जाती है, यानी वे उसे अच्छे नहीं लगते।  तब मनुष्य भौतिक सुख-साधनों से विरक्त हो जाता है। उसे ईश्वर का सान्निध्य अच्छा लगने लगता है। वह हर पल, हर क्षण उसका ही सिमरन करना चाहता है। जब मनुष्य सांसारिक सुखों को छोड़ने की इच्छा करता है, तभी वह परमात्मा के सामीप्य का आनन्द प्राप्त कर सकता है। अन्यथा तो सब ठीक ही चल रहा है।
           जब तक मनुष्य संसार सागर रूपी नाव से नीचे नहीं उतरेगा, तब तक वह परमात्मा रूपी नाव पर सवार नहीं हो सकता। दो नावों पर एकसाथ सवारी नहीं की जा सकती। इस प्रकार करने से डूबना अवश्यम्भावी है। प्रभु का सामीप्य मनुष्य के लिए परम वरदान है। इस कृपा को प्राप्त करने का मनुष्य को सदा यत्न करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

ईश्वर शुभ करता है

बाजार में जो भी अच्छी, नई व सुन्दर वस्तु को मनुष्य देखता है, उसे उसी क्षण से पाने का प्रयास करने लगता है। यह तो आवश्यक नहीं कि मनुष्य उस वस्तु को प्राप्त कर ही ले। ईश्वर मनुष्य को जीवन में वही सब कुछ देता है जो उसके लिए उचित होता है। वह अपनी सन्तान हम मनुष्यों का सदा ही हित चाहता है। इसलिए जो हमारे लिए हितकर होता है, वह बिना कहे प्रसन्न होकर समयानुसार हम मनुष्यों को दे देता है। मनुष्य को उसका मनचाहा सब कुछ सदा ही प्राप्त हो जाए, यह भी आवश्यक नही होता।
          मनुष्य सदा ही ईश्वर से कुछ-न-कुछ माँगता रहता है। पर उसे वह हर वस्तु नहीं मिल सकती, जिसकी वह कामना करता है। इस संसार में हम भौतिक माता-पिता अपने बच्चों के लिए सब प्रकार के साधन जुटाते रहते हैं, परन्तु वह उन्हें नहीं लेकर देते जो हमारे हिसाब से उनकी नाजायज माँग होती है। उसके लिए वे चाहे कितने हाथ-पैर पटक लें, कितना ही रोना-धोना क्यों न कर लें। उनकी इच्छा को पूरा नहीं किया जाता।
          इस विषय से सम्बन्धित एक बोधकथा कुछ समय पहले पढ़ी थी। आप भी इस पर विचार कीजिए। कुछ संशोधन के साथ कथा प्रस्तुत कर रही हूँ जो इस प्रकार है-
         कहते हैं एक बार स्वर्ग से घोषणा हुई, "भगवान सेब बॉटने आ रहे हैं। आप सब लोग तैयार हो जाइए।"
          सभी लोग भगवान से प्रसाद लेने के लिए तैयार होकर लाइन लगाकर खड़े हो गए। एक छोटी बच्ची बहुत उत्सुक थी क्योंकि वह पहली बार भगवान को देखने जा रही थी। एक बड़े और सुन्दर सेब के साथ-साथ भगवान के दर्शन की कल्पना से ही वह खुश हो रही थी। अन्त में प्रतीक्षा समाप्त हुई। बहुत लम्बी  कतार में जब उसका नम्बर आया तो भगवान ने उसे एक बड़ा और लाल रंग का सेब दिया। लेकिन जैसे ही वह सेब पकड़कर लाइन से बाहर निकली, उसका सेब हाथ से छूटकर कीचड़ में गिर गया।
          बच्ची उदास हो गई कि भगवान का दिया हुआ प्रसाद व्यर्थ हो गया। अब उसे दुबारा से लाइन में लगना पड़ेगा।दूसरी लाइन पहली से भी लम्बी थी। लेकिन कोई और रास्ता भी तो नहीं था। सब लोग ईमानदारी से अपनी-अपनी बारी से सेब लेकर जा रहे थे। अब वह बच्ची फिर से लाइन में लगी और अपनी बारी की प्रतीक्षा करने लगी। आधी क़तार को सेब मिलने के बाद सेब ख़त्म होने लगे। अब तो वह बच्ची बहुत निराश हो गई। उसने सोचा कि उसकी बारी आने तक तो सभी सेब खत्म हो जाएँगे। लेकिन वह यह नहीं जानती थी कि भगवान के भण्डार कभी ख़ाली नही होते। जब तक उसकी बारी आई, तब तक और नए सेब आ गए थे।
          भगवान तो अन्तर्यामी होते हैं। बच्ची के मन की बात जान गए। उन्होंने इस बार बच्ची को सेब देकर कहा, "पिछली बार वाला सेब एक तरफ से सड़ चुका था। तुम्हारे लिए सही नहीं था इसलिए मैने ही उसे तुम्हारे हाथों गिरवा दिया था। दूसरी तरफ लंम्बी कतार में तुम्हें इसलिए लगाया क्योंकि  नए सेब अभी पेडों पर थे। उनके आने में समय बाकी था। इसलिए तुम्हें अधिक प्रतीक्षा करनी पड़ी। ये सेब अधिक  लाल, सुन्दर और तुम्हारे लिए  उपयुक्त है।"
        भगवान की यह बात सुनकर बच्ची बहुत ही सन्तुष्ट हो गई। वह अपने हिस्से का सेब लेकर वहाँ से चली गई।
        इसी प्रकार यदि हमारे किसी भी कार्य की सफलता में विलम्ब हो रहा हो तो उसे भगवान की इच्छा मानकर स्वीकार कर लेना चाहिए। जिस प्रकार हम अपने बच्चों को उत्तम से उत्तम वस्तुएँ देने का प्रयास करते हैं, उसी प्रकार वह मालिक भी अपने बच्चों को वही देता है जो उनके लिए उत्तम होता है। ईमानदारी से अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी चाहिए और उस परमपिता परमात्मा की कृपा के लिए हर पल, हर क्षण उसका स्मरण करते रहना चाहिए।
          वह मालिक परम न्यायकारी है। वह सबके साथ समानता का व्यवहार करता है। हमारे द्वारा किए गए शुभाशुभ कर्मों के अनुसार वह यथासमय हम जीवों को उनका फल देता रहता है। उस पर अविश्वास नहीं करना चाहिए बल्कि अपने कर्मों की शुचिता की ओर ध्यान देना चाहिए। किसी कवि ने हमें समझाते हुए कहा है-
       ईश्वर: यत् करोति शोभनमेव करोति।
अर्थात् ईश्वर जो करता है, हमारे भले के लिए ही करता है। इसलिए उस पर आस्था बनाए रखनी चाहिए।
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