शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ

वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ

संसार में जन्म लेने के पश्चात मनुष्य दिन-दिन करके बड़ा होता है। धीरे-धीरे समय बीतते वह आयुप्राप्त हो जाता है। उसके पास ग्रहण की गई शिक्षा की योग्यता के साथ-साथ अनुभवों का भी एक विशाल खजाना(भण्डार) एकत्रित हो जाता है। अपने इस संग्रहालय से मोती चुन-चुनकर वह उन्हें अपनी आने वाली पीढ़ियों को विरासत में सौंपना चाहता है। वह चाहता है कि उसके ज्ञान और अनुभव से सीखकर कठिनाइयों से लोग बच जाएँ और वे गलतियॉं न दोहराऍं। बच्चे अपने जीवन में उत्तोरत्तर उन्नति करते चलें।
          सागर में छिपे खजाने किनारों पर स्वयं नहीं आ जाते। उन्हें पाने के लिए अथक परिश्रम करना पड़ता है। समुद्र में गहरे पैठना पड़ता है। उसी प्रकार वयोवृद्ध जनों के हृदयों से ऐसे अनुभवजन्य खजानों को उनके पास बैठकर पाकर उनका लाभ उठाया जा सकता है। खड़े-खड़े, भागते-भागते उनसे वह खजाना प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए धैर्य पूर्वक पास बैठकर ही जाना-समझा जा सकता है। यह सत्य है कि उनके अनुभव से लाभ ही होगा, हानि नहीं।
            इसी तरह आयु बीतने पर उनका जीवन यादों का एक ग्रन्थ बन जाता है। उसमें कटु और मधुर दोनों ही तरह की स्मृतियाँ कैद हो जाती हैं। जीवन के ये खट्टे-मीठे अनुभव उन्हें समय-समय पर याद आते रहते हैं। मधुर यादों को याद करके वे प्रसन्न होते हैं और जीवन में आई कटुताओं को याद करके उनका मानस कुछ समय के लिए व्यथित हो जाता है। उस समय यदि कोई उन्हें सहारा दे सके तो वे उन कड़वी यादों से सरलता से बाहर आ सकते हैं।
            किसी व्यक्ति विशेष की याद उन्हें बहुत तड़पाती है। कभी-कभी मनुष्य यादों के सहारे जिन्दगी काट लेता है। यह भी सम्भव है कि उसके प्रियजन अथवा बन्धु-बान्धव उससे जीवन काल में ही दुनिया से बिछुड़ गए हों। उनके वापिस लौटा लाने की हर कोशिश व्यर्थ हो गई होती है पर उनके साथ बिताए गए जीवन के पल हमेशा ही स्मृति में कैद होकर रह जाते हैं। वे चलचित्र की भॉंति मनुष्य के मानस पर चलते हुए यदा कदा उसे मायूस कर जाते हैं। 
            इसी तरह यद्यपि दोस्ती के जमाने भी लौटकर नहीं आते पर निश्चित ही हृदय में कसक छोड़ जाते हैं। जहाँ तक हो सके उन सुखद पलों को याद करके उदास होने के स्थान पर उन मधुर यादों को प्रसन्नतापूर्वक जी लेना चाहिए। युवाओं को अपनी योग्यता पर मान होना चाहिए, अभिमान कदापि नहीं। उन्हें इस सत्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि उन वयोवृद्ध माता-पिता के कारण ही वे योग्य बनकर सफलता के सोपानों को छू पाए हैं।अब उन्हें उनका तिरस्कार न करके उनका सम्मान करना चाहिए।
            युवावर्ग को बुजुर्गों के ज्ञान का उपहास करते हुए यह नहीं कहना चाहिए कि आप चुप रहो आपको क्या पता? आपको समझ नहीं आएगा?इस तरह के अपमान से से वे बहुत आहत होते हैं। उनका हृदय व्यथित होता है। उन्हें लगने लगता है कि अब वे अपने बच्चों के लिए अनुपयोगी हो गए हैं। उनके जीवन में उनकी कोई आवश्यकता नहीं है बल्कि वे उन पर एक बोझ बनते जा रहे हैं। इस व्यवहार से वे टूटने लगते हैं। इस तरह से जब वे अनावश्यक सोचते रहते हैं तो उनके स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव पड़ता है।
            यहाँ यह कहने से मैं स्वयं को रोक नहीं पा रही कि जिन माता-पिता की मेहनत की कमाई और धन-समृद्धि को वे युवा बच्चे किसी भी तरह प्राप्त करने के लिए लालायित रहते हैं तो वे मूर्ख कैसे हो सकते हैं? उस सबको उन्होंने अपनी समझ-बूझ से ही बनाया होता है। माता-पिता का सब कुछ चाहने वाले बच्चे उनके प्रति असहिष्णु नहीं हो सकते। उनसे किनारा करके उन्हें ओल्डहोम जैसे स्थानों पर नहीं भेज सकते। बाल्यावस्था और युवावस्था में जिस प्रकार उन्होंने अपने बच्चों को सहारा दिया था, अब उनकी बारी है। बच्चे अपने दायित्वों से मुॅंह नहीं मोड़ सकते।
            इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि आयु बढ़ने पर मनुष्य धीरे-धीरे शारीरिक रूप से अशक्त होने लगते हैं। इस कारण वे उस समय अधिक बोलने लगते हैं, रूठने-मानने लगते हैं, अनावश्यक क्रोध और जिद करने लगते हैं। उनका व्यवहार बच्चों की तरह हो जाता है। एक ही बात को वे कई बार दोहराने लगते हैं। तब उन्हें बच्चों के प्यार और विश्वास की बहुत अधिक आवश्यकता होती है। उन्हें यह अहसास करवाना चाहिए कि वे हर स्थिति में बच्चों के लिए उपयोगी हैं और वे उनके परामर्श के बिना एक भी कदम नहीं चल सकते। यदाकदा किसी विषय पर उनसे सलाह लेकर उनको सन्तुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए।
          सार रूप में यही कहा जा सकता है कि बच्चों को बिना किसी पूर्वाग्रह के वयोवृद्ध लोगों के अनुभवों का लाभ उठाना चाहिए। यदि वे ऐसा कर सकें तो बड़ों को भी उन बच्चों पर गर्व होगा।
चन्द्र प्रभा सूद 

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