गुरुवार, 7 मई 2026

मित्रता को कसौटी पर परखें

 मित्रता को कसौटी पर परखें

मित्रता सदा जाँचकर और परखकर ही करनी चाहिए। मित्र अपने मानसिक स्तर के अनुरूप तो कम-से-कम होना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि ऐसे लोगों से दोस्ती कर ली जाए जिससे कि उन दोस्तों के कारण जीवन में कभी पछताना पड़े अथवा शर्मिन्दा होना पड़े। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो सके दोस्ती ऐसे व्यक्ति से ही करनी चाहिए जो हर प्रकार से योग्य हो, विश्वसनीय हो और हितचिन्तक हो अथवा सज्जन हो।
             मित्रता मानव जीवन का एक अनिवार्य और अमूल्य भाग है जो भावनात्मक समर्थन, खुशी और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देती है। सच्चे मित्र कठिन समय में सहारा बनते हैं, तनाव कम करते हैं और व्यक्तिगत विकास में सहायता करते हैं। यह रिश्ता विश्वास, आपसी सम्मान और निस्वार्थ प्रेम की नींव पर टिका होता है। 
              वास्तव में मित्र वही होता है जो माता के समान मनुष्य की रक्षा करता है, पिता की तरह उसे हितकारक कार्यों में लगाता है। कुमार्ग पर जाने पर डाँटकर लौटाकर ला सकता है। सच्चा मित्र किसी भी परिस्थिति में साथ नहीं छोड़ता। वह हर दुख-सुख में सबसे पहले कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़ा मिलता है। 
            वह इससे अनजान रहना चाहता है कि उसका मित्र अमीर है या गरीब। मित्रता के रास्ते में स्टेटस आड़े नहीं आता। वह मित्र को उसके धर्म अथवा जाति से नहीं बल्कि अपनेपन के कारण पहचानता है। इसीलिए भगवान कृष्ण और गरीब ब्राह्मण सुदामा की मित्रता से बड़ा और कोई उदाहरण हो ही नहीं सकता।
            सज्जन व्यक्ति के साथ मित्रता को हम गन्ने के समान मान सकते हैं। गन्ना जिसे हम पूजा में रखते हैं और उससे बनी चीनी से तैयार स्वादिष्ट पदार्थ खाकर जीवन का आनन्द लेते हैं। उसे कितना ही तोड़ लो, छील लो, चूस लो, यहाँ तक कि उसे मशीन में डालकर पीस ही डालो, वह हर बार केवल अपनी मिठास से ही हम सबको निहाल करता है। यानी हर रूप में गन्ना मिठास ही देता है। वह मिठास हमारे अनेक भोज्य पदार्थों को रसीला और स्वादिष्ट बनाती है। उन मनभावन व्यंजनों को खाकर हम सभी तृप्त हो जाते हैं।
            मित्र की मित्रता भी इसी तरह होती है जो मनुष्य को अपनी मिठास से सराबोर करती है। फूल की तरह यह नाजुक और सुगन्ध देने वाली होती है। इस मित्रता को विश्वास और सच्चाई की खाद से पुष्ट करना चाहिए और स्नेह के जल से सींचना चाहिए। तभी यह दोस्ती पुष्पित और पल्लवित होती है जिसकी खुशबू चारों ओर फैलती है। इस मित्रता को देखकर किसी को भी ईर्ष्या हो सकती है।
          मित्रता में यदि विश्वास को तोड़ा जाए अथवा झूठ, छल-फरेब घर कर जाएँ तो इसमें दरार आ जाती है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी अनमोल दौलत को कोई भी नहीं खोना चाहेगा। इसे खोने का अहसास ही बहुत कष्टदायी होता है। इसलिए सच्चे मित्रों से किसी भी परिस्थिति में किनारा नहीं करना चाहिए और न ही दोस्तों के रास्ते में काँटे बिछाने के विषय में सोचना चाहिए।
           बचपन में जब बच्चा मित्रता के मायने नहीं समझता, उस समय वह अपने पास आने वाले हर किसी को अपना दोस्त मान लेता है यानी जो उससे बात करता है या उसके साथ खेलता है अथवा अपने खिलौने आदि शेयर करता है।
            वही बच्चा जब बड़ा हो जाता है तब वह समझदार बन जाता है। उस समय उसे अपने विवेक से मित्रों का चुनाव करना चाहिए। यथासम्भव चापलूस लोगों को अपने से सदा दूर रखना चाहिए। क्योंकि वे स्वार्थवश साथ जुड़ते हैं और अपनी स्वार्थ की पूर्ति होते ही वे पराए हो जाते हैं। ऐसा करके उस समय लगने वाले मानसिक आघात से बचा जा सकता है।
         मित्रता स्वार्थरहित प्रेम और भरोसे का एक अनमोल रिश्ता है जो सुख में प्रसन्नता को दोगुना कर देता है और दुःख में उसे आधा कर देता है। सच्चा मित्र जीवन के हर मुश्किल दौर में छायादार वृक्ष की तरह सहारा बनता है और सही मार्ग दिखाता है। सच्ची दोस्ती सबसे बड़ी दौलत है जो मुसीबत में भी साथ निभाती है। दोस्ती यदि दिल से की जाए तो इसमें कभी भी संदेह की सम्भावना नहीं रहती। सही  मायने में यदि स्वार्थ रहित कन्धा मिल जाए तो फिर मनुष्य के जीवन में कभी कोई गम शेष नहीं रह जाता।
          मित्र वास्तव में श्मशान तक का साथ निभाने वाला होना चाहिए तभी जीवन का आनन्द बना रहता है। आज के भौतिक युग में सच्चा, निस्वार्थ मित्र मिलना किसी खजाने को पाने से कमतर नहीं है। मनुष्य का सौभाग्य होता है तभी उसे ऐसा साथी मिलता है। ऐसे रत्न को सम्हालकर रखना चाहिए जो दुनिया की भीड़ में बिना किसी हील-हुज्जत के हाथ थामकर आगे जाने में समर्थ हो सके।
चन्द्र प्रभा सूद 

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