मकड़जालों से मनुष्य का वास्ता
मकड़ी के जाले प्रायः घरों में लगते रहते हैं। हम इनका घर में लगना शुभ नहीं माना जाता। इसके अतिरिक्त दीवार पर लगे जाले घर की खूबसूरती को नष्ट करते हैं। कहते है कि जाले यदि घर में लगे हों तो मनहूसियत फैलाते हैं। इसीलिए जाले दिखते ही हम उनकी सफाई करने के लिए बेचैन हो जाते हैं और उन्हें उस स्थान से हटाकर ही दम लेते हैं। खाली पड़े घरों में तो ये बहुत ही अधिक फैल जाते हैं। मकड़जाल का शाब्दिक अर्थ है उलझन भरी संरचना। मकड़ी का जाला उलझन, फरेब अथवा किसी को फंसाने वाली कोई भी पेचीदा वस्तु या योजना हो सकती है। यानी साजिशों के मकड़जाल में किसी को फँसाना कह सकते हैं।
मकड़ी के पेट में स्थित विशेष ग्रन्थियाँ होती हैं जो एक तरल रूप में सिल्क या रेशे का निर्माण करती हैं। यह सिल्क बाद में ठोस रूप में बदल जाता है और मकड़ी के पैरों से बाहर निकलता है जिसे वह जाल बनाने में इस्तेमाल करती है। मकड़ी अपने शिकार यानी छोटे-छोटे कीट-पतंगों को अपने जाल में फंसाने के लिए जाल बनाती है। जाल की विशेष संरचना शिकार को फंसाने में मदद करती है। कुछ मकड़ियाँ जाल का उपयोग अपने रहने के स्थान के रूप में भी करती हैं। कुछ मकड़ियाँ जाल का उपयोग अपने अण्डे रखने के लिए भी करती हैं।
मकड़ी का जाला बहुत मजबूत होता है और इसके रेशे काफी हल्के होते हैं। ये रेशे स्टील से भी मजबूत हो सकते हैं। यह जाल बहुत लचीला और खिंचाव को सहन करने में सक्षम होता है जो शिकार को पकड़ने के दौरान टूटता नहीं है। मकड़ी का जाल उसकी जीवित रहने की प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है और यह उसकी शिकार करने की विशेष विधि को दर्शाता है।
जंगलों में भी मकड़ियाँ अपने जाले बनाती रहती हैं। इन जालों से बचकर ही सब लोगों को निकलना पड़ता हैं। यदि शरीर या चेहरे को ये छूते हैं तो हम एक अजीब तरह की उलझन का अनुभव करते हैं। उनसे पीछा छुड़ाने का भरसक प्रयास भी करते हैं।
मकड़ी की कारीगरी की जितनी भी प्रशंसा की जाए वह कम ही होगी। इतनी खूबसूरती से वह अपने जाले बुनती हैं। यदि उस बुनावट को निहारने लगो तो नजर उस पर से हटती नहीं है। मन हैरान रह जाता है मकड़ी के कौशल को देखकर। यह जाल जो मकड़ी बुनती है उसमें अपने शिकार यानी कीट-पतंगो को फंसाकर अपना पेट भरती है।
जाल कितना भी आकर्षक हो अथवा खूबसूरत क्यों न हो इसमें फंसने वाले को कभी भी राहत नहीं मिल सकती। मनुष्य को मकड़ी के जाल से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि किसी प्रकार के जाल में भी वह नहीं फंसेगा फिर वह चाहे कितना ही मनमोहक हो।
संसार में रहते हुए मनुष्य को इस तरह के मकड़जालों से प्रतिदिन ही वास्ता पड़ता रहता है। कभी मोहमाया के जाल उसे लुभाते है तो कभी सुविधाभोगी होने के कारण शार्टकट का मार्ग। कभी-कभी वह जान-बूझकर अन्न की तलाश में भटकते हुए कबूतरों की तरह स्वयं ही इन जालों में फंसकर असहाय अनुभव करता है। कभी-कभी अनजाने में फंसकर उससे बाहर निकलने के लिए छटपटाता है।
यदि मनुष्य की इच्छा शक्ति दृढ़ हो तो वह संसार के किसी प्रलोभन देने वाले जाल का तिरस्कार कर सकता है और उसमें फंसता नहीं है। परन्तु कमजोर मानसिकता वाले मनुष्य क्षणिक लाभ के लिए इस जाल में फंसकर अपना जीवन नरक के समान कष्टदायी बना लेते हैं। उस समय ऐसी भयंकर भूल के लिए उनके पास पश्चाताप करने के अलावा कोई और रास्ता शेष नहीं बचता।
शिकार करने वाले शिकारियों का तो काम ही होता है दाना डालने का और जाल बिछाने का। अब यह हमारे विवेक पर निर्भर करता है कि हम उन शिकारियों के जाल में न फंसने के उपाय ढूँढ निकालें और उन्हें दूर से ही बॉय-बॉय करते हुए हँसते हुए सुरक्षित रहें।
इस संसार में जितने भी लुभावने जाल हैं वे मनुष्य को पागल बना देने के लिए पर्याप्त हैं। सच्चाई का रास्ता लम्बा और पथरीला होता है पर यह आकर्षण वाला मार्ग दूर से सुहावना प्रतीत होता है और उस पर चलने वाले को लहुलूहान कर देता है। यहाँ दया अथवा करुणा की कोई भी गुँजाइश नहीं होती।
मकड़ी जिस प्रकार जाला बनाकर उसके तन्तुओं से स्वयं को समेट लेती है अर्थात् अपने आप को छिपा लेती है, उसी प्रकार तन्तु रूप मायाजाल अथवा सृष्टि की रचना करके ईश्वर भी स्वयं को अपनी इच्छा से आच्छादित कर लेता है यानी स्वयं को समेट लेता है। परमेश्वर और उसकी रचना को समझने के लिए ही 'मुण्डकोपनिषद्' के प्रथम मुण्डक में मकड़ी का उदाहरण दिया गया है। फिर उस प्रभु को पाने के लिए अनेकानेक यत्न करने पड़ते हैं। वही जीव को चौरासी लाख योनियों में भटकने से बचाकर, जन्म-मरण के इन बन्धनों से स्वतन्त्र करके मोक्ष प्रदान कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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