सोमवार, 13 जुलाई 2026

धन्य है आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता

धन्य हैं आज्ञाकारी सन्तान के माता-पिता  

धन्य हैं वे माता-पिता जिनकी आज्ञाकारी सन्तान आजन्म उनका मान-सत्कार करती है। ईश्वर के तुल्य समझते हुए जिन्दगी के हर मोड़ पर मन से उनकी देखभाल करती है, बिना कहे उनकी सभी आवश्यकताओं को पूरा करती है। कभी उनके मन में यह विचार तक नहीं आने देती कि उनके माता-पिता यह सोचने पर विवश हो जाएँ कि काश यह हमारी सन्तान न होती। ऐसी सुयोग्य सन्तान पर हर माता-पिता को बहुत गर्व का अनुभव होता है।
           अपने बच्चों से बढ़कर माता-पिता के लिए और कोई नहीं होता। वे उन्हें पढ़ा-लिखाकर योग्य बना हुआ देखना चाहते हैं। वे यह भी कामना करते हैं कि उनके बच्चे अपने पैरों पर खड़े होकर जीवन में एक सफल व्यक्ति बनें। दुनिया की सारी नेमते उनके कदमों में हो, किसी प्रकार का कोई अभाव अथवा परेशानी उनके पास फटकने भी न पाए। बच्चे का भविष्य बनाने के लिए वे सभी तरह के कष्ट हंसते हुए झेल लेते हैं।
           वाट्सअप पर यह बोधकथा पढ़ी थी। मुझे अच्छी लगी। सबके साथ इसे साझा करने की इच्छा हुई। कुछ संशोधनों के साथ आपके समक्ष यह कथा प्रस्तुत है। 
           सभी माता-पिता की तरह एक पिता ने भी अपनी सामर्थ्य से बढ़कर पुत्र की बहुत अच्छी परवरिश की, उसे खूब पढ़ाया, लिखाया व उसकी सभी आवश्यकताओं को पूरा किया। पुत्र सफल इन्सान बनकर एक मल्टी नेशनल कम्पनी में उच्च पद पर कार्य करने लगा। कम्पनी की ओर से उसे उच्च पद के साथ-साथ अच्छा वेतन व सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ प्रदान की गईं। 
          समय बीतते उसका विवाह एक सुन्दर व सुघड़ कन्या से हुआ। उसके घर एक प्यारी-सी बेटी ने जन्म लिया। समय बीतते पिता भी बूढ़ा हो गया। बूढ़े पिता को एक दिन पुत्र से मिलने की उत्कट इच्छा हुई। वह उससे मिलने शहर उसके ऑफिस में गया। वहाँ पुत्र का शानदार ऑफिस देख पिता का सीना गर्व से फूल गया। उसके मातहत सैंकड़ों कर्मचारी कार्य कर रहे थे। 
            उसके चैम्बर में जाकर पीछे से उसके कन्धे पर हाथ रखकर प्यार से पुत्र से पूछा, "इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
            पुत्र ने पिता को बड़े प्यार से हंसते हुए यह कहा, "मेरे आलावा कौन हो सकता है?" 
           पिता पुत्र के उत्तर से निराश हो गया। उसे यह विश्वास था कि बेटा गर्व से कहेगा, "सबसे भाग्यशाली इन्सान आप है जिन्होंने मुझे योग्य बनाया।"
           उसकी आँखे छलछला गईं। दफ्तर से बाहर निकलने से पहले पुनः उन्होंने पीछे मुड़कर बेटे से पूछा, "बताओ  इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान कौन है?"
          पुत्र ने इस बार अपने पिता से बार कहा, "पिताजी, वह तो आप हैं।"
          पिता आश्चर्यचकित हो गया और उसने पुत्र से‌ कहा, "अभी तो तुम स्वयं को इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान बता रहे थे।"
         पुत्र ने हंसते हुए कहा, "पिताजी उस समय आपका हाथ मेरे कन्धे पर था। जिस पुत्र के कन्धे पर या सिर पर पिता का वरद हस्त होता है, वह पुत्र दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है।" 
       ‌  पिता की आँखे नम हो आईं, उसने अपने पुत्र को गले लग लिया।
          सच बात है यह कि जिसके कन्धे पर या सिर पर पिता का हाथ होता है वह इस दुनिया का सबसे भाग्यशाली इन्सान होता है। पिता का वरद हस्त उसी इन्सान के सिर पर हो सकता है जो माता-पिता का आज्ञाकारी बच्चा होता है। जिसे उनकी परवाह होती है और उनके सुख-दुख का ध्यान रखता है। उनकी हर छोटी-बड़ी इच्छा का मान रखता है। तभी वह उनका आशीर्वाद भी पाने का अधिकारी बन पाता है।
         इसके विपरीत अपने माता-पिता का जो सन्तान वृद्धावस्था में बिल्कुल ध्यान नहीं रखती, उन्हें दाने-दाने को मोहताज बना देती है, उन्हें दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश कर देती है, ऐसी सन्तान को न तो ईश्वर कभी क्षमा करता है और न ही घर-परिवार, बन्धु-बान्धवअथवा समाज। ऐसे नालायक बच्चों के लिए दुखी होकर माता-पिता के मुँह से यही बात निकलती है कि 'काश ये पैदा होते ही मर जाते।'
          भगवान श्रीराम और श्रवण कुमार जैसी पितृभक्त सन्तानों को ही संसार युगों-युगों तक स्मरण करता है और उनके उदाहरण दिए जाते हैं। ऐसे बच्चे सबकी ईर्ष्या का भाजन बनते हैं। यही समाज व देश की धरोहर होते हैं। माता-पिता के साथ सभी लोग उन पर मान करते हैं। 
चन्द्र प्रभा सूद 

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