सोमवार, 10 अगस्त 2026

विद्वत्ता की कसौटी

विद्वत्ता की कसौटी

मनुष्य पढ़-लिखकर जब योग्य बनता है तो उसके घर-परिवार और बंधु-बान्धवों में उसे  सम्मान मिलता है। वैसे प्रत्येक मनुष्य की हार्दिक इच्छा होती है कि वह बुद्धिमान व्यक्ति कहलाए। विद्वान उसकी बुद्धिमत्ता का लौहा मानें। किसी सभा में यदि वह जाए तो उस विद्वत सभा में उसकी ही चर्चा हो। सभी उससे अपना सम्बन्ध बनाने के लिए इच्छुक रहें। सर्वत्र उसे एक विशेष स्थान मिले। 
          अब हम विचार करते हैं कि विद्वत्ता की कसौटी क्या है? मनुष्य को बुद्धिमान बनने के लिए कुछ तथ्यों की ओर ध्यान देना आवश्यक हैं- 
          सबसे पहली अथवा प्रमुख बात यह है कि मनुष्य का विचरवान होना आवश्यक होता है। उसे मननशील होना चाहिए। जब वह एकान्त में बैठकर विचार करता है तो उसे करणीय और अकरणीय का बोध हो जाता है। उसी के अनुरूप अकरणीय कार्यों का परित्याग करता हुआ और करणीय कार्यों के आलम्बन से दिन-प्रतिदिन उन्नति करता हुआ वह सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है।
          सज्जनों का अनुकरण करना और विद्वानों की संगति में रहना बहुत आवश्यक होता है। इससे मनुष्य में एक प्रकार का ठहराव आता है। उसका व्यवहार सब लोगों के साथ प्रायः सन्तुलित होने लगता है। उसके मन में व्यष्टि (एक) के स्थान पर समष्टि (सबका) का भाव आने लगता है। तभी वह सबको अपने साथ लेकर चल पाता है।
        जब वह ज्ञानार्जन करता है तब वह अपने नकारात्मक विचारों के जंजाल से मुक्त होकर सकारात्मक मनोवृत्ति वाला हो जाता है। इस तरह ईर्ष्या-द्वेष आदि दुर्भावनाओं के परित्याग करने से वह महापुरुषों की श्रेणी में आ जाता है। हर स्थान पर उसे यथोचित मान-सम्मान मिलने लगता है। इस तरह वह अग्रणी बनकर समाज में दिशा देने का कार्य करने लग जाता है।
          मनुष्य के लिए उचित यही है कि वह अपनी योग्यता और अनुभव को देश, समाज, घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में बाँटे। इससे उसे अपना जीवन संवारने के साथ-साथ दूसरों को भी मार्गदर्शन करना चाहिए। समाज को ऐसे मनीषियों की बहुत आवश्यकता है जो निस्वार्थ होकर उसकी भलाई के कार्य कर सकें। इन समाज सुधारकों को युगों-युगों तक स्मरण किया जाता है।
        आजकल राजाओं का युग नहीं है फिर भी हम देश के प्रथम नागरिक यानी राष्ट्रपति को इस श्रेणी में मान सकते हैं। मनीषियों का विद्वानों के सम्मान के विषय में यह मानना है - 
        स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते।
अर्थात् राजा का सम्मान उसके अपने देश में होता है। इसके विपरीत विद्वान को हर स्थान पर मान दिया जाता है।
          हम देखते हैं कि हमारे देश के उच्च शिक्षा प्राप्त वैज्ञानिक, इंजीनियर, डॉक्टर आदि विश्व के किसी भी देश में चले जाएँ, उन्हें सर्वत्र सिर-आँखों पर बिठाया जाता है और उन्हें समान रूप से सम्मान दिया जाता है। उनकी नियुक्तियाँ अच्छे वेतनमान पर होती हैं। इन लोगों को अपने देश में भी उतना‌ ही पुरस्कृत किया जाता है।
          कहने का तात्पर्य यही है कि विद्वान किसी भी आयु अथवा जाति का हो वह सदा पूजनीय होता है। विद्वत्ता के समक्ष आयु की सीमा कोई मायने नहीं रखती, वह गौण हो जाती है। जाति का बन्धन भी गौण हो जाता है। सीखने की जहॉं तक बात है, एक बच्चे से भी ज्ञान लिया जा सकता है। इसमें हेठी जैसी कोई बात नहीं होती।
          यदि कोई व्यक्ति यह सोचे कि विद्वत्ता न होने पर, उसका ढोंग कर लेने से वह विद्वानों की श्रेणी में आ जाएगा तो यह उस मनुष्य की सरासर भूल है। मूर्ख व्यक्ति जब भी मुँह खोलेगा तो उसकी पोल खुल जाएगी। इस तरह तब दूसरों से तिरस्कृत होने पर उसकी स्थिति दयनीय हो जाती है। इसके लिए हम कह सकते हैं कि काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ती है, बार-बार नहीं चढ़ती।
          यहॉं संस्कृत भाषा के विश्व सुप्रसिद्ध विद्वान् महाकवि कालिदास की चर्चा करना चाहती हूॅं। अपने पूर्व काल में वे निपट मूर्ख थे। विद्वानों ने अपने अपमान का बदला लेने के लिए उनका विवाह परम विदुषी विद्योतमा से करवा दिया था। अशुद्ध 'उष्ट्र' शब्द सुनकर उनकी पत्नी ने उन्हें घर से निकाल दिया था। विद्वानों की संगति और ईश्वर की उपासना से वे विद्वान बने।
          विद्वानों को यह सिद्ध करने की या प्रचार करने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वे बहुत जानकार हैं। लोग उनके प्रचारतन्त्र से प्रभावित होकर उनसे कुछ सीखें। होता इसके विपरीत है, लोग ढूँढते हुए उनके पास आकर अपनी ज्ञान पिपसा को शान्त करते हैं।
          विद्वानों की विद्वत्ता कस्तूरी की गन्ध की भाँति होती है जिसे चाहे सात पर्दों में भी छुपाकर क्यों न रखा जाए, वह चारों ओर के वातावरण को सुगन्धित कर ही देती है।
          विद्वत्ता मनुष्य को ईश्वर का दिया हुआ उपहार है। वह उसे अपने पुण्य कर्मों की बदौलत प्राप्त करता है। मनुष्य भाग्य के भरोसे नहीं बैठ सकता। उसे फिर भी कठोर परिश्रम करना पड़ता है। दिन-रात एक करना पड़ता है। स्वाध्याय, मनन, सज्जनों की संगति और ईश्वर की उपासना करके ज्ञान को निस्सन्देह प्राप्त किया जा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

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