सास और बहु के आपसी संबंधों की कड़वाहट के किस्से प्रायः सुनने को मिलते हैं। जिस घर में ऐसा माहौल होता है वहाँ दिन-रात का चैन पंख लगाकर उड़ जाता है। फिर शेष बचते है अकेलापन, उदासी, घर में अशांति आदि।
ऐसा नहीं है कि इस खटपट के लिए अकेली सास दोषी है या अकेली बहु। दोनों ही की ओर से कुछ-कुछ ऐसा हो जाता है जिससे घर अशांत व नरक तुल्य हो जाता है। आजकल पहले जमाने की तरह दोनों ही अनपढ़ नहीं बल्कि पढ़ी-लिखी हुई होती हैं। फिर उन दोनों समझदार गृहणियों से ऐसे कटु व्यवहार की अपेक्षा कदाचित नहीं की जाती। यदि दोनों थोड़ी सी समझदारी से काम लें तो घर में कोई समस्या ही न रह जाए और स्वर्ग के समान सुखी व खुशहाल हो जाए।
हमारा पारिवारिक ढ़ाँचा ऐसा है कि हर बेटी को विवाह के उपरान्त अपने माता-पिता का घर छोड़कर अपने ससुराल पति के घर जाना होता है। इसलिए ससुराल पक्ष को चाहिए कि अपनी बहु का स्वागत करें और उसे खुले दिल से अपनाएँ।
कमियाँ हर इंसान में होती हैं। उन कमियों को नजरअंदाज करके ही हम सभी संबंध निभाते हैं। फिर बहु के साथ परिवार और परिवार के सदस्यों के साथ बहु के संबंध निभाने में कठिनाई क्यों?
सभी माता-पिता चाहते हैं उनकी बेटी ससुराल में सुखी रहे। अपनी बेटी के लिए अपने दामाद व ससुराल पक्ष के लिए मधुर व्यवहार की अपेक्षा की जाती है। परन्तु वही माता-पिता बहु के लिए संकीर्ण हृदय क्यों हो जाते हैं?
भाई या बेटा जो पहले अपना होता है शादी के बाद वो पराया कर दिया जाता है यह बात हजम नहीं होती। यदि वह पत्नी की सुने तो उसे जोरु का गुलाम कहकर धिक्कारा जाता है। इसके विपरीत यदि अपने माता-पिता या परिवार के विषय में वह सोचे तो उसे mom's boy कहकर अपमानित किया जाता है।
बहु के मायके वालों को अपना बेटा तो आज्ञाकारी चाहिए पर दामाद नहीं। समझ में नहीं आता लोगों की सोच इतनी स्वार्थी कैसे होती जा रही है?
बहु भी किसी की बेटी होती है। उसे भी नाजों से पाला जाता है। आप उसे घर की लक्ष्मी का सम्मान दें। उसकी कमियों को अनदेखा करते हुए उसे प्यार से धीरे-धीरे अपने परिवार के अनुरूप बनाएँ। इस बात को हमेशा स्मरण रखिए कि अपने बच्चे भी अवज्ञा कर जाते हैं और पलटकर जवाब भी दे जाते हैं। बहु भी तो अपनी बेटी है उसके साथ कभी ऊँच-नीच हो जाए तो गाँठ मत बाँध लीजिए। जहाँ तक हो सके दूसरों के सामने बच्चों की प्रशंसा कीजिए बुराई कदापि नहीं।
लड़की अपने माता-पिता का घर छोड़कर जो सपने लेकर ससुराल आती है उन्हें बड़ों को विश्वास में लेकर पूरा करे। सच्चे मन से सास- ससुर को माता-पिता माने और देवर-ननदों को भाई-बहन। प्रयास यही रहना चाहिए कि बड़ों को कभी पलटकर जवाब न दिया जाए क्योंकि इससे संबंधों में कटुता आती है। उस समय लगाई गयी चुप्पी सौ झगड़ों से बचाती है।
गलती हो जाने पर घर के छोटे या बड़े सभी सदस्यों को बिना किसी पूर्वाग्रह के अपना अहम छोड़कर क्षमा याचना कर लेनी चाहिए इससे घर में सौहार्द बना रहता है।
माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी को ससुराल में सामंजस्य रखने का परामर्श दें। छोटी-सी बात को तूल देकर बेटी के घर में दखल न दें जब तक पानी सिर से ऊपर न हो जाए। बेटी को भी चाहिए कि वह ससुराल की हर बात माता-पिता को न बताए। इससे झगड़े ज्यादा बढ़ते हैं। बार-बार बेटी के घर जाकर मीनमेख निकालना या टीका-टिप्पणी करने से संबंधों में दरार आने लगती है।
किसी भी घटना के लिए दोनों ही पक्ष जिम्मेदार होते हैं। संबंधों में खटास न आने पाए इसलिए गम खाना सीखिए। बड़ों को बच्चों के सिर अपना वरद हस्त रखना चाहिए और बच्चों को बड़ों का यथोचित सम्मान करना चाहिए। दोनों ही पक्ष थोड़ा झुककर चलें तो घर में सुख, शांति व समृद्धि बनी रहती है
शुक्रवार, 8 मई 2015
सास बहू के संबंध
बुधवार, 6 मई 2015
विवाह की 42वीं वर्षगांठ पर
आज 7 मई को हमारे वैवाहिक गठबंधन की 42 वीं वर्षगांठ है। इस यादगार दिन की स्मृतियों को सहेजते हुए अपने व अपने जीवन साथी भूपाल सूद के लिए यह भावपूर्ण एक नई कविता-
मीत चलो प्रेम की पींग बढ़ाएँ ऊँची ऊँची
रोक न पाए इसको कर न सके कोई नीची
दूर गगन तक इसे बढ़ाकर छू लें चंदा तारे
देखें ललचाई आँखों से खड़े हुए जन सारे
हाथ थामकर आओ दे दो मुझको सहारा
फिर न होगा हमसे दूर देखो वहाँ किनारा
मैं तुम हो जाऊँ और तुम मैं हो जाओ वादा
ऐसा जग में नेह निराला हो जाए यह वादा
आधा मैं खा लूँगी और आधा तुम खा लेना
मिल बाँटकर ऐसे ही हम दोनों ने जी लेना
कोई गिला न करना न करना कोई शिकवा
खुशी-खुशी संध्या तक साथ चलेंगे मितवा
धूप-छाँव की आहट भी न रोके राह हमारी
सह लेंगे इक-दूजे की मिल कर पीड़ा सारी
बने मूक दर्शक जग सारा है ये रीत निराली
भूल सके न जग में कोई ऐसी प्रीत निराली
मंगलवार, 5 मई 2015
विधवा विवाह
विधवाओं की दुर्दशा के बारे में बहुत कुछ सुना व पढ़ा। इससे मन को अतीव पीड़ा हुई। पता नहीं अपने घर की इज्जत को इस तरह प्रताड़ित होते हुए देखकर लोगों के मन क्यों नहीं फटते? घर-परिवार में क्या एक विधवा का भरण-पोषण नहीं किया जा सकता? क्या उसके घर में वास करने से वहाँ कुछ घट जाता है?
कुछ विधवाएँ तीर्थ स्थानों में परिजनों के अत्याचारों से तंग आकर चली जाती हैं और कुछ जबरदस्ती भेज दी जाती हैं। वहाँ खाने-पीने को मोहताज, स्वास्थ्य की सभी सुविधाओं से वंचित अंधेरे व घुटन भरे कमरों में जीवन बिताती हैं। ये विधवाएँ कहीं-कहीं भिक्षा माँग कर जीवन यापन कर रही हैं। सभ्य समाज के लिए यह बड़े शर्म की बात है कि उसका एक अंश इतनी बदहाली में गुजर बसर कर रहा है और वह मौन होकर इस अन्याय की ओर से आँख मूँद कर सो रहा है।
हमारे भारत की संस्कृति तो ऐसे संस्कार नहीं देती कि अपने प्रिय जन को इस प्रकार असहाय छोड़ दिया जाए। चाहे वह माँ हो, बहु हो, बेटी हो अथवा बहन हो उसे इस प्रकार का जीवन व्यतीत करने के लिए मजबूर करना भी अपराध ही है। हालात ये हैं कि अंध रूढ़ियों के कारण किसी भी शुभकार्य में उसकी उपस्थिति अशुभ मानी जाती है।
विधवा का पुनः विवाह भी तो किया जा सकता है। प्राचीन काल में भी विधवा का विवाह हुआ करता था। आयु प्राप्त विधवा की बात मैं नहीं कर रही। हो सकता है उम्र के उस पड़ाव में जब उसके बच्चे बड़े व जीवन में सेटल हो जाते हैं वह शायद पुनः विवाह न करना चाहे। परंतु अल्प वय विधवा के पुनः विवाह की अनुमति तो हमारे ग्रन्थ देते हैं।
विचारणीय है कि पुरुष किसी भी आयु में पुनर्विवाह कर सकता है तो महिला क्यों नहीं? उसे घर-परिवार की जिम्मेदारी का अहसास कराके या समाज का डर दिखा के पुनर्विवाह से रोक दिया जाता है। जबकि उसे भी तो अपने जीवन के बारे में सोचने का बराबर का हक है।
अथर्ववेद के मंत्र १८.३ में कहा गया है कि मैंने विधवा युवती को जीवित मृतो के बीच से अर्थात शमशान भूमि से ले जाई जाती वह पति की मृत्यु के विरह जन्य दुःख रूप घोर अंधकार से द्रवित थी इसलिए उसे पूर्व पत्नीत्व से हटाकर दूसरा पत्नीत्व प्राप्त करा दिया है। यह मन्त्र हमें समझा रहा है कि विधवा का पुनः विवाह किया गया।
अथर्ववेद के ही अन्य मन्त्रों 9/5/27-28 में कहा गया है कि जो स्त्री पहले पति की मृत्यु के पश्चात जब पुन: दूसरे पति को प्राप्त करती है तो पुन: पत्नी होनेवाली स्त्री के साथ दूसरा पति एक ही गृहस्थलोक में वास करने वाला हो जाता है। अर्थात् दोनों पति-पत्नी के रूप में अपनी गृहस्थी चलाते हैं।
पति की मृत्यु के बाद देवर से भी पुनर्विवाह के प्रमाण ऋग्वेद १०/४०/२ और निरुक्त ३/१४ में भी मिलते हैं।
वेदों के यह प्रमाण सिद्ध करते हैं कि वेदों में विधवा विवाह को महापाप नहीं मानते थे अपितु पुनर्विवाह की अनुमति थी। इस प्रकार विधवा को उसके पूर्ण अधिकार के साथ जीवन व्यतीत करने की अनुमति थी। उन्हें घर से अलग रहकर यातनाएँ सहने के लिए मजबूर नहीं किया जाता था।
वैसे कानून विधवा को व उसके बच्चों को ससुराल की धन-संपत्ति में बराबर का हक देता है। उसके पति के घर, व्यापार या पेंशन एवं सभी बचतों पर उसका पूरा हक होता है।
आज इक्कीसवीं सदी के प्रगतिशील युग में इस प्रकार की रूढ़ियों को तोड़कर असहनीय यातनाओं को झेलने को लाचार इन विधवाओं के पुनर्वास व उन्हें यथोचित सम्मान देने की आवश्यकता है। सबसे प्रमुख बात है औरतों को शिक्षित करना जिससे उन्हें अपने अधिकारों की जानकारी हो सके और वे इस जहालत से छुटकारा पा सकें। वे इन अंध रूढ़ियों को तोड़कर समाज में अपना स्थान बना सकें।
सोमवार, 4 मई 2015
बाल विवाह
भारत में जड़ कर गई कुरीतियों में बाल विवाह एक ज्वलंत समस्या है।इक्कीसवीं सदी में जहाँ विश्व सफलता की बुलंदियों को छू रहा है हम इन सामाजिक कुरीतियों पर चर्चा कर रहे हैं। बड़े दुख की बात है कि टीवी व इन्टरनेट के जमाने में भी न जाने कितने मासूम इन ढकोसलों की बलि पर चढ़ जाते हैं।
वैदिक काल में भी बाल विवाह जैसी रूढ़ियाँ नहीं थी। तब पुरुष की विवाह की आयु 25 वर्ष निश्चित थी।
भारतीय कानून के अनुसार, विवाह योग्य आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष एवं महिलाओं के लिए 18 वर्ष है। यदि कोई इससे कम आयु में यदि किसी का विवाह होता है तो वह विवाह को निरस्त घोषित कर सकता है।
जिस उम्र में बच्चे गुड्डे-गुड़ियों से खेलते हैं इन्हें शादी के मंडप में बिठा दिया जाता है। पढ़ने-लिखने की सुविधा से ये वंचित रह जाते हैं। इसका परिणाम सारी जिन्दगी इन लोगों को भुगतना पड़ता है। अशिक्षित हो जाने के कारण अच्छी नौकरी नहीं मिल पाती। जीवन की मुँह बाये खड़ी समस्याओं से जूझना बहुत कठिन हो जाता है। उन्हें पग-पग पर कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। साथ ही कच्ची उम्र में विवाह का उपहार इन्हें बीमारियों के रूप में मिलता है। कम उम्र में सेक्स की शुरुआत एवं गर्भधारण से जुड़ी स्वास्थ समस्याएँ अक्सर होने की सम्भावना होती है। इस आयु में मातृत्व एवं शिशु मृत्यु की दरें अधिकतम होती है।
कम उम्र की लड़कियाँ परिपक्व नहीं होतीं। अक्सर घरेलू हिंसा, सेक्स सम्बन्धी ज़्यादतियों एवं सामाजिक बहिष्कार का शिकार होती हैं।
विभिन्न राज्यों में अठारह वर्ष से कम आयु में विवाहित हो रही लड़कियों का प्रतिशत खतरनाक है- मध्य प्रदेश में 73 %, उत्तर प्रदेश में 64%, राजस्थान में 68%, आन्ध्र प्रदेश में 71%, बिहार में 67%।
यूनीसेफ की “विश्व के बच्चों की स्थिति- 2009” रिपोर्ट के अनुसार भारत की 47 प्रतिशत महिलाएँ कानूनी रूप से मान्य आयु सीमा– 18 वर्ष से कम आयु में ब्याही गईं, जिसमें 56 प्रतिशत ग्रामीण क्षेत्रों से थीं।
यूनीसेफ के अनुसार (‘विश्व के बच्चों की स्थिति-2009’) विश्व के बाल विवाहों में से 40 प्रतिशत भारत में होते हैं।
वास्तव में इस प्रथा का प्रचलन मुगल काल में हुआ। माना उस समय लड़कियों की सुरक्षा हेतु इसका प्रचलन हुआ होगा।
आज हमारा देश स्वतंत्र है। अब इस समय हम इन समस्याओं से सरलता से मुक्त हो सकते हैं फिर इन्हें सीने से लगाए रखने की कोई आवश्यकयता महसूस नहीं होती।
बाल विवाह उन्मूलन हेतु सरकारी व गैर सरकारी संस्थाओं की पहल पर इसके विरुद्ध कानून बनाया है। इसी कड़ी में राज्यों ने भी इसके कानून पारित किए हैं। लड़कियों की शिक्षा को सुगम बनाना चाहिए। हानिकारक सामाजिक नियमों को बदलना चाहिए। सामुदायिक कार्यक्रमों को सहायता देनी चाहिए। युवा महिलाओं को आर्थिक अवसर प्रदान करने चाहिएँ।
प्रत्येक विवाह को वैध मानने के लिए सरकार ने उसका पंजीकरण आवश्यक कर दिया है।
बच्चों के खुशहाल व स्वस्थ जीवन की कामना करते हुए मैं आप सभी सुधी जनों से अनुरोध करती हूँ कि कुरीति को जड़ से उखाड़ने में सहायता करें। हालांकि हमारे समाज सुधारक सैंकड़ों वर्षों से इन कुरीतियों की मुक्ति के लिए प्रयास करते रहे। सरकार से भी कड़े कानून बनाने की अपील करती हूँ जिससे बाल विवाह की कुप्रथा पर लगाम कसी जा सके।
रविवार, 3 मई 2015
बेमेल विवाह
अपने आसपास हम कई बेमेल या अनमेल जोड़ों को देखते हैं। इन जोड़ों में बहुधा पुरुषों की आयु अधिक होती है और पत्नी कम आयु की होती है। हालांकि यह अपराध नहीं है परन्तु कई बार समस्याओं को भी जन्म दे देती है।
इस विषय को विद्वानों ने अपने-अपने तरीके से उठाया है। इससे संबंधित कुछ फिल्में भी बनी हैं। टीवी सीरियल से भी यह विषय अछूता नहीं है।
पत्नी की मृत्यु के पश्चात घर व बच्चों की देखभाल के लिए कम आयु की युवती से विवाह कर लिया जाता है। कभी-कभी युवावस्था में अपने दायित्वों का निर्वहण करते हुए विवाह योग्य आयु कब बीत जाती है युवक को पता ही नहीं चलता। उस परिस्थिति में भी ऐसा बेमेल विवाह हो जाता है। इसके अतिरिक्त वृद्धावस्था के अकेलेपन को दूर करने के लिए भी साधन सम्पन्न ऐसा विवाह कर लेते हैं।
कई बार साधनहीन लोग दहेज न दे पाने या अन्य किसी मजबूरी के चलते अपनी कम आयु बेटी का विवाह किसी अधेड़ व्यक्ति से करने के लिए विवश हो जाते हैं। लोग प्रायः उन्हें पिता व पुत्री समझ लेते हैं।
पुरुष यदि अधिक आयु का हो तो वह इसी परेशानी में रहता है कि यदि कहीं उसकी पत्नी को उसका हमउम्र साथी मिल गया और उससे उसे प्यार हो गया तो क्या होगा? इसलिए वह उसकी हर जायज-नाजायज माँग को पूरा करता रहता है। कभी-कभी धन-दौलत के लालच में भी कम आयु की महिला उससे शादी कर लेती है। उसके पीछे प्रायः स्वार्थ ही कारण होता है। स्वार्थपूर्ति के उपरान्त उसकी दशा शोचनीय हो जाती है।
समाज में ऐसा भी देखा गया है कि अधेड़ आयु पति अपनी पत्नी के अत्याचार व उसका किसी ओर से शारीरिक संबंध तक जग हसाई न हो इस डर से सहन कर लेने को विवश हो जाता है।
इससे भी बढ़कर त्रासदी यह होती है कि अधेड़ पति के युवा बच्चे उस कम आयु माँ को स्वीकार न करके उससे नफरत करते हैं।
इस तरह मनों में घुलने वाला जहर किसी की भी हत्या करवा देता है। इसी तरह कभी-कभार पत्नी भी अपने युवा प्रेमी के साथ मिलकर पति की हत्या का पडयन्त्र रच डालती है और फिर सब कुछ लेकर फरार हो जाती है।
अब हम चर्चा करते हैं जब पत्नी की आयु पति से अधिक होती है। वैसे शादियों के मुहूर्त निकालने वाले मानते हैं कि पत्नी यदि आयु में बड़ी हो तो शुभ होता है। वे दो या अढ़ाई वर्ष तक पत्नी का बड़ा होना अच्छा मानते हैं।
समस्या तब होती है जब पत्नी दस से बीस वर्ष तक अपने पति से बड़ी होती है। सहानुभूति के कारण या धन-संम्पत्ति के लालच में किए गए इस वैवाहिक संबंध में परेशानियाँ अधिक होती हैं। आयु के अधिक अंतर के कारण पत्नी शीघ्र अधेड़ावस्था में पहुँच जाती है और पति अभी युवा ही रहता है। ऐसी स्थिति में वह कामेच्छाओं की पूर्ति के लिए इधर-उधर भटकने लगता है। विवाहेत्तर संबंध तक बना लेता है। जिसका परिणाम नित्य कलह-क्लेश होता है। जिसका अंत भी किसी एक की हत्या हो सकता है।
पति या पत्नी कोई भी यदि आयु में वृद्ध है तो उसका परिणाम प्रायः सभी को भुगतना पड़ता है। यदि दोनों की आयु में कम अंतर हो तो गृहस्थी कुछ अधिक सुविधा से चलती है। माता-पिता को चाहिए कि अपने बच्चों के बेमेल विवाह कराने से बचें ताकि उनका और बच्चों की जिन्दगी का सफर सुहाना हो सके।
शनिवार, 2 मई 2015
विवाह संस्था पर कुठाराघात
भारतीय संस्कृति पर कुठाराघात करने के लिए पाश्चात्य लोग तैयार बैठे हुए हैं। उनके पिछलग्गू देशीय महानुभाव भी आग में घी डालने कार्य कर रहे हैं। इसका दुष्परिणाम है वे विवाह जैसी सामाजिक व्यवस्था को तहस-नहस करना चाहते हैं। पर शायद वे भूल रहे हैं-
यूनान, मिस्र, रोमा सब मिट गए जहाँ से
बाकी बचा है अब तक नामो-निशाँ हमारा।
हमारी सांस्कृतिक विरासत की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि उनको हिला पाना असंभव है।
हालांकि आज इस भौतिकतावादी युग में देखादेखी जीवन मूल्यों का ह्रास हो रहा है। इसका परिणाम तलाक के बढ़ते मुकदमे हैं। बच्चों में धैर्य की कमी के कारण आपसी सामंजस्य में कठिनाई आ रही है। वे भूल जाते हैं कि उनके परिवारी जन उनकी ऐसी दशा देखकर कितना कष्ट भोग रहे हैं। उधर बेचारे निर्दोष बच्चे सबसे अधिक प्रभावित होते हैं।
कुछ परिस्थितियों में तलाक लेना उचित हो सकता है पर हर केस में नहीं। पति का पत्नी पर अपने अहम के कारण कटाक्ष करना, मानसिक व शारीरिक शोषण करना, दहेज के लिए प्रताड़ित करना आदि सर्वथा अनुचित है। इस प्रकार की स्थिति होने पर भारतीय दण्ड संहिता में महिलाओं की सुरक्षा के लिए बहुत से कानूनों का प्रावधान किया है। उनका उपयोग वह कर सकती है।
ये कानून महिलाओं को उत्पीड़न से रोकने के लिए बनाए गए हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि इनकी आड़ में अपना स्वार्थ साधा जाए।
कुछ महिलाएँ विवाहेत्तर संबंध, पति से अधिक कमाना, पति का दुर्घटना में विकलांग हो जाना, उसका नपुंसक होना आदि किसी भी कारण से यदि अपने पति से अलग होना चाहती हैं तो वे अपने पति सहित ससुराल के अन्य सभी सदस्यों पर दहेज या प्रताड़ना का झूठा केस दर्ज करवा देती हैं। यह सर्वथा अनुचित है।
अब अदालतें उन महिलाओं के घड़ियाली आँसुओं से पिघलने वाली नहीं हैं। गलत बयानी करने वालों को सावधान हो जाना चाहिए क्योंकि ऐसा करने पर उन्हें सजा भी हो सकती है। कानून को मजाक समझना बंद कर देना चाहिए।
विवाह जैसे पवित्र बंधन को दूषित करने वाले चाहे पुरुष हों या महिलाएँ किसी को भी समाज क्षमा नहीं करेगा। यह बात गाँठ बांध ले कि अपनी सांस्कृतिक विरासत का अपमान करने और दूसरी संस्कृति को आधे-अधूरे मन से अपनाने वालों की स्थिति धोबी के कुत्ते जैसी हो जाती है जो न घर का रहता है न घाट का।
दूसरे शब्दों में हम ऐसा कह सकते हैं कि अपनी विरासत का सम्मान कीजिए। व्यर्थ अहम के कारण उसका तिरस्कार कदापि न करिए। दूसरों की अच्छाइयों को अपनाने में कोई बुराई नहीं पर उन्हें अपने मूल्यों की कसौटी पर पहले परख लें। ऐसा न हो कि बाद में पश्चाताप करने का अवसर भी हाथ से चला जाए।
आज विदेशों की तरह हमारे भारत में भी युवाओं को लिविंग रिलेशनशिप भाने लगी है। अपने मन में विचार कीजिए कि इस संबंध में अपना कहने के लिए कौन है? दोनों के माता-पिता व संबंधी शायद ही इस संबंध को मन से स्वीकार कर पाएँ। परन्तु सामाजिक संस्कारों से मुक्त होने का दावा करने वाले ऐसे दूषित विचारों वाले युवा जो अपने साथी की बेवफाई सहन नहीं कर पाते तो क्या इस संबंध में आँखों देखी मक्खी निगल सकेंगे? मेरे विचार में जिन्हें परिवार में रहकर संबंध निभाने नहीं आते वे इसे भी अधिक समय तक नहीं निभा सकते। वहाँ भी नित्य के लड़ाई-झगड़ों से दो-चार होते हुए उनका शीघ्र ही अलग होना निश्चित है।
भेड़चाल से अपना ही नुकसान होता है। यथासंभव इससे बचने का प्रयास करिए। अपनी घर-गृहस्थी की सारी जिम्मेदारियों को प्रसन्नतापूर्वक निभाइए फिर देखिए आपको चारों ओर खुशियों की वर्षा होती मिलेगी।
शुक्रवार, 1 मई 2015
सेंध लगाते दुख
दुख चोरों की तरह सेंध लगाकर हमारे घर में घुस आते हैं और हमारे जीवन में उथल-पुथल मचा देते हैं। चाहे हम अपने घर को कितना ही मजबूत किले की तरह बना लें या चाहे सारी खिड़कियाँ व दरवाजे बंद कर लें। फिर भी पता नहीं कहाँ से ये घर में घुसने का मार्ग खोज लेते हैं और सबसे छिपते हुए नजरें बचाकर चले आते हैं। घर आकर शांति से मेहमानों की तरह नहीं बैठते बल्कि सारे घर को और वहाँ रहने वाले सभी को अस्त-व्यस्त कर डालते हैं।
ये दुख बड़ा ही कष्ट देते हैं। इंसान को अपने जाल में ऐसा फंसा लेते हैं कि उससे बचने का कोई रास्ता नहीं सूझता। मनुष्य सोचता ही रह जाता है कि उसे किस गुनाह की सजा मिल रही है।
कुछ दुख हमारी अपनी नादानियों या गलतियों के कारण हमें मिलते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आलस्य, झूठा अहम, अपने दायित्वों का भली-भाँति निर्वाह न करना, लापरवाही बरतना, अनजाने में ही समाज विरोधी कार्य कर बैठना, समुचित आहार-विहार की ओर ध्यान न देना आदि हमारे आने वाले दुखों का कारण बनते हैं। ये सभी कारण हैं जिनका फल हमें शीघ्र ही यानि तत्काल, कुछ समय के उपरान्त या इसी जीवनकाल में मिल जाता है।
इनके अतिरिक्त कुछ दुख ऐसे भी होते हैं जो इस जीवन काल में हमें अपने प्रारब्ध अथवा भाग्य के कारण भोगने पड़ते हैं। सृष्टि की रचना अरबों साल पहले हुई ऐसा हमारे सद्ग्रन्थों का कहना है। हमारे इस भौतिक शरीर में विद्यमान आत्मा ने भी न जाने कितने ही रूप धारण किए होंगे।
हर जन्म में जीव कुछ-न-कुछ अपराध करता है जिसका फल उसे भोगना ही होता है। जिन दोषों का फल वह भोग लेता है वे समाप्त हो जाते हैं। परन्तु जिन दुष्कर्मों का फल हमें नहीं मिलता वे संचित(इकट्ठे) होकर जन्म जन्मान्तर तक हमारे साथ ही चलते रहते हैं।
ऐसी कपोल कल्पना है कि मृत्यु के देवता यमराज के पास हमारे सारे कर्मों का लेखा-जोखा रखने के लिए कोई बही-खाता है जो चित्रगुप्त के पास रहता है। ये हम लोगों को अपराध या गलत काम न करने से डराने के लिए रची गई है। खैर, ये संचित कर्म हमारे साथ ही रहते हैं जिनके अनुसार हमारा भाग्य या प्रारब्ध बनता है।
उसी के अनुसार ही दुख समयानुसार हमारे जीवन में आते हैं और समझाते हैं कि भविष्य के लिए यह चेतावनी है। अब संभल जाओ और अपने जीवन में सत्कर्म करने चाहिएँ।
अपने दुख हम चाहें भी तो कम नहीं कर सकते। जब तक उनको हम भोग नहीं लेते तब तक उनसे मुक्ति नहीं मिलती। इसका कारण है जो भी कर्म हम करते हैं उनका फल तो भोगना पड़ता है। इसीलिए कहा गया है-
'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।'
अर्थात अच्छे या बुरे जो भी कर्म हम करते हैं उनको भोगे बिना छुटकारा नहीं होता। ये कर्मफल पवित्र जल में डुबकी लगाने, तीर्थों की यात्रा करने या तथाकथित गुरुओं की शरण में जाने से नहीं कटते।
दुख के समय कोई भी हमारा सहायक नहीं होता सब लोग नजरें फेर लेते हैं। उस समय ईश्वर की उपासना, सुधी जनों का साथ व वेदादि सद् ग्रन्थों का अध्ययन हमें उस कष्ट से मुक्त होने तक मानसिक शांति और उसे सहने की शक्ति प्रदान करते हैं।
इसलिए उस कष्टदायक काल में तथाकथित ज्योतिषियों एवं तान्त्रिकों के पास जाकर अनावश्यक धन व समय की बरबादी से बचना चाहिए। ईश्वर पर पूर्ण विश्वास को ही हमें अपना एकमात्र आश्रय बनाना चाहिए।