आत्मरक्षा के लिए हर किसी को निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। जो व्यक्ति अपनी स्वयं की रक्षा नहीं कर सकता उसकी रक्षा कोई दूसरा नहीं कर सकता। इसलिए शास्त्र कहते हैं- 'आत्मानं सततं रक्षेत्।'
अर्थात मनुष्य को अपनी रक्षा के लिए निरन्तर यत्न करना चाहिए।
यदि किसी मनुष्य में शारीरिक बल की कमी भी हो तो उसे अपना आत्मिक बल यानि अपना आत्मविश्वास बढ़ाना चाहिए। जिस मनुष्य के पास आत्मिक बल होता है वह कभी किसी परिस्थिति में भी घबराता
नहीं है और किसी भी व्यक्ति का सामना कर सकता है।
एक चींटी जो बहुत ही छोटा जीव है और किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकती। यदि उसे छेड़ा जाए तो वह भी कुलबुलाते हुए अपना विरोध प्रकट कर देती है। इसी प्रकार मनुष्य को भी आवश्यकता पड़ने पर अपने शक्तिशाली शत्रु का प्रतिरोध अवश्य करना चाहिए।
एक दृष्टान्त कभी पढ़ा था कि एक साँप को किसी मुनि ने कहा कि तुम व्यर्थ ही निरपराध लोगों को डसकर उन्हें मार देते हो। यह अच्छी बात नहीं है। तुम्हें भी अहिंसा का मार्ग अपना लेना चाहिए और अपना परलोक सुधारना चाहिए। उसे महात्मा जी की बात पसद आ गई और उसने सोचा क्यों न मैं लोगों को क्षमादान देकर परलोक सुधार लूँ।
कुछ दिन बीतने पर वह उन महात्मा जी के पास आया और अपनी व्यथा सुनाने लगा। उसने कहा कि जब से उसने लोगों को काटना छोड़ दिया है तब से कोई भी उससे नहीं डरता। लोग मुझे परेशान करते हैं और मुझ पर पत्थर भी बरसा देते हैं। बच्चे भी मेरी पूँछ मरोड़ देते हैं। उसकी बात सुनकर महात्मा जी ने उस साँप को समझाते हुए कहा कि तुझे लोगों को काटने के लिए मना किया था। यह थोड़ा कहा था कि तुम फुफकारना भी छोड़ दो। दूसरों को डराने के लिए अपना फन फैलाते हुए फुफकार अवश्य करो।
निर्विषेणापि सर्पेण कर्त्तव्या महती फटा।
विषो भवति वा मा भूत् फटटोपो भयङ्कर:॥
अर्थात विषरहित साँप को भी फुफकारना चाहिए। उसके पास विष हो चाहे न हो पर उसका फन फैलाना ही सबके हृदय में भय पैदा कर देता है।
अग्नि बहुत ही शक्तिशाली है। वह बड़े-बड़े जंगलो और भवनों तक को नष्ट कर देती है। जो भी जीव उसकी चपेट में आ जाता है जलकर भस्म हो जाता है। वही राख जब ठंडी पड़ जाती है तो उस पर चींटियाँ भी चलने लगती हैं।
इसी प्रकार भयंकर विषधर जो किसी भी जीव को नहीं बख्शता उसके निर्जीव हो जाने पर चींटियाँ उसे खा जाती हैं।
कहने का तात्पर्य यही है कि निर्बल व्यक्ति को इस ससार में कोई भी जीने नहीं देता। कहते हैं बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। इसी प्रकार का व्यवहार एक बलवान निर्बल के साथ करता है। उसे हर तरह से प्रताड़ित करता है। उसका वश चले तो किसी शक्तिहीन को जीने ही न दे। वही इस दुनिया का मालिक बनकर रहने लगे। पर अफसोस यह करना उसके बस में नहीं है। ईश्वर ने अपनी सृष्टि में सभी प्रकार के जीव उत्पन्न किए हैं और उनकी रक्षा भी करता है।
मनुष्य को ईश्वर के अतिरिक्त किसी से भी नहीं डरना चाहिए। वह उसका परम रक्षक है। इसलिए केवल उसकी शरण में जाना चाहिए। महात्मा गांधी की तरह शारीरिक बल न होते हुए भी आत्मिक बल होना चाहिए जिससे शक्तिशाली साम्राज्यों की नींव भी हिल जाती है। फिर इंसान तो कुछ भी नहीं है। वह चाहे कितना खूँखार और बलशाली हो आत्मविश्वासी के समक्ष टिक नहीं सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 8 अक्टूबर 2015
आत्मरक्षा
बुधवार, 7 अक्टूबर 2015
दीपक की तरह बनिए
मनुष्य को दीपक की भाँति प्रकाशमान होना चाहिए। मनुष्य इसीलिए ही मनुष्य कहलाता है कि वह अपने परिवेश में चारों ओर रहने वाले दूसरे लोगों की सुधबुध ले। उसे अपने सद् गुणों से चारों ओर प्रकाश फैलाए।
जब सूर्य का प्रकाश तीव्र होता है उस समय किसी अन्य प्रकाश की आवश्कयता नहीं होती। उसके उपस्थित न होने पर ही अंधकार अपने पैर पसारने लगता है। ऐसे समय में एक छोटा-सा दीपक अंधेरे कमरे में यदि रख दिया जाए तब उसके प्रकाश से कमरे में उजियारा हो जाता है। वहाँ पर चलने-फिरने वाले लोगों का आवागमन इस प्रकार सुविधापूर्वक होने लगता है कि वे ठोकर खाकर गिर जाने से बच जाते हैं।
जिन मनुष्यों को उनके शुभकर्मों के कारण ईश्वर ने सामर्थ्यवान बनाया है उनको चाहिए कि वे समाज के पिछड़े वर्ग के लिए दीपक की भाँति बनें। उनके चेहरों पर यदि वे थोड़ी-सी प्रसन्नता भी ला पाएँ तो उनका मानव जीवन पाना सफल हो गया समझिए।
वास्तव में मनुष्य वही कहलाता है जो अपने देश, धर्म व समाज के लिए कुछ कर गुजरने का साहस रखता हो। जिस प्रकार दीपक छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, धर्म-जाति आदि सभी प्रकार के बंधनों से ऊपर उठकर सबको बराबर प्रकाश देता है उसी प्रकार ये महापुरुष भी सबको एक समान मानते हुए अपने दायित्वों को करने में संलग्न रहते है।
अपने निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए तो पशु-पक्षी भी जीते हैं। इंसान और अन्य जीवों में कुछ अन्तर होना आवश्यक है। हमारे ऋषि-मुनियों का मानना है कि सभी मनुष्येतर जीवों की भोगयोनि होती है। उस योनि में वे केवल अपने अशुभ कर्मो का दण्ड भोगते हैं। केवल मनुष्य जीवन ही कर्मयोनि होता है जिसमें शुभाशुभ सभी प्रकार के कर्मों को करने में वह स्वतन्त्र होता है।
अब यह उसकी इच्छा पर निर्भर है कि वह शुभकर्मो को करता हुआ परलोक सुधार ले अथवा अशुभ कर्मों की ओर प्रवृत्त होकर परलोक तो क्या यह लोक भी बिगाड़ ले।
इसलिए इस मनुष्य योनि में जितने अधिक शुभकर्म अथवा पुण्यकर्म अपने खाते में मनुष्य जोड़ पाएगा उतना ही सुख और ऐश्वर्य उसे आने वाले अगले जन्मों में भी मिलेगा।
दीपक नेह की चिकनाई और उसमें डाली गई बाती से स्वयं को जलाकर दूसरों को प्रकाश देता है। उसी प्रकार मनुष्य जब दूसरों को अपने प्यार से सराबोर करता है और अपने संयम एवं अनुशासनात्मक जीवन से तपा हुआ दूसरों पर अपनी छाप छोड़ने में सफल होता है तभी वास्तव में वह समाज में प्रकाशित होता है। सबके लिए पूजनीय बन जाता है लोग उसे सिर-आँखों पर बिठाते हैं। ऐसे सज्जन मनुष्य समाज के दिग्दर्शक बनते हैं और सबके अराध्य होते हैं।
समाज कल्याण मन्त्रालय द्वारा कई योजनाएँ सामाजिक रूप से पिछड़े इस वर्ग की सुरक्षा हेतु बनाई गई हैं। बहुत-सी समाजसेवी संस्थाएँ भी इस कार्य में सक्रिय हैं परन्तु उनके इन कार्यों के लाभ से अभी भी बहुत बड़ा वर्ग वंचित है। छोटी-छोटी सस्थाएँ भी इनकी भलाई के लिए कार्य कर रही हैं। इनके अतिरिक्त भी देश के गाँवों और प्रदेशों में अपने-अपने स्तर पर अनेक लोग इन परोपकारी कार्यों में निस्वार्थ भाव से जुटे हुए हैं।
अभी भी इन आर्थिक व सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों के जीवनों को प्रकाश की महती आवश्यकता है। इनके सच्चे साथी बनकर यदि इनके जीवन को किसी तरह प्रकाशित किया जा सके तो मानव जन्म सफल हो जाएगा। वास्तव में इन्हीं दीपक स्वरूप व्यक्तियों का जीना ही इस ससार में जीना कहलाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 6 अक्टूबर 2015
ईश्वर हमारे भले के लिए करता है
हम प्राय: सुनते रहते हैं और कहते भी हैं कि ईश्वर जो करता है हमारे अच्छे के लिए ही करता है। कहने-सुनने यानि (theory) में तो यह बहुत अच्छा लगता है परन्तु जब इसका अभ्यास (practical) करने की बारी आती है तो हम बगले झाँकने लगते हैं।
उस समय हमें लगता है कि हमें ही परीक्षा में क्यों डाला जा रहा है? दुनिया में बहुत से और भी लोग हैं उनकी परीक्षा लो न। उस समय हम भूल जाते है कि जन्म से मृत्यु तक न जाने हम कितनी परीक्षाओं से गुजरते हैं। कुछ परीक्षाओं में हम पास होते हैं और कुछ में फेल। जब तक पास न हो जाएँ तब तक परीक्षा देनी पड़ती है।
ईश्वर हमेशा ही हमारी भलाई करता है परन्तु हम अज्ञानी उसकी महानता को समझ नहीं पाते और उस पर दोषारोपण करते हुए उसे कोसते रहते हैं। यहाँ एक कहानी याद आ रही है जो बचपन में हम सभी ने पढ़ी है।
किसी राजा का एक मन्त्री था उसे ईश्वर पर बहुत विश्वास था। वह हर कार्य का श्रेय ईश्वर को ही देता था। हर बात पर कहता था ईश्वर जो करता है हमारे अच्छे के लिए ही करता है। एक दिन उस राजा की अंगुली कट गई। राजा ने उससे अंगुली कटने पर पूछा-' इसमें ईश्वर ने मेरा क्या भला किया?' तब भी उसने यही कहा कि ईश्वर जो करता है हमारे भले के लिए होता है। राजा उसकी इस बात पर चिढ़ गया और उसे बहुत क्रोध आया। तब उसने अपने मन्त्री को जेल में डाल दिया।
कुछ दिन बीतने पर एक दिन राजा शिकार खेलने के लिए जंगल में गया। वहाँ जंगल में अपने देवता को बलि चढ़ाने के उद्देश्य से आदिवासियों ने राजा को पकड़ लिया। राजा की कटी हुई उस अंगुली को देखकर उसे यह कहते हुए छोड़ दिया कि इसका अंग भंग हो चुका है। इसलिए देवता को इसकी बलि नहीं दी जा सकती। उस समय राजा को यह प्रत्यक्ष अनुभव हुआ कि ईश्वर जो भी करता है हमारे अच्छे के लिए करता है।
अपने राज्य में वापिस लौटकर उसने मन्त्री को जेल से बाहर निकाला। राजा ने उससे कहा कि ईश्वर पर तुम्हारे अटूट विश्वास के कारण आज मैं अपनी कटी हुई अंगुली के कारण बच गया पर इसमें तुम्हारा क्या भला हुआ?
तब मन्त्री ने राजा से कहा कि मैं भी अपकी कटी हुई अंगुली के कारण ही बच गया। यदि आप मुझे जेल में न डालते तो मैं भी आपके साथ जंगल में शिकार के लिए जाता। आप तो कटी हुई अंगुली के कारण बच जाते और वे लोग मेरी बलि चढ़ा देते। मैं आपकी सेवा भी न कर पाता। इसीलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि ईश्वर जो भी करता है हमारे भले के लिए करता है।
यह सचमुच ही ईश्वर का चमत्कार है जिसे हमारी स्वार्थी बुद्धि समझ ही नहीं पाती। काल के मुँह में समाता हुआ मनुष्य भी वर्षों तक जीवित रह लेता है। वह प्रभु इतने चमत्कार दिखाता है कि उनका वर्णन भी हम नहीं कर सकते।
हम उस प्रभु पर सच्चे मन से यदि विश्वास करते हैं तो वह हमारे सारे बिगड़े हुए काम बना देता है। वह तो इसी प्रतीक्षा में रहता है कि कब मनुष्य उसे सच्चे मन से याद करे और वह उसकी सहायता के लिए आगे हाथ बढ़ाए।
वह जगत्पिता परमात्मा ही हमारा अन्तिम ठौर है। दुनिया के सभी रिश्ते-नाते हमारा साथ छोड़ देते हैं परन्तु वह मालिक कभी हमें निराश नहीं करता। जो भी उसे पुकारता हुआ उसकी शरण में जाता है वह उस पर अनुग्रह करता है। हर समय वह हमारे साथ-साथ चलता हुआ हमारी रक्षा करता है। इसीलिए वह जो भी हमारे लिए करता है अच्छा ही करता है। हमें उसके न्याय पर पूरा विश्वास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 5 अक्टूबर 2015
मनुष्य की परछाई
हर मनुष्य की अपनी स्वयं की एक परछाई होती है। वह अपनी परछाई के पीछे सदा भागता रहता है जो कभी उसके हाथ नहीं लगती। मनुष्य आगे-आगे चलता जाता है और यह परछाई हमेशा उसके पीछे-पीछे ही चलती रहती है। चाहकर भी वह हाथ बढ़ाकर उसे छू नहीं सकता।
इंसान जब पीछे मुड़ जाती कर इसे देखने का प्रयास करता है तो यह सिमट है और दिखाई नहीं देती। थोड़ी देर के बाद जब वह सीधा चलने लगता है तो यह पुन: उसके पीछे हो जाती है। यह मृगतृष्णा के ही समान उसे छलती रहती है। कोई भी मनुष्य सदा के इसे लिए बाँधकर नहीं रख सकता।
मनुष्य जहाँ भी जाता है उसकी यह परछाई उसके साथ-साथ चलती हुई सी सबको दिखाई देती है। यह प्रकाश में ही दिखाई देती है। प्रात:काल और सायंकाल यह छोटी होती है दोपहर के समय लम्बी। रात के स्याह अंधेरे में यह भी छिप जाती है और तब दिखाई नहीं देती।
यह एक दास की तरह पूर्ण रूपेण हमारा अनुसरण करती है। हम धीरे-धीरे चलते हैं तो यह भी मस्त चाल में चलती है। हम तेज-तेज चलते हैं तो यह भी तेजी दिखाती है और यदि हम भागते हैं तो यह भी भागती हुई दिखाई देती है। कहने का तात्पर्य यही है कि कैसी भी गति में हम हों हमारे पीछे-पीछे रहती है।
ऐसा कहा जाता है कि जब मनुष्य दुखों और परेशानियों के अंधेरे काले बादलों से घिर जाता है उस समय इस दुनिया के सभी भौतिक रिश्ते-नाते उसका साथ छोड़ देते हैं यहाँ तक कि उसकी अपनी परछाई भी उससे मुँह मोड़ लेती है।
कहने का तात्पर्य यही है कि रात की कालिमा जैसे भयंकर कष्ट के समय यह परछाई भी बेगानी हो जाती है और मनुष्य से दूर भाग जाती है। जब उसके जीवन से दुख के बादल छटने लगते हैं और मनुष्य को पुन: आशा की एक किरण दिखाई देने लगती है। तब धीरे-धीरे उसके दुखों का अन्त होने लगता है। उसके जीवन में सुखों के साथ-ही-साथ स्थायित्व का प्रकाश भी चमकने लगता है। उस समय यह फिर उसके पीछे हो लेती है और साथ चलने लगती है। यानि यह भी मनुष्य के सुख की साथी है दुख की कदापि नहीं।
यह वही परछाई होती है जो कहने के लिए मनुष्य की अपनी होती है। परन्तु इस पर भी अन्य भौतिक पदार्थों की तरह भरोसा न करने का परामर्श हमारे विद्वान हमें देते हैं।
इस परछाई के विषय में एक और बात जो खास तौर से कही जाती है वह यह है कि जब मृत्यु मनुष्य के सिर पर मंडरा रही होती है उस समय मनुष्य की परछाई दिखनी बंद हो जाती है। अर्थात मनुष्य जीवन के अन्तकाल के पहले ही यह परायों की तरह उसका साथ छोड़ देती है। बस यहीं तक का उसका और मनुष्य का साथ होता है।
भौतिक जगत की शेष अन्य सम्पदाओं की भाँति यह भी केवल इसी संसार में ही साथ निभाती है परलोक में हमारा साथ निभाने नहीं जाती। इस तरह तो उसे हम विश्वसनीय नहीं कह सकते।
मनुष्य को चाहिए कि मृगतृष्णा के समान धोखा देने वाले इन छलावों के प्रपंच से यथासंभव बचकर रहे। इनके जाल में फंसने से जीवन में कष्ट के अतिरिक्त और कुछ नहीं मिलता। ईश्वर सबके जीवन में भरपूर सुख और शान्ति दे इसी कामना के साथ।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 4 अक्टूबर 2015
जीवन में शून्य
शून्य का अपने आप में कोई भी महत्त्व नहीं होता परन्तु जब वह एक से नौ तक किसी भी संख्या के साथ जुड़ जाता है तब उसका मूल्य बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि शून्य को एक के साथ जोड़ दिया जाए तो वह दस बन जाता है।
इसी प्रकार से क्रमशः बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी और नब्बे बन जाता है। यदि किसी संख्या के साथ एक से अधिक शून्य जोड़ दिए जाएँ तो अरबों-खरबों तक की संख्या बन जाती है। कहने का तात्पर्य है किसी भी संख्या के साथ यदि शून्य बढ़ाते जाएँगे तो वह रकम उतनी ही बड़ी-बड़ी होती जाएगी।
हमारा जीवन भी उसी प्रकार शून्य होता है। यदि उसमें हम सत्कर्मों को न जोड़ें तो। तब हमारे उस जीवन का कोई मूल्य नहीं रह जाता। मनुष्य अपने खाते में जितने अधिक शुभकर्म जोड़ता जाता है उतना ही संसार में उसका मूल्य बढ़ता जाता है। वह जीरो से हीरो बनने लगता है। अर्थात वह संसार में महान बनकर सबके हृदयों में विराजमान हो जाता है।
मनुष्य का दिमाग उसे ईश्वर ने वरदन स्वरूप दिया है। विवेक शक्ति उसे ब्रह्माण्ड के अन्य जीवों से विशेष बनाती है। वह अपने दिमाग या विवेक का उपयोग यदि नहीं करता तब सभी लोग उसे सदा ही मूर्ख समझते हैं यानि शून्य या जीरो। उसके लिए महामूर्ख, गोबर गणेश, मिट्टी का माधो, गधा, अक्ल से पैदल इत्यादि विशेषणों का वे प्रयोग करते हैं।
इससे भी अधिक यदि किसी मनुष्य का जन्म से ही दिमाग नहीं होता तो मेंटली रिटार्टिड कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यदि कहें तो वह मानव तन पाकर भी शून्य जैसा ही होता है। उसे अपनी कोई समझ नहीं होती पशुवत विचरण करता हुआ वह अपने घर-परिवार वालों को एक बोझ की तरह लगता है। उसके जन्म पर किसी को भी प्रसन्नता नहीं होती। उसके इस दुनिया से विदा होने पर सभी संबंधी राहत की साँस अवश्य लेते हैं।
विचार यह करना है कि हम शून्य होने से बचना चाहते हैं या नहीं? मेरे विचार में कोई भी मनुष्य शून्य होना नहीं चाहेगा। उसका प्रयास यही होना चाहिए कि ऐसे कौन से कार्य वह करे कि दूसरों को सदा ही उसकी अनुपस्थिति अखरे। वह हमेशा सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहना चाहता है।
चाहने मात्र से यह सब सम्भव नहीं हो सकता। उसके लिए मनुष्य को अपने आपको योग्य पात्र बनना होता है। मनुष्य को यह पात्रता कमानी होती है जो सदा ही समाज के नियमों के अनुसार आचरण करने से मिलती है।
मनुष्य के शुभकर्मों की अधिकता जब होती है तब उस जीव को मनुष्य का जन्म मिलता है। अपने पूर्वकृत अशुभ कर्मों को भोग लेने के पश्चात ही जीव को उनसे छुटकारा मिलता है उससे पहले कदापि नहीं। अन्यथा वह चौरासी लाख योनियों में अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगने के लिए बस बारबार चक्कर काटता रहता है और कष्ट भोगता है।
इस जन्म और मृत्यु के बंधन से जीव जब तक मुक्त नहीं हो जाता तब तक उसे इस भवसागर के भंवर में गोते खाने पड़ते हैं इसके अतिरिक्त उसके पास और कोई चारा नहीं होता। इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ है और मृत्यु उससे दूर है तब तक उसे अपने पुण्य कर्मों की सूची को बढ़ाते रहना चाहिए और शून्यता की इस दुखदायी स्थिति से बचने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 2 अक्टूबर 2015
ईश्वर स्मरण की कोई आयु नहीं
एक गीत की पंक्तियाँ याद आ रही हैं-
आया था किस काम रे
क्यों सोया चादर तान के
सुरत सम्हाल अब गाफला
अपना आप पहचान रे।
इन पंक्तियों का अर्थ है कि इस संसार में जिस उद्देश्य से आया है, उसे मनुष्य भूल गया है। आगे कहा है कि अब तो होश में आ जाओ और अपने आप को पहचानो।
विचार इस विषय पर करना है कि मनुष्य इस दुनिया में किस काम को करने के लिए आया था? ऐसा क्या हुआ कि वह यहाँ आने के अपने उद्देश्य को भूल गया है? उसे ऐसा क्या करना चाहिए कि जिससे वह जागकर स्वयं को पहचान सके?
चौरासी लाख योनियों में अपने पूर्व कृत कर्मों को भोगकर जीव मनुष्य का चोला धारण करता है। वह ईश्वर को प्राप्त करने के लिए तब तक बारबार जन्म लेता रहता है जब वह अपने परम लक्ष्य मोक्ष को नहीं पा लेता।
विद्वानों का कथन है कि जीव जब माता के गर्भ में होता है तब ईश्वर से नित्य प्रार्थना करता है कि मुझे इस अंधेरे से बाहर निकालो और इस कष्ट से मुक्त करो। मैं सदा तुम्हें स्मरण करूँगा। परन्तु ज्योंहि जीव इस धरा पर अवतरित होता है त्योंहि उसे दुनिया की हवा लगने लगती है। ईश्वर से किए अपने सारे वादे भूल जाता है। फिर संसार के कारोबार में लगा वह इस संसार में आने के अपने उद्देश्य को भी किनारे कर देता है।
इस प्रकार जीव इस संसार के मकड़जाल में फंसकर ही रह जाता है और गफलत में जीवन जीने लगता है। दुनिया की रेस में भागते-भागते निढाल होता रहता है। उसे दीन-दुनिया किसी की कोई खबर नहीं रहती। बस अपने और अपनों के इर्द-गिर्द घूमते रहना उसकी प्रकृति बन जाती है। ऐसे में उसे अपने किए गए वादों की याद नहीं आती।
मनुष्य दुनिया में आकर बहुत स्वार्थी बन जाता है। मृत्युपर्यन्त स्वार्थों को पूरा करने के अनेक यत्न मनुष्य करता है। पर वे हैं कि सुरसा के मुँह की तरह बढ़ते जाते हैं। उसके लिए अपने दायित्वों को निभाना प्राथमिकता होती है। ईश्वर का नाम जपना आगे सरकता रहता रहता।
बचपन में सोचता है कि अभी खेलने और पढ़ने की उम्र है, पहले बड़ा हो जाऊँ, अपने जीवन में सेटल हो जाऊँ फिर जवानी में ईश्वर को याद कर लूँगा। जब जवानी आती है तब घर-परिवार के दायित्वों का निर्वहण करने में वह इतना अधिक व्यस्त हो जाता है और सोचता है कि बच्चे सेटल हो जाएँ, उनके शादी-ब्याह हो जाएँ तब फिर निश्चिन्त होकर मैं भगवान को याद करूँगा। वह अवस्था पार होने के बाद मनुष्य रिटायरमेंट की आयु में पहुँच जाता है और धीरे-धीरे अशक्त होने लगता है। तब शरीर उसका साथ नहीं देता और बीमारियाँ घेरने लगती हैं।
उस समय वह खीज उठता है जब कोई उसे ईश्वर का स्मरण करने के लिए कहता है। वह उत्तर देता है कि मैं बीमारी से पहले लडूँ या भगवान को याद करने बैठ जाऊँ। यदि उसने स्वयं को याद कराना है तो पहले मुझे ठीक तो करे। यही सब करते हुए उसका अन्तकाल भी आ जाता है। उस समय वह पश्चाताप करता है, प्रभु से क्षमा याचना करता और जीवन का समय बढ़ाने के लिए मिन्नतें करता है। बचपन से ही यदि ईश्वर का स्मरण किया होता तो अन्तकाल में पछताना नहीं पड़ता।
अब कुछ नहीं हो सकता। अब तो वही बात हो जाती है- 'अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत।' सारा जीवन मनुष्य तथाकथित रूप से ईश्वर से नजरें चुराता है। उसकी बताई हुई सारी शिक्षाओं को भूलकर दुनिया की चकाचौंध में खो जाता है।
यदि अन्तकाल में प्रसन्नता से उस मालिक के पास जाना चाहते हैं, उससे नजरें मिलाना चाहते हैं तो अभी कुछ भी नहीं बिगड़ा। समय व्यर्थ गंवाए बिना उस प्रभु की अराधना में जुट जाओ। दुनिया के सारे कार्य स्वतः ही पूर्ण होते जाएँगे।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 1 अक्टूबर 2015
नकल से विवेक कुंठित
दूसरों की नकल करने का स्वभाव हमारे उस विवेक को कुंठित कर देता है जो हमें अच्छाई और बुराई के अन्तर का ज्ञान कराता है। नकल करते समय हम अपने मस्तिष्क का नहीं बल्कि दिल का कहना मानते हैं।
यद्यपि नकल करते हुए मनुष्य को सदा अपनी अक्ल का ही इस्तेमाल करना चाहिए जो ईश्वर ने हमें उपहार के रूप में दी है- ऐसा सदा ही समझदारों का मानना है। हमें दूसरों नकल करते समय मक्खी पर मक्खी न मारकर इस विषय पर गहन विचार करना चाहिए कि जो काम हम करने जा रहे हैं उससे हमारी जग हंसाई तो नहीं होगी।
विद्यार्थी अपने अध्ययन काल में कामचोरी के कारण जब गृहकार्य नहीं कर पाते तब साथी की कापी लेकर नकल कर लेते हैं। उस समय उन्हें यह भी ध्यान नहीं रहता कि वे अपने नाम के स्थान पर बिना समझे जल्दबाजी में साथी का नाम आदि की जानकारी लिख देते हैं जिससे अध्यापक को ज्ञात हो जाता है कि किसकी नकल करके वह कार्य किया गया है। इसी तरह परीक्षा के समय भी होता है। कभी-कभी अपने सही उत्तर को साथी के गलत उत्तर के कारण गलत लिखकर अपने अंक कम करवा लेने पर पछताना पड़ता हैं।
आस-पड़ौस या बन्धु-बान्धवों के घर कोई भी नई वस्तु आ जाने पर हमारी अकुलाहट शुरू हो जाती है। चाहे वह उनका नया बड़ा घर हो अथवा महंगी नई गाड़ी हो। इनके अतिरिक्त बड़ा टीवी, बड़ा फ्रिज, महंगा नया फोन या आईपेड कुछ भी हो सकता है। हमारे मन में उन वस्तुओं को देखकर हीन भावना आने लगती है। तब हम सोचने लगते हैं कि कब हम उन अनावश्यक वस्तुओं को खरीद पाएँगे।
उन वस्तुओं को खरीदने वालों को हम भाग्यशाली कहते हुए अपने दुर्भाग्य को कोसने लगते हैं। ईश्वर पर भी दोषारोपण करने से भी हम नहीं चूकते कि उसने हमें ये सब खरीदने की सामर्थ्य क्यों नहीं दी।
तब हम अपने बैंक अकाऊँट खंगालते हैं। पड़ौसी के घर आने वाली नई वस्तुओं की नकल करके हम भी वस्तुएँ खरीद लेते हैं। उस समय हम उन वस्तुओं को खरीदने के लिए इतने अधिक उतावले हो रहे होते हैं कि यह भी विचार नहीं कर पाते कि उसे खरीदने के लिए हमारे पास साधन हैं भी या नहीं। यदि अपने पास धन है तो ठीक नहीं तो जुगाड़ हो जाएगा वाली सोच का सहारा लेते हैं।
तब हम पैसे का जुगाड़ करने में जुट जाते हैं। यदि हमें किसी अपने के माध्यम से धन मिल जाए तो बढ़िया नहीं तो फिर हम किसी व्यक्ति से अथवा बैंक से कर्ज लेकर वह वस्तु खरीदकर परेशानी अवश्य मोल ले लेते हैं। आखिर उधार लिया हुआ पैसा चुकाना भी तो पड़ता है जिससे घर का मासिक बजट गड़बड़ा जाता है। कई आवश्यक खर्चों को मजबूरन रोकना पड़ जाता है।
दूसरों की होड़ करते हुए हम अपने घर में यदा-कदा ऐसी वस्तुएँ भी एकत्रित
कर लेते हैं जिनकी हमें आवश्यकता ही नहीं होती। इससे घर में जगह तो घिरती ही है और व्यर्थ ही पैसा भी बरबाद हो जाता है। इसलिए यथासंभव भेड़चाल न करते हुए दूसरों की नकल करने से बचना चाहिए। अपने विवेक का सहारा लेकर स्वयं को भविष्य में आने वाले कष्टों से बचाने में ही बुद्धिमत्ता कहलाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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