दूसरों की राह में काँटे बिछाने वालों को जीवन में फूल नहीं मिला करते, यह शाश्वत सत्य है। यथासम्भव यही प्रयास करना चाहिए कि मनुष्य जाने-अनजाने किसी के भी दुख का कारण न बने।
यह संसार एक सुन्दर बगीचे की तरह है। इसमें जैसी खेती की जाती है, फसल भी वैसी ही काटी जाती है। प्यार, मुहोब्बत, भाईचारे, विश्वास आदि के बीज बोने वाले लोगों को प्यार आदि मिलते हैं। सब लोग ऐसे सज्जनों पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं और उनका साथ देने के लिए सदा तैयार रहते हैं।
इसके विपरीत ईर्ष्या, द्वेष आदि की फसल बोने वालों को दुनिया से नफरत ही मिलती है। दूसरों का अहित करने वाले उन लोगों का साथ कोई भी पसन्द नहीं करता, उन्हें छोड़ देने में देर नहीं करते।
दूसरों को दुख देकर खुश होने वाले अपने जीवन में कभी सुख नहीं पा सकते। कभी-न-कभी तो उन लोगों का अंतस् उन्हें झकझोरता ही है कि सारा जीवन उन्होंने षडयन्त्र करते हुए बिता दिया है। अपने जीवन के अन्तिम काल में जब उनका कोई भी सहायक नहीं बनता तब उन्हें इस बात का अहसास होता है तब प्रायश्चित करने से भी कुछ हल नहीं निकल पाता।
जिस प्रकार कमान से निकला तीर वापिस नहीं आता उसी प्रकार उन कुविचार रखने वालों की भी स्थिति होती है। सुख और दुख तो मनुष्य के पास उसके जीवन में कर्मभोग फल होते हैं, जिन्हें भोगे बिना उनसे छुटकारा सम्भव नहीं होता।
मनीषी जन मानते हैं कि दुख और तकलीफ भगवान की बनाई हुई ऐसी प्रयोगशाला है, जहाँ मनुष्य की योग्यता और आत्मविश्वास को परखा जाता है। दुख के समय मनुष्य को अपने आत्मविश्वास को डिगने नहीं देना चाहिए बल्कि दृढ़तापूर्वक कुमार्ग का सहारा लिए बिना कष्टदायक समय को विनयपूर्वक ईश्वर की उपासना करते हुए और स्वाध्याय करते हुए गुजर जाने देना चाहिए जैसे तूफान आने पर पेड़ झुककर अपने ऊपर से उसे गुजर जाने देते हैं। मनुष्य दुखों की अग्नि में तपकर ही कुन्दन बनकर उभरता है।
यह बात हर व्यक्ति को गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुख भोगने वाला समय बीतने के बाद आगे जाकर मनुष्य सुखी हो जाता है पर दूसरों को दुख देने वाला कभी सुखी नहीं रह सकता। दुखी व्यक्ति के मन से निकलने वाली हाय उसे कभी चैन से नहीं बैठने देती।
इसे भी झुठलाया नहीं जा सकता -
जो तोको काँटा बोए ताको बोइए फूल।
तोको फूल के फूल हैं वा को हैं तिरसूल॥
अर्थात रास्ते में काँटे बोने वालों के लिए अपनी ओर से फूल बोने चाहिए। कवि का कहना है कि तुम्हें इस नेक कार्य के बदले फूल मिलेंगे और उसे काँटे मिलेंगे।
मनीषी इसीलिए समझाते हैं कि 'जैसा करोगे वैसा भरोगे' अथवा 'जैसी करनी वैसी भरनी'। इसके अतिरिक्त भी कहते हैं-
बोया पेड़ बबूल का तो आम कहाँ से खाए।
इन उक्तियों का यही अर्थ है कि मनुष्य जैसा व्यवहार दूसरों के साथ करता है, उसके बदले में वैसा ही पाता है। बबूल का पेड़ बोकर आम के फल की आशा करना व्यर्थ है।
दूसरों को कष्ट की सौगात देने वालों को रिटर्न गिफ्ट में कष्ट और परेशानियाँ ही मिलेंगी। इसके विपरीत अपने जीवन में दूसरों को खुशियाँ बाँटने वालों को बदले में खुशियाँ ही मिलती हैं।
एक सज्जन व्यक्ति और एक दुर्जन व्यक्ति की वैचारिकता में यही अन्तर होता है। दुर्जनों के चेहरे पर कठोरता का तथा मन में क्रूरता का भाव होता है और सज्जनों के चेहरे व हृदय में सरलता का भाव होता है।
दूसरों को कष्ट की भट्टी में धकेलकर उनके शत्रु बनने के स्थान पर उनके आँसू पौंछने वाले मददगार बनना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 6 मार्च 2016
दूसरों की राह में काँटे बिछाना
शनिवार, 5 मार्च 2016
आकर्षक व्यक्तित्व
आकर्षक व्यक्तित्व की चाहत हर मनुष्य को होती है। इसीलिए वह अपने व्यक्तित्व को निखारने में जुटा रहता है। हर प्रकार के उपाय करता है। विभिन्न प्रकार के सौन्दर्य प्रसाधनों का उपयोग करता है। यह रंग-रूप मनुष्य को ईश्वर की ओर से मिलता है। उसमें उसकी मर्जी शामिल नहीं होती। वह चाहकर भी अपनी इच्छानुसार अपने शरीर को नहीं बना सकता।
यद्यपि कुछ लोग शरीरिक दोषों को सुधारने के लिए प्लास्टिक सर्जरी का सहारा लेते हैं, परन्तु वह तो कोई स्थायी हल नहीं है। केवल शारीरिक सौन्दर्य के कारण मनुष्य इठलाता फिरता है। उसे इस सत्य को कभी विस्मृत नहीं करना चाहिए कि ये रूप-सौन्दर्य क्षणिक होता है। कहने का तात्पर्य है यह कि सुन्दरता नश्वर है, अनश्वर नहीं।
रोग से आक्रान्त होने पर शरीर बदसूरत हो सकता है। आयु के एक पड़ाव पर शरीर पर झुरियाँ आ जाने से उसका वह रूप खो जाता है जिस पर वह गर्व करता है। इससे भी बढ़कर किसी रोग के कारण भी शरीर बेडौल हो सकता है। इसमें अपना कोई दोष न होते हुए भी तब वह दूसरों से नजरें चुराने लगता है।
इसलिए मात्र शरीर के सौन्दर्य को देखने के स्थान पर मनुष्य की आन्तरिक सुन्दरता परखी जानी चाहिए। अपने ज्ञान, अपनी योग्यता के बल पर अग्रणी रहने वाले व्यक्तित्व देश अथवा विदेश सर्वत्र पूजनीय होते है। वास्तव में सुदर्शन व्यक्तित्व उन्हीं लोगों का ही माना जाता है और वही समाज के प्रेरणास्त्रोत और आदर्श होते हैं।
इस महत्त्वपूर्ण मुकाम तक पहुँचने के लिए वे समय रहते अथक परिश्रम करके ज्ञानार्जन करते हैं। फिर अपनी योग्यता के बल पर उच्च पद पर आसीन होते हैं। बहुत से लोग उनके सज्जन और दुश्मन बन जाते हैं। उनकी योग्यता की परख करने वाले उनके मित्र बनते हैं।
इसके विपरीत उनकी उन्नति से ईर्ष्या करने वाले उनके साथ अपनी शत्रुता निभाते हैं। इसका कारण बिल्कुल स्पष्ट है कि अपने जीवन में वे स्वयं तो कुछ नहीं कर पाते यानि असफल रहते हैं। इसलिए उच्च पदासीन मेधावी लोगों की ओर देखकर, उनकी बुराई करके चर्चा में बने रहने के लिए अपनी भड़ास निकालते हैं। अन्यथा इन बुरे लोगों की ओर किसका ध्यान जाएगा?
ये लोग फलदायी वृक्ष की भाँति होते हैं जिनका संसर्ग पाकर हर व्यक्ति स्वयं को कृतार्थ समझता है। फलों से लदे हुए वृक्षों पर लोग पत्थर फैंककर मारते हैं और स्वादिष्ट फल खाकर आनन्द लेते हैं। इन पर कटाक्ष करने वाले उन लोगों को छोड़कर अन्य बुद्धमान इनसे मार्गदर्शन रूपी मधुर फल को पाकर लोग लाभान्वित होते हैं।
दुष्ट लोग सूखे पेड़ की तरह होते हैं। ठूँठ बने वृक्ष जरा-सी चिन्गारी गिर जाने जल जाते हैं। इसी तरह वे दुर्जन सफल लोगों से केवल ईर्ष्या ही करके अपने आप को जलाने का कार्य करते हैं। जैसे उन सूखे वृक्षों पर पत्थर मारने का कोई लाभ नहीं होता, उनसे न फल मिलते हैं और न ही छाया। उसी प्रकार इनकी संगति में लाभ न के बराबर मिलता है पर हानि अधिक होती है।
हर मनुष्य को उसके जीवन काल में अपने आप को साबित करने का एक अवसर अवश्य मिलता है। जो उस अवसर का लाभ उठा लेते हैं वे अपने व्यक्तित्व में चार चाँद लगा लेते हैं। उस अवसर को किसी भी कारण से चूकने वाले रेस में पिछड़कर आयु पर्यन्त नाकामयाबी का कलंक ढोते हैं। हर व्यक्ति में इतनी सामर्थ्य होती है कि वह अपने व्यक्तित्व को दुनिया के समक्ष एक उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 4 मार्च 2016
एकसूत्र में बंधा परिवार
परिवार जब तक एकसूत्र में बंधा रहता है तब तक उसकी शक्ति के सामने कोई भी टिक नहीं सकता। कोई भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखने की हिम्मत नहीं कर सकता। सभी लोग उस परिवार की एकता से घबराते हैं। उस समय उसमें सेंध लगा पाना बहुत कठिन होता है।
इसके विपरीत परिवार के टूटकर बिखरते ही स्वार्थी लोगों की बन आती है। वे उन सभी को अलग-अलग बहला-फुसलाकर अपना हित साधने में जुट जाते हैं। इसके लिए उन सबको हानि पहुँचाने से बाज नहीं आते।
इसी विषय में एक दृष्टान्त देखते हैं। किसी समय में एक व्यक्ति के चार बेटे थे। उसे सभी भाग्यशाली मानते थे। वह अपने बच्चों के नित्य के लड़ाई-झगड़ों से बहुत परेशान रहता था। समय बीतते जब वह मृत्यु ने उसके द्वार पर दस्तक दी तब वह उदास हो गया। तब उस मरणासन्न अवस्था में भी बच्चों के आपसी व्यवहार के कारण उसे चैन नहीं मिल रहा था। उसने चारों बेटों को अपने पास बुलाया। उन्हें कुछ लकड़ियाँ लाने के लिए कहा। चारों बेटे पिता के आदेश के अनुसार ही लकड़ियाँ लेकर उपस्थित हो गए।
पिता ने उनसे उन लकड़ियों को तोड़ने के लिए कहा तो बहुत ही सरलता से वे उसे तोड़ने लगे। तब पिता ने उन चारों को लकड़ियों का गट्ठर बनाने के लिए कहा। बच्चों ने पिता के आदेश का पालन किया। पिता ने उन्हें उस गट्ठर को तोड़ने के लिए कहा। चारों ने बहुत प्रयास किया परन्तु वे सफल नहीं हो पाए।
तब पिता ने चारों को मिल-जुलकर रहने के लाभ बताते हुए कहा कि मिलकर रहने से कोई भी उनका अहित करने के लिए उनमें फूट नहीं डाल सकता। जब तक वे एक बंधी हुई मुट्ठी की तरह रहेंगे तो दूसरे उनका बुरा करने के लिए दस बार सोचेगा क्योंकि उसे ज्ञात होगा कि चारों मिलकर उसे परास्त कर देंगे।
यदि वे चारों जीवन में लड़ते-झगड़ते रहेंगे तो दूसरे इस बात का लाभ उठाएँगे। बच्चों को यह बात समझ आ गई और तब उन्होंने अपने पिता को वचन दिया कि वे भविष्य में मिलकर रहेंगे।
इसी प्रकार जब तक झाडू एक सूत्र में बंधी रहती है तब तक वह कचरा साफ करती है। परन्तु जब वही झाडू सूत्र के टूट जाने से बिखर जाती है तब खुद ही कचरा बन जाती है। उस समय उस अनावश्यक कचरे को उठाकर लोग कूड़ेदान में फैंक देते हैं। यानि वही बिखरे तिनके सबके लिए असह्य हो जाते हैं।
इसलिए हम हमेशा परिवार में एक मुट्ठी की तरह बंधकर, मिल-जुलकर रहना चाहिए। आपसी द्वन्द्वों के कारण बिखरकर दूसरों की नजर में आसानी से उपलब्ध हो जाने वाला बनने से बचना चाहिए।
अपने विचारों में परिपक्वता लानी चाहिए। यह मानना चाहिए कि परिवार का हित साधने में ही सबका भला होता है। मन की शुद्धता के लिए लोग सप्ताह के किसी भी दिन उपवास रखते हैं और अन्न का त्याग करते हैं। होना यही चाहिए कि अपने मन की शुद्धि के लिए अपने परिवार को तोड़ने वाले कुविचारों का त्याग करके उसे तोड़ने के स्थान पर जोड़कर रखने का यत्न करना चाहिए।
परिवारी जनों के प्रति मन से ईर्ष्या और द्वेष के भावों को दूर करके अपने हृदय को सरल और सहज बनाना चाहिए। सभी सदस्यों को अपने अहं का बलिदान करके परिवार की एकजुटता को बनाए रखना चाहिए। इससे बुजुर्गों और बच्चों में होने वाली अकेलेपन की समस्या से बचा जा सकता है। अत: अपने परिवार हितों को सर्वोपरि मानते हुए थोड़ा-सा धैर्य रखना चाहिए। इसके लिए विवेकी बनकर यदि अपने स्वार्थों की बलि भी देनी पड़े तो हिचकिचाना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 3 मार्च 2016
कर्मों की पूंजी बढ़ाएँ
मनुष्य जीवन भर अपनी पूँजी बढ़ाने की फिराक में रहता है। ऐसा कोई अवसर नहीं चूकता जिससे उसकी पूँजी में बढ़ोत्तरी हो सके और उसका धन दिन-प्रतिदन द्विगुणित होता रहे। इसके लिए अपने धन को बैक में फिक्सड कराता है, स्वर्ण आदि के बाँड खरीदता है, उसे शेयर मार्किट में लगाता है, नए व्यापार में उसे इन्वेस्ट करता है। और भी न जाने क्या-क्या उपाय अपने जीवन काल में करता रहता है?
मनुष्य हर हाल में दूसरों से आगे निकलकर विजयी कहलाना चाहता है। इसके लिए घर-परिवार की परवाह किए बिना दिन-रात का सुख-चैन होम कर देता है। माता-पिता, पत्नी-बच्चों, बन्धु-बान्धवों तक सबको भुलाकर पूँजी को बढ़ाने के लिए अपने एकसूत्री मिशन पर आगे-आगे बढ़ता ही जाता है। तब उसके पास पीछे मुड़कर देखने के लिए भी कोई समय नहीं होता।
उस संघर्ष काल में उसका अपना समय भी उसके हाथ से फिसल जाता है। उसके जीवन में फिर एक समय भी ऐसा आ जाता है जब अथक परिश्रम से कमाई हुई मनचाही दौलत उसके पास एकत्र हो जाती है पर अपनों का साथ छूट जाता है। तब वह हैरान रह जाता है और पश्चाताप करता है कि यह उसने क्या कर डाला? उसके हाथ में उस समय कुछ भी नहीं बच पाता। वह मानो खाली हाथ रहकर दूसरों का मुँह ताकता रह जाता है।
उस भागमभाग में वह इस सत्य को भी भूल जाता है कि उसकी वास्तविक पूँजी उसके अपने बन्धु-बान्धव हैं। उनसे भी बढ़कर उसके अपने सद् विचार हैं, उसकी नेक करनी है। धन-दौलत और ऐश्वर्य तो सब इस लोक की कमाई है जो परलोक में उसके साथ नहीं जाते। जहाँ आँखे बन्द हुईं सब कुछ मानो समाप्त हो जाता है। उसके सत्कर्म और उसके विचार रूपी पूँजी जन्म-जन्मान्तरों तक उसके साथ रहती है। उन्हीं के अनुसार ही मृत्यु के पश्चात उसे पुनर्जन्म मिलता है।
जैसे-जैसे कर्म मनुष्य करता रहता है वैसा-ही-वैसा फल उसे मिलता है। न उससे कम और न उससे ज्यादा। ईश्वर के न्याय में किसी प्रकार की हेराफेरी अथवा भाई-भतीजा वाद नहीं होता। वह किसी के साथ पक्षपात नहीं करता। इसलिए वहाँ पर बस केवल फेयर गेम होती है।
इन्सान को यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि यह धन-वैभव मोहिनी माया है। वह आज एक के पास है तो कल दूसरे के पास चली जाती है। उसके लिए राजा और रंक सब एक समान हैं। आज पैसा जेब से निकालो तो वह दूसरे की जेब में चला जाता है और उसकी पूँजी को बढ़ाता है।
इसलिए मनुष्य की वास्तविक पूँजी धन न होकर उसके अपने विचार होते हैं। धन तो खरीददारी करते समय दूसरों के पास चला जाता है। उसके सद् विचार तब तक उसका साथ नहीं छोड़ते जब तक वह स्वयं कुमार्ग पर चलने के लिए उन्हें न छोड़ दे। ये उसके अपने पास उसकी जमा पूँजी बनकर ही रहते हैं। यह पूँजी केवल इसी जन्म में शेष नहीं रह जाती बल्कि जन्म-जन्मान्तरों में कमाई हुई पूँजी के जुड़कर उसमें वृद्धि करती है। इस तरह हमारे सद् विचार हमारी आध्यात्मिक उन्नति करते हुए हमें महान बनाते हैं।
ज्यों ज्यों वह अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करके, सज्जनो की संगति करके और ईश्वर की आराधना करके उनका संचय करता जाता है, त्यों त्यों वे उसे आम साधारण जन से ऊपर उठाकर महामानव की श्रेणी में लाकर खड़ा कर देते हैं। फिर वह समाज में शिरोमणि पद प्राप्त कर लेता है। दुनिया उसके पीछे चलती है।
अत: अपनी भौतिक पूँजी अवश्य बढ़ाइए पर साथ ही अपने सुविचारों की पूँजी बढ़ाने पर भी जोर देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 2 मार्च 2016
ईश्वर वही देता जो हमारे लिए अच्छा है
ईश्वर की लीला बड़ी विचित्र है। उसे हम लोगो की यह साधारण बुद्धि नहीं समझ सकती। पता नहीं उसके कितने हाथ हैं जो पूरे संसार के असंख्य जीवों को भर-भरकर देता है यानि छप्पर फाड़कर देता है। जब लेने पर आता है तो घर के दाने भी बिक जाते हैं।
वह परम न्यायकारी है। किसी के साथ भी पक्षपात नहीं करता। उसकी अदालत में जो फैसले किए जाते हैं, उनकी अन्यत्र कहीं सुनवाई नहीं होती। सत्कर्म करने वालों को वह हर तरह से मालामाल कर देता है। दुष्कर्म करने वालों को माफ नहीं करता।उन्हें दुखों और तकलीफों में तपाकर कुन्दन बनाता है। इसीलिए उसकी लाठी की आवाज नहीं होती।
वह बारबार हमें हर काम को करने से पहले चेतावनी अथवा प्रोत्साहन देता रहता है पर हम कानों में रुई डालकर बैठे रहते हैं। उसके समझाने अथवा इन्कार करने का हम लोगों पर कोई असर नहीं होता। तभी हम हर समय बौखलाए हुए से रहते हैं।
एक बच्चा हर उस वस्तु के लिए अपने माता-पिता से जिद करता है जिसे वह अपने मित्र, पडौसी अथवा किसी दुकान पर देखता है। यह तो आवश्यक नहीं कि माता-पिता उसकी माँगी हुई सारी वस्तुएँ खरीद दें। कुछ ही वस्तुएँ वे उसे लेकर देते हैं शेष के लिए मन कर देते हैं या बहला देते हैं। वे वही वस्तुएँ उसे खरीदकर देते हैं जिनकी उसके जीवन के लिए वाकई उपयोगिता होती है।
बच्चों की तरह हम लोगों को भी हर वह वस्तु चाहिए होती है जो दुनिया में किसी के भी पास होती है, चाहे उसकी हम आवश्यकता हो अथवा न हो। वह परम पिता परमेश्वर भी हमारी सारी जायज-नाजायज माँगों में से वही हमें देता है जो हमारे पूर्वजन्म कृत हमारे कर्मों के अनुसार हमें मिलनी चाहिए। उससे न कम और न ज्यादा। हम है कि अनावश्यक हठ करते हुए परेशान रहते हैं।
ईश्वर वह कभी नहीं देता जो हम सबको अच्छा लगता है। हमारा क्या है? हमें हर चीज अच्छी लगती है। मनुष्य का वश चले तो वह चाँद को लाकर अपनी दीवार पर सजा ले। सूर्य के प्रकाश को अपने घर में कैद करके उसे आगे न जाने दे। बाकी सारी दुनिया चाहे अंधेरे में ठोकरें खाती रहे। इसी तरह नदियों का सारा पानी भी किसी को न लेने दे। यानि सारी प्रकृति पर अपनी सत्ता कायम कर ले। वह स्वार्थी बनकर दूसरे के मुँह में जाता हुआ निवाला भी छीनकर खा ले और उसे भूखा मरने के लिए छोड़ दे।
ईश्वर वही देता है जो हमारे लिए अच्छा होता है। हमारी योग्यता और भाग्य के अनुसार ही वह हमें देता है। यदि हमारे भाग्य में नहीं हो तो वह किसी-न-किसी रूप से हमारे हाथ से निकल जाएगा। जैसे बन्दर के गले में मोतियों का मूल्यवान् हार डाल दिया जाए तो वह उसे तोड़कर फैंक देगा। उसी प्रकार हम सभी अज्ञ मनुष्य अपनी मूर्खताओं के कारण उस मालिक द्वारा प्रदत्त नेमतों का लाभ नहीं उठा पाते। अपने दुर्भाग्य के कारण उन्हें व्यर्थ गंवा देते हैं।
यहाँ मुझे एक दृष्टान्त याद आ रहा है। एक लकड़हारे की ईमानदारी और उपकार पर प्रसन्न होकर राजा ने उपहार स्वरूप उसे चन्दन का वन दे दिया। उस मूर्ख को उस चन्दन का मूल्य ही ज्ञात नहीं था। इसलिए अमूल्य चन्दन भी उसके भाग्य को नहीं पलट सका। यानि उसकी गरीबी को दूर करने में सफल नहीं हो सका। वह वहीं-का-वहीं रह गया। जब राजा को उसकी मूर्खता का पता चला तो उसने माथा पीट लिया।
यह उसकी दयानतदारी है जो हमें जीवन में मायूस नहीं करता। वह बिना माँगे नित्य ही हमारी झोलियाँ भरता रहता है। यह हमारी सूझबूझ पर निर्भर करता है कि हम अपनी झोली में मालिक के द्वारा दिया गया कितना खजाना समेट सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 1 मार्च 2016
मन में बुराई न रखो
मनुष्य का अपने जीवन काल में अनेक लोगों से वास्ता पड़ता है। सभी लोग अलग-अलग स्वभाव व कार्यक्षेत्र के होते हैं। कुछ लोगों की मधुर स्मृतियाँ उसकी पूँजी बन जाती हैं। उन्हे जीवन में प्राय: याद करके आनन्द से सराबोर हो जाता है। कुछ लोगों के साथ होने वाले कटु अनुभवों के कारण उन्हें याद करके उसके मन में आक्रोश पनपने लगता है। उन्हें वह दुस्वप्न समझकर भूलने की नाकामयाब कोशिश करता है।
हर मनुष्य का स्वभाव ऐसा नहीं होता कि वह उनका प्रतिकार करे अथवा उनके मुँह पर जूता मारने जैसा व्यवहार करे। वह अपने भीतर-ही-भीतर कुढ़ता रहता है। यह पिष्टपेषण उसे चैन नहीं लेने देता और वह असहज होने लगता है। इस तरह उसके दिन-रात की मानसिक शान्ति भंग होने लगती है। यह स्थिति किसी भी तरह सराही नहीं जा सकती।
हमारे मनीषी इसीलिए समझाते है कि दिल में बुराई रखने से बेहतर है उस नाराजगी को प्रकट कर दो। ऐसी विकट परिस्थिति में जहाँ दूसरो को समझाना कठिन हो जाए, वहाँ स्वयं को समझ लेना ही बेहतर है। आत्मविश्लेषण करते रहना चाहिए। इससे पता चल जाता है कि गलती सामने वाले की थी या हमीं से कहीं चूक हो गई।
प्रसन्न रहने का सीधा-सा मन्त्र यही है कि आशा या उम्मीद केवल अपने आप से रखी जाए किसी अन्य से नहीं। दूसरों से उम्मीद रखने पर प्राय: निराशा ही हाथ लगती है। जितनी अपनी सामर्थ्य है उसके अनुरूप ही हमें सफलता मिल पाती है। बहुत बार हम स्वयं ही अपनी उम्मीद के अनुसार सफलता पाने से चूक जाते हैं।
जब हम स्वयं अपनी आशा और विश्वास पर खरे नहीं उतर पाते तब हमें यह सोचना चाहिए कि दूसरा भी इन्सान है, उससे भी चूक हो सकती है। इसलिए हमें दूसरों से नाराज नहीं होना चाहिए।
सहृदयता पूर्वक चिन्तन करने से मन में दूसरों के प्रति आने वाली दुर्भावनाएँ स्वयं ही किनारा कर लेती हैं। इससे दूसरों के लिए मन में जमी ईर्ष्या व क्रोध रूपी धूल की परतें साफ हो जाती हैं और मन दर्पण की तरह चमकने लगता है।
मेरा विचार है कि जब दो लोगों में किसी भी विषय पर टकराव हो तो उसे आमने-सामने बैठकर सुलझा लेना चाहिए। अपने मन में दुराग्रह पाल करके बैठने से अच्छा है कि अपनी नाराजगी के कारण को प्रकट करके दूर कर देना चाहिए। ऐसा करने से सम्बन्धों में आने वाला मनमुटाव दूर हो जाता है और वे लम्बे समय तक बने रहते हैं।
सम्बन्ध कोई भी हो, चाहे माता-पिता का हो, पति-पत्नी का हो, फिर दोस्तों-रिश्तेदारों के मध्य हो अथवा कार्यालयीन साथियों का हो, उन सबमें पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक है। अपने मनों में कभी भी, किसी भी कारण से दरार नहीं आनी चाहिए। उसके कारण आने वाली दूरी को पाटना असम्भव तो नहीं कठिन अवश्य हो जाता है।
यदि सम्बन्धों में तनाव बना रहेगा और उसे दूर करने का प्रयास नहीं किया जाएगा, तब सभी प्रभावित लोगों के मनों को अतीव कष्ट होगा। यह स्थिति किसी भी सहृदय के लिए भी सुखद नहीं कही जा सकती। सबसे बड़ी बात कि सहजता और सरलता का वातावरण बनाने में आई बाधा को सभी दूर करना चाहते हैं। इसके मूल में सभी पक्षों का अहं आड़े आ जाता है जो समझौता करने से इन्कार कर देता है।
गलती करना मानवीय प्रकृति है, इसे सदा याद रखना चाहिए। यदि बिना किसी पूर्वाग्रह के इसे स्वीकार करते हुए यदि क्षमाशील बना जाए तो दूसरों को मानसिक सन्ताप देने के स्थान पर उन्हें उन्हीं की गलती का अहसास कराते हुए अपनी विशालहृदयता का परिचय देना चाहिए। हर व्यक्ति दूसरों की उम्मीद पर खरा नहीं हो सकता। अतः दूसरों से नाउम्मीद होने के स्थान पर स्वयं पर भरोसा रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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