शुक्रवार, 8 जुलाई 2016

दुष्ट के साथ कैसा व्यवहार

माना यही जाता है कि बुरे व्यक्ति अथवा दुष्ट के साथ सहृदयता बरतनी चाहिए। उसे यथासम्भव सुधारने का प्रयास करना चाहिए। उसे सन्मार्ग दिखाया जाए तो वह शायद अपने बुराई के रास्ते को छोड़ सकता है और निस्सन्देह एक अच्छा इन्सान बनने का प्रयत्न सकता है।
          आज प्रायः लोग इस तर्क को न मानकर यही कहते हैं कि एक बार जो व्यक्ति गलत रास्ते पर चल पड़ता है उसकी वहाँ से वापिसी असम्भव नहीं तो कठिन अवश्य होती है। इसका कारण है कि उसका मन वहाँ रमता है और वह समझता है कि उसका लौहा सभी मानते हैं। उसकी तूती बोलती है तथा लोग उससे डरते हैं। इसलिए वह वापिस नहीं लौट सकता। यदि वह लौटना चाहे भी तो उसके साथी उसे वैसा नहीं करने देते। उन पर अपना कीमती समय नष्ट न करके उसका सदुपयोग करना चाहिए।
          अपराधिक प्रवृत्ति वाले मनुष्यों को कितना भी सुधारगृह में भेज दो, उन्हें एक जिम्मेदार नागरिक बनाने का कितना भी यत्न क्यों न किया जाए पर परिणाम वही होगा यानि 'ढाक के तीन पात।' तब उन पर की गई मेहनत की जाए व्यर्थ हो जाती है।
          किसी विद्वान का कहना है कि दुष्ट के साथ दुष्टता का व्यवहार करना चाहिए-
             'शठे शाठ्यं समाचरेत्।'
या दूसरे शब्दों में कहा जाए कि-
         'ईंट का जवाब पत्थर से देना चाहिए।'
अर्थात यदि कोई ईंट मारे तो उस पर पत्थर से वार तो कर ही देना चाहिए।
         उनका कथन है कि उन्हें  कोई और भाषा समझ ही नहीं आती। वे इसके लिए तर्क देते हैं कि दुष्ट व्यक्ति साँप की तरह होता है। उसे कितना भी दूध पिलाओ वह डंक जरूर मारता है। इसी तरह दुष्ट के साथ कितना भी अच्छा करो, मौका आने पर वह अपनी हरकतों से बाज हीं आता। वह हानि करा ही देता है। इसलिए वह कभी विश्वास के योग्य नहीं बन सकता, उसका त्याग करना ही श्रेयस्कर होता है।
     यदि दुष्ट के साथ नरमी का बर्ताव किया जाए तो उसका दिमाग सातवें आसमान पर चढ़ जाता है। वह दूसरों को मूर्ख समझता है। इसलिए उसके साथ नरमी नहीं बरतनी चाहिए। उनका कथन है कि-
          'आर्जवं हि कुटिलेषु न नीति:।'
अर्थात् दुष्ट के साथ सरलता नहीं बरतनी चाहिए।
           उसे ऐसा व्यवहार रास नहीं आता। मनुष्य को ऐसी नीति अपनानी चाहिए जिससे उसे यह न लगे कि सामने वाला कमजोर हैं या उसका प्रतिकार नहीं कर सकता। अतः उसको दबाया न सकता है अथवा डरा-धमकाकर उससे अपना उल्लू सीधा किया जा सकता है।
      वैसे तो हम सब चाहते हैं कि उन दुष्ट लोगों को सुधारने का एक मौका दिया जाना चाहिए। पर वास्तव में एक अवसर मिलने पर उनमें सुधार हो सकता है क्या? यदि हाँ तो यह समाज के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि होगी अन्यथा समय की बरबादी ही मानी जाएगी।
      दुष्ट को यदि हम क्षमा करेंगे तो वह हमारा मजाक उड़ायेगा और कहेगा कि हम में हिम्मत ही नहीं है उसका सामना करने की। हमारी क्षमाशीलता को वह हमारी कमजोरी समझकर और अधिक अत्याचार करेगा। इसिलए उसका प्रतिकार करना आवश्यक हो जाता है।
     अपवाद हर विषय में मिल जाते हैं। सन्यासियों की संगति में आकर रत्नाकर डाकू लोकप्रसिद्ध रामायण के रचियता बन गया। इसी प्रकार महात्मा बुद्ध के सम्पर्क में आने पर अंगुलिमाल डाकू उनका प्रिय शिष्य बन गया। ऐसे उदाहरणों से इतिहास भरा हुआ है जहाँ सज्जनों की संगति में दुष्ट अपनी बुराइयों को दूर करके महापुरुष बन गए। बस केवल खोजने भर की देर है। वाल्मीकि व अंगुलीमाल डाकू दोनों ही महात्माओं की संगति में महान बने तथा उन्होंने समाज को दिशा देने का कार्य किया। पर ऐसे कुछ ही लोग हैं जो अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
      यहाँ मैंने विद्वानों की उक्तियों को आपके समक्ष रखा है। अब आप अपनी तर्क बुद्धि और विवेक से विचार करें कि हम इन दुष्ट लोगों के साथ कैसा व्यवहार करें?
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 7 जुलाई 2016

प्रकृति में संतुलन

प्रकृति में संतुलन ईश्वर स्वयं बनाकर रखता है। उसे किसी के परामर्श अथवा सहायता की आवश्यकता नहीं होती। उसकी इस सुन्दर रचना में यानि सृष्टि में कहीं कोई कमी नहीं है।
        परमात्मा ने ब्रह्माण्ड में जीवों को भेजते समय एक लाइफ साईकिल का निर्धारण किया है। जीव उत्त्पन्न होगा, फिर बड़ा होगा और अन्त में इस संसार से विदा लेकर अगले पड़ाव यानि नए जन्म की प्रक्रिया से गुजरेगा। जब से इस ब्रह्माण्ड की रचना हुई है, तब से यह क्रम अनवरत चलता जा रहा है। इसमें कहीँ भी, किसी प्रकार की त्रुटि की गुंजाइश नहीं है।
        सूर्य, चन्द्र आदि सभी ग्रह-नक्षत्र आदि सभी का क्रम निश्चित है। कोई प्रातः आकर रात्रि में विदा लेता है तो कोई रात में आकर सवेरे चला जाता है। नदियाँ अपने उद् गम से यात्रा प्रारम्भ करके समुद्र में जाकर विलय हो जाती हैं।
       सृष्टि के सभी जीव-जंतुओं के अन्न-जल की व्यवस्था उसने बहुत ही अच्छे ढंग से की है। सबके भोजन के लिए उस प्रभु ने पेड़-पौधों की उत्पत्ति की जिससे सबको अपने भोज्य पदार्थ मिलते रहें। पेड़-पौधे बहुत अधिक न बढ़ जाएँ, इसके लिए उसने शाकाहारी जीवों की रचना की।
          पशु-पक्षियों के लिए उसने ऐसी व्यवस्था की है जिससे उन्हें हर स्थान पर भोजन मिल सके। हाँ, इन्सान के लिए कुछ अधिक श्रम का प्रावधान रखा ताकि वह उसके लिए जी-तोड़ मेहनत करे और उस मालिक को भी याद करता रहे। पर्वतों की चटटानों और पत्थरों में भी उसने जीवों के लिए भोजन छिपाकर रखा है जिसे वे अपनी जरुरत के समय खा सकें।
         पृथ्वी पर पशुओं की संख्या अधिक न होने पाए इसलिए उसने मांसाहारी जीवों की रचना की। वे शिकार करते हैं और अपना भोजन प्राप्त करते हैं। उन्हें भी बैठे बिठाए भोजन नहीं मिलता बल्कि उन्हें भी इसके लिए संघर्ष करना पड़ता है। कवि ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
       न हि सुप्तस्य सिंहस्य मुखे प्रविशन्ति मृगाः।
अर्थात सोए हुए शेर के मुँह में स्वयं पशु नहीं जाता।
       कहने का तात्पर्य यही है कि अपने भोजन को प्राप्त करने के लिए सभी को संघर्ष करना पड़ता है। उस मालिक ने ऐसा सबके लिए ऐसा प्रबन्ध कर दिया है कि उसे भोजन तो मिले पर उसके लिए परिश्रम करने की शर्त भी लगा दी।
         कहते हैं ‘बड़ी मछली छोटी मछली को खाती है।’ इसका यही अर्थ है कि जलचरों की संख्या बहुत अधिक न हो जाए इसलिए यह विधान रच दिया। इस दुनिया में कहीं पशुओं की अधिकता न हो जाए, अतः शेर, चीते, बाघ जैसे खूँखार जीवों की रचना की ताकि पशुओं का सृष्टि में अनुपात बना रहे। चील, गिद्ध, सियार आदि जीव बनाए जो बचे हुए मांसाहार को साथ-साथ निपटा सकें, जिससे कहीं बदबू न हो। पेड-पौधों का संतुलन बना रहे, इसके लिए शाकाहारी जीवों को बना दिया।
         इन्सानों का अनुपात बिगड़ने न पाए इसलिए प्राकृतिक आपदाओं यानि सुनामी, बाढ़, भूकम्प आदि का समावेश कर दिया। इसके आलावा समय-समय पर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि आदि भी होती रहती है जिससे मनुष्यों की जनसंख्या में सन्तुलन बना रहे और आवश्यकता से अधिक आबादी न बढ़ सके।
       अपने घर में देखते हैं कि दीवार पर रेंगने वाली छिपकली मच्छर आदि कीटों को खाती है। जो जीव दूसरे जीवों को खाते हैं, उनके मारने के बाद वही जीव उन्हें खा जाते हैं। जैसे साँप के मारने के बाद चींटियाँ उसे खा जाती हैं। जो अग्नि सब कुछ जलाकर भस्म कर देती है, जब वह बुझ जाती है तो हर कोई उसे रौंद देता है।
        मांसाहारी मनुष्य बहुत गर्व से कुतर्क देते हैं कि इन्सान के लिए ईश्वर ने सभी जीवों को बनाया है, इसीलिए हम उन्हें खाते हैं। यह सच है कि सृष्टि के जीवों से सहायता लेने के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सामर्थ्य दी है परन्तु उन्हें मारकर खाने की आज्ञा वह कदापि नहीं देता। उस मालिक ने सभी प्रबन्ध स्वयं किए हुए हैं। उसे सांसारिक मनुष्यों की सहायता की कोई आवश्यकता नही है।
         अतः उसके विधान मेँ अपनी टाँग अड़ाना छोड़ दें। वह बहुत ही समर्थ है उसे हम इन्सानों की सहायता की कोई आवश्यकता नहीं है। बस यह याद रखिए कि वह स्वयं सब सम्हाल सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 6 जुलाई 2016

दान देना कर्तव्य

दान के महत्त्व को हमारे मनीषी भली-भाँति समझते थे। इसीलिए उन्होंने हमें बताया की हर शुभकार्य को करते समय दान करना चाहिए। इसके अतिरिक्त किसी भी दुःख-तकलीफ से उभरने के पश्चात् भी दान देना चाहिए। अपने मन की शांति के लिए भी हर मनुष्य को अपनी शुद्ध कमाई में से कुछ धन अलग निकाकर रखना चाहिए और उसे दान में भी देना चाहिए।
         समाज में रहते हुए मनुष्य दूसरों से बहुत कुछ ग्रहण करता है क्योंकि सदा से ही वह एक समाजिक प्राणी है। उसके बदले में उसे समाज के हितार्थ कुछ-न-कुछ अपना योगदान करते रहना चाहिए। उनमें दान देना भी प्रमुख है। दान करने के विषय में मुझे कबीरदास जी का एक दोहा याद आ रहा है-
               चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
               दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर।।
अर्थात नदी में जल का भण्डार होता है पर यदि चिडिया उसमें से कुछ बूँदे जल की ले लेती है तो उसके जल में कोई कमी नहीं आती, वह खाली नहीं होती।
          इस प्रकार अपनी कमाई में से कुछ राशि यदि समाजिक और धार्मिक कार्यो पर व्यय की जाए तो वह धन सार्थक हो जाता है। धन का दान किसी प्रभावशाली व्यक्ति को देखकर नहीं करना चाहिए अथवा न ही किसी के दबाव में आकर करना चाहिए। साथ ही किसी की होड़ में आकर भी दान नहीं करना चाहिए। मन में पूर्ण श्रद्धाभाव और अपना कर्तव्य मानकर दान देना चाहिए।
         दान देते समय यह भी सावधानी बरतनी चाहिए कि दान सुपात्र को ही देना चाहिए ताक़ि वह उसका सदुपयोग करे। यदि दान कुपात्र को दिया जाए तो वह उसका दुरुपयोग करेगा। इस तरह दिया गया धन व्यर्थ हो जाता है, तब फिर अपने मन को भी कष्ट होता है।
        दान देते समय कर्त्तापन का अभिमान मन में कदापि नहीं आना चाहिए। हालाँकि यह इन्सानी कमजोरी है कि वह चाहता है सभी लोग उसके इस कार्य को महत्त्व दें, उसकी सराहना करे और सम्मान दे। जिसकी सहायता की है वह सारी आयु नजरें न मिला सके अथवा हमेशा उसके सामने सिर झुककर रहे। ऐसी सोच को अपने ऊपर हावी नहीं होने देना चाहिए और यथासंभव अहं से बचने का प्रयास करना चाहिए।
        यदि मनुष्य इस बात को आत्मसात कर लेना चाहिए कि देने वाला तो वह ईश्वर है, इन्सान तो बस दान देने का एक माध्यम है। तब कभी उसके मन में यह अभिमान नहीं आ सकेगा कि दान उसने दिया है या उसने किसी की सहायता की है।
         दान देने का लाभ तभी होता है जब अपना कर्त्तव्य समझकर दान दिया जाए। हमारे मनीषी कहते हैं कि दाएँ हाथ से दान दो तो बाएँ हाथ को पता न चले। दूसरे शब्दों में कहेँ तो दान को गुप्त रूप से देना चाहिए और स्वयं को भी उसके बारे में याद न रहे।
        इसी भाव को रहीम जी ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में लिखते हैं-
            देन हार कोई और है भेजत जो दिन रैन।
            लोग भरम हम पर करें तासो नीचे नैन।।
अर्थात देने वाला तो कोई ओर है जो हमें दिन-रात देता रहता है। लोगों को व्यर्थ ही भ्रम हो जाता है कि हम देने वाले हैं। इसीलिए दान देते समय उनकी नजरें झुक जाती थीं।
         देवताओं की रक्षा के लिए अपनी हड्डियों का दान करने वाले महर्षि दधिचि को हम सब जानते हैं।  दानवीर कर्ण को कौन भूल सकता है। इतिहास भरा हुआ है ऐसे महापुरुषों की गाथाओं से।
        धन के दान को सर्वाधिक महत्त्व इसलिए दिया जाता है कि उसके बिना कोई भी कार्य सम्भव नहीं होता। अन्न, वस्त्र, श्रम आदि के दान का भी महत्त्व का नहीं है। मनुष्य यदि नए वस्त्र नहीं दान कर सकता तो ऐसे वस्त्र देने चाहिए जिन्हें कोई पहन सके और कुछ समय के लिए वह अपना तन ढक सके।
         विद्या के दान का शास्त्रों में सबसे अधिक महत्त्व माना जाता है। इससे एक भावी पीढ़ी संस्कारित होती है जो देश का भविष्य होती है। इसलिए निस्वार्थ भाव से दान देते रहना चाहिए। इससे मनुष्य के इहलोक और परलोक दोनों ही सुधरते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 5 जुलाई 2016

कंक्रीट के जंगल

कंक्रीट के जंगल में रहते-रहते हम सभी शहर वासी संवेदना से रहित होते जा रहे हैं। ऊँची-ऊँची बहुमंजिली इमारतें हमारी प्रगति व वैभव का प्रतीक हैं। एक जैसे बने ये आलिशान भवन मानो हमें मुँह चिढ़ा रहे हैं।
       इनमें रहने वाले हम दिन-प्रतिदिन अपने में सिमटते जा रहे हैं। मैं, मेरे बच्चे और मेरा परिवार बस। इसके आगे हमारी सोच अपने दरवाजे बंद कर लेती है। आज हम मात्र केवल यही सोचते हैं कि अमुक व्यक्ति से संबंध रखने से मुझे क्या लाभ मिलेगा? जहाँ लाभ नहीं वहाँ संबंध भी नहीं चाहे रक्त संबंध ही क्यों न हों? अगर वे हमारी कसौटी पर खरे न उतरें तो हम उनसे किनारा करने में भी नहीं हिचकिचाते। हमें किसी मित्र-संबंधी की भी परवाह नहीं है। हम बस अपने में सिमट कर रहना पसंद करते हैं।
      अपने आसपास की हमें कोई चिन्ता नहीं। पड़ौसी के घर में कोई सुख है या दुख, उनके घर चूल्हा जला या नहीं हम इन सबसे अनजान हैं। या यूँ कहें कि हम ये सब जानना ही नहीं चाहते। हमारे द्वार पर कोई याचक आ जाए तो उसे अपमानित करके भगा देते हैं। और अपनी जरूरत होने पर गधे को भी बाप बनाने में नहीं हिचकिचाते।
       कंक्रीट के जंगल में ईंट, पत्थर, सीमेन्ट, लौहे आदि की तरह हमारे मन भी कठोर बनते जा रहे हैं। हमारे सामने चाहे किसी का एक्सीडेंट हो जाए या चाहे कोई मर भी जाए तो हमारे दिल नहीं पसीजते।
यदि हम हरियाली वाले जंगलों में रहते तो शायद हमारे हृदयों में संवेदनाएं बनी रहतीं और हम इतने निष्ठुर न होते।
         'वसुधैव कुटुम्बकम्' की विशाल दृष्टि वाले हम अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण अपने जीवन मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं।
        हमें यत्न पूर्वक अपने आपको सहिष्णु व सहृदय बनाना होगा तभी सामाजिक प्राणी वाली छवि पर फिर से खरे उतर सकेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 4 जुलाई 2016

जीवन की रेस में सफलता

जीवन की रेस में सफलता प्राप्ति के लिए हर मनुष्य अपने हाथ-पैर मारता है। उसके बाद भी यदि ऐसा लगे कि पास आती हुई सफलता रूठकर कहीं दूर चली जा रही है और हाथ नहीं आ रही तब उसे अपने प्रयासों में परिवर्तन लाने की आवश्यकता होती है।   
        भाग्य पर अन्धविश्वास न करके अपने उद्देश्यों को मजबूत बनाना चाहिए और अपने कर्म पर भरोसा करना चाहिए और स्वयं की सामर्थ्य पर ही विश्वास करना चाहिए। जीवन में कुछ बातें या घटनाएँ अवश्य ही संयोगवश हो जाती हैं पर हमेशा ऐसा नहीं होत।
        दृढ़ विश्वास और अपनी सामर्थ्य का सदुपयोग करते हुए अपने लक्ष्य की ओर कदम बढ़ाने वालों को कभी असफलता का मुँह नहीं देखना पड़ता। हाँ, कभी क्षणिक अवसाद अवश्य हो सकता है परन्तु उसका परिणाम सदा ही सुखदायी और परिवर्तन लाने वाला होता है।
          अपने लक्ष्य को पाने के इच्छुक साहसी लोग असफलताओं से निराश नहीं होते। जब तक मन-मस्तिष्क सुनियोजित रहेगा यानि उनमें तालमेल बना रहेगा तो तब तक मनुष्य की भावनाएँ उसी के अनुरूप ही जन्म लेंगी।
           मनुष्य की उर्जा, उसकी शक्ति का यदि सही दिशा में उपयोग होगा तो शरीर भी अपनी गति में आ जाता है। मनीषी कहते हैं कि मनुष्य अपने भाग्य का रचयिता स्वयं होता है। यह सर्वथा उचित है। मनुष्य जब अपने मजबूत इरादों, दृढ़ विश्वास, सुनियोजित मन-मस्तिष्क और एक निश्चित गति से आगे बढ़ेगा तो ब्रह्माण्ड की कोई भी ताकत उसे पछाड़ नहीं सकती।
        मनुष्य के विचारों में, उसकी सोच में स्पष्टता और परिपक्वता का होना बहुत आवश्यक होता है। उसका आत्मविश्वास कभी डगमगाना नहीं चाहिए। अपने लक्ष्य तक पहुँचने के लिए मनुष्य को एकान्त में बैठकर विवेकपूर्वक योजना बनानी चाहिए और उसे सही समय पर क्रियान्वित करना चाहिए।
         यदि उसकी योजना में ही कमी रह जाएगी तो उसकी सफलता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। मनुष्य को उत्साही बनना चाहिए पर अति उत्साही नहीं होना चाहिए। ऐसा करके वह अपने ही दुर्भाग्य को स्वयं न्यौता दे बैठता है जिसके लिए आयुपर्यन्त उसे हाथ मलते ही रह जाना पड़ता है।
           मनुष्य को चाहिए की वह उन सबको अपने साथ लेकर चले जिन्हें वह पसंद हैं। जो उसे नापसंद हैं उनका त्याग न करके ऐसा कुछ करे कि वे स्वेच्छा से उसके साथ जुड़ने के लिए तैयार हो जाएँ। जीवन में पता नहीं कब किस मोड़ पर उसे उनकी भी जरूरत पड़ जाए। उस समय वह स्वयं को सबसे भाग्यशाली इन्सान समझेगा।
          किसी को भी अपने जीवन मैं सदा एक जैसी परिस्थितियाँ नहीं मिलतीं।धूप-छाँव का खेल चलता रहता है। उन सभी स्थितियों को सम रहकर सहन करना ही बुद्धिमत्ता है। भगवन श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता में इसे द्वन्द्व सहन करना कहा है।
           मनुष्य को व्यपरियों की तरह जमा-घटा का पहाड़ नहीँ पढ़ना चाहिए। उसके ये विचार उसकी सोच को संकुचित बना देते हैं। उसे महान बनने के स्थान पर सबका प्रिय बनने का यत्न करना चाहिए। महान तो वह अपने सत्कार्यो से बन ही जाता है।
         अपनी क्षमताओं के अनुसार यदि वह अपनी उन्नति की ओर ध्यान देगा तो उसका व्यक्तित्व स्वयं ही निखरकर दुनिया के सामने आ जाएगा। उसे संसार सधारण से असाधारण या महान बना देता है। तब वह महापुरुषों की श्रेणी में गिना जाता है। उसके दिशा-निर्देशों की अनुपालना करके लोग स्वयं को धन्य मानते हैं।
        मनुष्य यदि कछुए की तरह कर्मठता, आत्मविश्वास, निष्ठा व लग्न से आगे बढ़ने लगे तो तरह खरगोश जैसे तीव्रगामी लोगों को पछाड़कर अपनी सफलता के झंडे गाड़ सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 3 जुलाई 2016

इन्सानी शिकायत

हम इन्सानों को सदा ही हर दूसरे व्यक्ति से शिकायत रहती है। हर मनुष्य को लगता है कि उसके बराबर इस संसार में कोई और बुद्धिमान नहीं है। वह अपने सामने किसी को कुछ समझता ही नहीं। इसीलिए हर किसी में कमियाँ ढूँढकर, उनका उपहास करके आत्मसन्तोष का अनुभव करता है।
       यदि उसमें दूसरों की कमियाँ देखने की आदत न होती तो बहुत अच्छा होता। दूसरों के स्थान पर अपनी कमियाँ ढूँढकर यदि वह उन्हें सुधार पाता तो इस संसार का भला हो जाता।
          वह अपने बन्धु-बान्धवों, संगी-साथियों के साथ-साथ प्रकृति, मौसम और ईश्वर से भी शिकायत रहती है।
       पति-पत्नी को एक-दूसरे से, बच्चों व माता-पिता, घर-परिवार के सभी सदस्यों, मित्रों, शत्रुओं, पड़ोसियों, कार्यालयीन साथियों आदि सभी से हमेशा शिकायत रहती है। उसे लगता है कि हर कोई उसका अहित करना चाहता है। सब उससे और उसके ऐश्वर्य से जलते हैं। तरक्की करते हुए उसे देखकर उसकी टाँग खींचकर जमीन पर पटखनी देना चाहते हैं। उसे सदा यही चिन्ता सताती रहती है कि किस तरह सबको नीचा दिखाकर वह पतंग की तरह ऊँचा उड़ता रहे।
         इसी प्रकार दूसरों को कोसते हुए हम सभी अपने जीवन में अशान्ति खरीद लेते हैं। सब कुछ होते हुए भी परेशान रहते हैं। यही एक शंका मन में घुन की तरह लगा लेते हैं कि हमसे कोई आगे न निकल जाए। यदि कोई अपने परिश्रम से आगे निकलने में सफल हो जाता है तब बस फिर उसकी बुराइयाँ करने की कवायद शुरू होने लगती है।
         प्रकृति जिससे वह सब कुछ लेता है उससे उसे विशेष रूप से शिकायत रहती है। स्वयं प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करने के उपरान्त भी उसका मन नहीं भरता और उसे दूषित करने से बाज नहीं आता। जब उसकी मूर्खता से अतिवृष्टि या अनावृष्टि होती है या भूकम्प आते हैं तब उनके कारण खेती और अन्य जानमाल की बरबादी होने की शिकायत करता है।
        नदियों पर बड़े-बड़े बाँध और पुल बनाकर सुविधाएँ भोगना चाहता है, उन्हें अपने यातायात के लिए प्रयोग करना चाहता है। पर उनकी सफाई पर ध्यान नहीं देना चाहता। इसलिए उनके द्वारा होने वाली तबाही पर बिसूरने लगता है।
        सागर से उसे परेशानी है कि उसका पानी खारा न होकर मीठा होता तो पानी की समस्या हल हो जाती। स्वयं तो वह हर समय पानी को बरबाद करता है। कुछ विद्वान कहते हैं कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा।
      पक्षियों से विशेषकर कोयल से उसे यह शिकायत है कि उसका रंग काला है। उसकी मधुर आवाज के साथ यदि रंग भी गोरा होता तो अच्छा होता। फूलों अर्थात गुलाब से शिकायत रहती है कि उसमें काँटे होते हैं। यदि वे न होते तो बहुत अच्छा होता। जब वह उसे तोड़ना चाहता है, वे उसे चुभ जाते हैं।
          पेड़-पौधों से शुद्ध वायु और सभी प्रकार के खाद्यान्न पाकर मुदित होता रहता है, फिर भी उन्हें काटकर अपने घर को सजाने तथा ईंधन के रूप में प्रयोग करने में जरा भी परहेज नहीं करता। उसे हर मौसम से भी शिकायत रहती है चाहे वह सर्दी हो, गर्मी हो, वर्ष हो या पतझड़ हो।
            इसी प्रकार पशुओं को अपने आराम और मनोरंजन के लिए पालतू बनाता है और अपने जीभ के स्वाद के लिए मारकर खा जाता है। जब वे इसके विपरीत कार्य करने लगते हैं तब उसकी रातों की नींद हराम हो जाती है।
        ईश्वर जिसने उसे इस संसार में भेजा और झोली भर-भरकर नेमते दीं, चौबीसों घण्टे किसी-न-किसी बात पर उसी से शिकायत करता रहता है। उसे यही लगता है कि दुनिया को मालिक सुख देता है किन्तु सआरे दुख, कष्ट और परेशानियाँ उसकी झोली में डाल देता है।
        इस शिकायत पुराण को तिलांजलि देकर यदि मनुष्य सकारात्मक सोच अपना ले तो उसकी बहुत सारी स्थितियाँ स्वयं ही बदल जाएँगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 1 जुलाई 2016

निस्वार्थ परोपकार

मनुष्य निस्वार्थ भाव से जो भी परोपकार के कार्य करता है वे कभी व्यर्थ नहीं जाते। वे कार्य उसके शुभकर्मों में जुड़ जाते हैं और उसके पुण्यों को बढ़ाते हैं। समयानुसार फलदार वृक्ष की तरह फिर वे उसे मीठा फल देते हैं। ऐसे मनुष्य की प्रसिद्धि कहाँ तक फैलेगी, यह सब ईश्वर ही जानता है। न तो वह स्वयं जानता है और न ही कोई और।
       उसके समीपस्थ अन्य दूसरे लोग चाहे उसकी चाहे कितनी ही आलोचना क्यों न करते रहें, उन्हें अनदेखा करते हुए वह अपनी ही धुन में मस्त, अपने द्वारा चुने हुए मार्ग पर सूर्य की तरह निरन्तर गतिमान रहता है।
       यहाँ हम एक कथा को लेते हैं जो इन्हीं विचारों की पोषक है। एक बहुत ही सज्जन व्यक्ति थे जो हर आने-जाने वाले को अपने पास बिठाकर पानी पूछते थे। आया हुआ कोई परदेसी यदि भूखा होता तो उसे पूछकर खाना भी खिलाते थे। वे बस यही कहते थे कि जो यहाँ दिया है, तो वहाँ मिलेगा।
        एक बार उन्हें किसी कार्यवश दूसरे शहर जाना पड़ गया। उन्होंने अपनी बहू से कहा कि चार पराँठे बनाकर उनके बैग में रख दे। जब भूख लगेगी तो किसी पेड़ की छाया में बैठकर खा लूँगा।
         उनकी बहू ने मन में विचार किया कि नित्य प्रति लोगों को खाना खिलाते रहते हैं और कहते हैं कि यहाँ दिया है तो वहाँ मिलेगा। इन्हें भोजन की क्या आवश्यकता आ पड़ी। उसने खाना नहीं बनाया। जब वे सज्जन घर से जाने लगे तो उन्होंने बहू से पूछा कि क्या उसने भोजन रख दिया है। उसने हाँ में उत्तर देते हुए कहा कि रख दिया है, आगे जाकर मिल जाएगा।
         वे अपने गन्तव्य पर थके-माँदे पहुँचे और एक चबूतरे पर बैठ गए। थोड़ी दूरी पर काम रहे युवक ने उन्हें देखा तो पहचान गया कि वे वही सज्जन हैं जिन्होंने थके और भूखे-प्यासे उसे खाना खिलाया था। वह उनके पास आया और उनसे हालचाल पूछा। फिर भूखा जानकर उन्हें बड़े प्यार से खाना खिलाया।
        तब उन सज्जन ने कहा कि मेरे बैग में मेरी बहू ने खाना रखा है, उसे भी खा लेते हैं। परन्तु जब उन्होंने बैग खोला तो देखा कि उसमें बहू ने खाना रखा ही नहीं था। तभी उन्हें बहू के शब्द याद आ गए कि यहाँ जो खाना दिया है, वह आगे जाकर मिल जाएगा।
          यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि अपना खुद का पेट भर लेना और अन्य किसी के बारे में कभी न सोचना पशुवृत्ति कहलाती है। मनुष्य को मिल-बाँटकर खाना चाहिए।
          स्वयं के हिस्से का भोजन खाना तो प्रकृति कहलाती है किन्तु दूसरों के हिस्से पर नजर रखना अथवा खा लेना विकृति कहलाती है। इन सबसे भी बढ़कर होता है किसी भूखे को अपना हिस्सा दे देना उसके संस्कारों को बताता है। हमारी भारतीय संस्कृति सदा अतिथि की सेवा करने का निर्देश देती है।
        जिन लोगों ने कभी भूख की ज्वाला का अनुभव नहीं किया उन्हें पता ही नहीं कि भूखा व्यक्ति क्या नहीं कर गुजरता। जिनके पेट भरे होते हैं उनके दिमाग खराब हो जाते हैं और नखरे होते हैं। इसलिए उनके घर की रोटियाँ किसी जरूरतमन्द को देने के स्थान पर कूड़े में फैंक दी जाती हैं या खाने लायक नहीं रहतीं।
        किसी की सहायता यदि बिना उससे कुछ प्राप्ति की भावना से सहृदयता पूर्वक की जाए तो वह अवश्य ही फलदायी होती है। ऐसे ही महानात्मा लोगों के पुण्यों के कारण इस धरती पर आज तक मानवता का अस्तित्व आज बचा हुआ है। अन्यथा स्वार्थियों ने इसे बरबाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वे अपने स्वार्थों को महत्त्व देते हुए लोगों को गलत सन्देश देते हैं। इससे लोगों का विश्वास डगमगाने लगता है जिसे हम किसी भी सूरत में उचित नहीं ठहरा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद
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