बच्चे बेचारे आजकल बस्ते यानी बैग के भार से दबे जा रहे हैं जो बहुत अधिक है। आजकाल यह फैशन बनता जा रहा है कि जितना बड़ा और भारी स्कूल का बैग होगा उस विद्यालय में उतनी ही अच्छी पढाई होगी।
विचारणीय है कि क्या वास्तव में शिक्षा का स्तर इतना बढ़ गया है कि भारी भरकम बोझ के बिना पढाई सम्भव नहीं हो सकती। शिक्षाविद बच्चों को इस बोझ से मुक्ति दिलाने में समर्थ हो सकेंगे।
प्राचीन काल में भारतीय शिक्षण पद्धति ऐसी होती थी जहाँ बच्चों पर पुस्तकों का बोझ कम होता था। जीवन को क्रियात्मक बनाने पर बल दिया जाता था। आज की शिक्षा व्यावसायिक हो गई है।
इस बोझ के कारण बच्चों की रीढ़ की हड्डी पर बहुत दुष्प्रभाव पड़ता है और वे कमर दर्द, कंधो के दर्द और थकान आदि से परेशान हो सकते हैं।
स्कूल बैग का वजन बच्चे के स्वास्थ्य और शारीरिक विकास पर बुरा असर डाल रहा है। 2014 में की गई एक स्टडी के अनुसार भारत में बच्चों के स्कूल बैग का औसत वजन 8 किलो होता है।
एक साल में लगभग 200 दिन तक बच्चे स्कूल जाते हैं। स्कूल जाने और वहाँ से वापस आने के समय जो भार बच्चा अपने कंधों पर उठाता है यदि उसे आधार मानकर गणना की जाए तो वह साल भर में 3200 किलो का वजन उठा लेता है। ये भार एक Pickup ट्रक के बराबर है। अच्छे अंक लाने के दबाव और भारी भरकम बोझ के नीचे बचपन दब रहा है। हैरानी की बात है कि कोई इसके विरोध मे आवाज नहीं उठाता।
स्कूल अभिभावकों को जिम्मेदार बताते हैं कि वे बच्चों के टाइम टेबल चेक नहीं करते। अभिभावकों का कहना है कि स्कूली बच्चों के पास अनेक विषयों की अलग-अलग किताबें और कापियाँ होती हैं। उन्हें हर दिन स्कूल ले जानी पड़ती हैं जिससे वे परेशान हो जाते हैं। बच्चों को सिखाएँ कि स्कूल बस या वैन में बैग को नीचे रखे। अनावश्यक वस्तुओं को स्कूल बैग में न रखें। कुछ बच्चे इतने आलसी होते हैं जो हर रोज बैग न लगाना पड़े अत: सारा सामान उसी में रखते हैं।
कुछ दिन पूर्व महाराष्ट्र सरकार ने एक अनोखी पहल की। तीसरी कक्षा से आठवीं कक्षा तक के बच्चों को बिना बस्ते के स्कूल बुलाया गया। स्कूल ने इस दिन को 'वाचन प्रेरणा दिवस' का नाम दिया। इसी तर्ज पर केरल ने भी यह पहल की। हालांकि बच्चों के बस्ते का बढ़ता बोझ अब दिल्ली में भी कम होने लगा है। सरकारी स्कूलों के साथ-साथ कई प्राइवेट स्कूलों ने भी यह कदम उठाया है। गुजरात, मध्य प्रदेश और राजस्थान में अन्य के मुकाबले स्कूली बस्तों का बोझ कम ही है।
तीसरी कक्षा में बच्चों के लिए भारी बैग मुसीबत बन जाता है। कई ऐसे भी पीरियड हैं, जो स्कूलों में खाली जाते हैं, कई बार कुछ पढ़ाई भी नहीं होती पर बैग में किताबें, कापियाँ तो सारी ले जानी पड़ती हैं।
सीबीएसई के अनुसार दूसरी कक्षा तक के बच्चों के बस्ते स्कूल में ही रहने चाहिए। बाकी बच्चों के लिए शिक्षकों और प्रिंसिपल को मिलकर ऐसा टाइमटेबल बनाना चाहिए, जिसमें बच्चों को ज्यादा किताबें न लानी पड़ें। चिकित्सकों की राय मानें, तो भारी बस्ता शारीरिक और मानसिक विकास का असर डालता है।
1980 में आर. के. नारायण ने राज्यसभा में बच्चों के बस्ते के बोझ को कम करने की आवाज उठाई थी। आज 36 वर्ष बाद भी बच्चे उसी बोझ से दबे हैं।
स्कूली बस्ते का बोझ कम करने के लिए इस बार दिल्ली सरकार ने पहल की है। सरकार का मानना है कि स्कूलों में पढ़ाई का समय कम करके खेल-कूद और दूसरी गतिविधियों का समय बढ़ाया जाए।
इस पहल का फायदा तभी हो सकता है जब बच्चों को बच्चों को रोबोट की तरह न पढ़ाया जाए। बस्ते रखने का प्रबन्ध स्कूल को सुनिश्चित करना चाहिए। कुछ स्कूलों ने ऐसे उपाय किए हैं। बच्चे उतनी ही किताबें घर ले जाएँ, जितनी उन्हें जरूरत है।
भारी बस्ते के बोझ से छुटकारे के लिए सटीक उपाय ढूँढने होंगे। दृढ़ इच्छाशक्ति से ही नए विकल्प खुल सकते हैं और बच्चों के लिए भविष्य बेहतर शिक्षा और स्वस्थ जीवन ला सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
बच्चों पर भारी बैग का बोझ
बुधवार, 5 अक्टूबर 2016
खो रहा बचपन
छोटे-छोटे बच्चों पर भी आज प्रैशर बहुत बढ़ता जा रहा है। उनका बचपन तो मानो खो सा गया है। जिस आयु में उन्हें घर-परिवार के लाड-प्यार की आवश्यकता होती है, जो समय उनके मान-मुनव्वल करने का होता है, उस आयु में उन्हें स्कूल में धकेल दिया जाता है।
अपने आसपास देखते हैं कि इसलिए कुकुरमुत्ते की उगने वाले नर्सरी स्कूलों की मानो बाढ़-सी आ गई है। वहाँ पर जाकर सर्वेक्षण करने से यह पता चलता है कि दो साल या उससे भी कम आयु के बच्चे पढ़ने के लिए भेज दिए जाते हैं।
अब स्वयं ही सोचिए कि जो बच्चा ठीक से बोल भी नहीं पाता, जिसे स्कूल या पढ़ाई के मायने ही नहीं पता उसे पढ़ने के लिए भेज दिया जाता है। कितना बड़ा अन्याय और अत्याचार हो रहा है उन मासूमों के साथ।
कारण समझ नहीं आता। इतने छोटे बच्चे क्या सीखेंगे? कहीं माता-पिता अबोध बच्चों को वहाँ भेजकर अपना पिंड छुड़ाने का काम तो नहीं कर रहे? इन मासूमों से उनका बचपन छीनकर आखिर हासिल क्या हो पाएगा?
यदि छोटे बच्चे से पूछो कि क्या वह स्कूल जाएगा? तो प्रायः बच्चे एकदम इन्कार देते हैं कि उन्हें स्कूल नहीं जाना। इसका कारण शायद माता या घर से दूर होना होता है। हो सकता है उनके मन मे घर से बाहर जाने पर असुरक्षा की भावना आ जाती हो।
वे मासूम बेचारे अपने माता-पिता की उच्च महत्त्वाकाँक्षाओं के कारण ही अपना स्वाभाविक जीवन जी ही नहीं पा रहे हैं। इसका एक कारण शायद आज हर क्षेत्र में होने वाला कम्पीटिशन ही है। माता-पिता जो योग्यता अपने जीवनकाल में प्राप्त नहीं कर पाए उसे बच्चों के माध्यम से पाना चाहते हैं। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वे अपने सपने बच्चों से पूरा होते देखना चाहते हैं। सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनका बच्चा कैरियर बनाने में कहीं चूक न जाए। वह उच्च शिक्षा ग्रहण करके अच्छी नौकरी करे, जहाँ उसे खूब सारा वेतन मिले। यह सोच बहुत ही अच्छी है कि उनके बच्चे समर्थ बनें।
इसके लिए बच्चे का बचपन नहीं छीनना चाहिए। उसे पैदा होते ही गौर-गम्भीर बना दिया जाए कि वह हँसना-बोलना ही भूल जाए। उनका सारा समय स्कूल जाने और फिर घर आकर ट्यूशन पढ़ने जाने में निकल जाता है और जो थोड़ा बहुत समय बचता है वह टी वी देखने या विडियो गेम खेलने में निकल जाता है।
आऊटडोर गेम खेलने का समय भी आज बच्चों को नहीं मिल पाता जो उनके स्वास्थ्य के लिए बहुत आवश्यक है। इससे उनका तन और मन दोनों स्वस्थ रहते हैं। मुझे याद है कि बचपन में हम स्कूल से लौटकर शाम के समय घर के बाहर घण्टों खेला करते थे।
बच्चों पर पढ़ाई का बोझ तो दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। उनके बस्ते का भार भी बहुत अधिक होता है जो उनके लिए परेशानियों का कारण बन रहा है। आज यह माँग बड़े जोर शोर से उठ रही है कि बच्चों पर पढ़ाई और बस्ते का बोझ कम किया जाए।
आजकल बेबी शो आदि कई तरह के कम्पीटिशन चल रहे हैं। टी वी आग में घी डालने का कार्य कर रहा है। वहाँ डाँस शो, गायन प्रतियोगिता, खाना बनाने की महारत को परखना, जी के क्विज आदि शो चल रहे हैं। इसलिए हर माता-पिता इसे भी अपना सपना बनाते जा रहे हैं। बच्चों पर यह दबाव भी रहता है कि इनका प्रशिक्षण लेकर इन प्रतियोगिताओं में भाग लें।
इन सबसे बढ़कर पढ़ाई में अंक कम नहीं आने चाहिए। उच्च शिक्षा के लिए यदि 98 या 99 प्रतिशत अंक न आएँ तो बच्चों की जान पर बन आती है। जो बच्चे इस प्रैशर को झेल नहीं पाते वे आत्महत्या जैसा घृणित कार्य कर बैठते हैं।
इसीलिए आज बच्चों को बीपी, शूगर, मोटापा, डिप्रेशन जैसी बिमारियाँ घेरती जा रही हैं। समय रहते इस स्थिति में सुधार न किया गया तो आने वाली पीढ़ियों को इसका खामियाजा भुगतना पड़ेगा। वे शायद मशीन की तरह संवेदना शून्य बनते जा रहे हैं। ऐसी परिस्थितियाँ माता-पिता और सभ्य समाज दोनो के लिए घातक हो सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 4 अक्टूबर 2016
नामी स्कूलों का मोह
सभी माता-पिता चाहते हैं कि उनके बच्चे किसी नामी स्कूल में पढ़कर अपना जीवन संवार लें और बड़ा आदमी बन सकें। अपनी तरफ से वे हर सम्भव प्रयास भी करते हैं। स्कूल में दी जाने वाली मोटी फीस आदि का भी प्रबन्ध करते हैं। इस तथ्य को हम झुठला नहीं सकते कि पब्लिक स्कूल में पढ़ने वाले सभी बच्चे होशियार नहीं हो जाते और न ही वे योग्य बन पाते हैं।
माता-पिता पैसे के बल पर लाखों रूपयों की कैपिटेशन फीस देकर अपने बच्चों का दाखिला बड़े नामी-गिरामी स्कूलों में करवा देते हैं। यह मेरे अकेले का कथन नहीं है। समाचारपत्रों, टी वी और सोशल मीडिया पर अक्सर ऐसे समाचार आते रहते हैं। किसी-किसी स्कूल, कालेज या यूनिवर्सिटी में होने वाले ऐसे दाखिलों की अनियमिताओं का वे सब पर्दाफाश करते रहते हैं।
प्रश्न यह उठता है कि क्या नामी स्कूल में पढ़ने वाले सारे बच्चे योग्य बनते हैं? क्या उन स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे संस्कारी भी बन पाते हैं?
इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चे भी अनुत्तीर्ण होते रहते हैं। एक कक्षा में एक या दो वर्ष भी बिताते हैं। यह उन बच्चों का हाल है जिन पर माता-पिता साल भर में लाखों रुपए खर्च कर देते हैं। स्कूल की पढ़ाई के साथ ही ट्यूशन पर भी धन को व्यय करते हैं। परन्तु फिर भी बच्चों को उत्तीर्ण नहीं करवा सकते।
इन संस्थाओं में पढ़ने वाले बहुत से बच्चे राउडी होते हैं। माता-पिता की तरह वे भी दुनिया को मुट्ठी में करने या दुनिया को देख लेने वाली प्रवृत्ति रखते हैं। छुटपन से ही उनके ये विचार उन्हें सभ्य इन्सान नहीं बनने देते।
ऐसे बच्चे संस्था के नियम-कानूनों की धज्जियाँ उड़ाने से नहीं चूकते। घर से स्कूल तो वे आते हैं पर वहाँ से बंक करके या भागकर इधर-उधर घूमने, सिनेमा देखने अथवा किसी होटल में चले जाते हैं। अपनी छोटी आयु से ही शराब और सिगरेट पीने लगते हैं। होस्टलों में तो यह होता ही रहता है। बच्चों के घर से भाग जाने तक की घटनाएँ भी यदा कदा हो जाती हैं।
कालेजों में परस्पर साथियों के साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार का असर स्कूलों में भी पड़ने लगा है। वहाँ भी कुछ बच्चे दादागिरी करते हैं और उनका साथ देने वाले अन्य बच्चे भी गलत कार्य करने से बाज नहीं आते।
कुछ पैसे वालों के बच्चे झूठे अहं के कारण अपने अध्यापकों का सम्मान नहीं करते। वे समझते हैं कि हमारे सामने इनकी औकात क्या है? पर वे भूल जाते हैं कि ज्ञान प्राप्त करने के लिए वे उन्हीं पर ही निर्भर हैं। वे जरा-सी बात हो जाने पर अपने अध्यापकों की हत्या की कर देते हैं। ऐसी घटनाओं की जानकारी देने के दायित्व से मीडिया चूकता नहीं है।
आज पैसे के दम पर मनमानी करने वाले इन स्कूलों में भी बच्चे गुटबाजी करते हैं और परस्पर शत्रुता निभाते रहते हैं। मौका हाथ लगने पर उनमें भीषण लड़ाइयाँ भी होती हैं। उस समय चाकू, पिस्तौल आदि निकाल लेना मामूली बात होती है।
स्कूल में कमजोर वर्ग के बच्चों के साथ प्रायः इनका व्यवहार असन्तुलित होता है। उन्हें मारना-पीटना, गाली-गलौच करना, ताने कसना तो उनका रोज का शगल होता है। बात-बात पर उन बेचारों को अपमानित करना ये लोग अपना अधिकार समझते हैं।
ऐसे नालायक बच्चे न तो स्कूल में अध्यापकों का सम्मान करते हैं और न ही घर पर अपने माता-पिता का। घर में काम करने वालों का हर बात पर अपमानित करना अपना अधिकार समझते हैं।
यह आलेख लिखने का मेरा उद्देश्य आप सबको डराना नहीं है बल्कि मात्र इतना समझाना है कि नामी स्कूलों के पीछे भागने के स्थान पर अपने बच्चों को पढ़ने के लिए उसे वहाँ भेजिए जो आपकी जेब के अनुरूप हो। पढ़ाना तो बच्चों को स्वयं ही पड़ता है। केवल स्कूली पढ़ाई पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। अपने बच्चों को योग्य और संस्कारी बनाना चाहते हैं तो स्वयं ही जिम्मा उठाइए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 3 अक्टूबर 2016
बच्चों के भोलेपन का दुरूपयोग
अपने बच्चों की सहजता, सरलता और भोलेपन का दुरूपयोग घर के बड़ों को कदापि नहीं करना चाहिए। मेरे कथन पर टिप्पणी करते हुए आप लोग कह सकते हैं कि कोई भी अपने बच्चों का नाजायज उपयोग कैसे कर सकता है?
इस विषय में मेरा यही मानना है कि हम बड़े अपनी सुविधा के लिए अनजाने में ही बच्चों को गलत आदतें सिखाते हैं। घर में छोटे बच्चों से जासूसी जैसा घृणित कार्य बहुत से लोग करवाते हैं।
सास-बहू ने एक-दूसरे की बुराई करते हुए क्या कहा? पति-पत्नी में से किसी एक ने दूसरे साथी के विषय में क्या कहा? ननद-भाभी में से किसने और क्या चुगली की? भाई-बहन में से किसने किसे भला-बुरा कहा? इनके अतिरिक्त और भी कई विषय हो सकते हैं।
छोटे बच्चे को विश्वास में लेकर या उसे किसी खिलौने, चाकलेट, पैसे आदि की रिश्वत देकर अथवा अनावश्यक प्यार जताकर बच्चे से कुरेद-कुरेदकर अपने मतलब की बात जानने की कोशिश लोग करते हैं। इस तरह बच्चे के मन में ताक-झाँक करके छिपकर दूसरों की बातें सुनने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है।
इसी प्रकार लालच या दबाव या प्यार के ब्लैकमेल के कारण बच्चा चुगली करना सीख जाता है। इसके विपरीत उसी कारण से दूसरों की बातें छुपाने लगता है। फिर धीरे-धीरे अपनी गलतियाँ भी सबसे छुपाने महारत हासिल कर लेता है।
बच्चों को चोरी करना, दूसरे का हक छीनना भी हमीं सिखाते हैं। घर में माँ या दादी या नानी या कोई और सदस्य सबसे छुपाकर उसे खाने की या अन्य कोई चीज यह कहकर दे देते हैं कि किसी को बताना नहीं।
कभी बच्चा अपनी बात मनवाने के लिए जिद करता है या रोता है तो घर के लोग उसकी इच्छा पूरी कर देते हैं। इस तरह हठ करके या रो-धोकर वह अपनी बात मनवाने का आदि हो जाता है। यदि उसकी बात को उसके जिद करने से पहले मान लिया जाए तो कितना ही अच्छा हो जाए।
बच्चा झूठ बोलना घर से ही सीखता है। माता-पिता यदि बच्चे को कहीं नहीं ले जाना चाहते और घर छोड़कर जाना चाहते हैं तो कह देते हैं डाक्टर के पास जा रहे हैं या आफिस जा रहे हैं। बच्चा उनकी यह बात सच मान लेता है और बच्चा चुप हो जाता है।
इसके अतिरिक्त जब कोई अवांछित मित्र या सम्बन्धी घर मिलने आता है या उसका फोन आता है तो घर के सदस्य कहला देते हैं कि वे घर पर नहीं हैं। यहीं से बच्चे के झूठ बोलने की ट्रेनिंग शुरू हो जाती है, आजन्म जिसका प्रयोग वह अपने बचाव के लिए करता है।
घर के सदस्यों का व्यवहार बच्चा बहुत बारीकी से परखता है और उसके मन में सभी सदस्यों की एक छवि अंकित हो जाती है। वद देखता है कि उसके माता-पिता का अपने माता-पिता, भाई-बहनों, सम्बन्धियों, मित्रों और सहकर्मियों के साथ कैसा व्यवहार है। उसी के अनुरूप ही वह भी व्यवहार करने लगता है।
बहुधा बच्चों को हम मुँहफट कह देते हैं। पर उस समय वे सच बोल रहे होते हैं। बड़े अपनी पोल खुल जाने को सहन नहीं कर पाते और बच्चों को दोषी मानकर उन्हें प्रताड़ित करते हैं। वे भूल जाते हैं कि सब उन्हीं के बोए बीज हैं।
बच्चे बेचारे को तो पता ही नहीं होता कि वह क्या कर रहा है? हम बड़ों की साजिश ही उसे इस दलदल में धकेलने की दोषी बनती है। बड़ा होकर जब वह यह सब हरकतें करता हैं तो उसे डाँटते हैं, मारते हैं या सजा देते हैं पर अपने गिरेबान में झाँककर नहीं देखते।
घर छोटे बच्चे की पाठशाला होता है जहाँ पर वह जीवन का ककहरा पढ़ता है। वहीं पर वह अच्छाई और बुराई को देखता है, सीखता है, समझता है और फिर जो उसे सरल और सुविधाजनक मार्ग लगता है उस पर बिना परिणाम की चिन्ता किए चलने लगता है। बच्चों के समक्ष अपने व्यवहार को सन्तुलित रखें ताकि उन मासूमों को दोषी ठहराने की आवश्यकता ही न पड़े।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 2 अक्टूबर 2016
पति-पत्नी में कौन महान
स्त्री और पुरुष दोनों का अपना अलग अस्तित्व है। दोनों ही समाज के अभिन्न अंग हैं। इन दोनों में से किसी एक के बिना इस समाज की परिकल्पना नहीं की जा सकती। पति-पत्नी के रूप में ये दोनों घर, परिवार और समाज में एक अहं किरदार निभाते हैं। इन्हें एक ही सिक्के के दो पहलू कहना उपयुक्त होगा, जिन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता।
पति और पत्नी दोनों के लिए एक ही शब्द 'दम्पत्ति' का प्रयोग किया जाता है। इसका अर्थ यही निकलता है कि ये दोनों एक ही इकाई हैं, कोई अलग-अलग नहीं हैं। महाकवि कालिदास ने भगवान शिव और भगवती पार्वती की वन्दना करते हुए इसी सत्य को उद्घाटित किया था। इस विषय में उनका कथन हैं-
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थ प्रतिपत्तये।
जगत: पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ।।
अर्थात जिस प्रकार शब्द और अर्थ परस्पर मिले होते हैं, उन्हें अलग नहीं किया जा सकता। उसी प्रकार शिव और पार्वती को भी अलग नहीं किया जा सकता। शब्द और अर्थ की तरह परस्पर मिले हुए उन दोनों की मैं वन्दना करता हूँ।
इस श्लोक को यहाँ लिखने का तात्पर्य केवल यही है कि शब्द और अर्थ में से किसी एक का उच्चारण करने पर दूसरे का स्मरण स्वाभाविक ही दृष्टिपटल पर आ जाता है। इसी तरह पति-पत्नी को भी परस्पर मिल-जुलकर रहना चाहिए। उनमें टकराव की कोई गुँजाइश ही नहीं होनी चाहिए। यदि व्यवहार में वे लडाई-झगड़ा करते हैं तो यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति कहलाती है।
नारी को त्याग, समर्पण और ममता की मूर्ति कहा जाता है। पुरुष को संघर्ष का दूसरा रूप माना जाता है। दोनों में से कौन अधिक महान है, यह कहना अनुचित होगा। दोनों को सदा एक-दूसरे की आवश्यकता रहती है। इसलिए वे एक-दूसरे के पूरक कहे जाते हैं अन्यथा वे दोनों ही अधूरे रह जाते हैँ।
पति और पत्नी गृहस्थी रूपी रथ के दो पहिए माने जाते हैं। एक के खराब हो जाने पर वह रथ डगमगाने लगता है। उस समय गृहस्थी रूपी रथ को सुचारू रूप से चलाने में बहुत कठिनाई का सामना करना पड़ता है।
घर को चलाने, अतिथियों का सत्कार, सुख-दुख में सहयोग आदि सभी कार्य दोनों को मिलकर करने होते हैं। एक अकेला इन सारे कामों को दक्षतापूर्वक नहीं कर सकता। बच्चों का पालन-पोषण करने के लिए भी दोनों के परस्पर मेल-मिलाप की जरूरत होती है। एक छोटे बच्चे के सर्वांगीण विकास के लिए उसके माता और पिता दोनों की समान रूप से आवश्यकता होती है।
इसीलिए उन बच्चों का व्यवहार बहुत असन्तुलित होता है जिनके माता और पिता का आपस में टकराव होता रहता है अथवा किसी कारण से उनका अलगाव हो जाता है। वे जिसके साथ भी रहते हैं उसे परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ते।
हर बच्चे को उसकी माता और उसके पिता दोनों चाहिए होते हैं। एक के भी अपने से दूर रहने को वह पचा नहीं पाता है। अतः विचलित होकर वह उनका ध्यान आकर्षित करने के लिए अनाप-शनाप कार्य करता रहता है जिससे वे दुखी हों।
हमारा सामाजिक परिवेश इस प्रकार का है कि दोनों में यदि आपसी सामञ्जस्य न हो और किसी कारण से अलगाव हो जाए तो समाज में उन्हें सम्मान नहीं मिल पाता। उनके लिए बेचारेपन का एक भाव सबके मन में रहता है। अपने परिवार में स्थायित्व बनाए रखने वालों को ही समाज में उचित स्थान मिलता है।
जिस घर में पति और पत्नी एक-दूसरे को यथायोग्य सम्मान देते हैं समाज में उनकी सराहना होती है। इसके विपरीत आचरण करने वालों को समाज तिरस्कृत करता है।
स्त्री महान है या पुरुष महान है कहना अनुचित है। दोनों का ही अस्तित्व समाज के लिए आवश्यक है। ईश्वर ने दोनों को विशिष्ट गुणों और कार्यों के लिए इस संसार में भेजा है। इसलिए यह विवाद ही निर्मूल है। अतः व्यर्थ के पूर्वाग्रह को छोड़कर एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए। किसी को भी हेय नहीं मानना चाहिए। समाज को अपनी मानसिकता में आमूल-चूल परिवर्तन लाने की महती आवश्यकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 1 अक्टूबर 2016
ईश्वर की पूजा माँ के रूप में
परमपिता परमात्मा की उपासना हर व्यक्ति अपनी तरह से करता है। मेरा यह मानना है कि ईश्वर के किसी रूप की उपासना यदि माँ के रूप में की जाए तो अधिक उपयुक्त होगा। माँ से बढ़कर और कौन है जो सन्तान के विषय उससे अधिक भली-भाँति समझता है।
इसलिए यदि मनुष्य परमेश्वर से अपनी निकटता और घनिष्ठता को बढ़ाना चाहता है तो माँ के रूप में ही उसकी पूजा-अर्चना करनी चाहिए।
माँ अपनी सन्तान से बहुत अधिक स्नेह रखती है जिसे मापने का कोई पैमाना आज तक बना ही नहीं है। यद्यपि पिता भी बच्चे से बहुत प्यार करता है परन्तु किसी बात पर असहमत हो जाने पर वह बच्चे के साथ कठोर व्यवहार कर सकता है परन्तु माता कभी ऐसा नहीं कर पाती।
माता की कोमल भावनाएँ और सन्तान के प्रति उसका मोह उसे ऐसा नहीं करने देता। उसका भावुक हृदय सन्तान के लिए सदा पसीज जाता है और वह उसकी बड़ी-से-बड़ी गलती को भी क्षमा करके उसे अपने गले से लगा लेती है।
घर-परिवार में सभी सदस्यों के होते हुए भी बच्चा माता के सबसे अधिक करीब होता है। वह चाहता है कि उसकी माँ हमेशा उसके आसपास रहनी चाहिए। वह स्वयं चाहे दोस्तों के साथ खेलने के लिए घर से बाहर जाए, कहीं घूमने जाए अथवा विद्यालय जाए पर जब घर वापिस लौटे तो सबसे पहले उसे अपनी माँ ही दिखाई देनी चाहिए। यदि वह उसे न दिखाई दे तो वह अनमना हो जाता है, खाना भी नहीं खाएगा और किसी काम में उसका मन नहीं लगेगा।
माँ और बच्चे का सम्बन्ध ही ऐसा होता है कि माँ की अनुपस्थिति उसे बहुत खलती है। वह उसे अपनी आँखों के सामने न पाकर रोने लगता है। एक माँ भी अधिक समय तक अपने बच्चे से दूर नहीं रह सकती। यदि मजबूरी में कभी ऐसा करना पड़े तो उसका मन अपने बच्चे में ही लगा रहता है। उसकी की चिन्ता में परेशान रहती है।
माता का अपनी सन्तान से रिश्ता ही ऐसा होता है। शायद यही कारण है कि इन्सान आयु में कितना भी बड़ा हो जाए किसी भी समस्या के आने पर 'हाय माँ' ही कहता है। उसकी माता चाहे परलोक भी सिधार जाए तब भी माँ को याद करना नहीं भूलता।
बच्चे नालायक हो सकते हैं पर माता नहीं। वह उनसे अपना रिश्ता समाप्त नहीं कर सकती और न ही उनसे मुँह नहीं मोड़ सकती। इसीलिए शायद कहा है - "पुत्र कुपुत्र हो सकता है पर माता कुमाता नहीं हो सकती।"
यह विश्लेषण हमने इस भौतिक संसार की माता और उसकी सन्तान के सम्बन्ध में किया है। इस सम्पूर्ण संसार की जननी वह है जिसे हम जगज्जननी कहते हैं। यदि भौतिक माता की तरह हमारा जुड़ाव उस जगज्जननी से हो जाए तो हमारे इस जीवन की रूपरेखा ही बदल जाए।
उससे मिलने की तड़प ही हमें उसके करीब ले जा सकती है। क्योंकि वह सारे संसार की माता है, इसलिए वह स्वयं ही अपने सारे बच्चों का ध्यान रखती है। चाहे वे जलचर, नभचर, भूचर या फिर मनुष्य किसी भी रूप में हों। उसके लिए सभी जीव समान हैं। उसे यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है। ये तो हम इन्सान ही हैं जो अपने दायित्वों को ठीक से नहीं निभा पाते, कोताही बरतते रहते हैं।
उस मालिक के बच्चे हम मनुष्य यदि उसका साथ सच्चे मन से चाहते हैं तो अपनी सोच में परिवर्तन करना होगा। उस प्रभु के पास जाने के लिए अपने मानस को तैयार करना होगा। दुनिया के सारे व्यापार जब निस्पृह होकर, अपना दायित्व मानकर करेंगे, तब उनमें लिप्त नहीं होंगे और उसके प्रिय बन सकेंगे।
इस संसार में आने से पहले जीव उस मालिक से प्रार्थना करता है कि अंधेरे से मुक्ति दे दो, दुनिया में जाकर तुम्हें नहीं भूलूँगा। पर होता इसके विपरीत है। संसार की चकाचौंध में जीव खो जाता है और उसे भूल जाता है। यदि हम इस दुनिया में आने के बाद उसे उसी तड़प से याद कर सकें तो इहलोक से विदा होने के बाद मुक्ति का मार्ग सुगम हो जाएगा। तब हमारे शरीर में विद्यमान आत्मा को उस परमात्मा में लीन होने से कोई नहीं रोक सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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