मंगलवार, 6 दिसंबर 2016

साहसी बनो

साहसी और पराक्रमी लोगों को सदैव ही अपने बाहुबल पर पूर्ण विश्वास होता है। वे कभी तथाकथित तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के फेर में नहीं पड़ते। वे अपने बलबूते पर अपना स्थान समाज में स्वयं ही बना लेते हैं। किसी प्रकार के कर्मकाण्ड पर उनको भरोसा नहीं होता। वे जंगल के राजा शेर की तरह निष्कंटक अपना अस्तित्व बनाए रखने में समर्थ होते हैं।
         निम्न श्लोक में कवि ने इसी भाव को प्रकट किया है-
           नाभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते मृगैः।
           विक्रमार्जितराज्यस्य   स्वयमेव   मृगेन्द्रता॥
अर्थात वन्य जीव शेर को राजा बनाने के लिए उसका अभिषेक संस्कार नहीं करते। यानी कतिपय कर्मकांड के माध्यम से शेर का राज्याभिषेक नहीं किया जाता। वह अपने पराक्रम से स्वयं ही राजत्व को बहुत सरलता से प्राप्त कर लेता है।
        कहने का तात्पर्य है कि जंगल के राजा को अपना आधिपत्य स्थापित करने के लिए किसी प्रकार का पूजा-पाठ करने की आवश्यकता नहीं होती। न ही उसे किसी के सहारे की आवश्यकता होती है। अपने कर्मक्षेत्र में अकेले रहकर वह सब प्राप्त कर लेता है जो उसे चाहिए होता है।
           इसी प्रकार पराक्रमी व्यक्ति भी अपने जीवन में अकेले चलते हुए बहुत कुछ प्राप्त कर लेते हैं। वे 'एकला चलो रे' का ही अक्षरश: पालन करते हुए प्रतीत होते हैं। वे किसी बैसाखी के मोहताज नहीं होते।
         निम्न श्लोक में कवि का कथन है कि साहसी मनुष्य को कार्य आरम्भ करने से पहले शेर से सीखना चाहिए-
           प्रभूतं कार्यानपि वा तन्नरः कर्तुमिच्छति।
           सर्वारम्भेण  तत्कार्यं  सिंहादेकं प्रचक्षते॥
अर्थात मनुष्य जो भी बहुत से कार्य करना चाहता है उन्हें आरम्भ करने से पहले शेर से सीखना चाहिए।
        इसका अर्थ यही है कि शेर से उसके साहस, निडरता, अकेलापन, युद्ध कौशल, आधिपत्य, स्वाभिमान आदि गुणों को सीखकर आगे बढ़ना चाहिए। ऐसा करने वाला व्यक्ति अपने जीवन में निश्चित ही सफल होता है।
         मनुष्य यदि दूसरों का मुँह देखता रहेगा तो कभी कोई साहसिक कार्य कर ही नहीं सकता। हर कदम उठाने से पहले लोग उसका मनोबल गिराने का काम करते हैं। स्वयं वे अपने जीवन में कोई जोखिम उठा नहीं सकते। इसलिए वे सदा दूसरों को अनावश्यक ही निरुत्साहित करके अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं।
         यदि इन्सान फालतू के डर पाल ले तो वह घर के बाहर कदम भी नहीं निकाल सकता। फिर तो वहाँ भी उसे डरना चाहिए कि किसी वाहन से टकराकर वह घायल न हो जाए। कोई सड़क चलता आवारा पशु उस पर आक्रमण न कर दे। कोई चोर-लुटेरा उसका धन आदि न छीन ले।
        ये सब भय यदि मनुष्य पाल लेगा तो वह एक स्वस्थ इन्सान नहीं बन सकता। वह शीघ्र ही मनोरोगी बन जाएगा। इस प्रकार का व्यवहार करके वह सभी लोगों की हँसी का पात्र बन जाएगा। लोग उस पर व्यंग्य बाण चलाने से नहीं चूकते।
         बिना साहस जुटाए मनुष्य एक कदम भी आगे नहीं बढ़ा सकता। साहसी व्यक्ति ही जीवन के हर कदम पर सफल होकर कीर्तिमान स्थापित करते हैं। वही समाज में अनुकरणीय होते हैं और उदाहरण बनते हैं।
         महात्मा गान्धी की तरह जब मनुष्य अकेला ही अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने लगता है तो उसका अनुसरण करने के लिए हजारों-लाखों की भीड़ उसका मनोबल बढ़ाने के लिए उसके पीछे आकर खड़ी हो जाती है। तब फिर उसकी सफलता में कोई सन्देह नहीं रह जाता।
         प्रत्येक मनुष्य को उन लोगों का ही सदा संसर्ग करना चाहिए जो उससे उच्च मानसिकता वाले हों। उनमें शौर्य आदि गुण कूट-कूटकर भरे हों। ऐसे साहसी निस्वार्थ लोग ही दूसरों को जोखिम उठाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। शेष अपने बाहुबल और ईश्वर पर विश्वास करके मनुष्य को अपने कर्मपथ पर जंगल के राजा सिंह की भाँति निरन्तर अग्रसर होना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 5 दिसंबर 2016

अति इच्छाओं का त्याग करें

इच्छाएँ या कामनाएँ असीम हैं। इनका कोई ओर-छोर नहीं है। इनके पीछे भागते रहने से परेशानियों के अतिरिक्त और कुछ भी हासिल नहीं होता। इन अनन्त कामनाओँ का निरोध करना अति आवश्यक होता है अन्यथा मनुष्य सारा जीवन भटकता ही रहता है। इस भटकाव का कभी अन्त नहीं होता।
        इसीलिए मनीषी समझाते हैं कि सुख और शान्ति से जीना चाहते हो तो इनके पीछे भागना छोड़ दो। जब इनको वश में कर लोगे तो ये स्वयं दास की आदेश का पालन करने लगती हैं।
        कामनाओँ का पूर्णरूपेण त्याग नहीं कर सकते इसलिए उन इच्छाओं का गला नहीं घोटना चाहिए। जिनके बिना जीवन जीना ही दुश्वार हो जाता है, उनकी कामना करनी चाहिए। निम्न श्लोक में ऐसा ही भाव प्रकट किया गया है-
           अतितॄष्णा न कर्तव्या तॄष्णां नैव परित्यजेत्।
           शनै: शनैश्च भोक्तव्यं स्वयं  वित्तमुपार्जितम्।।
अर्थात अति इच्छाएँ नहीं करनी चाहिए परन्तु इच्छाओं का सर्वथा त्याग भी नहीं करना चाहिए। अपने कमाए हुए धन का धीरे-धीरे उपभोग करना चाहिए।
         इस श्लोक का यही कथन है कि अति कामनाओँ का परित्याग करना चाहिए किन्तु इच्छा का नहीं। इसे और स्पष्ट करते हैं। मनुष्य को अपने तथा अपने परिवार के अच्छे से पालन-पोषण के लिए जिन-जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है उनकी कामना करनी चाहिए। उन्हें जुटाने के लिए सार्थक प्रयास भी करना चाहिए।
     इसी बात को उदाहरण से और स्पष्ट करते हैं। अपने रहने के लिए सुन्दर-सा घर है पर और-और घर खरीदने की इच्छा करने से परेशान रहना। अच्छी-भली गाड़ी घर में लेकिन पड़ोसी की ज्यादा बड़ी गाड़ी देखकर उसे खरीदने की कामना करना। कहने का तात्पर्य यही है कि दूसरों की होड़ करते हुए उन वस्तुओं को खरीदना समझदारी नहीं है।
       पहले हमें यह तो विचार कर लेना चाहिए कि जिस वस्तु की हम चाहना कर रहे हैं उसकी हमारे लिए क्या उपादेयता है? क्या उसके बिना हमारा गुजारा नहीं हो सकता है? क्या उसे खरीदने के लिए अपने पास पर्याप्त संसाधन हैँ? कहीं ऐसा तो नहीं कि उसे घर लाकर, थोड़े समय उसे क्या हम पश्चात कबाड़ में डाल देंगे?
          ये कुछ प्रश्न हैं जिनका उत्तर हमें स्वयं ही देना होता है। जिन वस्तुओं की हमें आवश्यकता ही नहीं है उन्हें दूसरों की होड़ करते हुए अपनी सामर्थ्य न होते हुए  भी कर्ज लेकर खरीदना लेना समझदारी नहीं कहलाती। इसे ही अतितृष्णा कहा जाता है जो मनुष्य के विनाश का कारण बनती है।
        अपने कठोर परिश्रम से अर्जित धन का अपव्यय नहीं करना चाहिए। उसे सदा सम्हालकर खर्च करना चाहिए। अपने पास धन है तो सभी सहायक हैं अन्यथा कोई नहीं पूछता। धन न होने पर अपने प्रिय बन्धु-बान्धव भी निस्सहाय अवस्था में निपट अकेला छोड़कर किनारा करने में ही अपना भला समझते हैं।
         यह धन हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति तो करता ही है, साथ ही दुख-सुख आने के समय हमारी सहायता भी करता है। यदि उस समय पैसा पास न हो तो कोई मदद करने के लिए आगे नहीं आता। इसलिए अपने धन को व्यर्थ ही उड़ाने के स्थान पर उसे अपने धूप-छाँव के समय के लिए बचाकर रखना बुद्धिमानी होती है।
        यदि मनुष्य अपनी इच्छाओं को सीमित कर ले अथवा अति इच्छाओं से परहेज कर ले तो उसे बहुत-सी चिन्ताओं से मुक्ति मिल सकती है। ऐसे ही लोगों को शहन शाहों का शाह कहा है। यही भाव निम्न दोहे में कहे गए हैं-
        चाह गई  चिन्ताप   मिटी  मनुआ   बेपरवाह।
        जिनको कछु नहीं चाहिए वे साहन के साह।।
          जीवन में सुखी व प्रसन्न रहने का निस्सन्देह यही मूल मन्त्र है कि अपनी इच्छाओं को सीमित करना चाहिए। अपने खून-पसीने से कमाए धन का दुरूपयोग न करके उसे अपने लिए सुरक्षित रखना चाहिए। सर्वत्र अति से बचना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 4 दिसंबर 2016

ईश्वर पर विश्वास रखें

ईश्वर पर यदि दृढ़ विश्वास हो तो मनुष्य अपने सभी कर्मों को उसी को ही समर्पित करता है। किसी भी कर्म को करने से पहले वह उस मालिक का स्मरण करता है और उसका धन्यवाद करता है। इस तरह मनुष्य अशुभ कार्यों में फँसने से बच जाता है और परेशानियों से भी बच जाता है।
         जिस कार्य में मनुष्य को सफलता मिलती है, उसका श्रेय वह परमात्मा को ही देता है। यदि किसी कार्य में उसे हानि होती है तो उसका अपयश अपने ऊपर ले लेता है। इसलिए उसके मन मेँ कभी कर्त्तापन का अभिमान नहीं आ पाता। श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने समझाया है कि सभी कर्म ईश्वर को समर्पित कर दो।
        एक बोधकथा पर विचार करते हैं। एक आदमी रेगिस्तान में भटक गया था। उसके पास रखी हुई खाने-पीने की सामग्री भी समाप्त हो गई। अब वह पानी की एक-एक बूँद के लिए तरसने लगा। उसे ऐसा प्रतीत होने लगा था कि यदि उसे अब कहीं से पानी नहीं मिला तो उसकी मृत्यु निश्चित हो जाएगी।
         उसे ईश्वर पर दृढ़ विश्वास था कि अवश्य ही कोई चमत्कार होगा और उसे पीने के लिए पानी मिल जाएगा। अचानक ही उसे अपने सामने एक झोपड़ी दिखाई दी। मृगतृष्णा और भ्रम के कारण वह कई बार धोखा खा चुका था। उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था। उसके लिए यह आशा की अन्तिम किरण थी।
         अपनी पूरी ताकत लगाकर झोंपडी की ओर वह जाने लगा। इस बार भाग्य ने उसका साथ दिया। उसने देखा कि झोपडी वीरान पड़ी थी। शायद सालों से वहाँ कोई नहीं गया था। झोंपड़ी के अन्दर का नजारा देखकर उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
       वहाँ पर एक हैण्ड पम्प लगा हुआ था। नयी ऊर्जा से भरकर वह हैण्ड पम्प चलाने लगा। परन्तु हैण्ड पम्प सूख चुका था। निराशा ने उसे घेर लिया।
             उसे लगने लगा था कि अब उसे मरने से उसे कोई नहीं बचा सकता। उसी समय झोपड़ी की छत से बँधी हुई पानी से भरी एक बोतल उसे दिखाई दी। वह बोतल का पीने ही वाला था कि बोतल से चिपका हुआ एक कागज़ उसे दिखा जिस पर लिखा था-" इस पानी का प्रयोग हैण्ड पम्प चलाने के लिए करना तथा फिर बोतल भरकर वापिस रखना मत भूलना।"
        उस आदमी को यह समझ नहीं आ रहा था कि वह पानी पिए या हैण्ड पम्प में डालकर उसे चालू करे। कुछ विचार करके उसने बोतल का पानी पम्प में डाला और  ईश्वर से अपने जीवन के लिए प्रार्थना की। पम्प चलाने पर उसमें से अमृत की तरह ठण्डा पानी निकलने लगा।
         उसने अपनी प्यास बुझाई और फिर बोतल को पानी से भरकर छत पर टाँग दिया। जब वह ऐसा कर रहा था तभी उसे सामने काँच की एक और बोतल दिखी। उसमें रेगिस्तान से बाहर निकलने का नक्शा पड़ा हुआ था।
        पानी से भरी हुई बोतल पर चिपके कागज को उतारकर उसने लिखा- "मेरा विश्वास कीजिए, यह पम्प काम करता है।" इसके बाद वह अपनी बोतलों में पानी भर कर वहाँ से निकल आया।
           इस बोधकथा पर मनन करने से यही समझ आता है कि पानी का हमारे जीवन में बहुत मूल्य है। इसके बिना हमारा जीवन अधिक समय तक नहीं चल सकता।
         इस संसार में हम सब जो भी सुख-समृद्धि पाना चाहते हैं, पहले उसे अपनी ओर से कर्मरूपी इस हैण्ड पम्प में डालना पड़ता है। तभी अपने योगदान से कहीं अधिक मनुष्य उसे अपने जीवनकाल में वापिस पा सकता है।
        ईश्वर के प्रति मन से समर्पण करने पर ही मनुष्य पूर्णरूपेण उसका कृपापात्र बन सकता है। इस तरह अपने अहं का परित्याग करके मनुष्य जीवन के सार तत्त्व को समझकर अपना जीवन सफल बना सकता है। उसका इहलोक और परलोक दोनों ही सुधर सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 3 दिसंबर 2016

मृत्य का स्थान निश्चित

मृत्यु का समय तथा स्थान हर जीव के लिए निश्चित होता है। जीव कहीं पर भी क्यों न रहता हो, अपनी मृत्यु के निश्चित स्थान पर और निर्धारित समय पर पहुँच ही जाता है। हम देखते हैं कि रेल, बस, वायुयान आदि दुर्घटनाएँ भी यदा कदा होती रहती हैं, जहाँ अलग-अलग स्थानों पर रहने वाले अनेक लोगों की एकसाथ, एकसमय पर मृत्यु हो जाती है।
          इसी प्रकार युद्ध की स्थिति होने पर भी बहुत से लोग अपने जीवन से हाथ धो बैठते हैं। भूकम्प, बाढ़, सुनामी, महामारी आदि प्राकृतिक आपदाओं के कारण भी अचानक एकसाथ बहुत से लोग काल के गाल मे समा जाते हैं।
         कभी-कभी धार्मिक आयोजनों, मेलों या सभाओं में भगदड़ मच जाने पर भी दूर-दराज के इलाकों से आए बहुत से लोग काल कवलित हो जाते हैं। कभी-कभार आतंकी हमले भी इस दायित्व को बखूबी निभाते हैं।
         इन सभी उदाहरणों से यही सिद्ध होता है कि जिस स्थान की मिट्टी जीव ने लेनी है अर्थात जो स्थान जीव की मृत्यु के लिए ईश्वर द्वारा निर्धारित किया गया है, वहाँ पर जीव किसी भी बहाने से पहुँच जाता है। वह स्थान चाहे वहाँ से सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर दूर ही क्यों न हो।
          इसी विषय को पुष्ट करती हुई यह एक बोधकथा है। एक बार भगवान श्री विष्णु अपने वाहन गरुड़ जी पर बैठकर कैलाश पर्वत की ओर गए। गरुड़ जी को उन्होंने द्वार पर ही छोड़ दिया और स्वयं वे भगवान शिव से मिलने के लिए अन्दर चले गए। कैलाश पर्वत की अपूर्व प्राकृतिक छटा को देखकर गरुड़ जी मन्त्रमुग्ध हो गए। उसी समय उनकी नजर बहुत खूबसूरत-सी छोटी-सी चिड़िया पर जा पड़ी।
         चिड़िया के सौन्दर्य को निहारते हुए गरुड़ जी के सारे विचार उसी के चारों ओर केन्द्रित होने लगे। तभी कैलाश पर्वत पर यमदेव पधारे। वे भी भगवान शिव से मिलने के लिए अन्दर जाने लगे तो उनकी नजर उस छोटे से पक्षी पर पड़ी। उस नन्हें से पक्षी को आश्चर्यचकित होकर देखने लगे। गरुड़ जी समझ गए कि अब उस चिड़िया का अन्त निकट आ गया है। यमदेव कैलाश पर्वत से निकलते ही उसे अपने साथ यमलोक ले जाएँगे।
          गरूड़ जी को उस प्यारी-सी नन्ही चिड़िया पर दया आ गई। वे इतनी छोटी और सुंदर चिड़िया को मरता हुआ नहीं देखना चाहते थे। उन्होंने उस चिड़िया को अपने पंजों में दबा लिया और कैलाश से हजारों कोस दूर, जंगल में एक चट्टान पर छोड़ दिया। उसके बाद वे स्वयं कैलाश पर्वत पर वापिस लौट आए।
          यमदेव जब कैलाश पर्वत से बाहर जाने लगे तब गरुड़ जी ने उनसे पूछा- "यमदेव! आपने उस चिड़िया को इतनी आश्चर्यभरी नजरों से क्यों देखा था?
        यमदेव ने उत्तर दिया- "गरुड़ जब मैंने उस चिड़िया को यहाँ कैलाश पर देखा तो मुझे ज्ञात हो गया था कि कुछ ही पलों के पश्चात, यहाँ से हजारों कोस दूर एक नाग उसे खाएगा।
         मैं सोच यही रहा था कि यह चिड़िया इतनी जल्दी, इतनी दूर उड़कर कैसे पहुँच जाएगी। अब जब वह यहाँ नहीं है, तब मुझे पता चल गया है कि निश्चित ही मर चुकी होगी।"
         यमदेव की यह बात सुनकर गरुड़ जी समझ गए कि मृत्यु जब आती है तो किसी भी तरह टालने का यत्न करने पर भी नहीं टलती। मनुष्य चाहे कितनी भी चतुराई क्यों न कर ले, उसे जब आना होता है तो आ ही जाती है।
          जीवन के उपरान्त मृत्यु तथा मृत्यु के अनन्तर जीवन एक शाश्वत सत्य है। जो भी इस अटल तथ्य को समझ लेता है वह विद्वान मृत्यु का स्वागत अपनी बाहें फैलाकर करता है, उससे घबराता नहीं है। जीव अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही ईश्वर द्वारा निर्धारित समय एवं स्थान पर ही काल का ग्रास बनता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 2 दिसंबर 2016

जैसा कर्म वैसा फल

सुकर्म या दुष्कर्म जैसा भी कर्म मनुष्य इस संसार में रहते हुए करता है, परमात्मा उसे उसी के अनुरूप फल देता है। यानी कि सुकर्मों के बदले सुख, समृद्धि और शान्ति आदि देता है। दुष्कर्मों के बदले उससे उसका सब कुछ छीन लेता है।
          एक कथा आती है कि एक बार महारानी द्रौपदी प्रातःकाल स्नान करने के यमुना जी के घाट पर गई। उसी समय वहाँ विद्यमान एक साधु की ओर उसका ध्यान आकर्षित हुआ। उसके शरीर पर मात्र एक लंगोटी थी। स्नान के पश्चात साधु जब अपनी दूसरी लंगोटी लेने लगा तो अचानक ही हवा के झोंके से उड़कर वह पानी में गिर गई और बहने लगी। साधु ने जो लंगोटी उस समय पहनी हुई थी, संयोगवश वह फटी हुई थी।
         अब साधु के सामने बहुत बड़ी समस्या आ गई कि अब वह क्या पहने? अपनी लाज कैसे बचाए? थोडी ही देर में सूर्योदय होने वाला है और तब यहाँ घाट पर लोगों के आवागमन से भीड़ बढ़ जाएगी।
          परेशान साधु शीघ्रता से पानी के बाहर निकलकर पास की एक झाड़ी में छिप गया। द्रौपदी यह सारा दृश्य देख रही थी। उसे साधु की इस दीन दशा पर बहुत दुख हुआ। उसने उसकी सहायता करने का विचार किया। अपनी पहनी हुई साड़ी में से उसने आधी फाड़ी और उस साधु के पास गयी।
       वह आधी साड़ी देते हुए द्रौपदी ने उस साधु से कहा - "महात्मन! मै आपकी परेशानी बखूबी समझ रही हूँ। इस वस्त्र को आप स्वीकार कर लीजिए और अपनी इज्जत बचाकर प्रस्थान कीजिए।"
        साधु ने बहुत ही सकुचाते हुए साड़ी का वह टुकड़ा ले लिया और उसे बहुत से आशीष दिए- "जिस तरह बेटी आज तुमने मेरी लाज बचायी है, उसी प्रकार भगवान भी एक दिन तुम्हारी लाज बचाएँगे।"
        समय बीतते युधिष्ठिर के द्यूतक्रीड़ा में हार जाने पर, गुरुजनों और सभासदों से भरी सभा में जब निर्लज्ज दुश्शासन रजस्वला द्रौपदी का चीरहरण कर रहा था, उस समय द्रौपदी की करुण पुकार को महर्षि नारद ने भगवान तक पहुँचाया।
         परम न्यायकारी परमेश्वर ने कहा-  "सभी जीवों पर मेरी कृपा शुभकर्मों के बदले ही बरसती है। द्रौपदी के खाते में क्या कोई पुण्यकर्म है?"
        जाँचा परखा गया तो उस दिन साधु को दिया वस्त्र दान के हिसाब में पाया गया। जिसका ब्याज कई गुणा बढ चुका था। इसे चुकाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण द्रौपदी की सहायता करने सभा में पहुँच गए। दुश्शासन चीर खींचता चला गया और वह वस्त्र प्रभु की कृपा से बढता ही चला गया।
        कर्म करते समय मनुष्य उससे मिलने वाले परिणाम के विषय में कभी नहीं सोचता। यदि सोच ले तो अशुभ कर्म नहीं करे। कर्म करते समय उसे इस बात का नशा होता है कि वह सब कुछ देख लेगा। परन्तु ऐसा हो नहीं सकता। देखने वाला तो वह मालिक है जो हमें मूर्खता करते समय चेतावनी देता है। किन्तु हम मनुष्य उसे सुनकर अनसुना कर देते हैं। जब उन पाप कर्मों का फल भुगतना पड़ता है तब तौबा बोल जाती है।
        इस संसार में रहते हुए इन्सान यदि सुकर्म करता है तो उसका फल कई गुणा बढ़कर मिलता है। यदि वह दुष्कर्म करता है तो उसे चक्रवृद्धि ब्याज सहित उनको भोगना पड़ता है। इसीलिए मनीषी कहते हैं-
                 'कर्मगति टारे नहीं टलती'
अर्थात कर्म की गति को यदि हम टालना चाहें तो वह असम्भव है। अपने शुभाशुभ कर्मों का कड़वा या मीठा फल तो जीव को हर हालत में भोगना ही पड़ता है।
        समय रहते यदि हम सब मनुष्य चेत जाएँ तो फिर कष्टों और परेशानियों से मुक्ति मिल सकती है। अन्यथा जो जैसा चल रहा है, वह तो चलता ही रहेगा। हम अपने जीवन काल में पाप-पुण्य का यह खेल खेलते ही रहेंगे। हँसते हुए ताली बजाते रहेंगे तथा रोते हुए मालिक को अपने दोषों के कारण अनावश्यक ही कोसते रहेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 1 दिसंबर 2016

स्वाभिमान और अभिमान

स्वाभिमान और अभिमान ये दोनों मनुष्य के चरित्र को परिभाषित करते हैं। जहाँ स्वाभिमान उसके उच्च व्यक्तित्व का उदात्त अंग कहलाता है तो वहीं अभिमान उसके पतन का कारण बनता है।स्वाभिमान मनुष्य का गुण बन जाता है और अभिमान उसका अवगुण कहलाता है।
         स्वाभिमान ही प्रत्येक मनुष्य का आभूषण है। यह हर इन्सान के अंतस में विद्यमान उसका प्रिय मित्र होता है। स्वाभिमान रूपी पूँजी जिसके पास नहीं होती, वह व्यक्ति मृतप्राय होता है। उसे हर कोई रौंदता हुआ आगे बढ़ जाता है। इसी प्रकार जिस भी देश के लोगों में स्वाभिमान का भाव नहीं होता, वह राष्ट्र मृतवत होता है। उस पर कोई भी शत्रु देश आक्रमण करके, उसे सरलता से अपने अधीन कर लेता है।
         इसके विपरीत अभिमान मनुष्य का वह अवगुण है जो इंसान के बाहर छलकता है यानी सिर चढ़कर बोलता है। यह मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है। मनीषियों का कथन है कि अहंकारी कितने भी ऊँचे बोल क्यों न बोल ले उसका अन्त हमेशा बुरा ही होता है।
         मनस्वी लोगों का एकमात्र धन स्वाभिमान होता है। निम्न सूक्तियों में भी यही कहा है-
                  मानो हि महतां धनम्। तथा
                  एकमानधनो हि मनस्वीनाम्।
स्वाभिमानी लोग अपने घर में भूखे रह लेते हैं परन्तु किसी दूसरे को कानोंकान खबर नहीं लगने देते। उनके लिए स्वाभिमान का त्याग करना मृत्यु का वरण करने के समान होता है। ऐसे महानुभाव मृत्यु तुल्य कष्टों और परेशानियों को हँसते-हँसते सहन कर लेते हैं। वे अपने स्वाभिमान का सौदा कभी भी, किसी भी मूल्य पर नहीं करते।
         ऐसे स्वाभिमानियों से तो बड़े-बड़े साम्राज्य भी थर-थर काँपते हैं। वे जानते हैं कि ऐसे लोगों को अपने जीवन की परवाह तो होती नहीं है। अपने मान के लिए वे कभी भी समझौता नहीं करते। इसीलिए वे उनका सम्मान करते हैं चाहे वह अपनी इज्जत बचाने के लिए ही क्यों न करते हों।
        इनके विपरीत अहंकार में चूर लोग खुद तो डूबते ही है, अपने साथियों को भी डूबाने का अपराध करते हैं। वे इस तथ्य को भूल जाते हैं- 'घमण्डी का सिर नीचा।'
        अहंवादी व्यक्ति कभी किसी का प्रिय नहीं बन सकता। उसका स्वयं को सबसे विशेष मानना ही इसका प्रमुख कारण है। इसलिए वह सबके साथ मिल-जुलकर नहीं रह सकता। हर व्यक्ति उसे अपने स्टैण्डर्ड का नहीं लगता। तभी उसे हर इन्सान में कमियाँ ही दिखाई देती हैं। वह सर्वत्र स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की फिराक में लगा रहता है।
        अपने इस अहं के कारण वह ईश्वर को भी कुछ नहीं समझते। हिरण्यकश्यप जैसे अहंकारी स्वयं को ही भगवान कहलवाने लगते हैं। अतः जो उनकी सत्ता को चुनौती देने का दुस्साहस करता है, उसे वे समूल नष्ट कर देते हैं। चाहे वह प्रहलाद जैसा उनका अपना प्रिय दुलारा बेटा ही क्यों न हो।
         कहने का तात्पर्य यह है कि यदि कोई छोटा बच्चा अपने भोलेपन के कारण यदि दूसरों के समक्ष अपने अहं का प्रदर्शन कर बैठता है तो लोग उसे बच्चे की मूर्खता कहकर क्षमा कर सकते हैं परन्तु बड़ों की गर्वोक्तियों को तो किसी भी शर्त पर माफ नहीं किया जा सकता।
        स्वाभिमानी और अहंकारी दोनों ही प्रकार के लोगों की कहानियाँ इतिहास के पन्नों मे कैद हैं। बस उन्हें खोजकर पढ़ने की आवश्यकता है।
         स्वाभिमान और अहंकार दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। स्वाभिमानपूर्वक जीवन व्यतीत करना दुधारी तलवार पर चलने के समान होता है। जहाँ जरा-सी चूक हुई वहीं लहूलुहान हो जाने का डर बना रहता हैं।
        दुनिया तो बस ऐसे ही अवसर की तलाश में रहती है, जब दूसरों का उपहास कर सके। उन पर तीक्ष्ण व्यंग्य बाणों से प्रहार कर सके। अतः अपने मिथ्या अभिमान का त्याग करके स्वाभिमान को बनाए रखना चाहिए और उसकी यथासम्भव सुरक्षा करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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