अपने जीवनकाल में हर मनुष्य को सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि द्वन्द्वों को सहन करना ही पड़ता है। ये सब चक्र के अरों की भाँति ऊपर-नीचे होती रहते हैं। इस क्रम को मनीषी 'चक्रनेमि क्रमेण' कहते हैं -
नीचैरुपरि गच्छति दशा चक्रनेमिक्रमेण।
अर्थात जैसे पहिए के अरे ऊपर नीचे घूमते रहते हैं उसी प्रकार मनुष्य के जीवन में सुख-दुख भी आते रहते हैं।
इसलिए मनुष्य को कभी भी घबराना नहीं चाहिए। अपने विवेक पर पूर्ण विश्वास रखते हुए, उनसे जूझते हुए अपनी विपरीत स्थितियों से बाहर निकलने का हर सम्भव प्रयास करना चाहिए। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, वे भी जब मनुष्यरूप में पृथ्वी पर आते हैं तो उन्हें इन द्वन्द्वों को सहन करना पड़ता है। यह सत्य है कोई भी जीव इस कालचक्र से बच नहीं सकता।
इसके लिए न तो उसकी मर्जी पूछी जाती है और न ही उसे सूचित किया जाता है। अचानक ही समक्ष आकर ये मनुष्य के जीवन में उथल-पुथल मचा देते हैं। उसकी हालत को बद से बदत्तर बना देते हैं। वह बस अपनी इस बेबसी पर कसमसाता रह जाता है और इससे बाहर निकलने के उपाय खोजता रहता है। अपने इस उद्देश्य में कभी वह सफल हो जाता है तो कभी असफल हो जाता है।
ऐसी स्थिति जब मनुष्य के जीवन में आती है तब उसके अपने सभी बन्धु-बान्धव उसका साथ छोड़कर उससे किनारा कर लेते हैं। कहा जाता है कि उस समय मनुष्य की अपनी परछाई भी उसका साथ नहीं निभाती। वह अलग-थलग पड़ जाता है अपने कष्ट के समय को व्यतीत करने के लिए। उसे सलाह देने या कोसने के लिए तो बहुत से लोग आ जाते हैं परन्तु उसका साथ निभाने अथवा सान्त्वना देने के लिए कोई आगे नहीं आता।
सूर्य अपने उदयकाल एवं अस्तकाल में एक ही स्थिति में रहता है अर्थात वह लाल रंग का होता है। सूर्य का उदाहरण देते हुए किसी कवि ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में हमें समझाते हुए कहा है-
उदये सविता रक्तो रक्तश्चास्तमये तथा।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता॥
अर्थात सूर्य उदय होते समय लाल होता है और अस्त होते समय भी लाल होता है। उसी प्रकार महापुरुष सुख और दुःख में एक समान रहते हैं।
कहने का तात्पर्य यह है कि जिस प्रकार सूर्य दोनों स्थितियों में एक समान रहता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी हर अवस्था के लिए तैयार रहना चाहिए और उस समय को धैर्यपूर्वक व्यतीत हो जाने देना चाहिए।
'महापुरुष' शब्द का प्रयोग इस श्लोक में इसलिए किया गया है। उनका अपना जीवन सन्तुलित और संयमी होता है। वे सुखद और दुखद किसी भी परिस्थिति में अपना आपा नहीं खोते और न ही विचलित होते हैं। वे सब स्थितियों को एक समान मानते हैं। अतः न हर्षित होते हैं और न ही व्यथित होते हैं। वास्तव में यह उनकी चरित्रगत विशेषता कहलाती है।
हर व्यक्ति को इन विपरीत स्थितियों के लिए स्वयं को सदा ही तैयार रखना चाहिए। अपनी धूप-छाँव के समय के लिए कुछ बचत भी कर लेनी चाहिए अन्यथा उसे दूसरों पर आश्रित होकर अपमान के घूँट पीने पड़ जाते हैं।
ऐसा नहीं है कि किन्हीं लोगों को जीवन में सदा सुख मिलते हैं तो किन्हीं को सदा दुख मिलते हैं। ये सब मनुष्य को अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उसके जीवनकाल में आते हैं। जो लोग इन दुखों की भट्टी में तपकर कुन्दन की तरह निखर बाहर आते हैं, वही वास्तव में इस संसार में महापुरुष बन जाते हैं।
इनके विपरीत जो लोग कठिनाइयों से बचने के लिए घबराकर कुमार्गगामी हो जाते हैं वे समाज और न्याय के शत्रु बनकर सजा काटते हैं। वे लोग घर-परिवार व बन्धु-बान्धवों के लिए अपमान का कारण बनते है।
मनुष्य को हर कदम फूँक-फूँककर सावधानीपूर्वक रखना चाहिए। अपने कर्त्तव्यों पूरा करते रहना चाहिए। शुभ से और अधिक शुभ की ओर अग्रसर होना चाहिए। तभी उसका इहलोक और परलोक दोनों संवर जाते हैं अन्यथा मानवजीवन प्राप्त करके भी उसका उद्धार नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 6 फ़रवरी 2017
हर स्थिति में एकसमान
रविवार, 5 फ़रवरी 2017
उड़ान भरते बच्चों को अपनों का मोह
पक्षियों के बच्चों की भाँति जब बच्चे लम्बी उड़ान भरकर दूर परदेश में चले जाते हैं तो उनके मन का कोई कोना रीता रह जाता है। अपनी मातृभूमि और जन्मदाता माता-पिता की याद उन्हें सदा सताती रहती है। अपनी नौकरी, व्यवसाय अथवा शिक्षाग्रहण आदि की विवशताओं के कारण इतनी दूरी को पाट पाना उनके वश में नहीं रह जाता।
इसीलिए रामायणकाल में सुवर्णमयी लंका के राजा दशानन को पराजित करके भी भगवान श्रीराम ने उनके छोटे भाई विभीषण को राज्य सौंपते हुए अपने अनुज लक्ष्मण से कहा था-
न मे सुवर्णमयी लंकाSपि रोचते लक्ष्मण।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी॥
अर्थात हे लक्ष्मण! मुझे स्वर्णिम लंका भी रुचिकर नहीं लगती। अपनी मातृभूमि और अपनी माता दोनों स्वर्ग से भी महान हैं, यानी दोनों की बराबरी कोई नहीं कर सकता।
नौकरी, शिक्षा आदि की विवशता या अन्न-जल के कारण या भाग्य इनमें से परदेश जाने का कोई भी कारण हो सकता है। नौकरी अथवा व्यवसाय की विवशता होती है जब वे अपनों के सुख और दुख में शिरकत नहीं कर सकते। उस समय उनका चंचल मन गम्भीर होकर उन्हें कचोटता रहता है।
वे उड़कर अपने बन्धु-बान्धवों के पास आकर उनका और अपना सुख-दुख साझा करना चाहते हैँ परन्तु कभी छुट्टी न मिलने और कभी समय की कमी अथवा कभी धन की कमी आड़े आ जाती है। इस तरह की कोई भी मजबूरी उनका रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है और वे बेचारे बस अपना मन मसोसकर रह जाते हैं।
विदेश में रहते हुए अपने देश की मिट्टी, अपनी मातृभूमि उन्हें बार-बार पुकारती है। इसीलिए उनके मन में भी यही भाव आता है कि किसी भी बहाने अपने देश जा सकें। वास्तविकता यही है कि अपने देश, अपना वेश और अपनी संस्कृति से हर व्यक्ति को प्यार होना चाहिए। जिसे इन सबसे प्यार नहीं है, वह इन्सान कहलाने के योग्य नहीं है।
अपने जन्मजात सस्कारों को वे अपने इस जीवनकाल में छोड़ नहीं पाते। उस देश की संस्कृति को चाहकर भी अपना नहीं पाते। चाहे उन्हें उस देश की नागरिकता भी क्यों न मिल जाए किन्तु अपनी जड़ों का मोह, किसी भी हालत में उससे उनका अपनापा नहीं टूट सकता।
जब भी कहीं कोई चर्चा होती है तो वे बड़े स्वाभिमान से स्वयं को अपने उसी देश का नागरिक ही बताते हैं, जिसकी गोद में लोटकर बड़े हुए होते हैं। जिस देश में रहते हैं, उसकी नागरिकता लेने के बावजूद भी वे आजन्म अपने मूल देश के नाम से ही जाने जाते हैं। वही उनकी वास्तविक पहचान होती है।
इसी प्रकार अपने देश के ही अन्य प्रदेशों में रहने वाले बच्चों की भी कमोबेश यही स्थिति होती है। जब जब भी उनकी आवश्यकता उनके अपने बन्धु-बान्धवों को होती है उस समय अवकाश न मिल पाने के कारण वे सबको निराश कर देते हैं। साथ-ही-साथ स्वयं भी निस्सन्देह आहत हो जाते हैं।
यह उन लोगों की मजबूरी ही होती है कि वे अपने देश में रहते हुए भी अपनों के प्यार से दूर अकेले जीवन जीने के लिए विवश होते हैं। चाहकर भी दुख-सुख में सम्मिलित नहीं हो सकते।
आज मँहगाई के कारण दोनों पति और पत्नी को कार्य करना पड़ता है। घर से दूर रहते हुए फोन के माध्यम से चाहे बच्चे अपने घर-परिवार से जुड़े रहते हैं किन्तु अपने वृद्ध होते हुए माता-पिता की चिन्ता से वे मुक्त नहीं हो पाते। उनका ध्यान घर की ओर ही लगा रहता है।
कुछ समय के लिए मेहमान की तरह आने वाले बच्चों और उनके माता-पिता का मन भले ही न भर सके पर उन्हें जाना तो पड़ता ही है। ये दूरियाँ चाहे समय अथवा मजबूरियों की भले ही हों पर मनों की दूरियाँ किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए। इसका सभी को ध्यान रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 4 फ़रवरी 2017
भोगा न भुक्ता
सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य इस संसार में आने के उपरान्त सोचता है कि वह सदा के लिए यहाँ रहेगा। उसकी सत्ता को कोई भी चुनौती नहीं दे सकता। यदि कोई ऐसा दुस्साहस करने की चेष्टा करता है तो उसे बरबाद करने में वह अपनी ओर से कोई कसर नहीं रखना चाहता।
वह अपने अन्तस में उठने वाली सभी कामनाओँ को पूर्ण करके, उनका सुख भोगना चाहता है। उसके लिए किसी भी हद से गुजर जाता है। अपने ऊपर यदि वह नियन्त्रण रख सके तो बहुत से अपराध करने से बच सकता है।
राजा भ्रतृहरि इन विषय भोगों के प्रति, अपनी असीम इच्छाओं के न समाप्त कर पाने को लेकर समझाते हुए कहते हैं-
भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ता।
तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः॥
कालो न यातो वयमेव याता।
तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥
अर्थात हमने भोग नहीं भोग रहे बल्कि भोग हमें भोग रहे हैं। हम तपस्या से नहीं तप रहे परन्तु दु:खों के ताप से संतप्त हो गए हैं। समय व्यतीत नहीं हो रहा पर हम स्वयं ही जीवन की बाजी हारते जा रहे हैं। हमारी तृष्णाएँ किञ्चित भी बूढ़ी नहीं हुई हैं अपितु हम ही तृष्णा के वशीभूत होकर वृद्ध होते जा रहे हैं।
इस विषय में एक कथा आती है कि इक्ष्वाकु वंश के राजा नहुष के छः पुत्रों में से सबसे बड़े याति राजकाज आदि से विरक्त रहते थे। इसलिए राजा नहुष ने अपने द्वितीय पुत्र ययाति का राज्यभिषेक करवा दिया। ययाति का विवाह शुक्राचार्य की पुत्री देवयानी के साथ हुआ।
ययाति की दो पत्नियाँ थीं। शर्मिष्ठा के तीन और देवयानी के दो पुत्र थे। अपनी आयु भोगने के उपरान्त भी ययाति का मन विषय भोगों में ही लगा रहता था। वे वृद्ध नहीं होना चाहते थे। इसके उपाय स्वरूप उन्होंने अपनी वृद्धावस्था अपने पुत्रों को देकर उनका यौवन प्राप्त करना चाहा। पुरू को छोड़कर और कोई अन्य पुत्र इस पर सहमत नहीं हुआ। पुत्रों में पुरू सबसे छोटा था। पिता ने इसी को ही अपने राज्य का उत्तराधिकारी बनाया और स्वयं एक सहस्र वर्ष तक युवा रहकर शारीरिक सुख भोगते रहे।
तदनन्तर पुरू को बुलाकर ययाति ने कहा- 'इतने दिनों तक सुख भोगने पर भी मुझे तृप्ति नहीं हुई। तुम अपना यौवन वापिस ले लो, मैं अब वानप्रस्थी बनकर तपस्या करूँगा।'
महाभारत के आदिपर्व में बताया गया है कि घोर तपस्या करने के पश्चात ययाति स्वर्ग पहुँच तो गए परन्तु स्वर्ग के राजा इन्द्र के श्राप के कारण स्वर्ग से भ्रष्ट हो गए। अन्तरिक्ष से पृथ्वी पर लौटते समय इन्हें अपने दौहित्र अष्ट, शिवि आदि मिले। इनकी कठिनाई को समझते हुए उन्होंने अपने अपने पुण्य के बल से इन्हें फिर स्वर्ग में वापिस भेज दिया। अन्तत: इन सबकी सहायता से राजा ययाति को अपने जीवन से मुक्ति मिली।
इस कथा से यही सिद्ध होता है कि विषय-भोगों में मदान्ध हुए ययाति जैसे स्वार्थी राजा को यह भी होश नहीं रहा कि जिस पुत्र की युवावस्था को वह ले रहा है, उसने तो अभी दुनिया भी नहीं देखी है। विषयभोगों और स्वार्थ में अन्धा होकर मनुष्य कोई भी अनर्थ कर सकता है।
ऐष्णाएँ मनुष्य को सदा ही लुभावने आकर्षण देकर नाच नचाती रहती हैं। मनुष्य भी इनके जाल में फँसकर जाने-अनजाने अपना जीवन नरक बना लेता है। यदि मनुष्य इन काम-वासनाओं पर लगाम लगा सके, संयम कर सके तो उनको अपने ऊपर हावी नहीं होने दे सकता है। इस तरह करने से उसका जीवन सुनियोजित ढंग से चल सकता है।
इन पर नियन्त्रण करने के लिए शास्त्र और मनीषी हम मनुष्यों को जगाने का कार्य करते रहते हैं। इन भोगों पर विजय प्राप्त करके ही मनुष्य अपना इहलोक और परलोक दोनों सुधार सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2017
ईश्वर की पूजा किस रूप में
ईश्वर साकार है या निराकार यह सदा से ही विवाद का कारण रहा है। कुछ लोग निराकार की उपासना करते हैं और कुछ लोग साकार की आराधना करते हैं। दोनों ही प्रकार के साधक अपने-अपने पक्ष में बहुत-सी दलीलें देते हैं।
वास्तव में ईश्वर का कोई स्वरूप नहीं है। वह एक ऐसा प्रकाश पुञ्ज है जिसका दर्शन करना असम्भव तो नहीं परन्तु बहुत ही कठिन है। इन चर्म चक्षुओं से उसका दर्शन नहीं किया जा सकता। मानव मन सदैव यहाँ वहाँ भटकता रहता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे हमारे आन्तरिक शत्रु हमारे जीवन पर इतने अधिक हावी हो जाते हैं कि वे उस स्थिति तक हमें पहुँचने ही नहीं देते।
कभी काम रूपी विशाल शत्रु मनुष्य को डस लेता है तो कभी क्रोध उसे पल-पल विवेकशून्य बना देता है । इसी तरह कभी लोभ रूपी शत्रु इतना जकड़ लेता है कि मनुष्य को पथभ्रष्ट कर देता है तो कभी मोह रूपी रूपी दानव मुँह बाए निगलने के लिए तैयार बैठा रहता है। शत्रु अहंकार उसका सर्वस्व हरण करने के लिए उसे उकसाता रहता है।
इन पाँचों शत्रुओं के मकड़जाल में छटपटाता हुआ मनुष्य प्रभु दर्शन से दिन-प्रतिदिन दूर और अधिक दूर होता जाता है। इसलिए यह डगर बहुत कठिन मानी जाती है।
बहुत से लोग ईश्वर की आराधना करने के लिए सरल मार्ग का चयन करते हैं। वे उसकी साकार रूप में अर्चना करते हैं। ईश्वर को साकार मानने के लिए वे उसे प्रायः मानवीय रूप देते हैं। वे उसका श्रृँगार करते हैं, भोग लगाते हैं यानी उनकी भक्ति नवधा कहलाती है।
रुपरहित, गन्धरहित, सर्वव्यापक होने के कारण ईश्वर निराकार है। ईश्वर की सर्वव्यापकता भी उसके निराकार होने में होती हैं क्योंकि सर्वव्यापक को हम किसी तरह से बाँध नहीं सकते।
यदि बहस करने की बात हो तो कह सकते हैं कि ईश्वर की मूर्ति बनाकर पूजा करने लगें तब उस सर्वव्यापक को एक पत्थर में या मूर्ति में विचार करके उसकी व्यापकता को बाधित कर देते हैं।
वास्तव में किसी भी रूप मे ईश्वर की उपासना मन को स्थिर करने और उसे पाने के लिए की जाती है। परमेश्वर की उपासना करने का उद्देश्य है चौरासी लाख योनियों के चक्र से और जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होकर, जीवन के परम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति करना।
हमारे ग्रन्थ और मनीषी मानते हैं कि परमात्मा अपने हृदय में ही मिलता है। दूसरे शब्दों में हृदय से ईश्वर की उपासना करनी चाहिए। जब मनुष्य ध्यान में बैठते हैं तो परमात्मा के गुणों का चिन्तन हृदय से करते हैं। जब परमात्मा का चिन्तन हृदय से यानी भावना से किया जाता हैं तो परमात्मा का दर्शन अपने हृदय में ही होता है।
ईश्वर जंगलों में भटकने, तीर्थस्थानों पर टक्करे मारने, तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के जाल में फँसने अथवा तथाकथित गुरुओं की चौखट पर माथा रगड़ने से कभी नहीं मिलता। वह तो मनुष्य के शुद्ध, पवित्र हुए हृदय में मिलता है।
सभी धर्म चाहे किसी भी रुप में उस मालिक तक पहुँचने का कोई मार्ग सुझाएँ, अन्ततः एक ही मार्ग शेष बचता है। हर किसी धर्मावलम्बी को ईश्वर प्रकाश के रूप में ही मिलता है। उसके लिए स्वय को तैयार करना होता है। उसे प्राप्त करने की जब तक सच्ची लगन या तड़प मन में नहीं होगी, तब तक वह हमारी पहुँच से बहुत दूर रहता है।
परमात्मा की पूजा-अर्चना करने का प्रदर्शन करने से वह नहीं मिल सकता। जिस तरह भौतिक सांसारिक वस्तुओं को पाने की तड़प होने पर हम उन्हें पाने में सफल हो जाते हैं। उसी प्रकार उस मालिक को पाने की लगन भी अवश्य ही सफलता देगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 2 फ़रवरी 2017
भाग्य से सब मिलता है
प्रत्येक मनुष्य को उसके प्रारब्ध या भाग्य के अनुसार ही इस जीवन में सुख-दुख या समृद्धि सब मिलते हैं, न उससे अधिक और न उससे कम। उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही उसका भाग्य बनता है। उसके घर में किसके भाग्य से धन-दौलत आती है, यह किसी को भी पता नहीं चलता। पर मनुष्य व्यर्थ ही अहंकार करता है।
वह सोचता है कि उसने अथक परिश्रम करके सब साधन जुटाए हैं। उसने धन कमाया है इसलिए उस सब पर केवल उसी का ही अधिकार है। परन्तु उसे इस बात का तनिक भी भान नहीं होता कि वह किसके भाग्य से खा और कमा रहा है ।
एक बोधकथा है कि एक आदमी ने नारदमुनि जी से पूछा- "प्रभु! मेरे भाग्य में कितना धन कमाना लिखा है?"
नारदमुनि ने कहा कि भगवान विष्णु से पूछ कर कल बताऊँगा। अगले दिन उन्होंने उसे बताया कि एक रुपया प्रतिदिन कमाना उसके भाग्य में लिखा है। आदमी बहुत खुश रहने लगा क्योंकि उसकी सारी जरूरतें एक रुपए में पूरी हो जाती थीं। उसके सादे जीवन और प्रसन्न स्वभाव से प्रभावित होकर एक दिन उसके मित्र ने अपनी बहन की शादी का प्रस्ताव उसके समक्ष रखा।
उसने बताया कि उसकी कमाई एक रुपया रोज है। इस बात को ध्यान में रखते हुए ही तुम्हारी बहन को गुजर-बसर करनी पड़ेगी। मित्र ने उस रिश्ते को अपनी मंजूरी दे दी।
अगले दिन से उस आदमी की कमाई ग्यारह रुपए हो गई। उसने नारदमुनि से पूछा- "उसके भाग्य में एक रुपया लिखा है तो ग्यारह रुपए उसे कैसे मिल रहे हैँ?"
नारदमुनि ने उससे पूछा - "उसका किसी से रिश्ता या सगाई हुई है क्या?"
उसके हाँ कहने उन्होंने बताया- "उसे वे दस रुपए उसके जीवनसाथी के भाग्य से मिल रहे हैँ। इसे जोड़ना शुरू कर दो, ये धन विवाह में काम आएगा।"
समयानुसार उसकी पत्नी गर्भवती हुई तो उसकी कमाई इक्कतीस रूपये होने लगी। तब नारदमुनि ने उसे बताया कि अब उसके बच्चे के भाग्य से उसे बीस रुपए अधिक मिलने लगे हैँ।
यह बोधकथा हमें समझा रही है कि घर में जितने भी प्राणी रहते हैं, उन सबका भाग्य जब मिलता रहता है तो उसी के अनुसार ही मनुष्य को अधिक-अधिक सब ऐश्वर्य मिलता रहता है। एक-एक सदस्य के घर-परिवार में आते रहने से मनुष्य के भाग्य का सितारा बुलन्द होता रहता है। सबके सम्मिलित भाग्य से ही वह सफलता के सोपानों को छूता हुआ दिन दोगुनी और रात चौगुनी तरक्की करता जाता है।
इसके विपरीत यदि घर में आने वाले किसी सदस्य का दुर्भाग्य हो तो चलता हुआ व्यवसाय बरबाद हो जाता है अथवा मनुष्य की नौकरी चली जाती है। वह कर्जे में डूब जाता है। घर में बीमारी पीछा नहीं छोड़ती। इस तरह मनुष्य को दुखों की चौतरफा मार को झेलना पड़ता है। उस समय मेहनत से कमाया हुआ धन कुछ भी काम नहीं आता।
इस प्रकार घर में आने वाले सदस्यों का भाग्य भी निर्णायक की भूमिका निभाता है। सभी का सामूहिक भाग्य ही घर का भाग्य विधाता बनता है। उसी के अनुसार मनुष्य को सुख-समृद्धि और सफलता मिलती है अथवा जीवन में निराशा मिलती है और उसे हार का सामना करना पड़ता है।
इस विवेचना का यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि मनुष्य हाथ पर हाथ रखकर निठ्ठला बैठ जाए। वह बस यही सोचता रहे कि जब भाग्य से ही सब मिलना है तो मेहनत क्यों करूँ?
मनुष्य यदि मेहनत नहीं करेगा तो सफलता के लिए आने वाले अवसर को वह पहचान नहीं पाएगा। इस तरह वह अपने उस स्वर्णिम अवसर को खोकर लाचार बना रहेगा। इसे किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता।
कर्मठ व कर्मशील मनुष्य भाग्य के भरोसे न बैठकर अपने रास्ते स्वयं बनाते हैं। वे अपने अथक परिश्रम और प्रयत्नों से अन्ततः विजयी बनते हैं। दुखों व परेशानियों की अग्नि में तपकर कुन्दन की तरह चमकते हुए दिखाई देते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 1 फ़रवरी 2017
माता-पिता वृक्ष की तरह
हमारे माता-पिता परोपकारी महान वृक्ष की तरह होते हैं जो अपने बच्चों को अपना सर्वस्व सौंप देते हैं। जब बच्चे छोटे होते हैं तब उनके साथ उन्हें खेलना अच्छा लगता था। बच्चे उनके साथ रूठते हैं, जिद करते हैं और नई नई माँगे रखते हैं तो उन्हें पूरा करके वे गौरवान्वित होते हैं। वे भी उनकी सारी कामनाओँ को खुशी-खुशी पूरा करके सन्तुष्टी का अनुभव करते हैं।
जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते जाते हैं तब योग्य बनकर अपना व्यवसाय अथवा नौकरी करने लगते हैं तब उनके पास अपने माता-पिता के लिए समय का अभाव होने लगता है। उस समय वे अपने माता-पिता से दूर होने लगते हैं। उनके पास तभी आते हैं जब किसी समस्या में घिर जाते हैं या किसी जरूरत के कारण कोई माँग लेकर आते हैं।
जिस तरह लोग पेड़ों के उपर चढ़ते हैं, मीठे फल खाते हैं, खेलते हैं और थक जाने पर उसकी छाया में बैठकर गर्मी की तपन से राहत पाकर वहीं छाया में सो जाते हैं। उसके मीठे फल खाकर उदर की पूर्ति करते हैं। इन पेड़ों के साथ हमारा एक अनोखा रिश्ता बन जाता है। पेड़ भी लोगों के न आने पर अकेले हो जाते हैं तो उदास हो जाते हैं, उन्हें याद करके रोते हैं।
लोग उन वृक्षों की लकड़ी को काटकर अपने घरों की खिड़कियाँ-दरवाजे बनाते हैं और फर्नीचर बनाते हैं। लकड़ी की खूबसूरत चीजों से घर की सजावट करते हैं। पेड़ का सर्वस्व हरण करके उसे ठूँठ बनाकर ही दम लेते हैं।
इसी प्रकार कई माता-पिता भी अपना सब कुछ बच्चों को देने के कारण पेड़ की तरह बंजर हो जाते हैं। यानी धनाभाव के कारण असहाय अवस्था में जीने के लिए विवश हो जाते हैं। वे निराश होकर अपने बच्चों की राह देखते रहते है जो पलटकर उनकी ओर देखते तक नही। फिर भी वे अपने बच्चों के लौटने उम्मीद नहीं छोड़ते।
सभी माता-पिता चाहते हैं कि बच्चे उनके पास आएँ और आकर उनसे लिपट जाएँ, उनके गले लग जाये। बचपन की तरह उनसे रूठे, जिद करे। सौभाग्य से यदि ऐसा अवसर उनके जीवन में आ जाए तो वृद्धावस्था में भी उनका जीवन फिर से अंकुरित हो जाता है। निस्सन्देह पुनः एक बार उनका जीवन खुशियों से लबालब भर जाता है।
एक दिन जब वे बच्चे स्वयं को वृद्ध हुआ देखते हैं तब उन्हें माता-पिता की याद आने लगती है। तब वे अपने माता-पिता की समस्याओं को अच्छे से समझने लगते हैं। जब उनके बच्चे उनके साथ भी वैसा ही व्यवहार करने लगते हैं तो उन्हें पश्चाताप होता है। उस समय उनके कन्धों पर हाथ रखकर सान्त्वना देने वाले हाथ इस संसार से विदा ले चुके होते हैं। तब वे उनके चरणों में बैठकर क्षमा याचना करने का अधिकार खो चुके होते हैं।
उस समय बार-बार उनके मन में यह विचार आता है कि काश समय रहते हुए उन्होंने अपने वृद्ध माता-पिता की उन समस्याओं को समझ लिया होता। काश अब वे उनकी गोद में सिर रखकर सो पाते, उनके साथ जी भरके खेल सकते, उनसे रूठने और मानने का खेल खेल सकते। जिससे वे जी उठते और आनन्द से अपनी वृद्धावस्था का समय बिता पाते।
यह अहसास यदि बच्चों को अपने माता-पिता के जीवनकाल में आ जाए तो उन्हें दरबदर की ठोकरें न खानी पड़ें। उन्हें कभी दो जून की रोटी के लिए तरसना न पड़े। अपने शरीर से लाचार होकर दवा के लिए भटकना न पड़े। न ही उन्हें अपने परिवार के रहते ओल्ड होम की शरण लेने के लिए विवश होना पड़े।
सभी माता-पिता अपने बच्चों में श्रवण कुमार जैसे बुढ़ापे की लाठी बनने वाले गुण देखना चाहते हैं। पर इसके लिए उन्हें अपने बच्चों के समक्ष उदाहरण बनना होगा। तभी बच्चों में ऐसे गुण स्वभावत: आ जाते हैं। इसलिए सभी सुधी जनों को अपने जीवन में हर कदम सावधानी पूर्वक फूँक-फूँककर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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