सृष्टि के आदि से लेकर अद्य पर्यन्त हर विचारशील मनुष्य के मन में कुछ प्रश्न अपना फन उठाए उसे सदा ही उद्वेलित करते रहते हैं। बादलों की भाँति हृदय में उमड़ते-घुमड़ते इन प्रश्नों के उत्तर जानने का वह भरसक प्रयास करता है, परन्तु फिर भी अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाता। इसलिए वह सदा यहाँ वहाँ भटकता रहता है और तथाकथित ढोंगियों और शठों के चंगुल में फँसकर परेशान होता है।
जो प्रश्न मनुष्य को सदैव उद्वेलित करते रहते हैं और उसका जीवन मुहाल कर देते हैँ, वे हैं- इस मानव जीवन का उद्देश्य क्या है? जन्म और मरण के बन्धनों से कौन मुक्त हो सकता है? दुनिया में नश्वर कौन कहलाता है और किसे हम अनश्वर कह सकते हैं?
इन प्रश्नों के उत्तर ढूँढ पाना कोई बच्चों का खेल नहीं है। इसके लिए बहुत कठोर साधना की आवश्यकता होती है। अपने महान ग्रन्थों के अनुशीलन और मनन की महती आवश्यकता होती है। ईश्वर की अनुकम्पा जिस मनुष्य पर हो जाए, वही सौभाग्यशाली इस सत्य की खोज के मार्ग पर अग्रसर हो सकता है। इस सत्य को ऋषि और मनस्वी जन आयुपर्यन्त खोजते रहते हैं, तब कहीं जाकर वे इस सत्य का अनुसन्धान करके उसे उद्घाटित करने में सफल हो पाते हैं।
जीवन का उद्देश्य वही चेतन मनुष्य जान सकता है, जो जन्म और मरण के बन्धनों से मुक्त हो जाता है। इस रहस्य को जानना ही मोक्ष कहलाता है। जिस मनुष्य ने स्वयं को और स्वयं मे विद्यमान आत्मा के गूढ़ रहस्य को भली-भाँति समझ लिया, वही जन्म और मरण के बन्धनों से मुक्त हो सकता है।
जिस मनुष्य ने अपने अंतस में विद्यमान आत्मा और तत्सम्बन्धित ज्ञान को आत्मसात कर लिया उसके लिए इस ब्रह्माण्ड में कुछ और जानना शेष नहीं रह जाता। ऐसा व्यक्ति ही जन्म-मरण और चौरासी लाख योनियों के बन्धनों से मुक्त होकर, बहुत कठिनता से प्राप्त हो सकने वाले मोक्ष का अधिकारी बन जाता है।
जिसका भी जन्म होता है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। कोई भी जीव यहाँ स्थायी रूप से निवास नहीं कर सकता। इसीलिए इस मृत्युलोक को हमारे ग्रन्थ और मनीषी मरणधर्मा कहते हैं। अतः सभी जीव नश्वर कहलाते हैं। केवल ईश्वर ही अनश्वर है क्योंकि वह जन्म और मरण के बन्धनों से परे है।
इसके अतिरिक्त ईश्वर का अंश जीव भी अनश्वर होता है। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि ईश्वर और शरीर में रहने वाली जीवात्मा दोनों ही अविनाशी हैं, शेष अन्य सभी प्रकार के भौतिक पदार्थ नश्वर हैं। यह आत्मा जब तक मोक्ष को प्राप्त नहीं कर लेती अर्थात परमात्मा में लीन नहीं हो जाती तब तक वह शरीर धारण करके इस धरा पर जन्म लेती रहती है।
वैसे सभी प्रकार के द्वन्द्व या भोग इस शरीर के होते हैं, आत्मा पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता। भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में कहा है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक:।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:॥
अर्थात इस आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल गीला नहीं कर सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
इस श्लोक के माध्यम से भगवान श्रीकृष्ण मनुष्य को समझा रहे हैं कि आत्मा पर किसी भौतिक प्राकृतिक पदार्थ का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। वह इन सबसे निर्लिप्त रहती है। शरीर इन सभी से प्रभावित होता है। बच्चे के रूप में जन्म लेकर बढ़ना और मृत्यु तक की यात्रा करता है।
इन रहस्यों की गुत्थी में उलझने के स्थान पर मनुष्य को अपने शास्त्रों और ऋषियों के बताए मार्ग का अनुकरण करना चाहिए। उसे संसार में सब उसके कृत कर्मों के अनुसार ही प्राप्त होता है। इसलिए कर्मों की शुचिता की ओर ध्यान देना परम आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 6 अप्रैल 2017
नश्वर-अनश्वर की पहेली
बुधवार, 5 अप्रैल 2017
शरीर और आत्मा
संसार में विविध प्रकार के जलचर, भूचर और नभचर आदि असंख्य जीव-जन्तु हैं और उतने ही उनके शरीर हैं। जीव को यह शरीर परमपिता परमात्मा ने उपहार स्वरूप दिया है। अब प्रश्न यह उठता है कि ईश्वर ने यह शरीर इन जीवों को क्यों दिया गया है? जीव जिसे ईश्वर का ही अंश कहा जाता है, वह कहाँ रहता है? इस जीव का शरीर के साथ क्या सम्बन्ध है?
आत्मा और शरीर के इस परस्पर सम्बन्ध को ग्रन्थों और मनस्वियों ने अपने अपने ढंग से सरल तरीके से समझाने का प्रयास किया है ताकि साधारण मनुष्य भी इस रहस्य को सहजता से समझ सके। इस गम्भीर सार से सम्बन्धित उसकी जिज्ञासा का शमन हो सके। आत्मा और शरीर की तुलना मनीषियों ने अपनी-अपनी समझ के अनुसार की है। उनके विशलेषण के सम्बन्ध में अब चर्चा करते हैं।
कठोपनिषद् में ऋषि ने बहुत ही सुन्दर उदाहरण देते हुए मनुष्य को बोध कराने का यत्न किया है। उन्होंने शरीर को एक रथ मानते हुए आत्मा को यात्री बताया है। यह सारा प्रपञ्च आत्मा रूपी यात्री को इस संसार सागर से पार ले जाने के लिए ही रचा गया है। निम्न श्लोक में इसु भाव को प्रस्तुत किया है -
आत्मानं रथं विद्धि शरीरं रथमेव तु।
बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च॥
अर्थात आत्मा को रथी यानी रथ का स्वामी मानो, रथ को उसका शरीर, बुद्धि को सारथी और मन को लगाम समझो।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में अनेकश: इस गूढ़ विषय पर प्रकाश डालकर मानव मन की गुत्थी सुलझाने का प्रयास किया है। उन्होंने इस विषय का सरलीकरण करते हुए, जीवात्मा के शरीर परिवर्तन की तुलना वस्त्र परिवर्तन से करके सबको चमत्कृत कर दिया है-
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि असंयाति नवानि देही॥
अर्थात जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को छोड़कर नए वस्त्र धारण करता है। उसी प्रकार आत्मा पुराने रोगी शरीरों का त्याग करके नए शरीर धारण करता है।
इस शरीर को कुछ मनीषी नौका मानते हैं जो संसार सागर में हिचकोले खाती रहती है। उस पर सवार आत्मा को पर ले जाने का यत्न करती है।
कुछ विद्वान इस शरीर को पिंजरे की संज्ञा देते हैं। इस पिंजरे में पक्षी रूपी आत्मा निवास करती है। कुछ विद्वान इस आत्मा को तोते की संज्ञा देते हैं। यानी शरीर रूपी पिंजरे में आत्मा एक कैदी की तरह रहती है। उनका मानना है कि जब समय आता है तब यह आत्मा रूपी पक्षी पिंजरा तोड़कर पलक झपकते ही उड़ जाता है। उस वक्त पक्षी ढूँढे से भी नहीं मिलता और पिंजरा
खाली पड़ा रह जाता है।
अन्य विद्वान इस शरीर को अयोध्या नगरी मानते हैं। इस शरीर में मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूर, अनाहत, हृदय, विशुद्धि, आज्ञा और सहस्त्राधार नामक आठ चक्र हैं तथा दो आँखें, दो कान, दो नासिका छिद्र, मुँह, गुदा और उपस्थ नौ द्वार है। इनके अतिरिक्त एक अन्य दसवाँ द्वार ब्रह्मरन्ध्र है। इनमे से किसी द्वार से निकलकर जीव परलोक गमन करता है। तब यह अयोध्या नगरी अपने राजा से विहीन हो जाती है।
विद्वान मनीषी आत्मा और शरीर को किसी भी रूप में मानें परन्तु सच्चाई यही है कि यह शरीर रूपी साधन जीव को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार उसे सीमित समय के लिए मिलता है। उसके पश्चात इस पञ्चभौतिक शरीर को छोडकर उसे परलोक की यात्रा के लिए प्रस्थान करना ही पड़ता है। तदनन्तर यह शरीर मिट्टी की तरह होता जिसे अपने प्रियजन ही अग्नि के हवाले कर देते हैं।
इस कथ्य का सार यही हैं कि यह शरीर जीव को साधन के रूप में मिला है परन्तु जीव शरीर को साध्य मानकर इसे सजाने-सँवारने में इतना व्यस्त हो जाता है कि वह अपने संसार में आने के उद्देश्य को मानो ताक पर सजा देता है। वह भूल जाता है कि उसका लक्ष्य परमपिता परमात्मा में एकाकार हो जाना होता है। तभीआत्मा को जन्म-मरण और चौरासी लाक्ष योनियों के आवागमन से मुक्ति मिल सकती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 4 अप्रैल 2017
अकेलापन अभिशाप
मनुष्य का अकेलापन इस संसार में उसके लिए सबसे बड़ा अभिशाप होता है। मनुष्य तो क्या अन्य जीव-जन्तु भी अकेले नहीं रह पाते। इसलिए वे झुण्ड बनाकर रहते हैं। प्रायः पशु-पक्षी अपने-अपने साथियों के साथ समूहों में नजर आते हैं। भेड़, बकरी, हाथी आदि सभी पशु मिलकर चलते हुए दिखाई देते हैं। पक्षी भी अपने झुण्ड में ही उड़ते हैं। इससे वे सभी शायद अधिक सुरक्षित अनुभव करते हैं।
पालतू पशुओं के लिए भी यही चिन्ता की जाती है कि उन्हें अकेला न छोड़ा जाए। यदि किसी कारण से उन्हें कुछ दिनों के लिए अकेला छोड़ दिया जाए तो उन्हें अकेलापन सालने लगता है। वे उदास हो जाते हैं और खाना-पीना तक त्याग देते हैं। जब तक घर के सदस्य वापिस न लौट आएँ, तब तक उन्हें अच्छा नहीं लगता। यही कारण है कि उनके लिए भी आजकल बहुत से क्रच खुलने लगे हैं।
इसी प्रकार यदि अकेली मछली को घर में रखे एक्वेरियम में छोड़ दिया जाए तो उसे भी अकेलापन बहुत अधिक सताता है। फलस्वरूप वह शीघ्र ही दुनिया से विदा ले लेती है। इसलिए वहाँ अनेक प्रकार की मछलियाँ रखनी होती हैं जिससे वे सब मिलकर रह सकें और घर में आने वाले सभी बच्चों और बड़े लोगों का मनोरञ्जन कर सकें।
मनुष्य तो फिर एक सामाजिक प्राणी है, वह भला अकेला क्योंकर रहे। उसे सबके समीप आने के लिए अपने रिश्तों को समझने की, सहेजने की और समेटने की महती आवश्यकता होती है। यदि मनुष्य के मन के किसी कोने में ऐसा भाव घर कर जाए कि जिन्दगी में कुछ भी शेष नहीं बचा है, जीवन नीरस हो रहा है, जीवन मुरझाने लगा है, पलभर के लिए भी कोई खुशी नहीं मिल रही है तो उस समय मनुष्य को अपनों के प्यार की आवश्यकता होती हैं।
इसलिए रिश्तों के स्नेह की वर्षा उस पर करनी चाहिए। यदि मनुष्य ऐसा कर सके तो उसे अपने जीवन में वास्तविक आनन्द और प्रसन्नता मिल सकती है। मनुष्य को स्वयं खुश रहने के लिए खुशियाँ बाँटते रहना चाहिए और सदैव मुस्कुराते रहना चाहिए। रोते-बिसूरते रहने वालों से सभी बन्धु-बान्धव किनारा करने में ही अपनी भलाई समझते हैं। इस क्षणभंगुर जीवन में मनुष्य जितना दूसरों को साथ लेकर चलता है, उतना ही उसका समय आनन्दमय बन जाता है। अन्यथा अकेले हो जाने पर सबको कोसने से कोई लाभ नहीं होता।
दुर्भाग्य से यदि किसी की भी गलती से कोई अपना दूर हो जाता है तो उसे अपने करीब लाने के लिए बारबार ईमानदार प्रयास करना चाहिए। इस प्रयास में तभी सफलता मिल सकती है जब मनुष्य पूरे मन से अपने लक्ष्य में जुट जाए। आधे-अधूरे मन से किए गए प्रयत्न असफल हो जाते हैं। अपने जीवन को जीवन्त बनाने हेतु कदापि संकोच नहीं करना चाहिए।
इसका अनुभव तो बहुत से लोगों को होगा कि गमले रखा हुआ अकेला पौधा भी अधिक दिनों तक हरा-भरा नहीं रह पाता, वह मुरझाने लगता है। यदि उसके पास बहुत से दूसरे पौधे रख दिए जाएँ तो वे सब खिले रहते हैं। इसका यही अर्थ है कि पेड़-पौधों को भी अपने साथियों की बहुत ही आवश्यकता होती है। उन्हें भी अकेलापन काटने को दौड़ता है।
मैंने अपने पुराने स्टाइल के बने हुए घर में देखा है कि रोशनी के लिए एक कमरे में दीपक रखने के लिए आमने-सामने वाली दीवार में दो स्थान बनाए हुए थे। इसका कारण शायद यही रहा होगा।
मनुष्य हो या सृष्टि का अन्य कोई भी जीव, हर किसी को किसी-न-किसी के साथ की आवश्यकता होती है। अपने आसपास यदि कहीं कोई अकेला व्यक्ति दिख जाए तो उसे सहारा देने का यत्न करना चाहिए। अपना अमूल्य समय देकर उसे असमय मुरझाने से बचाना चाहिए। यदि दुर्भाग्य से मनुष्य अकेला हो तो उसे किसी मित्र का साथ लेकर, आनन्दपूर्वक जीने का साधन करना चाहिए। इस तरह एक मनुष्य स्वयं को भी मुरझाने से बचा सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 3 अप्रैल 2017
अनुकरणीय पथ
किसी भी वाक्य की सत्यता को कसौटी पर परखने के लिए हम शास्त्रों में प्रमाण खोजते हैं अथवा विद्वानों की शरण में जाते हैं। वही सत्य-असत्य का बोध कराकर सबका मार्गदर्शन करते हैं। वे मनुष्य के विवेक को पैना करके उसे सही और गलत की पहचान करने के लिए सक्षम बनाते हैं। तब वह अपने सशय से मुक्त होकर अपने उद्देश्य की प्राप्ति में सफल होता है।
मनीषी यही समझाते हैं कि महापुरुष जिस मार्ग पर चलते हैं, वास्तव में वही मार्ग अनुकरणीय होता है -
'महाजनो येन गत: स पन्थ:'
उस मार्ग पर मनुष्य बिना विचारे आँख बन्द करके चल सकते हैं। उनका अनुसरण करके मनुष्य को अपने जीवन में न कभी प्रायश्चित नहीं करना पड़ता है और न कभी पीछे मुड़कर देखने की उसे आवश्यकता ही पड़ती है।
इसके विपरीत दुर्जनों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। उनकी कही गई हर बात को कसौटी पर परखना चाहिए। बिना सोचे उनका अनुसरण करने से मनुष्य को मुँह की खानी पड़ती है। अपनी हानि तो वह करता ही है, साथ ही जग हँसाई का दंश भी उसे झेलना पड़ता है। इसीलिए बड़े-बुजुर्ग कहते थे- 'बुरा रोने से चुप लगाना श्रेष्ठ होता है।'
सज्जनों और दुर्जनों में क्रियान्वयन का अन्तर होता है। अर्थात उनकी कथनी कुछ और होती है तथा करनी उसके सर्वथा विपरीत होती है। सज्जनों की कथनी सदा पत्थर की लकीर की तरह अमिट होती है। जबकि दुर्जनों के वचन पानी के बुलबुले के समान अस्तित्व रहित होते हैं। किसी कवि ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में इसी तथ्य को उकेरा है, जिसे आत्मसात करना आवश्यक हो जाता है -
असद्भि: शपथेनोक्तं जले लिखितमक्षरम्।
सद्भिस्तुलीलया प्रोक्तं शिलालिखितमक्षरम्।।
अर्थात दुर्जन की ली हुई शपथ पानी के उपर लिखे हुए अक्षर जैसे क्षगभंगुर होती है। परन्तु सज्जन व्यक्ति का सहज रूप से बोला हुआ वाक्य शिला के उपर लिखे हुए अक्षर के समान होता है। यानी सदा रहने वाला होता है।
कहने का तात्पर्य यही है कि दुर्जन यदि कुछ भी कहता है तो उस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। वह कितनी कसमें खा ले, चिकनी-चुपड़ी बातें कर ले, उस पर विश्वास कदापि नहीं करना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य को धोखा ही मिलता है। इस श्लोक में एक उदाहरण दिया है कि जैसे पानी के ऊपर लकीर खींच दो तो वह उसी पल मिट जाती है। इसी प्रकार दुर्जनों के वचनों को भी मानना चाहिए।
इसके विपरीत सज्जनों का हर वाक्य ब्रह्मवाक्य ही कहलाता है। इसका कारण उनकी सच्चाई की गहराई होता है। इसी कारण कवि ने कहा है कि उनकी कथनी मानो पत्थर पर खुदे हुए शिलालेख की तरह ही अमिट होती है। उसे कोई चाहकर भी मिटा नहीं सकता। जब तक वह शिला रहती है तब तक उस पर लिखा लेख भी रहता है।
उनका अपना जीवन क्रियात्मक होता है। तभी उनकी कथनी और करनी अलग न होकर एक होते हैं। अतः उनका आचार-व्यवहार सामने वाले पर सदा ही अपनी अमिट छाप छोड़ जाता है। उनके कुछ कहे बिना ही मनुष्य को अपने जीवन में बहुत कुछ मिल जाता है, जिसकी वह कामना करता है।
दुर्जनों का साथ सोने जैसे मनुष्य को ऐसा लोहा बना देता है, जिसका मूल्य दूसरों की दृष्टि में नगण्य होता है। उनके दुर्गुणों की अधिकता उन्हें सर्वत्र त्याज्य बनाती है। जितना उनसे दूर रहा जाए उतना ही मनुष्य के लिए सुख का कारक बनता है। अतः यत्नपूर्वक उनके साथ सम्बन्ध नहीं बनाने चाहिए और उनका बहिष्कार करना चाहिए।
सज्जनों का संसर्ग पारस पत्थर के समान होता है, जिसका स्पर्श मात्र लोहे को सोना बना देता है। ऐसे लोग यदि सौभाग्य से मिल जाएँ तो उनका दामन अपने जीवन के अन्तिम पल तक थामकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 2 अप्रैल 2017
घर का पर्यावरण
नवरात्रों में घर का पर्यावरण शुद्ध करें।
घर में रहने वाली, गृहकार्यों को दक्षता से निपटाने वाली पत्नी के विषय पुरुष प्रायः सोचते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन घर में निठल्ली बैठी रहती है। घर का काम भी कोई काम होता है। वे हर समय बस यही राग अलापते हैं कि उनकी पत्नी सारा दिन क्या करती है?
पुरुषों को यही लगता है कि नौकरी करने वाली महिलाएँ ही सिर्फ काम करती हैं। घरेलू स्त्रियाँ बस केवल अपने पति के कमाए हुए पैसों पर ऐश करती है।
एक आदमी ने भगवान से नाराज होते हुए प्रश्न किया- 'हे प्रभु! मैं सारा दिन खटता रहता हूँ, जीतोड़ मेहनत करता हूँ, अपने परिवार के लिए परिश्रम करके कमाता हूँ। मेरी पत्नी पूरा दिन घर में रहकर आराम करती है, मजे करती है और फरमाइशें करती रहती है? उसकी जिंदगी बहुत मजे से बिना किसी कष्ट से कट है, ऐसा अन्याय मेरे साथ क्यों हो रहा है?'
भगवान ने उसकी शिकायत सुनकर सुझाव दिया- 'ऐसा करते हैं केवल दो दिन के लिए तुम अपनी पत्नी के साथ उसकी जिन्दगी बदलकर देखो और सब कुछ स्वयं जान लो।'
वह आदमी खुशी से प्रभु की सलाह मान गया। अगले दिन प्रातः पाँच बजे जब अलार्म बजा तब उसने उठकर बच्चों का लंच बनाया और फिर उन्हें तैयार करके स्कूल भेजा। फिर पति बनी पत्नी को उठाकर उसका नाश्ता बनाया। फिर उसके जाने के बाद घर साफ किया।अभी नाश्ता करने बैठा ही था कि कामवाली आ गयी। वो गई तो बच्चों के स्कूल से आने का टाइम हो गया। उन्हें खाना खिलाकर होमवर्क करने बिठाया।
शाम के खाने की तैयारी करके बच्चों को ट्यूशन क्लास में ले गया। शाम को पत्नी के आने पर खाना परोसा तो उसने उसमें से चार कमियाँ निकाल दीं। उसकी नुकताचीनी से उसे गुस्सा तो बहुत आया पर वह चुप रहा। अन्त में थके होने के बावजूद रात को पति बनी पत्नी को संतुष्ट भी किया।
इस सारी दिनचर्या के बाद ही उस आदमी को पता चला कि पत्नी के बारे में वह कितना गलत सोचता था। उसके किए गए कार्यों की बराबरी नहीं की जा सकती। पत्नी बिना कोई वेतन लिए सारे कार्य बिना शिकन लाए खुशी-खुशी करती है।
उसे अपने ऊपर बड़ी ग्लानि हुई। उसे समझ आ गया था कि सारा दिन उसकी पत्नी चक्करघिन्नी बनी कभी पति की आवश्यकताओं को पूरा करती और कभी बच्चों की जरूरतों को पूरा करती इधर से उधर घूमती रहती है। अपने लिए उसके पास समय ही नहीं होता। वह यदि बीमार भी हो तो दवाई खाकर फिर से घर-गृहस्थी के कामों में जुट जाती है।
वह बिना किसी से शिकायत किए अपने सारे दायित्व बखूबी निभाती है। उसके बाद भी सभी आने-जाने वालों का स्वागत अपनी प्यारी-सी मुस्कान से करती है। पुरुष किसी भी मायने में उसकी बराबरी नहीं कर सकता।
तब दो दिन बाद प्रातः उठकर सबसे पहले उसने भगवान से प्रार्थना की कि वे उसे वापिस आदमी बना दें क्योंकि अब उसे समझ आ गया कि घर में रहने वाली एक औरत को कितना अधिक काम करना पड़ता है। उसके बराबर मैं भी काम नहीं कर सकता।
जिस पुरुष ने ईश्वर से शिकायत की थी उसे जिस प्रकार सब कुछ समझ में आ गया उसी तरह शेष अन्य पुरुषों को भी यह समझ में आ आना चाहिए। स्त्री के प्रति उनका व्यवहार सहृदयता पूर्ण होना चाहिए। हर समय पत्नी की शिकायत न करके उसकी समस्याओं की ओर ध्यान देना चाहिए। उस पर व्यंग्य करना या उस पर चुटकले बनाकर उसके स्वाभिमान को आहत नहीं करना चाहिए। अपने पुरुष होने के मिथ्या अहं का त्याग करके उसकी ओर सहायता करने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 1 अप्रैल 2017
शरीर स्वस्थ रहना आवश्यक
उपनिषद् का उपदेश है कि हमारा शरीर एक रथ है। हमारा शरीर एक वाहन ही तो है जो चलता रहता है और हमें भी चलाता है। इसमें यदि कोई रुकावट आ जाए यानि इसमें रोग आ जाए, एक्सीडेंट हो जाए या किसी कारण से चोट आ जाए तो सब अस्त-व्यस्त हो जाता है। मृत्यु आने पर जब यह निष्क्रिय हो जाता है। जैसे गाड़ी के नष्ट हो जाने पर उसे भंगार में फैंक देते हैं उसी प्रकार इस शरीर को मृत्यु के पश्चात श्मशान में जाकर जला देते हैं।
इससे यही समझ आता है- 'जान है तो जहान है।' यदि शरीर स्वस्थ है तो हम दुनिया के किसी भी काम को करने में समर्थ होते हैं परंतु इसके अस्वस्थ होते ही चक्का जाम जैसी स्थिति हो जाती है। हम स्वयं को असहाय समझने लगते हैं। ऐसा लगता है मानो हमारे साथ-साथ पूरी दुनिया भी स्थिर हो गयी है।
महाकवि कालिदास ने सत्य कहा है- 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्' अर्थात् हमारा शरीर धर्म(कर्म) का साधन है। शरीर स्वस्थ है तो हम अपने सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, पारिवारिक दायित्वों को पूर्ण कर सकते हैं। शरीर के अस्वस्थ होने पर हमें किसी से बात करना या किसी भी प्रकार के शोर को सुनना नहीं चाहते बल्कि चिड़चिड़े हो जाते हैं। कहने का तात्पर्य है कि हमें कुछ भी अच्छा नहीं लगता।
इस प्रकार कष्ट की स्थिति में हम किसी भी काम को करने में असमर्थ हो जाते हैं। हम भगवद् भजन भी नहीं कर सकते। वह भी तभी कर सकेंगे जब हम स्वयं स्वस्थ होंगे। शरीरिक कष्टों के आने पर और उस परेशानी के चलते हम प्रभु को स्मरण भी न करके उसे अपने कष्टों के लिए उलाहने देते हैं।
शरीर का स्वस्थ रहना बहुत हमारे लिए बहुत आवश्यक है। इसके लिए हमें स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना चाहिए। उचित आहार-विहार पर ध्यान देना आवश्यक है। इसे सजा-संवार कर रखना चाहिए। मात्र शरीर को सब कुछ समझ कर चौबीसों घंटे इसी शरीर की सेवा में लगे रहकर शेष सभी दायित्वों से मुँह नहीं मोड़ना अनुचित है।
हमारा यह शरीर साधन है साध्य नहीं। नश्वर शरीर को ही सब कुछ मानकर दीन-दुनिया भूल जाना उचित नहीं। किसी विद्वान ने इस विषय में कहा है-
'क्या तन माँजता रे आखिर माटी में मिल जाना'
समय बीतते यह शरीर विकारों से युक्त हो जाता है। इसका सौंदर्य भी कुछ निश्चित समय के लिए ही होता है। जहाँ तक हो सके शरीर से आगे सोच कर इस संसार में आने के उद्देश्य(मोक्ष) को प्राप्त करने की ओर कदम बढ़ाएँ और अपने इस मानव जीवन को सफल बनाने के लक्ष्य में सफलता प्राप्त करें।
चन्द्र प्रभा सूद
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