मृगतृष्णा के पीछे मनुष्य आखिर कब तक भागता रहेगा। इस भटकन का कहीं कोई अन्त तो होना चाहिए न। सीमित समय के लिए मिले इस मानव जीवन को मनुष्य मानो रेस में भागते हुए बिता देता है। अपना सारा सुख-चैन गँवाकर भी यदि उसे शान्ति मिल जाए तब गनीमत समझो।
वह न्यायकारी परमात्मा किसी के साथ अन्याय नहीं करता। वह ईश्वर चींटी जैसे छोटे से जीव से लेकर हाथी जैसे बड़े, हर जीव के लिए रोटी का जुगाड़ करता है। मनुष्य को भी उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार बिन माँगे ही सब दे देता है। ज्ञानी जन कहते हैं- 'जिसने यह जीवन दिया है, भोजन की व्यवस्था भी वही करेगा।'
जीवन चलाने के लिए आवश्यक साधनों को मनुष्य सरलता से जुटा सकता है। परन्तु जब महत्त्वाकाँक्षाएँ सिर उठाने लगती हैं, तब समस्याएँ मुस्कुराती हुई उसे मुँह चिढ़ाती रहती हैं। उस समय मनुष्य उन असीम इच्छाओं को पूरा करने के लिए कोल्हू का बैल बन जाता है। दिन-रात एक करता हुआ जी-तोड़ मेहनत करता है। इस पर भी आवश्यक नहीं है कि उसे सदा ही सफलता मिल जाएगी।
जिनके लिए वह ये सब यत्न करता है वे तो उसे अपनी इच्छा पूर्ति का एक साधन मात्र समझते हैं। जब तक उनकी जरूरतें वह पूरी करता रहेगा तब तक तो उसके बराबर उनका और कोई प्रिय नहीं होता है। सभी उसकी प्रशंसा करेंगे और मिन्नत-चिरौरी भी करेंगे।
इसके विपरीत जब वह दूसरों की आकाँक्षाओं पर खरा नहीं उतर पाता तब उससे बुरा और कोई नहीं होता। सबसे अधिक उसका बुरा तब होता है जब उसे नालायक और कामचोर कहकर अपमानित किया जाता है। उसके नाम के आगे एक असफल या नाकामयाब व्यक्ति होने का ठप्पा लग जाता है। फिर वह कितनी भी कोशिश कर ले स्थितियों को सुधारने में वह सफल नहीं हो पाता।
एक के बाद एक भौतिक वस्तुओं को जुटाने की फिराक में भागता हुआ मनुष्य इतनी दूर निकल जाता है कि उसका सब कुछ छूटता चला जाता है। जब पीछे की ओर मुड़कर देखता है तब वह स्वयं को निपट अकेला पाता है। फिर चाहकर भी अपनों के बीच नहीं जा पाता।
यही वह समय होता है जब मनुष्य जीवन के उस मोड़ पर पहुँच जाता है, जहाँ उसे अपनों के सहारे की सबसे अधिक आवश्यकता होती है क्योंकि जिन्दगी की लड़ाई लड़ते हुए वह अशक्त होने लगता है। उस वक्त उसे अपनों के सशक्त कन्धों की जरूरत स्वाभाविक रूप से होती है।
यही उसके सन्ताप का सबसे बड़ा कारण बन जाता है। उस समय वह बस कलपता है, अपना मन मसोसकर रह जाता है कि जिनके लिए सारा जीवन भागदौड़ की, अपना सुख-चैन खो दिया, इससे भी बढ़कर स्वयं को भी भूल गया, वही नजरें मिलाकर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं। उससे कहीं दूर बेगानों की तरह हो गए हैं। उस स्थिति में भी इन्सान चेत जाए तब भी अच्छा है।
एकाकी बैठकर आत्मचिन्तन करने पर ही समझ आती है कि अपने इस जीवन में क्या खोया और क्या पाया? मनुष्य जब तक खोये-पाये का लेखा-जोखा सुलझाता है, तब तक इस संसार को अलविदा कहने का उसका समय आ जाता है।
मनुष्य को अपनी असीम इच्छाओं को कुछ हद तक सीमित करना चाहिए। अनावश्यक ऐष्णाओं के पीछे भागने से कोई हल नहीं निकलने वाला। जितने भोगों को एकत्र करते जाओ, उतना ही मानसिक सन्ताप बढ़ता जाता है। इसलिए मृगतृष्णा के इस मायाजाल से यथासम्भव बचते हुए अपने जीवन में सुखोपभोग करना चाहिए अन्यथा इसके चंगुल से बच निकलना असम्भव तो नहीं बहुत ही कठिन अवश्य हो जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Twitter : http//tco/86whejp
मंगलवार, 6 जून 2017
मृगतृष्णा के पीछे भागना
सोमवार, 5 जून 2017
चुगलखोर आँखें
आँखे हमारा आईना होती हैं। ये जो आँखे हैं, बहुत ही दुष्ट और नालायक हैं जो कभी हमारा कहना नहीं मानतीं। ये आँखें बहुत चुगलखोर होती हैं जो न चाहते हुए भी हमारे मन के भावों की सबके समक्ष चुगली कर देती हैं। चाहे ऊपर से कितना ही न न करते रहें परन्तु इनकी बदौलत सबकी चोरी पकड़ी ही जाती हैं।
सुख, खुशी, दुख, सन्तोष, ईर्ष्या, क्रोध, वात्सल्य आदि मानव मन के सभी भाव फ सारी संवेदनाएँ, उसकी इन आँखों से ही प्रकट होती हैं। जब भी मनुष्य के जीवन में खुशी हो या गम आते है तब मौका मिलते ही ये तालाब की तरह भर आती हैं। गंगा-यमुना की धारा की भाँति ये बहने लगती हैं अथवा फिर बादलों की तरह बरसने लगती हैं। जहाँ मन के विपरीत कोई घटना अथवा बात हो जाए वहीं ये छलकने लगती हैं।
नीली, कजरारी और बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखें कवियों के काव्य के लिए सदा ही प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं। इनकी गहराई में डूबते-उतरते हुए कवियों ने इनके सौन्दर्य को लेकर बहुत से काव्य लिखे हैं। यत्र तत्र उन सभी काव्यों की सराहना भी की गई है। उनको पढ़कर ऐसे कवियों को दाद दिए बिना कोई नहीं रह सकता।
इनकी चितोरी चितवन से कोई बच नहीं सकता। इनके कटाक्ष बाण किसी को भी घायल कर सकते हैं। न जाने कितने ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की गहन तपस्या इन्होंने भंग की है। आज भी इनके सौन्दर्य से किसी संसारी व्यक्ति का बच पाना सम्भव नहीं है।
गम्भीरता का भाव लिए आँखे व्यक्ति के मन की पवित्रता और गहराई को प्रकट करती हैं। सरलता और सहजता के भाव वाली आँखे मनुष्य के हृदय की विशालता को दर्शाती हैं। बच्चों की तरह चंचल आँखें मानव मन की चंचलता का परिचायक होती हैं। क्रूरता या निर्दयता के भाव वाली आँखों से सभी बचना चाहते हैं। क्रोध से भरी हुई आँखों से डरकर लोग सहम जाते हैं और किनारा करने में अपनी भलाई समझकर कहीं भी छुप जाते हैं।
किसी अपने के मिलन अथवा वियोग के समय ये अनायास ही बिन बुलाए हुए मेहमान की तरह टपक पड़ते हैं। प्रसन्नता आने पर हमारा साथ देते हैं। अत्यधिक कष्ट के समय आकर ये मनुष्य के मनोबल को कमजोर बनाते हैं।
ये आँसू किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को कमजोर बना सकते हैं। स्त्री या पुरुष दोनों पर ये समान रूप से अपना प्रभाव छोड़ती हैं। कठोर कहे जाने पुरुष भी असहनीय कष्ट या किसी अनहोनी के समय अपने इन आँसुओं को रोक नहीं पाते, तब उनकी तथाकथित कठोरता कहीं गायब हो जाती है।
स्त्रियों को तो वैसे भी कमजोर और करुणामयी कहा जाता है। इसलिए उन पर हर स्थिति का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसीलिए उनके आँसू किसी-न-किसी बात पर छलक आते हैं। पुरुष प्राय: दोषारोपण करते हैं कि स्त्रियाँ इन आँसुओं का अपनी बात मनवाने के लिए हथियार के रूप में इस्तमाल करती हैं। हालांकि यह कहना उनकी सच्चाई पर प्रहार करना ही होता है। निस्सन्देह इसके अपवाद भी हो सकते हैं।
मक्कारों के घड़ियाली आँसुओं से सावधान रहने की बहुत आवश्यकता होती है। पता नहीं इन पर पिघल जाने वालों की पीठ में कब ये छुरा घोंप दें, कुछ नहीं कहा जा सकता। स्वार्थी लोग प्राय: ऐसे ही चकमा देते हैं।
ये आँसुओं से भरी आँखे वास्तव में दो हृदयों को जोड़ने के लिए एक पुल का कार्य करती हैं। इनकी माया अपरम्पार है। जो व्यक्ति इनके जाल में उलझ गया वह तो समझो काम से गया। जो इनसे बचकर निकल गया वह संयमी कुछ भी कर सकने में समर्थ होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 4 जून 2017
हृदय ब्रह्म
हृदय शब्द की व्याख्या करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् कहती है कि हमारा हृदय ही ब्रह्म है, यही प्रजापति है अर्थात् यही सब कुछ है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह हृदय इस मनुष्य जीवन का संचालक है। इसकी तीन सन्तानें हैं- देव, मनुष्य और असुर।
हृदय शब्द तीन अक्षरों से बना है- हृ+द+य। वैदिक व्याकरण में इनका अर्थ बताया है- हृ का अर्थ है 'हरति' अर्थात् लाना। द का अर्थ है 'ददाति' अर्थात् देना और य का अर्थ है 'याति' अर्थात् जाना।
जो इस रहस्य को समझ लेते हैं कि हृदय ही सब कुछ है यानि कि वही ब्रह्मा है, वही प्रजापति है। अपने और पराए सभी उसे उपहार लाकर देते हैं। जो इसे पूरी तरह जान लेता है वही स्वर्गलोक को जाता है। कहने का तात्पर्य है कि वह सभी प्रकार से सुखी रहता है।
हम सब जानते है कि हृदय मनुष्य के लिए कितना आवश्यक है। यह जब तक ठीक से कार्य करता रहता है, तब तक ही मनुष्य स्वस्थ रहता है। जहाँ इसमें विकार आया वहीं से परेशानी आरम्भ हो गई। यह लेता है, देता है और चलता है।
इसका कार्य रुधिर का लेना और देना होता है। यह शरीर से अशुद्ध रक्त को लेकर फेफड़ों द्वारा शुद्ध करके शरीर को वापिस लौटा देता है। इसी उद्देश्य को लेकर यह निरन्तर गतिमान् रहता है। यह न दिन देखता है और न रात, बस चलता ही रहता है। इस प्रकार हृदय शब्द के अर्थ से रुधिर की गति अथवा बल्ड सर्कुलेशन का भाव आ जाता है।
यदि यह हमारी तरह सोचने लगे कि वह चलते-चलते, अपना काम करते हुए थक गया है, अब उसे आराम करना चाहिए तो वहीं, उसी पल इस मनुष्य जीवन का अन्त हो जाता है। कहते हैं न कि मृतक का हार्ट फेल हो गया।
अभी ऊपर इसकी तीन सन्तानों की हमने चर्चा की थी। पहली सन्तान है देव। देव संयमी होते हैं। ये सदा ही मनुष्य को संयम करना सिखाते है, मर्यादा का पालन करने की शिक्षा देते हैं। ये मनुष्य को खानपान और आचार-व्यवहार आदि हर स्थान में जीवन को संतुलित रखने के लिए प्रेरित करते रहते हैं। जो लोग अपनी जीवन शैली नियमानुसार चलाते हैं उन्हें दुखों और कष्टों का सामना अपेक्षाकृत कम करना पड़ता है। उनका खानपान ऋतु के अनुसार होता है, वे समय पर सोते हैं और जागते हैं। वे सदा स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं।
दूसरी सन्तान है मनुष्य। ये कभी देवों की तरह संयमी बन जाते हैं तो कभी असुरों की तरह क्रूर बन जाते हैं। इनका ढुलमुल रवैया इन्हें स्वयं का मित्र और शत्रु बना देता है। जब ये दैवीवृत्ति की तरह स्वास्थ्य के नियमों का पालन करते हैं तो अपने मित्र बन जाते हैं उस समय उनका शरीर नीरोग रहता है। परन्तु जब असुरों की तरह अपने प्रति लापरवाह हो जाते हैं तो सभी नियमों की अनदेखी करते हैं। तब शरीर रोगी हो जाता है और मनुष्य कष्ट पाता है। डाक्टरों के पास इलाज के लिए जाता हुआ धन व समय की बरबादी करता है।
इसकी तीसरी सन्तान हैं असुर। वे हर नियम को, हर बन्धन को तोड़ने के पक्षधर होते हैं। उनका वश चले तो सारे एक्सपेरिमेंट इसी जीवन में अपने शरीर पर कर डालें। मानव शरीर में जब आसुरी वृत्ति बलवती हो जाती है तब आँख, नाक, कान, जिह्वा आदि सभी इन्द्रियाँ बेलगाम घोड़ों की तरह ही अनियन्त्रित हो जाती हैं। सबकी मनमानी इस अमूल्य शरीर का सत्यानाश कर देती है।
खाने-पीने, सोने-जागने यानि कि आहार-विहार में हर तरह की लापरवाही हमारे हृदय की गति के लिए घातक हो जाती है। शरीर दिन-प्रतिदिन रोगों का घर बनता जाता है। एक समय ऐसा आता है जब मनुष्य ईश्वर से प्रार्थना करने लगता है कि वह इस शरीर से उसे मुक्त कर दे।
अपने इस हृदय रूपी ब्रह्म या प्रजापति को सम्मान देना हमारा कर्त्तव्य है। इसकी चिन्ता और सुरक्षा ही हमारे स्वस्थ जीवन की कुँजी है। इसलिए किसी भी प्रकार की असावधानी हमारे जीवन में सेंध लगा सकती है। इससे बचना चाहिए और सजग रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Twitter : http//tco/86whejp
शनिवार, 3 जून 2017
विचारों का मकड़जाल
हमारे अंतस में विचारों का एक घना जंगल है। वहाँ न तो पूर्णरूप से अंधेरा है और न ही उजाला। यहाँ पर प्रकाश घने पेड़ों से छन-छनकर आता है। इसलिए हमें विचारों की उठापटक झिंझोड़ती रहती है। अंधेरे विचारों को हम नकारात्मक कह सकते हैं ये विचार हमें सबसे दूर करने की प्रक्रिया में रहते हैं। उजले विचार सकारात्मक होते हैं जो हमें सबसे जोड़कर रखते हैं और हम एक इकाई के रूप में रहना चाहते हैं।
इस जंगल में झाड़-झांखड़ व कंटीली झाड़ियों जैसे विचार हैं जो हमारे जीवन में उथल-पुथल मचाते रहते हैं। ऐसे रूखे व कठोर विचार भी हैं जो सदा हमें कचोटते रहते हैं।अनायास ही मन में उठ आए ये विचार हमारे सरल मार्ग को कठिन बनाकर हमारे लिए रुकावटें उत्पन्न करते हैं। इन्हें उखाड़ फैंकने में ही भलाई होती है अन्यथा ये हमारे लिए कष्टदायी हो जाते हैं।
यहाँ छायादार घने और फलवाले पेड़ जैसे विचार भी हैं जो सभी घर-परिवार जनों व बन्धु-बान्धवों को शीतल छाया एवं सफलता देते हैं। ऐसे सुविचारी लोगों के संपर्क में आने वाले सभी धन्य हो जाते हैं। छतनार वृक्ष की भाँति ये विचारशील परोपकारी लोग समाज के दिग्दर्शक बनते हैं। ये देश और समाज के लिए ईश्वर के वरदान की तरह होते हैं।
खूशबू फैलाने वाले पेड़ जैसे विचार हैं जो अपनी सुगन्ध से सभी दिशाओं को महका देते हैं जिस तरफ निकल जाते हैं इनकी खुशबू उनसे पहले पहुँच जाती है। जन साधारण के प्रिय बन जाने वाले ये सम्माननीय सभी को खुशियाँ व सुगन्ध से सराबोर कर देते हैं।
कौवों की कांव-कांव जैसे कर्कश या कठोर विचारों का होना हमारे लिए कभी अच्छा नहीं होता किसी के घर की मुंडेर पर कांव-कांव करने वाले कौवे को लोग पसंद नहीं करते बल्कि कंकर मारकर भगा उड़ा देते हैं।
उसी प्रकार ऐसे लोगों की कोई भी परवाह नहीं करता और न ही उनका साथ देता है।
हमारे विचारों में शेर की-सी हिंस्र प्रवृति भी विद्यमान रहती है। इसके कारण मन में क्रूरतापूर्ण विचार आते हैं। इसका ही परिणाम विध्वंस रूप में सबके समक्ष आता है। ऐसे विचार वाले समाज के शत्रु कहलाते हैं, सबसे कटकर रहते हैं व सजा पाते हैं।
इन सबके अतिरिक्त पक्षियों के समान कलरव करते विचार मोहिनी शक्ति रखते हैं। सभी लोग इनके मधुर व्यवहार से प्रसन्न रहते हैं इनका संसर्ग करने के लिए लालायित रहते हैं।
नदी झरनों की कलकल वाले विचार शांत, ठहराव वाले व दूसरों के लिए पूर्णतः समर्पित रहते हैं। कभी नदी की तरह तूफान का सामना करते हैं पर प्रायः अपना सर्वस्व समाज के लिए बलिदान करने में नहीं हिचकिचाते।
समुद्र-सी गहराई वाले विचारों का भी उदय होता है। ये अपने में असीम शक्तियाँ समेटे गहन गम्भीर होते हैं। इनकी थाह पाना संभव नहीं होता। ऊपर से कड़वे प्रतीत होने वाले ये विचारवान समाज के हीरे हैं। इनकी चमक के सामने सब कुछ फीका रह जाता है।
विचारों के मकड़जाल में घिरे हुए हम हमेशा उलझे रहते हैं। जितना हम उससे बाहर निकलने के लिए हाथ-पाँव फैलाते हैं उतना ही गहरे फंस जाते हैं। इसलिए हमें अपने विचारों को उचित मार्गदर्शन देते हुए ईश्वर से सद् बुद्धि की प्रार्थना बारंबार करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Twitter : http//tco/86whejp
शुक्रवार, 2 जून 2017
अपना किया हुआ सामने आता है
अपनी मान्यताओं में फँसा मनुष्य शेष सब भूल जाता है। उसे अच्छाई और बुराई का भान भी नहीं रहता। यद्यपि अपनी रूढ़ियों में जकड़ा मनुष्य अपने सुविचारों अथवा कुविचारों का उत्तरदायी स्वयं होता है। जो भी सुनो अथवा पढ़ो, उसे पहले अपनी तर्क की कसौटी पर कसना चाहिए। यदि वह विचार खरा उतरे और अपना विवेक उसे मानने की गवाही दे तभी अपनाना चाहिए अन्यथा उसे भूल जाना चाहिए।
इसी प्रकार की एक मान्यता पर हम बोधकथा के माध्यम से चर्चा करते हैं। लोग कहते हैं कि गंगा आदि नदियों में स्नान करने से सभी पाप धुल जाते हैं। कहते हैं कि एक ऋषि गंगा नदी में स्नान करते हुए उसका स्तुतिगान कर रहे थे। सहसा उन्हें ध्यान आया कि पतित पावनी माँ गंगा में बहुत से लोग आकर अपने पाप धोते हैं। इसका यही अर्थ हुआ कि उन लोगों के सारे पाप एकत्र होकर गंगाजी में समा गए हैं और गंगाजी भी पापी हो गईं हैं। उन्हें माँ गंगा का पापी होने वाला विचार बहुत अखरा। ये पाप आखिर कहाँ जाते हैं? इस रहस्य जानने के लिए उन्होंने तपस्या करने का निर्णय किया। उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर देव उनके समक्ष प्रकट हुए। ऋषि ने उनसे पूछा- 'भगवन, लोगों के जो पाप गंगाजी में धोए जाते हैं, वे कहाँ जाते हैं?'
उन्होंने कहा- 'चलो, गंगाजी से ही पूछ लेते हैं।'
वे दोनों लोग गंगाजी के पास गए और बोले- 'हे गंगे! लोग आपके जल में अपने पाप धोते है तो इसका मतलब हुआ कि आप भी पापी हैं।'
माँ गंगा ने उत्तर दिया- 'मैं क्यों पापी होने लगी? मैं अपने पास आए सारे पापों की गठरी समुद्र को जाकर सौंप देती हूँ।'
यह सुनकर दोनों समुद्र के पास गए और उनसे बोले- हे 'सागर! गंगाजी आपको पाप समर्पित करती हैं तो इसका अर्थ हुआ कि आप पापी बन गए हैं।'
समुद्र ने रुष्ट होते हुए कहा- 'मैं कैसे पापी बन गया? मै उन सारे पापों को भाप में बदलकर बादल को देता हूँ।'
वहाँ से वे दोनों बादल के पास गए और उनसे बोले- हे 'बादल! समुद्र पापों को भाप बनाकर आपको दे देता हैं, इसका यही अभिप्राय हुआ कि आप पापी हैं।'
बादल ने नाराज होते हुए कहा- हम पापी कैसे हो गए? हम उन सारे पापों को जल के रूप में बरसाकर धरती पर वापिस भेज देते हैं, जिससे किसान अन्न उपजाता है। वही अन्न मनुष्य खाता है। अन्न जिस मानसिक स्थिति से उत्पन्न किया जाता है, जिस सद् वृत्ति या कुवृत्ति से कमाया जाता है, जिस अवस्था में खाया जाता है, उसी के अनुसार उस मनुष्य की मानसिक स्थिति बन जाती है।
इस कथा का अर्थ यही है कि जो भी कर्म मनुष्य करता है, वे लौटकर उसी के पास आ जाते हैं। इसीलिए मनीषी हमें समझते हुए कहते हैं-
'जैसा खाओ अन्न, वैसा बनता मन।'
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अन्न को मनुष्य किस तरह कमाता है। यदि कठोर परिश्रम करके, ईमानदारी से कमाता है तो उत्तम है। यदि अपनी मेहनत की कमाई के धन से अन्न खरीदा जाता है, तभी घर के सभी सदस्यों के विचारों में शुद्धता रहती है। वहाँ सन्तान आज्ञाकारी और माता-पिता की सेवा करने वाली होती है। धन की यदि कमी हो तो भी घर में सदा हर प्रकार से खुशहाली बनी रहती है।
इसके विपरीत चोरी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, किसी को कष्ट देकर धन कमाया जाता है तो उस घर में कलह-क्लेश रहता है। वहाँ बच्चों में भी अच्छे संस्कार नहीं आते। सब कुछ होते हुए भी घर नरक की तरह दुखदायी बन जाता है। हर व्यक्ति दूसरे के प्रति असहिष्णु बन जाता है। यानी जैसा अन्न खाया जाता है वैसे ही घर के लोगों के विचार बन जाते हैं।
इसलिए इस मिथ से बाहर निकलिए कि मनुष्य के किए हुए पाप धुल जाते हैं। जो भी अच्छा या बुरा कर्म मनुष्य करता है, उसका फल भोगने के लिए उसे तैयार रहना चाहिए। उसे कोई शक्ति, कोई तन्त्र-मन्त्र, कोई तथाकथित गुरु उससे बचा नहीं सकते। इसलिए स्वयं ही सावधान हो जाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Twitter : http//tco/86whejp
गुरुवार, 1 जून 2017
विद्वानों में ईर्ष्या भाव
विद्वानों में परस्पर शत्रुता का भाव बहुत अधिक देखने को मिलता है। हर व्यक्ति स्वयं को दूसरों से कहीं अधिक बुद्धिमान समझता है। वह किसी दूसरे को सहन नहीं कर सकता। जो भी उससे आगे बढ़ता है अथवा उससे अधिक यश कमाता है, वह दूसरों की आँख की किरकिरी बन जाता है। हर कोई उसे पटखनी देने की फिराक में रहता है। जहाँ अवसर मिला वहीँ दूसरे की टाँग खीचने का सिलसिला आरम्भ हो जाता है।
किसी भी कार्यालय, संस्थान, राजनैतिक पार्टी, सामाजिक संस्था अथवा धार्मिक संस्था आदि में इसका उदाहरण सरलता से देख सकते हैं। और तो और शिक्षा का मन्दिर कहे जाने वाले विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में इसका प्रभाव सबसे अधिक मिलता है। वहाँ पर सभी लोग ही तथाकथित विद्वान या बुद्धिजीवी होते हैं। वे अपने से अधिक विद्वान साथी को बर्दाशत नहीं कर पाते। उसे देखकर उनका खून खौलने लगता है। वे साम, डैम, दण्ड, भेद आदि किसी का भी सहारा लेने से बिल्कुल भी नहीं चूकते।
इसलिए उठा-पटक का खेल हर स्थान पर चलता रहता है। कहीं भी, कोई भी किसी दूसरे को धक्का मारकर, नीचे गिराकर सीढ़ी पर चढ़कर महान बन जाना चाह्ता है। उसे अपने सामने वाले की बिल्कुल भी चिन्ता नहीं होती कि उसके मन को ठेस लगी होगी या उसे कितना कष्ट हुआ होगा। उसे तो बस अपना अहं साधना होता है, किसी अन्य का नहीं।
साहित्य जो समाज को दिशा देने का कार्य करता है, वहाँ पर यह ईर्ष्या तत्त्व या गुर्राहट बहुत अधिक दृष्टिगोचर होती है। साहित्य की रचना करना बुद्धिजीवियों का कार्य होता है। हर नया या पुराना रचनाकार अपनी रचना को सर्वोत्कृष्ट मानता है और दूसरों की रचनाओं को कूड़ा कहने से भी बाज नहीं आते। आत्ममुग्ध उन्हें अपने से इतर रचनाकारों को पढ़ना अपने अपमान जैसा लगता है।
ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवी किसी नए रचनाकार को इतना तिरस्कृत करते हैं कि उन्हें लगने लगता है कि शायद उन्होंने रचना लिखकर कोई अपराध कर दिया है। नए रचनाकारों को प्रोत्साहित करना यद्यपि बड़े लेखकों का प्राथमिक दायित्व होना चाहिए। परन्तु होता इसके विपरीत है, वही नए पौधों को पनपने से पहले उन्हें जड़ से उखाड़ देना चाहते हैं।
इसी कड़ी में यह भी जोड़ना चाहती हूँ कि आज नए कलमकारों का दिमाग भी सातवें आसमान पर है। वे स्वयं को सबसे महान समझते हैं। न वे अपने महान ग्रन्थों को पढ़ना चाहते हैं और न ही किसी विद्वान का परामर्श सुनना या मानना चाहते हैं। भाषा पर उनकी पकड़ नहीं है। इसीलिए साधना के आभाव में आज साहित्य का बँटाधार हो रहा है। इससे न समाज और न साहित्य किसी का भी भला नहीं हो रहा। पता नहीं कलम के ये अनगढ़ सिपाही अपनी आने वाली भावी पीढ़ी को क्या विरासत सौंपना चाहते हैं?
संस्कृत भाषा के किसी विद्वान ने इस विषय पर अपने विचार प्रकट करते हुए कहा है -
पण्डित: पण्डितं दृष्ट्वा श्वानवत् गुरगुरायते।
अर्थात एक विद्वान दूसरे विद्वान को देखकर ऐसे गुर्राता है जैसे एक कुत्ते को देखकर दूसरा कुत्ता भौंकता है।
विद्वत्ता का यह मिथ्या गर्व मनुष्य को कहीं का भी नहीं छोड़ता। ऐसे लोग समाज में शत्रु की भाँति कार्य करते हैं। एक-दूसरे को काट खाने के स्थान पर छोटों के प्रति सहृदयता का भाव होना चाहिए। एवंविध बड़ों के प्रति सम्मानभाव होना आवश्यक है। तभी एक विद्वान दूसरे से कुछ सीख सकता है। अपनी डफली अपना राग अलापने के स्थान पर यदि सभी महानुभाव सद्भावना से मिलजुलकर रह सकें तो इस समाज में अपेक्षाकृत अधिक सौहार्द बन सकता है। इस प्रकार अपनी भावी पीढ़ियों को स्वस्थ धरोहर सौंपी जा सकती है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Twitter : http//tco/86whejp