बच्चों की बालसुलभ चेष्टाओं को देखते हुए हम सभी बहुत आनन्दित होते हैं। प्रतिदिन उनकी किसी भी माँग को माता-पिता के न मानने पर रूठना और मानना, बात-बात पर जिद करना आदि अच्छा लगता है। इन सभी मौकों पर हम मुस्कुराकर रह जाते हैं। उनके ये सभी क्रिया-कलाप हमें मानसिक सन्तोष देते हैं। एक प्रकार से हम उन क्षणों में स्नेह से अभिभूत हो जाते हैं। कभी-कभी हम बड़े भी बच्चों की प्रसन्नता के लिए जान-बूझकर उनसे वैसा ही रूठने, मानने या जिद करने का अभिनय करते हैं। इस प्रकार जीवन अपनी ही गति से निरन्तर चलता रहता है।
छोटे बच्चे गिरते-पड़ते जब ठुमकते हुए चलते हैं तो वे हर किसी के आकर्षण का पात्र बन जाते हैं। इनके गिरने पर कष्ट भी होता है। चोट लगने पर जब ये रोते हैं तब बड़े इन्हें बहला देते हैं कि फर्श टूट गया है अथवा चींटी मर गई है। उसी पल वे रोना भूलकर उठ खड़े होते हैं और पहले की ही तरह बर्ताव करने लगते हैं।
छुपन-छुपाई का खेल जब वे खेलते हैं, तब उनका अलग ही रूप दिखाई देता है। एक ही स्थान पर बैठे हुए बड़े जब यह कहते हैं कि हमें तो वह दिखाई ही नहीं दे रहा, पता नहीं कहाँ चला गया है? चलो उसे ढूँढो। यह सुनते ही वह हँसते हुए आकर कहता है कि मैं तो यहाँ हूँ। बच्चों की ये सभी सरल क्रीड़ाएँ अनायास ही मन्त्रमुग्ध कर लेती हैं। उनकी इन मनोहारी चेष्टाओं पर माता-पिता व अन्य सभी बलिहारी होते रहते हैं।
हर अवसर पर उनका बात-बात पर उन्मुक्त होकर खिलखिलाना हर किसी को आनन्दित करता है। इन्सान चाहे कितना भी परेशानियों में क्यों न घिरा हो पर छोटे बच्चे जब गोद में बैठकर प्यार करते हैं, तब कुछ समय के लिए मनुष्य अपने सारे कष्ट भूल जाता है। बच्चे के साथ बच्चा बन जाता है।
कितनी ही सख्या में बड़े लोग एक स्थान पर बैठे हों, वहाँ उतनी रौनक और खुशगवार माहौल नहीं हो पाता जितना एक बच्चे के आने पर हो जाता है। सभी लोग उस बच्चे के साथ बच्चा बनकर आनन्दित होने लगते हैं। सारा वातावरण उल्लासमय हो जाता है। सब उन पलों को सहेज लेना चाहते हैं।
किसी भी बात को न समझ पाने पर इनके भोले-से मुखड़े पर आया आश्चर्य का भाव वाकई देखने लायक होता है। इनके बालसुलभ प्रश्नों की बौछार का उत्तर देते हुए सब थक जाते हैं। ये बच्चे हैं कि नित नए प्रश्नों के साथ हाजिर हो जाते हैं। डाँट खाने के बाद थोड़े समय के लिए अवश्य चुप लगाते हैं। फिर बिना बुरा माने, बिना नाराज हुए उनका वही क्रम पुन: आरम्भ हो जाता है।
बच्चों में छल, कपट, ईर्ष्या, द्वेष, तेरे-मेरे आदि की सभी भावनाएँ हम समझदार लोग ही उनके निष्कपट हृदयों में भरते हैं। उन्हें सरल से विषाक्त बनाने का कार्य हम बखूबी निभाते हैं। हम अपने गिरहबान में झाँकने के बजाय फिर बाद में यह कहने से भी नहीं चूकते कि आजकल के बच्चे बहुत चालाक अथवा घाघ हो गए हैं। इन्हें छोटे-बड़े का लिहाज करना ही नहीं आता।
इन्हें हम बड़े अपने स्वार्थ के लिए भी इस्तेमाल करते हैं। कोई भी लालच देकर घर में एक-दूसरे की जासूसी इन मासूमों से करवाना एकदम गलत है। धीरे-धीरे यही प्रवृत्ति उनमें लालच बनकर पनपने लगती है। बड़े होकर जब वे किसी माँग को पूरा करने के लिए पैसा या अपनी जरूरत की कोई वस्तु माँगते हैं, तब उस समय हमें बुरा लगता है। तब हमें याद नहीं आता कि यह गलत संस्कार हमीं ने उसे दिए हैं।
हम बड़ों की सच्ची-झूठी बातों को अक्षरश: सत्य मानने वाले इन बच्चों को यदि हम सरल हृदय ही रहने दें तो समाज का ढाँचा ही कुछ और हो जाएगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 12 जून 2017
बालसुलभ चेष्टाओं का आनन्द
रविवार, 11 जून 2017
मूर्ख मनुष्य
मनुष्य का बुद्धिहीन अथवा मन्दबुद्धि होना अलग बात है और मूर्ख होना अलग विषय है। बुद्धिहीन मनुष्य तो दुर्भाग्यशाली होता है, तभी मानव का तन पाकर भी वह अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार अपनी बुद्धि का उपयोग नहीं कर पाता। परन्तु मूर्ख वह कहलाता है जो अपनी बुद्धि होते हुए भी उसका प्रयोग करना ही नहीं चाहता। जो कोई उसे जैसा कहता है, उसे ही ब्रह्मवाक्य मानकर उसी राह पर चलने लगता है।
आँख रहते हुए भी जानबूझकर यदि कोई गड्डे में गिरना चाहे या पहाड़ की ऊँचाई से कूदना चाहे, दूसरों के चेतावनी देने पर यदि कोई आग में अपना हाथ जलाने से न माने तो वह व्यक्ति मूर्ख ही कहलाएगा। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि मूर्ख व्यक्ति अपने पैर पर स्वयं कुल्हाड़ी मारने का काम करता है और फिर नुकसान उठता है।
ऐसे व्यक्ति का अपना कोई स्वतन्त्र मत नहीं होता, वह तो बस यही प्रतीक्षा करता रहता है कि कोई आए और उसका हाथ पकड़कर उसे उसके लक्ष्य तक पहुँचा दे। ऐसे मूर्ख सर्वत्र उपहास का पात्र बनते हैं। लोग उनका प्रयोग कठपुतली की तरह करते हैं जिसका उन्हें भान तक नहीं हो पाता। उन्हें व्यर्थ ही यह प्रतिभासित होता हे कि लोग उन्हे देखकर प्रसन्न होते हैं। जबकि वे उसका उल्लू बना रहे होते हैं। वे अपने शत्रु स्वयं होते हैं। वास्तव में किसी मूर्ख को समझदार बनाना खाला जी का घर नहीं अपितु टेढ़ी खीर है। उनके साथ माथा पच्ची करना, उन्हें समझाना वास्तव में अपना ही समय बरबाद करना होता है। वे तो चिकने घड़े होते हैं, उन पर किसी की भी अच्छी बात का कोई असर नहीं होता।
शक्यो वारयितुं जलेन हुतभुक्छत्रेण सूर्यातपो
नागेन्द्रो निशिताङ्कुशेन समदो दण्डेन गोगर्दभौ।
व्याधिर्भेषजसङ्ग्रहैश्च विविधैर्मन्त्रप्रयोगैर्विषं सर्व- स्यौषधमस्ति शास्त्रविहितं मूर्खस्य नास्त्यौषधम्॥
अर्थात आग को जल से बुझा सकते हैं, सूर्य के ताप को छाते से रोका जा सकता है, मतवाले हाथी को अंकुश से वश में किया जा सकता है, पशुओं को डण्डे के बल से वश में किया जा सकता है, रोग औषधियों से शान्त हो सकता है, विष को भी अनेक मन्त्रों के प्रयोगों से शान्त कर सकते हैं। यानी सब उपद्रवों की औषधि शास्त्रों में मिल जाती है परन्तु मूर्ख के लिए कोई भी औषधि नहीं बनी है।
यह श्लोक हमें चेता रहा है कि मूर्ख व्यक्ति का कोई इलाज नहीं हो सकता। प्राकृतिक तापों से मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है। खूँखार पशुओं को भी मनुष्य प्रेम या कठोरता से वश में कर सकता है। उसी प्रकार हर रोग का भी उपचार किया जा सकता है। परन्तु मूर्ख व्यक्ति लाइलाज होता है। उसके लिए कित्तने भी उपाय कर लो परन्तु वह किसी की अच्छी बातों को न मानता है और न ही समझना चाहता है।
इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाना चाहिए कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया जाए या उनसे किनारा कर लिया जाए या उनको मजाक का पात्र समझ लिया जाए। अपनी ओर से सदा ही उन्हें अपने प्रेम से या डाँट-फटकार से सुधारने का प्रयास करते रहना चाहिए। शायद कभी किसी क्षण, किसी की कही गई कोई बात उनके मन पर लग जाए या चुभ जाए और उनके जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाए। फिर वही समाज के दिग्दर्शक बन जाएँ।
महाकवि कालिदास जैसे महामूर्ख अपवाद स्वरूप इस धरा पर कभी-कभार ही जन्म लेते हैं। वे इतने मूर्ख थे कि जिन्हें इतना भी ज्ञान नहीं था कि जिस टहनी पर बैठकर उसे काट रहे हैं, उसके कटते ही वे स्वयं भी गिर जाएँगे। विधि का विधान था कि उन्हें परम विदुषी पत्नी मिली। उसके द्वारा घर से निकाला जाना उनके जीवन का टर्निग प्वाइंट बन गया था। मूर्ख होते हुए भी उन्होंने उस अपमान को अपने हृदय पर लिया। इसके फलस्वरूप विद्वानों की संगति और ईश्वर की उपासना करके वे उच्चकोटि के विद्वान् बने जिन्हें आज सम्पूर्ण विश्व नमन करता है।
इसलिए अपनी ओर से उन्हें सन्मार्ग पर लाने का प्रयास करते रहना चाहिए। उन्हें पशुवत या खिलौने की तरह न समझकर अपनी तरह ही इन्सान मानना चाहिए। उनके साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। हो सके तो कोई ऐसा कार्य उन्हें सिखा दिया जाए जिससे वे अपना पेट भरने के योग्य बन जाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 10 जून 2017
अपरिग्रह करें
अपरिग्रह से तात्पर्य है आवश्यकता से अधिक संग्रह न करके जरूरत के अनुसार करना। यह अपरिग्रह हमें मितव्ययिता सिखाता है। जिसका तात्पर्य है कि हम हमेशा अपनी आवश्यकताओं को सीमित रखें उन्हें इतना अधिक न बढ़ाएँ कि जीवन भर अपना सुख-चैन गँवाकर मारामारी करनी पड़े।
हर धर्म अनावश्यक रूप से संग्रह न करने का परामर्श देते हैं। यह संग्रह धन, संपत्ति, गाड़ी, वस्त्र, आभूषण आदि किसी भी वस्तु का हो सकता है। संग्रह प्रवृत्ति की जब अति हो जाती है तो मनुष्य घर-परिवार, बंधु-बांधवों व समाज से कट जाता है। बस अपने को झोंक देता है इस खबत में। घर-परिवार, बंधु-बांधवों यहाँ तक की अपने बच्चों को भी भूल जाता है। और यह जनून कभी-कभी पागलपन की हद तक भी पहुँचकर कष्टकारक बन जाता है।
जब मनुष्य पर अति संग्रह की भावना हावी हो जाती है तब वह पाप-पुण्य, धर्म-अधर्म, अच्छा-बुरा सब भूल जाता है। वह जायज-नाजायज हर हथकंडा अपनाता है। उसी का परिणाम है आज समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, रिश्वतखोरी, बेइमानी, धोखा धड़ी एक दूसरे का गला काटने में भी परहेज न होना आदि। इंसान इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, प्रापर्टी टैक्स और एक्साइज ड्यूटी बचाने के तरह-तरह के प्रपंच करने से बाज नहीं आता।
तथाकथित धर्मगुरु जन साधारण को अपरिग्रह का उपदेश देते हैं पर स्वयं धन-संपत्ति का संग्रह करते हैं या दिन-प्रतिदिन देश-विदेश में उसे बढ़ाने की कोशिश में भोले-भाले लोगों से छल-प्रपंच करने में लगे रहते हैं। आखिर वे लोग क्योंकर भूल जाते हैं कि उनकी खबर लेने वाला वह ईश्वर की आँखें उन्हें हरपल व हरक्षण देखती रहती हैं। उनका अपना जमीर भी उन्हें कचोटता होगा पर शायद वे इतने खुदगर्ज बन जाते हैं कि अपनी अंतरात्मा की आवाज़ भी वे अनसुनी कर देते हैं। ऐसे उनके कथन का प्रभाव लोगों पर नहीं हो सकता।
अपरिग्रह का यह अर्थ कदापि नहीं कि हम घर-बार छोड़ कर साधु बन जाएँ और जंगलों में जाकर तपस्या करें। बल्कि अपरिग्रह की प्रवृत्ति हमें दुखों से बचाना चाहती है। इसका सीधा-सा अर्थ है कि अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके हम अपना जीवन सुखी बना सकते हैं। अपने ऊपर परेशानियों को कम लादेंगे तो टेंशन व अन्य बिमारियों से बचे रहेंगे।
इसीलिए हमारे संतकवि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं-
साईं इतना दीजिए जा में कुटुम्ब समाए।
मैं भी भूखा न रहूँ साधु भी भूखा न जाए॥
यह है अपरिग्रह का सटीक विचार।
संग्रह करने की मनाही कदापि नहीं है। अपने घर-परिवार की आवश्यकताओं को भली-भाँति पूरा कर सकें तथा अपने अच्छे-बुरे समय के लिए तो अपने पास होना चाहिए। यदि ऐसा न हो तो फिर जिन्दगी की धूप-छाँव किस का मुँह देखेंगे? उस समय कोई भी सहायक नहीं बनता।
यदि मनुष्य दृढ़ता पूर्वक अपनी आवश्यकताओं को सीमित करे तो आर्थिक विषमता समाप्त की जा सकती है।जीवन शांतिपूर्ण व सुखमय हो सकता है। इसका अर्थ है निरंतर श्रम करके समाज से उतना ग्रहण करें जितनी आवश्यकता है। शेष समाज के भलाई के कार्यों में लगाना चाहिए।
हमारी संस्कृति में इसे अपनाने पर बल दिया है। महात्मा बुद्ध व भगवान महावीर ने अहिंसा के साथ-साथ अपरिग्रह पर बल दिया है जिसकी आज के युग में बहुत सार्थकता है। विचारकों ने हमेशा परिग्रह का तिरस्कार करके अपरिग्रह को महत्त्व दिया है।
यह हम पर निर्भर करता है कि हमें जीवन में सुख-शांति चाहिए या मारा-मारी वाली दुख-परेशानियों से भरी जिन्दगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 9 जून 2017
आधुनिकीकरण में जीवन
कुछ दशक पूर्व हमारे देश में सभी गृहणियाँ बैठकर खाना पकाया करती थीं। जमीन पर चूल्हा बनाया जाता था, उसमें लकड़ी जलाकर भोजन बनाने की प्रथा थी। फिर अँगीठी का प्रयोग होने लगा जिसे कोयले और लकड़ी से सुलगाया जाता था। अभी भी गाँवों आदि में यह चूल्हा प्रचलन में है। प्रात: का खाना पकाने के पश्चात सायंकाल के लिए उसमें रात के खाने हेतु कुछ भी पकाने के लिए चढ़ा दिया जाता है। धीमी-धीमी आँच पर पका हुआ वह भोजन बहुत ही स्वादिष्ट और पौष्टिक होता है, उससे आज हम वञ्चित हो गए हैं।
आज रसोईघर में शेल्फ डालकर खाना खड़े होकर बनाया जाता है। चूल्हे का स्थान गैस ने ले लिया है। कूकर से गैस पर खाना निस्सन्देह शीघ्र बन जाता है। इससे समय व ईंधन दोनों की बचत होती है। परन्तु यह भी सत्य है कि इस खाने में वैसा स्वाद नहीं होता। आजकल बनने वाले मॉड्यूलर किचन सभी सुविधाओं से भरपूर होते हैं। महिलाएँ खाना पकाने का सारा सामान हाथ बढ़ाकर बिना किसी कष्ट के सरलता से ले सकती हैं।
आधुनिकीकरण ने मनुष्य को जहाँ सुविधाओं से सम्पन्न किया है, वहीँ दूसरी ओर उसके लिए काँटे बोने का कार्य भी किया है। सभी सुविधाओं से सम्पन्न इन आधुनिक रसोईघरों में चमक-दमक बहुत है। इनमेँ खाना बनाने के समय की बचत होती है। लकड़ियों से होने वाले धुँए और कष्ट के बिना ही भोजन तैयार हो जाता है। साथ ही बर्तन भी चमकते रहते हैं, उन्हें अधिक घिसने की आवश्यकता भी नहीं रहती। जरा-सा विम लगाओ और बर्तन जगमग करने लगते हैं।
बैठकर खाना बनाते समय गृहणियों को बार-बार उठकर सामान लेना पड़ता था। इससे अनजाने में ही उनका व्यायाम हो जाया करता था जो उनके लिए स्वस्थ के लिए लाभदायक होता था। आधुनिक रसोईघरों में सारे कार्य खड़े होकर निपटाए जाते है। वहाँ नीचे झुकने या नीचे बैठने की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस प्रक्रिया से स्वभाविक रूप से महिलाओं का व्यायाम नहीं हो पाता। इसलिए टाँगों और पैरों पर सारे शरीर का भार पड़ता रहता है जो समय बीतते कई बिमारियों को अनायास ही न्योता दे बैठता है।
इतनी सब अच्छाइयों के बावजूद कहीं कुछ अधूरापन कचोटता रहता है। पहले रसोईघर में जमीन पर बैठकर जो खाना खाया जाता था उसमें कुछ और ही आनन्द आता था जो आज मंहगे और डिजाइनर डाइनिंग टेबल पर बैठकर खाने से भी नहीं आता। कुछ लोग उन चूल्हों और उन पर पके हुए खाने को देखकर अपनी नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं जैसे पता नहीं उन्होंने क्या देख लिया हो?
तब माँ के हाथ का बना खाना प्यार से खाया और खिलाया जाता था। साथ ही सब लोग अपने दिन भर की घटने वाली घटनाओं की भी चर्चा किया करते थे। माता-पिता बात-बात में बच्चों को संस्कार भी देते रहते थे। ऐसे में बच्चे संस्कारी और घर के सभी सदस्यों की परवाह करने वाले बनते थे। परन्तु आज यह सब स्वप्न जैसा होता जा रहा है।
आज बहुत सारा पैसा कमाने की होड़ में सब कुछ पिछड़ता जा रहा है। सभी लोग सदा भागमभाग में लगे रहते हैं, किसी के पास तसल्ली से बैठकर खाने का समय ही नहीं होता। उस पर घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों और कार्यालय का तनाव भी बना रहता है। बच्चों को भी इसलिए संस्कार देने का कार्य करना सम्भव नहीं हो पाता। तभी माता-पिता अनजाने में ही अपने बच्चों को उद्दण्ड बनाते जा रहे हैं।
जिस अन्न के लिए मनुष्य कोल्हू का बैल बना दिन-रात खटता रहता है, उसी को खाने का समय उसके पास नहीं निकल पाता। यह स्थिति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण कही जा सकती है। ऐसे में चमकते हुए घर तो बस न चाहते हुए सराय अथवा होटल की तरह बनते जा रहे हैं।
आधुनिकीकरण होना बहुत अच्छा है। यह हमारी उन्नति का परिचायक है। साथ ही हमें अपनी विरासत को नकारकर उसका उपहास नहीं करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 8 जून 2017
अन्तस् की धूल हटाएँ
लौकिक या ईश्वरीय कोई भी सम्बन्ध ऐसा ही नहीं है जिसके लिए हमारे मनों पर धूल नहीं जमती। जब तक वहाँ धूल जमी रहती है तब तक सब धुँधला-धुँधला दिखाई देता है। जब उस धूल को हटाकर सफाई कर देते हैं तब सब पारदर्शी हो जाता है।
यह सब कहने का यही अभिप्राय है कि हर रिश्ता प्यार और विश्वास पर टिका होता है। जितना हम एक-दूसरे के प्रति संवेदनशील रहेंगे, वह सम्बन्ध उतना ही अधिक करीबी बन जाता है।
अब सोचने वाली है कि यह कौन-सी धूल है जिसकी यहाँ चर्चा की जा रही है? मन पर यह कैसे जम जाती है? इसे साफ कैसे किया जा सकता है?
ईर्ष्या, द्वेष, काम, क्रोध, मोह, माया, लालच, अहंकार आदि की धूल हमारे मन पर जम जाती है। हम प्राय: आवेश में आ जाते हैं। किसी दूसरे की भौतिक उन्नति, समृद्धि, वैभव, ज्ञान आदि को हमारा अहं सहन नहीं कर पाता। इसीलिए हम दूसरों की ओर से उदासीन हो जाते हैं और दूरी बना लेते हैं। हम अपने बन्धु-बान्धवों के बीच भेदभाव की दीवारें खड़ी करते रहते हैं। सम्बन्धों के बीच नफरत के बीज बोते रहते हैं।
धीरे-धीरे समय बीतने पर सारी यादें धुँधली पड़ जाती हैं। इस कारण हमारे मनों में दरारें पड़ने लगती हैं। हमें सब कुछ बदरंग दिखाई देने लगता है। कुछ भी साफ नहीं दिखता। यदि हम इनसे पीछा छुड़ाना चाहते हैं तब हमारा अहं आड़े आ जाता है। तब हम चाहकर भी अपनी दुर्भावनाओं से मुक्त नहीं हो पाते और हमारे मनों में जमी हुई धूल बढ़ती जाती है।
हमारे अपने घर में जो भी फर्नीचर होता है, उसे हम प्रतिदिन झाड़-पौंछकर साफ करते हैं, उसे चमकाकर सजाते हैं। इसी तरह अपने घर को भी शीशे की तरह चमकाते हैं ताकि वहाँ आने-जाने वाला हर व्यक्ति हमारे सलीके की प्रशंसा करे। घर यदि साफ-सुथरा होता है तो वहाँ सकारात्मक ऊर्जा प्रसरित होती है। वह हमारे तन, मन को प्रफुल्लित करती है। इसके विपरीत धूल आदि गंदगी रहने पर नकारत्मक ऊर्जा रहती है जिससे तन और मन दोनों रोगी हो जाते हैं।
इस प्रकार हम प्रतिदिन धूल को झाड़कर साफ करते हैं। अपने घर के बाहर सड़क पर जमी धूल भी हमें अच्छी नहीं लगती। उसे कितनी भी साफ कर लो फिर दुबारा उस पर धूल हो ही जाती है। हम बार-बार सफाई करते हैं परन्तु धूल भी अपना साम्राज्य फिर से स्थापित कर लेती है।
अपने मन पर नित्य जम रही धूल के प्रति हम लापरवाह रहते हैं। हम उसे साफ करने अथवा हटाने का कोई प्रयास ही नहीं करते। अपने घर की धूल हमें परेशान करती है पर मन की धूल को हम बड़े प्यार से पालते हैं। उसे अपना मीत बना लेते हैं। उससे हमें तनिक भी चिड़चिड़ाहट नहीं होती।
यदि हम अपने मन पर पड़ी अथवा विचारों की धूल को दूर करने का यत्न करे तो निश्चित ही सफलता मिलेगी। जब हम इसे हटा देंगे तो हमारे अन्तस् की जड़ता दूर हो जाएगी। वर्षा के बाद जैसे सारी प्रकृति चमकती हुई दिखाई देती है वैसे ही धूल के दूर हो जाने से सब कुछ साफ-साफ दिखाई देता है।
बन्धु-बान्धवों के प्रति मन में पनपने वाला रोष धुलकर सब चमकता हुआ प्रतीत होता है। मनों में आई हुई मलिनता नष्ट होने लगती है। तब उनको कसौटी पर परखने की आवश्यकता नहीं रहती। मन में आने वाले ग्लानि के भाव सभी को बहुत सुकून देते हैं।
यथासम्भव अपने अन्तस् की धूल को साफ करने के लिए ईश्वर की उपासना, सद् ग्रन्थों का अध्ययन और सज्जनों की संगति में रहना चाहिए। इससे मनों में सरलता और सहजता का वास होता है। जिससे सहृदयता बढ़ती है। उसे शीशे की तरह चमकाने से सकारात्मक किरणें प्रवाहित होती हैं। वे हमारे पास आने वाले सभी लोगों को प्रभावित करती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 7 जून 2017
अन्नदाता किसान
किसान जो हमारे अन्नदाता हैं उनकी दशा हमारे देश में हमेशा से ही शोचनीय रही है। इसका सबसे बड़ा कारण रहे हैं उनकी अशिक्षा और आर्थिक रूप से पिछड़ापन। हालांकि आज उनके बच्चे पढ़ने लगे हैं। फिर भी अभी बहुत कुछ करना है उनके लिए।
बहुत से गाँव इतने वर्षों की आजादी के बाद भी अभी तक शहरों से नहीं जुड़ पाए हैं, वहाँ पक्की सड़कें नहीं हैं। दिल्ली जो भारत की राजधानी है वहाँ भी लोग बिजली और पानी के संकट से यदा कदा जूझते रहते हैं तो उन दूर-दराज के गाँवों में तो यह समस्याएँ मुँह बाए खड़ी ही रहती हैं।
पहले समय में कृषि पूर्णरूपेण वर्षा पर आधारित रहती थी। आज भी उन स्थितियों में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ है। यद्यपि कृषि के लिए बहुत से आधुनिक यन्त्र बन गए हैं जिनका उपयोग किसान करते रहते हैं परन्तु फिर भी वर्षा उनके इरादों पर पानी फेर देती है। अतिवृष्टि, अनावृष्टि और असमय ओलावृष्टि आदि प्राकृतिक आपदाएँ उनकी फसलों को बरबाद कर देती हैं।
महंगाई के चलते उर्वरक, खाद और बीज इत्यादि दिन-प्रतिदिन बहुत महंगे होते जा रहे हैं। उनको खरीदने के लिए धन की आवश्यकता होती है। जिसे वह साहूकार से या बैंक से कर्ज के रूप में लेता है। यदि फसल अच्छी हो गई तो कर्ज का भुगतान कर दिया जाता है। परन्तु यदि दुर्भाग्यवश फसल बरबाद हो जाए तो फिर कर्ज चुका पाना असम्भव हो जाता है। किसान अच्छी फसल की आशा में बच्चों की शादी, घर की मुरम्मत आदि की योजनाएँ बनाता है। लेकिन जब फसल ही चौपट हो जाती है तब उसकी सारी योजनाएँ धरी की धरी रह जाती हैं।
पीढ़ी दर पीढ़ी हमारे किसानों की जमीन के टुकड़े छोटे होते जा रहे हैं। उस पर मौसम की मार और कर्ज लिया धन उनकी कमर ही तोड़ देता है। वे असहाय हो जाते हैं। बैंकों से लिए कर्ज को न चुका पाने के कारण उनके गुँडानुमा एजेण्ट उनके मन में इतना आतंक भर देते हैं कि आत्महत्या के अतिरिक्त उन्हें और कोई उपाय नहीं सूझता।
पहले समय में साहूकार उन अनपढ़ किसानों को पीढ़ियों को थोड़े से कर्ज को न चुका पाने के कारण बंधक बना लिया करते थे। इसी विषय से सम्बन्धित स्कूल में पढ़ी हुई इंगलिश भाषा में लिखी कहानी 'A handful of wheat' यानि 'मुट्ठी भर अनाज' जो ऋण स्वरूप लिया गया था, उसकी याद आ रही है। इसके लेखक शायद मुलख राज आनन्द हैं।
लेखक ने इसमें लिखा है कि किसानों की दुर्दशा का वर्णन किया है। अपनी किसी आवश्यकता के कारण साहूकार से थोड़ा-सा ऋण लेता है और उस पर चक्रवृद्धि ब्याज के अनुसार उसका बढ़ता रहता ऋण कभी चुकाया गया माना नहीं जाता। फिर उस ऋण को चुकाने के लिए उसके बच्चों को सारी आयु उसी प्रक्रिया से गुजरने के लिए विवश होना पड़ता है।
पहले साहूकारों का आतंक होता था जो ब्याज के रूप में उनकी फसलें कटवाकर ले जाया करते थे और अब बैंकों का खौफ रहता है। इनके अतिरिक्त इन छोटे किसानों के पास अनाज सुरक्षित रखने के लिए भण्डार गृह भी नहीं होते। इन्हें औने-पौने भाव अपनी मेहनत से उगाई हुई फसल को दलालों को बेचना पड़ता है। मण्डियों में जाकर भी उन्हें अपनी फसल का उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
सरकार और स्वयं सेवी संस्थाएँ किसानों की समस्याओं को सुलझाने का प्रयास करते रहते हैं। उन सबके किए गए उपाय अभी किसानों की दशा को सुधारने में सफल नहीं हो पा रहे हैं। हम सभी को भी उनके प्रति संवेदनशील होना चाहिए और उनके उत्थान के लिए मनन करना चाहिए। किसानों को सड़क पर उतारकर आन्दोलन करने के लिए यदि विवश होना पड़े तो बहुत दुख की बात है।
ऐसे किसान जो परिश्रम करके हमें जीवन देते हैं, हम उनके प्रति थोड़ा भी संवेदनशील नहीं हैं। वे किसान और उनके परिवारी जन दाने-दाने को तरसते हैं और हम सबका पेट भरने के लिए दिनोंदिन फाके करते हैं। हम उनके परिश्रम का मूल्य तो नहीं चुका सकते पर अन्न को सुरक्षित रखकर उनकी मेहनत का सम्मान तो कर सकते हैं। अपने झूठे अहं का प्रदर्शन करते हुए अपनी पार्टियों में अन्न को बरबाद होने से बचा सकते।
चन्द्र प्रभा सूद
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