नंगे पैर यानि बिना जूता या चप्पल पहने चलना हाईजीन और स्वास्थ्य दोनों ही के लिए लाभदायक होता है। विद्वानों कहते हैं हरी घास पर प्रातःकाल चलने से आँखों की रौशनी बढ़ती है। इसीलिए सवेरे पार्क में बहुत से लोग यह क्रिया करते हुए दिखाई देते हैं।
बहुत से घरों में आज आधुनिक सुविधाओं वाले माडर्न रसोईघर बन गए हैं, वहाँ सारा कार्य खड़े होकर किया जाता है। इसलिए वहाँ जूता या चप्पल ले जाने पर कोई प्रतिबन्ध नहीं होता। अभी भी बहुत से परिवार ऐसे मिल जाएँगे जिनके रसोईघर में जूते-चप्पल ले जाने की मनाही है। वे मानते हैं कि जहाँ खाना बनता है वहाँ इन्हें ले जाने से शुद्धता नहीं रहती और इनके साथ कई कीटाणु घर में प्रवेश कर जाते हैं।
इसी तरह आज भी अनेक घर ऐसे मिल जाएँगे जहाँ घर के भीतर जूते आदि नहीं लाए जाते बल्कि घर का हर सदस्य उन्हें मुख्य द्वार के बाहर ही उतारकर घर में प्रवेश करता है। इसका कारण है कि वे अपने घर को बाहर की गन्दगी से बचाकर शुद्ध रखना चाहते हैं।
प्रायः सभी धर्मस्थलों में भी जूते-चप्पलों को बाहर उतारा जाता है। अधिकांश स्थानों पर उनके लिए विशेष व्यवस्था की जाती है। यहाँ भी उन स्थलों की पवित्रता और शुद्धता मुख्य कारण होती है। इसी प्रकार के अन्य सभी धार्मिक आयोजनों में चाहे वे घर पर हों अथवा कहीं अन्यत्र क्यों न हो रहे हों इन्हें बाहर ही उतारने का विधान है। घरों, दुकानों, फैक्टरी या किसी भी आयोजन में पूजा करते समय इन्हें उतार दिया जाता है। इस धार्मिक आस्था पर कोई भी प्रश्नचिह्न नहीं लगाता।
अस्पतालों के गहन चिकित्सा कक्ष यानि आई सी यू में रोगियों को बाहरी कीटाणुओं के आक्रमण से बचाने के लिए जूते-चप्पलों को उस कक्ष के बाहर ही उतारने का आदेश लिखा होता है।
23 जून को नीरू नायर ने नंगे पाँव चलने के विषय में 'काम की बातें' ग्रुप में उपयोगी जानकारी दी है। उनका मानना है कि नंगे पैर रहने से एनर्जी लेवल बढ़ता है और घुटनों एवं कूल्हों की हड्डियाँ मजबूत होती हैं। खाली पैर चलना एक प्रकार की एक्सरसाइज है। रोजाना आधा घंटा पैदल चलने से हार्ट की बीमारी, डायबिटीज और कैंसर जैसे रोगों से मुक्ति मिल सकती है।
कुछ लोग घर में भी खाली पैर घूमना पसंद करने लगे हैं क्योंकि इससे कई तरह के पॉजिटिव एफेक्ट्स भी शरीर पर पड़ते हैं। सेहत के लिए गर्मी के दिनों में नंगे पैर चलना अधिक फायदेमंद होता है। यह शरीर को ठंडा रखता है। ऐसा भी देखा गया है कि बचपन में अधिक खाली पैर रहने से बड़े होने पर पैर की तकलीफें कम होती हैं।
नीरू की इन बातों में सार अवश्य है। इसे मान लेने से किसी प्रकार की हानि नहीं हो सकती। इस प्रकार नंगे पाँव चलने से पैर अवश्य गन्दे हो सकते हैं, परन्तु उसके लाभ अधिक हैं।
जैन साधु आज भी बिना जूता पहने रहते हैं। वे एक स्थान से दूसरे स्थान की यात्रा नंगे पैर ही करते हैं। उनका विचार है कि जूतों के नीचे आकर मरने वाले कई जीवों की हत्या के पाप से बचा जा सकता है।
कुछ लोग अपनी गरीबी या विपन्न अवस्था की लाचारी के कारण सड़कों पर घूमते हुए भी दिखाई दे जाते हैं। वे लोग भी प्रायः स्वस्थ ही रहते हैं।
हमारी पृथ्वी मे हर तरह की धातुएँ पाई जाती हैं जो हमारे शरीर के लिए उपयोगी हैं। नंगे पैर चलकर हमें वे धातुएँ स्वतः मिल जाती हैँ जिनकी कमी हो जाने पर हम डाक्टरों के पास जाकर अपना अमूल्य समय व कमाया हुआ धन खर्च करते हैं और फिर उनके निर्देशानुसार उन्हें दवा के रूप में खाते हैं।
नंगे पैर चलना चाहे धार्मिक कारण से हो अथवा स्वास्थ्य के लिए हो, उसके पीछे भावना मनुष्य के कल्याण की ही होती है। इससे कोई हानि नहीं होती, इसलिए इसे अपनी आदत में शामिल कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 7 अगस्त 2017
नंगे पैर चलना लाभदायक
रविवार, 6 अगस्त 2017
रक्षाबन्धन का त्योहार
भाई-बहन का सम्बन्ध अटूट है और ईश्वर की ओर दिया गया एक अनमोल उपहार है। ये दोनों अर्थात भाई और बहन एक-दूसरे के पूरक हैं। भाई यदि घर की शान है तो बहन घर का मान होती है। बहन के लिए भाई का और भाई के लिए बहन का प्यार अमूल्य होता है।
भारतीय संस्कृति में बहन एक अनमोल बन्धन माना जाता है। मृत्युपर्यन्त भाई इस रिश्ते को अपना कर्तव्य के समझकर अपनी हैसियत के अनुसार भली भाँति निभाता है। इसी रिश्ते के प्रतीक-स्वरूप रक्षाबन्धन व भैयादूज त्योहार हैं। ये सामाजिक त्योहार भाई-बहन के प्रगाढ़ बन्धन के प्रतीक हैं। रक्षाबन्धन जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस त्योहार में बहन भाई को राखी के स्वरूप में रक्षाकवच बाँधती है और भाई उसे यथाशक्ति उपहार देकर आयुपर्यन्त रक्षा करने का वचन देता है। भैयादूज पर बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है भाई सामर्थ्यानुसार बहन को उपहार देता है। भाई चाहे छोटा हो या बड़ा हमेशा बहन का सहारा बनता है।
यद्यपि आज के भौतिकतावादी युग में ये सम्बन्ध भी अछूता नहीं रहा। कहीं-कहीं किन्हीं परिवारों में धन-संपत्ति को लेकर भाई-बहन के संबंधों में कुछ कड़वाहट अवश्य आ गई हैं। पर वे कुछ परिवार अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि जिस धर्म में अपने रक्त सम्बन्धों में विवाह की अनुमति है वहाँ भी सगे भाई-बहन में विवाह निषिद्ध है।
इस कथन का यही तात्पर्य है कि भाई-बहन का संबंध बहुत ही पवित्र है इसे उन दोनों को ही सच्चे मन से निभाना चाहिए।
यहाँ हम यह भी जोड़ सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में यदि सगी बहन न होते हुए किसी युवती को बहन मान लिया जाता है तो उसके साथ भी ताउम्र वैसा ही संबंध निभाया जाता है जैसा रिश्ता सगी बहन के साथ निभाया जाता है।
ईश्वर भाई और बहन के इस रिश्ते की पवित्रता बनाए रखे।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 5 अगस्त 2017
सफलता मिलने पर विनम्रता
इन्सान को हर परिस्थिति में सदैव प्रसन्न रहने का प्रयास करना चाहिए। सफलता मिले अथवा असफलता, हर परिस्थिति से शिक्षा लेकर या सबक लेकर उसे आगे बढ़ने का अभ्यास करना चाहिए। यहाँ मैं यही कहना चाहती हूँ कि अपनी सफलता की प्राप्ति पर उसे खुश अवश्य होना चाहिए और अपनी ख़ुशी अपने बन्धु-बान्धवों के साथ बाँटनी भी चाहिए। परन्तु सन्तुष्ट होकर, हाथ-पर-हाथ रख करके नहीं बैठ जाना चाहिए। सफलता के लिए मनुष्य को निरन्तर प्रयत्नशील बने रहना चाहिए।
इसका एक विशेष कारण यह है कि मिलने वाली हर छोटी या बड़ी उपलब्धि को प्राप्त करने के बाद यदि मनुष्य सन्तुष्ट होने लग जाएगा तो उसकी उन्नति का मार्ग निश्चित ही अवरुद्ध हो जाएगा। इसलिए अधिकाधिक सफलताओं को उसे अपने खाते में जोड़ लेना चाहिए। एक के बाद एक सफलता के सौपानों पर अनवरत चढ़ने वाले किसी भी मनुष्य को अपने से कहीं पीछे छूट गए अथवा नीचे खड़े हुए लोगों का तिरस्कार करने का अधिकार कदापि नहीं मिल जाता।
उस अवस्था में उसका यह महत कर्तव्य बनता है कि उन लोगों को सफलता की ओर आगे बढ़ने के लिए वह प्रोत्साहित करके अपने मानवता के गुण को साकार करे। हर मनुष्य का नैतिक दायित्व बनता है कि वह अपने साथ दूसरों के विषय में भी सोचे। यदि मनुष्य अपने सच्चे मन से और निस्वार्थ भाव से ऐसा कर पाता है तो चारों दिशाओं में उसका यश निस्सन्देह प्रसरित है। समाज उसे शीघ्र ही अपना पथ-प्रदर्शक स्वीकार कर लेता है।
इसका अर्थ यह भी कर सकते हैं कि नित्य प्रति मैडल या तमगे बटोरने वालों को सदा ही सिर झुका करके उन्हें प्राप्त करना होता है। यदि वे वहाँ अकड़कर खड़े हो जाएँ तो उन्हें वैसा करने नहीं दिया जाएगा और सर्वत्र उनकी निन्दा होगी। इसलिए ऐसे सफल मनुष्य को सदा ही विनम्र बनना चाहिए। वह फलदायी महान वृक्ष की तरह जितना अधिक झुकेगा यानी विनम्र बनेगा, सफलता रूपी फल उसे उतने ही अधिक मिलेंगे। दूसरों के साथ साथ वह अपना मनोबल भी बढ़ाता रहेगा। इस तरह उसके लिए अनजाने ही एक पंथ और दो काज वाली स्थिति बन जाती है।
मनीषी हमें समझाते हुए कहते हैं -
नमन्ति फलिनो वृक्षा: नमन्ति गुणिनो जना:।
शुष्कवृक्षाः मूर्खाश्च न नमन्ति कदाचन॥
अर्थात फलों से लदे वृक्ष झुकते हैं और गुणीजन झुकते हैं या विनम्र होते हैं। इसके विपरीत सूखे पेड़ या ठूँठ और मूर्ख मनुष्य कभी नहीं झुकते।
यह श्लोक स्पष्ट बताता है कि मनुष्य का सबसे प्रमुख गुण विनम्रता है। मनुष्य जब तक जीवित है और संवेदनशील है उसे विनम्र होना चाहिए। अकड़कर रहने का काम मुर्दों के लिए छोड़ देना चाहिए क्योंकि उस समय वह खाली हाथ होता है।
जब कभी मनुष्य असफलता का मुँह देख ले, तो निराश होकर अथवा गुमनमी के अँधेरों में सदा के लिए खो नहीं जाना उसके लिए उचित नहीं है। स्मरणीय है यह बात कि परिश्रम करने वालों की कभी हार नहीं होती। सफलता को अन्ततः उनके पास आना ही पड़ता है। छोटी-सी चींटी का उदाहरण हमेशा याद रखना चाहिए कि बार बार हारने के बाद वह सफल हो जाती है। हम तो फिर विवेकी मनुष्य हैं।
सफलता छोटी अथवा बड़ी नहीं होती है बल्कि महत्वपूर्ण होती है। मनुष्य द्वारा किए गए ईमानदार अथक परिश्रम का वह परिणाम होती है। केवल भाग्य के भरोसे रहकर, निठ्ठले बैठकर सफलता को कदापि प्राप्त नहीं किया जा सकता। यथायोग्य कर्म करके अपने मनोवाञ्छित फल को हाथ बढ़ाकर पा सकते हैं। अतः मनुष्य को अपने जीवन में मुस्कुराहट लाने के लिए अपने पराक्रम पर सदैव भरोसा रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 4 अगस्त 2017
हत्या अपराध
जीवहत्या को हम क्या मानते हैं, हमारी सोच पर निर्भर करता है। यह एक बहुत बड़ा अपराध है। किसी को भी कारण-अकारण जान से मार देना कोई बड़ा बहादुरी का कार्य नहीं है। इसलिए हर सामर्थ्यवान व्यक्ति का कर्त्तव्य बनता है कि वह यथासम्भव असहायों की रक्षा करे। यहाँ हम चर्चा करेंगे कि किन-किन मनुष्यों का वध न करके उनकी रक्षा करना कर्त्तव्य होता है।
महर्षि वाल्मीकि ने 'वाल्मीकि रामायण' में इसे स्पष्ट करते हुए कहा है-
अयुद्धयमानं प्रच्छन्न प्राञ्जलिं शरणगतम्।
पलायन्तं प्रमत्त वा न त्वं हन्तुमिहार्हसि॥
अर्थात् (अयुद्धमान ) बिना शस्त्र के, (प्रच्छन्न ) छिपा हुआ, (करबद्ध ) हाथ जोड़े हुए , (शरणागत ) शरण में आए हुए, पलायन करने वाले अथवा उन्मत्त (पागल) व्यक्ति का वध करना उचित नहीं है।
इसी विषय पर 'हिंगुलप्रकरण' में प्रकाश डालते हुए कहा है-
यो दधाति तृणं वक्त्रा प्रत्यनीकोSपि मानवो।
सोSवध्य: सतां लोके कथं वध्यातृणादना:
अर्थात् जो शत्रु अपने मुख में तृण ले लेता वह अवध्य होता है यानि उसका वध नहीं किया जाता।
जो व्यक्ति निहत्था है, उस पर वार करना अनुचित होता है। हथियारों से लैस यदि निरपराधियों को मौत के घाट उतार देता है तो इसे कायरता ही कहा जाएगा। अपने बराबर के लोगों से युद्ध किया जाए तो उसका परिणाम द्रष्टव्य होता है।
जो व्यक्ति छिपा हुआ है, उस पर भी वार नहीं करना चाहिए। प्राचीनकाल में युद्ध के मैदान में भी ऐसा न करने के लिए कहा जाता था। हो सकता है डर के कारण छिप जाने वाला निर्दोष हो।
जो व्यक्ति हाथ जोड़कर गिड़गिड़ा रहा है, क्षमायाचना कर रहा है उसे मारकर भी कोई तमगा नहीं मिल सकता। उसे यदि क्षमा कर दिया जाए तो वाह-वाही अवश्य मिल सकती है।
शरण में आए हुए शरणागत की रक्षा करना हर मनुष्य का कर्त्तव्य होता है। इतिहास में ऐसे अनेक उदाहरण हमें मिल जाएँगे, जहाँ शरणागत जीव की रक्षा करने के लिए अपने प्राणों को भी संकट में डाल दिया गया। राजा शिवि से बड़ा उदाहरण क्या होगा जिन्होंने निरीह कबूतर की रक्षा के लिए स्वयं को बाज के हवाले कर दिया था।
पलायन करने वाले का भी वध नहीं करना चाहिए। वह तो बेचारा स्वयं हालात का सामना नहीं कर पा रहा। इसीलिए वह पीठ दिखाकर भाग रहा है। उसे छोड़ देना चाहिए।
दुर्भाग्यवश जो उन्मत्त है, उसे मारकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। उसे अपने हाल पर ही छोड़ देना चाहिए।
जो व्यक्ति पहले से ही हार मान ले या मुँह में तिनका डाल ले उसका भी वध नहीं करना चाहिए।
ऐसे सभी शत्रु दया के पात्र होते हैं। उनका वध नहीं करना चाहिए। आज भी किसी अन्य देश में शरण लेने वाले किसी राजनायिक को या किसी मनुष्य को पूर्ण सुरक्षा दी जाती है। जो सेना युद्धक्षेत्र से पलायन करती है, उसे जाने दिया जाता है। दो देशों में सुरक्षा मुद्दों पर आवशकयक चर्चा होना भी इसी का ही एक रूप है। एक देश के नागरिक या मछुआरे आदि गलती से दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर जाते हैं, उनसे पूछताछ करके बाद में छोड़ दिया जाता है।
प्राचीनकाल में युद्ध के भी नियम होते थे, जिनका पालन सभी राजा किया करते थे। आजकल सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया हैं। आधुनिक हथियारों से लैस शस्त्र न दिन देखते हैं और न रात ही देखते हैं, बस हमला करके निर्दोष नागरिकों को मौत के घाट उतार देते हैं। राजनैतिक क्षेत्र में या युद्ध के मैदान में शायद ये सारी बातें बहुत अधिक उपयोगी सिद्ध न हो सकें, परन्तु दैनन्दिन जीवन में इन सबकी हमें बहुत ही आवश्यकता होती है। मनुष्य जितना ही अधिक क्षमाशील बनता है, उतना ही उसे यश और मानसिक सन्तोष मिलता है, जो उसकी सबसे बड़ी दौलत होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 3 अगस्त 2017
धन का सदुपयोग सीखें
अपने परिश्रम या खून-पसीने से कमाए गए धन का सदुपयोग करना प्रत्येक मनुष्य को सीखना चाहिए। यानी घर-परिवार, देश, धर्म और समाज के लिए अपने धन को व्यय करना चाहिए। धन को मनुष्य का सहायक या रक्षक बनना चाहिए न कि उसे अपने पैर की बेड़ी बनने देना चाहिए। यदि कोई मनुष्य धन के आगमन पर नकचढ़ा बन जाएगा या अपने झूठे अहं के कारण दूसरों को कीड़े-मकौड़ों की तरह समझकर उनकी अवहेलना करने लग जाएगा तो उसे समाज से कटकर रहने के लिए विवश होता पड़ जाता है।
इस तरह वह समाज में अकेला पड़ जाता है। कोई भी बन्धु-बान्धव उसकी परवाह नहीं करता। हाँ, उससे मतलब होने पर उसकी चाटुकारी अवश्य कर लेते हैं। ये ऐसे सम्बन्ध होते हैं जो केवल स्वार्थ के कारण बनते हैं और उसके पूर्ण होने तक ही टिके रह पाते हैं। इन सम्बन्धों की अवधि बहुत सीमित समय के लिए होती है। ये सम्बन्ध लम्बे समय तक साथ नहीं निभाने में असफल रहते हैं।
इन्सान को यह भी सदा याद रखना चाहिए कि वह अपनी कमाई के हिसाब से नहीं बल्कि अपनी जरूरत के हिसाब से गरीब होता है। उसके पास प्रभूत धन हो परन्तु उसका मन संकीर्ण हो, तुच्छ हो अथवा वह धन पर कुण्डली मारकर बैठ जाए तो सब कुछ होते हुए भी वह व्यक्ति गरीब ही कहलाएगा। अर्थात उससे बड़ा गरीब इस दुनिया में और कोई हो ही नहीं सकता।
कहने का तात्पर्य यही है कि यदि धन की कमी नहीं है परन्तु घर के आवश्यक खर्चों में अनावश्यक कटौती की जाए और धन व्यय न किया जाए या उससे किसी असहाय की सहायता न की जाए या उसे किसी शुभकार्य, दानकार्य में खर्च न किया जाए या फिर सामाजिक कार्यों के लिए भी उसका उपयोग न किया जाए तो ऐसे धन का होना न होना बराबर होता है। उस धन का किसी के लिए कोई औचित्य नहीं रह जाता।
मनीषी ऐसे धन को मिट्टी के ढेले के समान समझते हैं। उनकी दृष्टि में यह अनुपयोगी धन व्यर्थ होता है। चाहे वह धन घर में पड़ा हो या बैंक के लॉकर में या फिर पुराने समय की तरह जमीन में गड़ा हो। ऐसा धन या तो चोर-डाकू लूटकर ले जाते हैं या फिर उन धनिकों के जामाताओं के काम में आता है।
ऐसे लोगों के बच्चों को जब उनकी मृत्यु के पश्चात प्रचुर धन बिना किसी परिश्रम और रोक-टोक के मिल जाता है तो वे उसे दोनों हाथों से उड़ाते हैं। उनकी इस अवस्था का लाभ अवसरवादी लोग उठाते हैं। वे उन्हें बहकाकर कुमार्गगामी बना देते हैं। उन्हें व्यसनों में उलझकर, उनके साथ ही उस पैसे पर स्वयं भी ऐश करते हैं। उस समय अपने शुभचिन्तक उन्हें जहर की तरह लगते हैं। जब सब लुट जाता है तब दूसरों को कोसने या लानत-मलानत करने से कोई लाभ नहीं होता।
ऐसे धनिक गरीबों की श्रेणी में ही गिने जाते हैं जो धन का उपयोग करने के स्थान पर अपनी चमड़ी या शरीर को कष्ट देना अधिक पसन्द करते हैं। जब तक यह उनके पास पैसा रहता है, तभी तक दुनिया उन्हें पूछ लेती है कि 'भाई तू कैसा है?' अन्यथा इस संसार में कोई भी किसी की परवाह नहीं करता। सभी अपने में मस्त रहते हैं।
मनुष्य यदि जीवन में लोकप्रियता पाना चाहता है तो उसे पैसों को हमेशा जेब में रखना चाहिए, अपने दिमाग में नहीँ। इसका अर्थ यही है कि पैसा सदा उसकी जेब में रहना चाहिए, उसे उसके सिर पर चढ़कर बोलना नहीं चाहिए। धन का उपयोग तभी होता है जब वह घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूर्ण करे, कष्ट में पड़े हुए बन्धु-बान्धवों की सहायता करे, परोपकारी कार्यों में लगाया जाए, देश-धर्म तथा समाज के हित के साधन में लगाया जाए।
जो व्यक्ति अपने धन का संग्रह न करके उसका सदुपयोग करते हैं, वही लोग वास्तव में अपने जीवन का आनन्द उठाते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं करना चाहिए कि मनुष्य अपने सुख-दुःख के लिए संचय न करे, बस अपनी मौज-मस्ती में या व्यसनों में उसे उड़ा दे या बरबाद कर दे। अपने धन को बरबाद करने वाले अन्ततः खली हाथ रह जाते हैं। फिर उन्हें अपने शेष जीवन में पश्चाताप करना पड़ता है। धन को व्यय करना भी एक कला है, एक अनुशासन है, जिसका पालन सभी मनुष्यों को करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 2 अगस्त 2017
भिन्न प्रकृति के लोग
आसपास रहने वाले या काम करने वाले बहुत से लोगों के साथ हमारा संपर्क होता है। सबकी प्रकृति अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के आचरण और व्याहार में हमें विभिन्नता दिखाई देती है। जिस प्रकार मनुष्य रंग-रूप में एक जैसे नहीं दिखाई देते उसी प्रकार उनकी आदतों में भी अन्तर स्पष्ट ही लक्षित होता है।
सामाज में रहते हुए वे सब के साथ कैसा व्यहार करते हैं? समाज उनकी स्थिति कैसी है? उसके अनुसार उन्हें हम चार श्रेणियों में इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं- 1. उदार 2. दाता 3. कंजूस 4. मक्खीचूस।
सबसे पहले हम उदार लोगों की चर्चा करते हैं। ये महानुभाव सारी पृथ्वी के जीवों को अपने हृदय से लगाकर रखने का जज़्बा रखते हैं। ये परोपकारी लोग सभी के चहेते होते हैं। हर व्यक्ति इनसे अपना संपर्क साधना चाहता है। ये निस्वार्थ भाव से सबके सुख-दुख में साथ निभाते हैं। लोग इनके पास अपनी परेशानियों के साथ आते हैं और प्रसन्न होकर वापिस लौटते हैं। किसी के रहस्यों को सार्वजनिक करके उसे उपहास का पात्र नहीं बनाते। बहुत ही गम्भीर व सज्जन इन लोगों को महापुरुषों की तरह समाज पूजता है।
दूसरे प्रकार के लोग दाता होते हैं जो दान देने में कभी पीछे नहीं हटते, सदैव तत्पर रहते हैं। सामाजिक एवं धार्मिक सभी प्रकार की संस्थाओं को वे दिल खोलकर दान देते हैं। जहाँ किसी जरूरतमंद को देखते हैं बिना किसी को पता चले उसकी सहायता करते हैं। अपने-पराये का भेदभाव किए बिना ही बादलों की तरह निस्वार्थ भाव से मदद करने में हिचकिचाते नहीं हैं। लोग अपने कष्ट के समय में इनकी उदारता से कृतार्थ होते हैं। समाज में इन लोगों का एक स्थान होता है। अपने सरल स्वभाव के कारण ये लोग हर जगह पर सम्मानित किए जाते हैं।
तीसरे प्रकार के लोग कंजूस होते हैं। वे हर किसी से मोलभाव करते रहते हैं। अपने घर-परिवार, पत्नी और बच्चों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अतिथि सत्कार करने में भी घबराते नहीं हैं परन्तु पैसे को दाँतों से पकड़ते हैं। सामने इनका लिहाज करते हुए चाहे कोई कुछ न कहे पर पीठ पीछे कंजूस कहकर मजाक अवश्य ही उड़ाते हैं।
चौथे प्रकार के लोगों को आम भाषा में मक्खीचूस कहते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं जो न खाते हैं और न खाने देते हैं। हर समय पैसे को लेकर झिकझिक करते रहते हैं। इनके लिए कहा जाता है-
'चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाए।'
ये लोग अपने धन पर साँप की तरह कुंडली मारकर बैठे रहते हैं। लोग पीठ पीछे तो क्या सामने भी इनको चिढ़ाते हैं। पर इन चिकने घड़ों पर कोई असर नहीं होता। ये लोग दाँत निपोर कर रह जाते हैं। इनसे घर-परिवार के जन व भाई-बन्धु आदि सभी परेशान रहते हैं। किए गए अपमान का भी इन लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये जस के तस ही रहते हैं। जीते जी ये किसी की जरूरत को पूरा नहीं करते। परिवार के लोग आवश्यक वस्तुओं के लिए भी तरसते रहते हैं और ये उसे फिजूलखर्ची बताकर अपना पल्लू झाड़ लेते हैं। पर इनकी मृत्यु के बाद इनके घर के लोग उस पैसे को बिना दर्द के उड़ाते हैं।
हमें स्वयं तय करना है कि हम किस श्रेणी का बनना चाहते हैं। सबकी आँखों का तारा बनकर हम सुख भोगना चाहते हैं या लोगों के व्यंग्य बाणों को सहन करना अपनी नियति बनाना चाहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 1 अगस्त 2017
परस्पर टकराते स्वार्थ
बहुत विचार करने पर भी मुझे यह समझ में नहीं आ रहा कि आज एक भाई अपने दूसरे भाई के खून का प्यासा क्यों होता जा रहा है? क्या वे प्यार से मिल-जुलकर नहीं रह सकते? क्या आज सबके खून सफेद हो रहे हैं? ऐसा क्या हो गया है कि रिश्तों के मायने ही बदलते जा रहे हैं?
हमारे स्वार्थ शायद इतने अधिक टकराने लगे है कि हम असहिष्णु होते जा रहे हैं। उन्हें पूरा करने के लिए हम सब अनावश्यक ही दिन-रात अपना सुख-चैन गँवाकर निरन्तर रेस में शामिल हो रहे हैं। मैं, मेरा परिवार और मेरे बच्चे बस यहीं तक हम सभी सीमित होते जा रहे हैं। इनके अतिरिक्त न हमें कोई दिखाई देता है और न ही हम किसी अन्य भाई-बन्धु के विषय में सोचना चाहते हैं।
हमारा अहंकार इतना अधिक प्रबल होता जा रहा है जो किसी शर्त पर, किसी के साथ भी समझौता नहीं करना चाहता। सारी दुनिया को देख लेने अथवा उसमें आग लगा देने की मानसिकता समाज का बहुत अहित कर रही है। हमारा यही अहं हमें दूसरों के साथ सामञ्जस्य स्थापित नहीं करने देता। इसलिए हमें सबसे अलग-थलग करने में सफल हो रहा है और हम इसके शिकार हो रहे हैं।
ये स्वार्थ और अहंकार दोनों ही घर-परिवार के बिखराव में अहं रोल निभा रहे हैं। यही कारण है कि बच्चे माता-पिता की धन-सम्पत्ति, व्यापार आदि का उनके जीवन काल में ही बटवारा करके सुख की साँस लेना चाहते हैं। उन्हें सदा यही लगता है कि दूसरे भाई या बहन को माता-पिता कहीं उनसे अधिक न दे दें। यदि ऐसा हो गया तो वे घाटे में रह जाएँगे। सबसे बड़ी बात कि घाटे का सौदा कोई भी नही करना चाहता। इसलिए अपने स्वार्थों की पूर्ति के लिए वे जुगत भिड़ाते रहते हैं। जायज-नाजायज हथकंडे अपनाकर वे माता-पिता की मेहनत की कमाई हथिया लेते हैं।
आज के बच्चों को अपने अधिकारों को पाना तो आता है परन्तु अपने दायित्वों से अनजान बने रहना चाहते हैं। माता-पिता की सेवा करना तो वे प्राय: भूल जाते हैं। अपने भाई-बहनों के साथ अच्छा व्यवहार करना भी उन्हें याद नहीं रहता।
अपने पैतृक घर में ऊपर-नीचे के तल अथवा मंजिल में बच्चे नहीं रह सकते परन्तु फ्लैटों जाकर दूसरे अनजान लोगों के साथ रहना पसन्द करते हैं। वहाँ रहकर समझौता कर सकते हैं पर अपने भाई-बहनों की शक्ल तक वे देखना पसन्द नहीं करते। उन्हें लगता है कि परायों के साथ रहकर वे सुखी रहेंगे पर जीवन में ऐसा हो नहीं पाता।
इन्सानी कमजोरी है कि जिस किसी वस्तु की वह कामना करता है और जब वह उसे उपलब्ध हो जाती है, तब वह उससे ऊब जाता है और कुछ नया पाना चाहता है। यही उसके भटकाव का कारण है जो उसे कहीं भी चैन नहीं लेने देता।
सम्बन्धों में आपसी मनमुटाव के कारण ही शायद खून सफेद होने की बात कह दी जाती है। भाई-बहन धन-सम्पत्ति के लालच में इतने अन्धे हो जाते हैं कि एक-दूसरे के खून के प्यासे बन जाते हैं। इसके लिए एक-दूसरे की हत्या करने या करवाने के लिए षडयन्त्र तक रच डालते हैं। फिर जीवन पर्यन्त घर-परिवार, समाज और न्याय के दुश्मन बन जाते हैं। जिनके लिए ऐसा जघन्य अपराध करते हैं, उन्हें दुनिया की भीड़ में संघर्ष करने के लिए अकेला छोड़ देते हैं।
हमारे सयाने कहते हैं- 'अपना यदि मारेगा तो भी छाया में फैंकेगा।' कहने का तात्पर्य है कि ईश्वर प्रदत्त अपने सम्बन्धों की कद्र करनी चाहिए। वह मालिक नहीं चाहता कि अपने भाई-बन्धुओं से अनुचित व्यवहार किया जाए। धन-वैभव तो आना-जाना है, इसके लिए आत्मीय सम्बन्धों को दाँव पर लगाने से बचना चाहिए। हम सभी को सथासम्भव भाईचारा बनाकर रखना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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