शुक्रवार, 6 अप्रैल 2018

परेशानियों से मुक्ति

समस्याएँ अथवा परेशानियाँ मानव जीवन का एक अभिन्न हिस्सा हैं। उनसे बच पाना किसी भी व्यक्ति के लिए सम्भव नहीं है। जब ये सिर उठाने लगती हैं तो इन्सान तौबा बोलने लगता है। यानी इनके प्रभावी होने की स्थिति में मनुष्य घबरा जाता है, घुटन-सी महसूस करता है। ये दोनों उसके साथ आगे-पीछे होते हुए चलती रहती हैं। कभी उसे दिखाई देती हैं यानी उसके जीवन को प्रभावित करती हैं तो कभी कुछ समय के लिए तिरोहित हो जाती हैं। ऐसा भी कह सकते हैं कि मनुष्य खुली हवा में साँस ले सके, इसलिए कुछ दिन के लिए वे आरामगाह में चली जाती हैं। परन्तु एक अच्छे व सच्चे मित्र की भाँति उसका साथ कभी नहीं छोड़तीं।
         इन समस्याओं से घबराकर हार मान लेना इसका हल नहीं हो सकता। उनका सीना तानकर सामना करने से ही उनसे मुक्ति मिल सकती है। उनकी आँखों में आँखें डालकर ही उनसे उत्तर मांगना चाहिए। हम देखते हैं कि आँधी अथवा तूफान में वही बच सकते हैं जो थोड़ा झुक जाते हैं और जो वृक्ष तनकर खड़े रहते हैं, वे टूट जाते हैं। इसी प्रकार जो व्यक्ति विपरीत परिस्थितियों में तनकर खड़े रहते हैं या अनैतिक मार्ग अपना लेते हैं यानी उन हालातों में भी समझदारी नहीं दिखाते वे टूट जाते हैं। जो उस कठिन समय में सत्य के मार्ग पर चलते हुए धैर्य से उसके व्यतीत हो जाने की प्रतीक्षा करते हैं, वे निश्चित ही उभर जाते हैं।
           जीवन सदा एक ही ढर्रे पर नहीं चल सकता। किसी को सदा ही सुख मिलता रहेगा और किसी को हमेशा दुख मिलता रहेगा, ऐसा नहीं हो सकता। ये सब क्रम से मनुष्य के पास आते रहते हैं। ये दुख-कष्ट कभी मनुष्य को उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार मिलते हैं तो कभी अपनी मूर्खता से वह इन्हें न्योता दे देता है। अब आप कहेंगे कि स्वयं कोई दुख क्यों बुलाएगा? यह बिल्कुल सत्य है। हर इन्सान को ज्ञात है कि सदा समय से सोना और जागना चाहिए, समय पर खाना खाना चाहिए, भोजन सुपाच्य होना चाहिए प्रतिदिन सैर करनी चाहिए, आवश्यकता से अधिक भोजन कभी नहीं खाना चाहिए इत्यादि।
          अब प्रश्न यह उठता है कि क्या हम सब ऐसा करते हैं? इसका उत्तर हर ओर से नहीं में ही आएगा। यह सब नियम हमने तोते की तरह रटे हुए हैं। इनकी अनुपालना करने में हम तरह-तरह के बहाने बनाते हैं या फिर बगलें झाँकने लगते हैं। जानते-बूझते जब हम स्वयं ही अपने शत्रु बनने का कार्य करेंगे तो कष्ट भी तो हमें ही सहन करने पड़ेंगे। कोई और तो हमारे हिस्से के कष्ट नहीं भोगेगा। उस समय अपनी गलती को न मानने से इन्कार करके दूसरों पर दोषारोपण करके उन्हें कोसने से या ईश्वर को भला-बुरा कहने से समस्या नहीं सुलझ सकती। अपनी की हुई मूर्खताओं का खामियाजा खुद भुगतना ही पड़ता है।
           इस तथ्य को हम यूँ भी समझ सकते हैं कि मनुष्य के जीवन की हर समस्या ट्रैफिक की लाल बत्ती की तरह होती है। हमें लाल बत्ती के हरे होने की प्रतीक्षा करनी होती है। यदि सिग्नल पर ठहरने के स्थान पर हम गाड़ी को तेजी से चलाकर कर जाने का प्रयास करेंगे तो अपने सही मार्ग से आने वाली गाड़ी से दुर्घटना होने की सम्भावना बढ़ जाती है। अपने साथ-साथ सामने वाले को भी क्षति हो सकती है। उस समय जान तक जाने का जोखिम हो सकता है। यदि हम थोड़ी देर प्रतीक्षा कर लें, तो वह लाल बत्ती हरी होनी ही होती है। तब हम निस्संकोच अपनी गाड़ी को चलाते हुए बिना किसी जोखिम के पार हो सकते हैं।
         ईश्वर पर सच्चे मन से पूर्ण विश्वास रखना चाहिए कि वह सदा हमारा शुभ ही करेगा। धैर्य का दामन किसी भी कारण से कभी भी नहीं छोड़ना चाहिए। सदा यही प्रयास करना चाहिए कि कष्ट का वह समय ईश्वर की अर्चना करते हुए, सज्जनों की संगति में रहते हुए और अपने ग्रन्थों का स्वाध्याय करते हुए शान्तिपूर्वक व्यतीत हो जाए। समय सदा से परिवर्तनशील है, बदलता ही रहता है, कभी एक जैसा नहीं रहता। आज दुख-परेशानी है तो शीघ्र ही सुख देने वाला समय भी जीवन में आ जाएगा। ऐसी आशा की ज्योति सदा अपने अन्तस में जलाए रखनी चाहिए, उसे किसी कारण से बुझने नहीं देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 5 अप्रैल 2018

ध्यान लगाना

महर्षि पतञ्जलि विरचित योगदर्शन ग्रन्थ में अष्टांगयोग का चित्रण किया गया है। उनके अनुसार योग के आठ अंग हैं- यम, नियम, आसन, प्रत्याहार, प्रणायाम, धारणा, ध्यान और समाधि। इनका पालन करते हुए अन्ततः मनुष्य समाधिस्थ होकर ईश्वर में लीन हो जाता है। यह प्रक्रिया एक दिन में पूर्ण नहीं होती। साधक को वर्षों लग जाते हैं फिर भी मोक्ष नहीं मिल पाता। कई जन्मों तक साधना करनी पड़ती है तब कहीं जाकर वह अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को प्राप्त कर पाता है।
         आज हम ध्यान के विषय में चर्चा करते हैं। ध्यान के विषय में योगशास्त्र ने कहा है- 
          तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्।
अर्थात ध्येय वस्तु में चित्तवृत्ति की एकतानता को ध्यान कहते हैं। एकतानता का अर्थ होता है एकाग्रता।
        मनुष्य का सारा जीवन योग की प्रथम दो सीढ़ियों यानी यम और नियम की अनुपालना करने में ही अटका रहता है। इन दोनों का मन से पालन करने पर मनुष्य का अन्त:करण शुद्ध हो जाता है। फिर भी, चाहकर वह उन दोनों का पालन करने में समर्थ नहीं हो पाता। दुनिया के आकर्षण इतने अधिक हैं कि उनमें खोकर वह अपने निर्धारित लक्ष्य से भटक जाता है। फिर ध्यान और समाधि तक पहुँचना तो बहुत ही कठिन कार्य होता है।
         ध्यान अष्टांगयोग की सातवीं सीढ़ी है।
ध्यान लगाने का अर्थ होता है सांसारिक विषय-वासनाओं से मन को हटाकर अपने अन्तस के साथ सम्बन्ध बनाना। यह सबसे कठिन होता है, उसके लिए मन को साधना पड़ता है। जब साधना में बैठो तो यह मन मनुष्य को भटका देता रहता है। उसे स्थिर होकर नहीं बैठने देता। उसी समय उसे दुनियाभर की बातें याद आती हैं। घर-गृहस्थी, नौकरी-व्यवसाय, बच्चों, मित्रों आदि की समस्याएँ सताने लगती हैं। यदि यह मन ध्यान में अवस्थित हो जाए तो सारी गुत्थियाँ सुलझ जाती हैं।
          ध्यान का अर्थ किसी लक्ष्य पर केन्द्रित होना भी किया जा सकता है। विद्याध्ययन, नौकरी पाना, व्यवसाय में सफलता पाना अथवा खेल आदि किसी भी क्षेत्र का चयन करके उसमें योग्यता पाने के लिए भी ध्यान केन्द्रित करना पड़ता है। वहाँ भी मन की सारी शक्ति को जुटाकर लक्ष्य भेदन करना होता है। हर क्षेत्र में ध्यान लगाने से ही सफलता कदम चूमती है। वहाँ भी आने वाली विघ्न-बाधाओं से मुक्ति हेतु साधना करनी पड़ती है। आम बोलचाल की भाषा में भी हम कहते हैं-
      अपना ध्यान रखन। ध्यान से पढ़ो या देखो। ध्यान कहाँ है? आदि।
         जब भौतिक वस्तुओं की प्राप्ति के लिए मन को एकाग्र करना पड़ता है तो फिर महान आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ध्यान लगाने की आवश्यकता तो अधिक ही होगी। ध्यान लगाने से मनुष्य का मन धीरे-धीरे शान्त होने लगता है। तत्पश्चात वह काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या, द्वेष आदि आन्तरिक शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने लगता है। इससे उसका मन निश्छल हो जाता है।
         ध्यान की अवस्था में मनुष्य को विभिन्न प्रकार की और विचित्र प्रकार की अनुभूतियाँ होती हैं। उन अनुभूतियों में कभी वह डरता है, कभी हँसता है, कभी रोता है। इस ध्यान की प्रारम्भिक अवस्था में उसे नदी, समुद्र, गुफा, पर्वत, वन, उपवन, पक्षी, इन्द्रधनुषी रंग, शंख, नीला आकाश, बादलों की गड़गड़ाहट, साँप, साधु-सन्यासी, देवदर्शन, मन्दिर या कोई भी पूजास्थल, हिंसक पशु, कल्पवृक्ष, कामधेनु, फल वाले वृक्ष, सूर्य, चन्द्रमा आदि दिखाई देते हैं।
         ध्यान की अवस्था में भयभीत हो जाने वाले साधक को पुनः साधना करनी पड़ती है। यह सब विघ्न साधक के समक्ष इसलिए आते हैं जिससे उसकी परीक्षा ली जा सके कि वह इस ध्यान साधना के लिए मन से कितना तैयार है। कहीं वह दूसरों की देखादेखी या होड़ में तो इसका अभ्यास नहीं कर रहा।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 4 अप्रैल 2018

परोपकारी के लिए सब सम्भव

परोपकारी मनुष्य जो सदा दूसरों के हित की चिन्ता में लगा रहता है, उसके लिए इस संसार में कुछ भी प्राप्त कर लेना कठिन नहीं होता। इसका कारण है कि मनुष्य सृष्टि का ऐसा प्राणी है जिसे ईश्वर ने इतनी सामर्थ्य दी है कि वह जो भी चाहे प्राप्त कर सकता है। उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है। उसमें इतनी शक्ति है कि वह किसी भी जलचर, नभचर या भूचर प्राणी को अपने वश में कर सकता है। उनके माध्यम से अपना जीवन सुगम बना सकता है। शेर जैसे खूँखार जानवर को भी पालतू बनाने की उसमें शक्ति है।
          संसार की जिस भी वस्तु को पाने की वह कामना करता है, चाहे वह लौकिक हो अथवा पारलौकिक हो, उसे पाकर ही वह चैन लेता है। दूसरों का हितचिन्तक बेशक बन्धु-बान्धवों की दृष्टि में बेकार के काम कर रहा होता है परन्तु सामाजिक दृष्टि से देखा जाए तो वह महान कार्य कर रहा होता है। यदि सभी लोग अपने-अपने स्वार्थों को महत्त्व देने लगें तो समाज की भलाई के कार्य फिर कौन करेगा? इस तरह तो किसी दीन, दुखी, असहाय, जरूरतमन्द का मीत कोई नहीं बनेगा। उनके आँसू पोंछने वाला कोई नहीं होगा। वे बेचारे तो अपेक्षित हो जाएँगे।
          रामचरितमानस में तुलसीदास जी ने हमें समझाने का प्रयास किया है-
       परहित बस जिन्ह के मन माहीं।
       तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कछु नाहीं॥
अर्थात जिनके मन में सदैव दूसरे का हित करने की अभिलाषा रहती है अथवा जो सदा दूसरों की सहायता के लिए तत्पर रहते हैं, उनके लिए सम्पूर्ण जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।
          तुलसीदास जी के कथन का अर्थ है कि परोपकारी व्यक्ति निस्स्वार्थ भाव से देश, धर्म और समाज के कार्यों में जुटा रहता है। उसका दृष्टिकोण विशाल होता है, संकुचित नहीं। वह मैं, मेरा घर, मेरे बच्चे वाली सोच को पीछे छोड़ चुका होता है। वह सम्पूर्ण विश्व को अपना घर मानता है और वहाँ रहने वाले सभी जीवों को अपना मानता है। इसीलिए वह सामान्य लोगों से कहीं ऊपर होता है यानी महान कहलाता है। लोग भी उस पर आँख मूँदकर विश्वास करते हैं। उसका कारण यही है कि दूसरों का हित साधने में उसका अपना कोई स्वार्थ नहीं होता।
          ये लोग परम विश्वसनीय होते हैं। जो भी कोई व्यक्ति अपने सुख-दुख उनके साथ साझा करता है, वे उसे कभी सार्वजनिक नहीं करते। उनके कारण किसी को शर्मिंदगी का सामना नहीं करना पड़ता। उनका मन सागर की तरह गम्भीर होता है, जिसमें अनेक नदियों की तरह बहुत से लोगों की समस्याएँ रहती हैं। वे कभी भी किसी के समक्ष प्रकट नहीं होतीं। लोगों को भी विश्वास होता हैं कि उनके सामने प्रकट की गई किसी भी समस्या का समाधान देर-सवेर हो जाएगा।
          परोपकारी जीवों को जीवन में यदि किसी विपरीत परिस्थिति का सामना करना पड़ जाए तो उनका साथ देने के लिए बहुत-सी बाहें उठ खड़ी होती हैं और बहुत से कदम उनके साथ चल पड़ते हैं। इस तरह पलक झपकते ही उनकी परेशानियाँ छूमन्तर हो जाती हैं। इस तरह एक विशाल भुजबल उनकी एक आवाज़ पर उठ खड़ा होता है। इस तरह उनको लोक कल्याण के कार्यों को सम्पन्न करने में सुगमता होती है।
          ऐसे महान परोपकारी, समाजसेवी लोग यदि जीवन में मिल जाएँ तो प्रयास यही रहना चाहिए कि उनका साथ न छोड़ा जाए। उनके सम्पर्क से मनुष्य कई दोषों से मुक्त हो सकता है। उनके संसर्ग से शायद अपना जीवन भी सार्थक हो जाए। यही लोग आने वाली पीढ़ियों के लिए दिग्दर्शक का कार्य करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 3 अप्रैल 2018

मन को साधना

हमारा यह मन बहुत ही चञ्चल है, मनुष्य को किसी भी पल आराम नहीं लेने देता। अभी यहाँ है तो अगले ही पल पूरे विश्व की सैर करके लौट आता है। सारा दिन उधेड़बुन में निकाल देता है। सारा समय यह छल-कपट करने की जुगत भिड़ाता रहता है। इसीलिए यह तरह-तरह के षडयन्त्र करता रहता है। तेरा-मेरा करता हुआ कभी किसी को अपना बना लेता है और कभी अपनों को पराया कर देता है। यह मन ही है जो मनुष्य को सदैव इधर-उधर भटकाने में लगा रहता है, उसे क्षणभर के लिए आराम से नहीं बैठने देता।
          दुनिया का सारा प्रपञ्च यह मन करता हैl यह मनुष्य के उत्थान और पतन का कारक होता है। वह यदि चाहे तो मनुष्य परिश्रम करके सफलता की ऊँचाइयों को छू ले, आसमान में उड़ान भर ले, समुद्र का सीना चीरकर उसमें से मोती निकाल लाए, दुर्गम पर्वतों की चढ़ाई कर ले, इस दुनिया को सुख-सुविधाएँ देने के लिए नित-नए आविष्कार कर ले। कहने का तात्पर्य यह है कि यह मन यदि सकारात्मक रुख अपना लेता तो वह किसी से नहीं डरता और जो भी चाहता है, उसे कर गुजरता है।
          दूसरी ओर इसके नकारात्मक होते ही मनुष्य का विनाश निश्चित हो जाता है। यदि यह मेहनत करने के स्थान पर आलस्य रूपी शत्रु को गले लगा लेता है तो एक अच्छा भला मनुष्य भी शेखचिल्ली की तरह दिवास्वप्न ही देखता रह जाता है। उस समय वह अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का कार्य करता है। न वह अपने दायित्व पूर्ण कर पाता है और न ही अपने परिवार के। इसलिए वह सभी की नजरों से गिर जाता है। उसका सर्वत्र तिरस्कार होता है।
         यह जब सुविधपूर्वक जीने की कल्पना करने लगता है तब शॉर्टकट तलाशने लगता है। उस समय वह कुमार्ग पर चलने के लिए भी लालायित हो जाता है। जहाँ उसे बिना श्रम किए आकषर्ण दिखाई देता है, वह बिना समय गँवाए तत्क्षण उसी मार्ग पर चल पड़ता है। सारे झूठ-फरेब करता हुआ यह मन अपने ऊपर एक आवरण ओढ़ लेता है। उस खोल से बाहर निकल सकना उसके लिए नामुमकिन तो नहीं पर असम्भव अवश्य होता है।
         जब मनमाफिक बात हो जाती है तो वह बल्लियों उछलने लगता है। परन्तु जब उसकी इच्छा के विरुद्ध कुछ हो जाता है तो वह उठा-पटक करने लगता है, विद्रोही बन जाता है। उस स्थिति में इस मन पर अंकुश लगाना आवश्यक हो जाता है। इसीलिए मनुष्य के मन को ही बन्धन और मोक्ष का कारण माना जाता है। इसी मन के ही कारण मनुष्य जन्म और मरण के चक्र में फँसा रहता है। यह मनुष्य को मोह-माया के बन्धनों में ऐसा उलझाकर रखता है कि वह चारों खाने चित्त हो जाता है। इस कारण संसार में भेजने वाले परमपिता परमात्मा से दूर होता जाता है। फिर वही चौरासी लाख योनियों का फेर उसके सम्मुख रहता है। मनुष्य को वही पुनर्जन्म की त्रासदी झेलनी पड़ती है और पुनः मृत्यु से आमना-सामना करना पड़ता है। इस चक्र से वह चाहकर भी नहीं बच पाता।
          यदि इस कष्टदायी जन्म-मरण से मुक्त होकर मोक्ष की कामना की जाए तो यत्नपूर्वक मन को प्रभु की आसक्ति में लगाना पड़ता है। यह मन बार-बार संसार की चकाचौंध की ओर आकर्षित होता रहता है, उसे वहाँ से बारम्बार बलपूर्वक हटाकर वापिस ईश्वर की भक्ति की ओर उन्मुख करना पड़ता है। इसे ही भगवान श्रीकृष्ण ने 'श्रीमद्भावद्गीता' में अभ्यास कहा है। निरन्तर इस अभ्यास से मन विषय-वासनाओं से मुक्त होकर प्रभुभक्ति की तरफ जाने लगता है। उस समय में के सारे कालुष्य समाप्त हो जाते हैं और उसकी चञ्चलता दूर हो जाती है। मन शान्त होने लगता है।
        अहंकाररहित, शुद्ध-पवित्र मन में ही ईश्वर का निवास हो सकता है। यदि वहाँ जरा-सी भी मलिनता होती है, तो ईश्वर को प्रतिष्ठित करने के लिए स्थान नहीं बनाया जा सकता। इसलिए अपने मन को साधकर, स्थिर करके ही ईश्वर का प्रिय भाजन बना जा सकता है। तदनन्तर जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त होकर मुक्ति या मोक्ष की कामना सफल होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 2 अप्रैल 2018

शरीर दुबारा नहीं मिलता

वह सब कुछ मनुष्य पुनः पुन: परिश्रम करके प्राप्त कर सकता है जिनकी वह कामना करता है। सुख-सुविधा के सारे साधन वह स्वयं अपने और अपने परिवारी जनों के लिए देर-सवेर जुटा ही लेता है। उसके ईमानदार प्रयत्न कर्म बनकर उसके जीवन को समृद्ध बनाते हैं। इस जीवन में भौतिक ऐश्वर्य कमा लेना सरल एवं सहज होता है। घर, गाड़ी, फ्रिज, टीवी आदि को मनुष्य अपने स्टेंडर्ड के अनुसार या खराब हो जाने की स्थिति में समय-समय पर बदलता रहता है।
           जिस शरीर को माध्यम बनाकर वह इतराता फिरता है, उसे एक बार यदि खो दिया तो भौतिक वस्तुओं की भाँति पुनः प्राप्त करना असम्भव होता है। शरीर से प्राण निकल गए तो वह मिट्टी के ढेर के समान अनुपयोगी हो जाता है। अपने परम प्रियजन भी उसे कुछ घण्टे तक सहन नहीं कर सकते। जल्दी से उस प्राणरहित शरीर या शव को अग्नि को समर्पित करने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि मानव का यह शरीर जीव को बहुत ही कठिनता से प्राप्त होता है।
          निम्न श्लोक में कवि ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में समझाया है-
             पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं  पुनर्भार्या  पुनर्मही।
             एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥
अर्थात् धन-संपति, मित्र, स्त्री, राज्य बार-बार मिल सकते हैं। परन्तु मनुष्य का शरीर केवल एक ही बार प्राप्त होता है, बार-बार नहीं।
           कवि इस श्लोक के माध्यम से हमें समझाने का प्रयास कर रहा है कि धन-सम्पत्ति यदि किसी कारण से नष्ट हो जाए तो मनुष्य दिन-रात मेहनत करके पुनः जुटा लेता है। यदि कोई मित्र साथ छोड़ दे अथवा एक प्रदेश से दूसरे स्थान पर नौकरी-व्यवसाय के कारण अन्यत्र जाने से पुराने मित्र पीछे छूट जाएँ तो पुनः नए मित्र बना लिए जाते हैं। पत्नी की मृत्यु हो जाने पा पुनः विवाह किया जा सकता है। यदि राज्य पर किसी शत्रु राजा का अधिकार हो जाए तो अपनी सेना को एकत्र करके राज्य को वापिस पाया जा सकता है।
          जीव को मनुष्य का यह शरीर बहुत ही पुण्य कर्मों के सञ्चय होने के पश्चात मिलता है। एक बार शरीर के अग्नि में समर्पित हो जाने के उपरान्त इसे पुनः प्राप्त करना असम्भव होता है। पुनर्जन्म होगा भी तो कोई आवश्यक नहीं कि फिर से मानव का यही शरीर मिलेगा या यही बन्धु-बान्धव मिलेंगे। मनीषियों का कथन है कि अपने कर्मों के भोग के अनुसार चौरासी लाख योनियों में से किसी एक में जीव का जन्म होता है। वह योनि कोई भी हो सकती है यानी भूचर, जलचर या नभचर किसी भी रूप में जीव का जन्म होता है।
         शुभकर्मों की अधिकता होने पर ही जीव को पुनः मनुष्य का शरीर मिलता है। उस समय उसके माता-पिता और अन्य परिजन भी उसे अपने कर्मानुसार ही मिलते हैं। पूर्वजन्म की कोई स्मृति उसके स्मृतिपटल पर शेष नहीं रहती। यही विधि का विधान है। यदि ऐसा न होता तो जीव के लिए जीना बहुत कठिन हो जाता है। उस समय जीव अपने पुराने जन्म की स्मृतियों में ही भटकता रह जाता, उन्हीं में खोया रहता और नए जन्म में रच बस नहीं पाता।
         मनुष्य को सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि अगला जन्म उसे अपने कर्मों के अनुसार मिलेगा। जिस भी शरीर को वह पाना चाहता है, उसके कर्म भी उसी के अनुसार होने चाहिए। अपने जीवनकाल में सदा शुभकार्य करके इस देह का सदुपयोग करना चाहिए। जो मनुष्य प्रतिदिन सत्कर्म करते हैं, कदाचार से दूर रहते हैं, वास्तव में उनका जीवन सफल हुआ माना जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 1 अप्रैल 2018

भगवान कहे जाते डॉक्टर

इस बात से कोई इन्कार नहीं कर सकता कि डॉक्टर को भगवान का दर्जा दिया जाता है। प्राचीनकाल में डॉक्टर को वैद्य कहा जाता था। भगवान कहा जाने वाला वही डॉक्टर यदि यमराज की तरह व्यवहार करने लगे यानी वह रोगियों के इलाज से अधिक धन को महत्त्व देने लगे तो रोगी मनुष्य कहाँ जाए। ऐसे डॉक्टर का सम्मान घटने लगता है। विवशता तो यह है कि उसके पास गाहे-बगाहे इलाज के लिए जाना ही पड़ता है।
          आजकल प्रायः डॉक्टर लोग मरीज के इलाज से अधिक उसकी जेब को टटोलने में लगे रहते हैं। वे भी तथाकथित पण्डितों यानी ज्योतिषियों की तरह लालची बनते जा रहे हैं। ज्योतिषी अपने पास आए परेशान व्यक्ति को ग्रहों के वक्री होने या घर के किसी व्यक्ति की मृत्यु का डर दिखाकर, उसका उपचार करवाने या पूजा-पाठ करवाने के नाम पर यजमान से धन बटोरते हैं। अब चाहे व्यक्ति के पास धन न हो और उसे उधार लेकर ही क्यों न उन्हें देना पड़ जाए।
           इसी तरह आजकल डॉक्टर लोग भी छोटी-सी बीमारी को पहाड़ जैसा बड़ा बनाकर अपने मरीजों को डराते हैं और उन्हें ऑपरेशन करवाने के लिए विवश करते हैं। अपनी सेहत को गँवाकर उनके लालच का भुगतान बेशक व्यक्ति को सारी आयु क्यों न करना पड़ जाए। यहाँ भी वही बात है कि मनुष्य को चाहे अपना घर, खेत या जमीन गिरवी रखकर अथवा बेचकर ही क्यों न उनकी फीस का पैसा चुकाना पड़े। डॉक्टरी का पवित्र पेशा अब दिन-प्रतिदिन धन्धा बनता जा रहा है। यह स्थिति वाकई बहुत कष्टदायी है।
          किसी कवि ने इन लालची डॉक्टरों से व्यथित होकर अपने उदगार प्रकट किए हैं जो इस प्रकार हैं-
    वैद्यराज    नमस्तुभ्यं    यमराज    सहोदर:।
    यमस्तु हरति प्राणान् वैद्य: प्राणान् धनानि च।
अर्थात हे यमराज के भाई वैद्यराज! तुम्हें प्रणाम। यमराज तो सिर्फ प्राणों का हरण करता है परन्तु आप प्राण और धन दोनों का हरण कर लेते हो।
         ऐसे डॉक्टरों की तुलना कवि ने यमराज से की है जो मनुष्य के प्राणों का हरण करते हैं। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि यमराज केवल प्राण हरता है। वह भी तब, जब मनुष्य के पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार मिली हुई उसके जीवन की अवधि समाप्त हो जाती है। पर बहुत से डॉक्टर ऐसे हैं जो गलत इलाज करके अपने मरीज के प्राणों को दाँव पर लगा देते हैं। ये लोग अपने मरीज के प्राणों के साथ उनके धन का हरण भी कर लेते हैं।
          इसी के साथ ही यहाँ उन अस्पतालों की भी चर्चा करना चाहती हूँ जो सेवाकार्य के स्थान पर धन को अधिक महत्त्व देते हैं। वहाँ डॉक्टरों को सेवा करने के बजाए धन कमाने की मशीन समझते हैं। इसलिए डॉक्टर लोग भी अपने पास आने वाले मरीजों को ऑपरेशन करवाने के नाम पर ठगते हैं। आज ऐसे ऐसे ऑपरेशन किए जा रहे हैं, जिनकी रोगी को आवश्यकता ही नहीं होती। इन सब कारस्तानियों की चर्चा यदा कदा सोशल मीडिया, टी.वी. और समाचार पत्रों में होती रहती है। इसके साथ ओवर बिलिंग या रोगी की मृत्यु के पश्चात डिक्लेयर न करने के स्थान उसके परिजनों से धन ऐंठते की भी चर्चा होती रहती है। इनकी हठधर्मिता के कारण पैसा न होने की स्थिति में लोगों को उनके मृतक परिजनों के शव देने से इन्कार कर दिया जाता है। साथ ही रोगियों को अस्पताल से तब तक छुट्टी नहीं दी जाती जब तक वे अस्पताल का पूरा पेमेंट नहीं कर देते।
        ऐसा करते समय डॉक्टर भूल जाते हैं कि उन्होंने अपने प्रोफेशन या व्यवसाय में आते समय सेवा करने की शपथ ली थी। जैसे एक हाथ की पाँचों अँगुलियाँ बराबर नहीं होतीं, उसी प्रकार आज के व्यावसायिक माहौल में भी ऐसे सेवाभावी डॉक्टर मिल जाते हैं जो भेड़चाल में नहीं हैं यानी वे इस रेस में शामिल नहीं हैं। वे अपनी जेब से पैसा खर्च करके अपने पास आने वाले रोगियों का उपचार करते हैं। ऐसे कर्तव्यनिष्ठ और लगनशील डॉक्टरों को हम हृदय से नमन करते हैं। अन्य दूसरे डॉक्टरों को भी अपने इस पुण्य व्यवसाय के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, तभी वे अपना खोया हुआ सम्मान वापिस पाने में समर्थ हो सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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