अपनी तुलना किसी से न करें
मनुष्य को अपनी तुलना कभी किसी दूसरे से नहीं करनी चाहिए। उसे इस बात को अपने मन में गहरे बिठा लेनी चाहिए कि वह ईश्वर की एक श्रेष्ठ रचना है। इसलिए वह जैसा भी है सर्वश्रेष्ठ है। ईश्वर के हर कार्य में अच्छाई होती है। उसे भी मालिक ने कुछ सोचकर ही इस संसार मे भेजा है। इसलिए उसे कोई विशेष कार्य करना चाहिए।
उस प्रभु की हर रचना अपने आप में सर्वोत्तम और अद् भुत होती हैं। किसी भी इन्सान में इतनी सामर्थ्य नही है कि उसे समझ सके अथवा उसमें से कोई कमी नहीं निकालकर स्वयं को सर्व शक्तिमान सिद्ध सके। इसलिए अपने में विद्यमान कमियों अथवा आने वाली परेशानियों को देखते हुए सदा ही अपने आप को कोसते रहना उचित नहीं है। उस मालिक पर मनुष्य को पूर्ण आस्था और विश्वास रखना चाहिए।
यहाँ एक उदाहरण लेते हैं। हम एक बीज बोते हैं और उस छोटे से बीज से एक बहुत बड़ा वृक्ष बन जाता है। यदि जब हम उस बीज को खोलकर देखते हैं तो हमें कुछ भी ऐसा भी नहीं दिखाई देता। उस समय हम समझ ही नहीं पाते कि यह नन्हा-सा बीज महान वृक्ष का कारक बन जाएगा।
एक छोटे से बीज में इतना बड़ा वट वृक्ष समाया होता है। उसी प्रकार मनुष्य के अन्तस् में भी अनन्त सम्भावनाएँ विद्यमान रहती हैं। आवश्यकता होती है तो बस उन्हें तलाशने की। अपनी आन्तरिक सामर्थ्य को पहचानकर उसके अनुसार कार्य करने वाले को जीवन में कभी हार का स्वाद नहीं चखना पड़ता।
हम अपना स्वयं का ही उदाहरण लेते हैं। हमारे अपने हाथ की पॉंचों अंगुलियॉं बराबर नहीं होती। जब हमारी अपनी अंगुलियों में समानता नहीं होती तो संसार के सभी जीवों की क्षमता एक जैसी कैसे हो सकती है? अर्थात् नहीं हो सकती। इसलिए दूसरों को देखकर स्वयं को दोष नहीं देना चाहिए। जितनी अपनी सामर्थ्य है, उसी के अनुसार कार्य करने चाहिए। दूसरों से तुलना करके अनावश्यक तनाव लेना उचित नहीं होता।
मनुष्य जब अपनी दूसरों से तुलना करता है तो उस समय वह अपनी मेहनत की खुशी को भी खो देता है। हर व्यक्ति इस दुनिया में विशेष योग्ताऍं लेकर पैदा होता है। उसकी अपनी अलग पहचान होती है। इसी प्रकार हर किसी का जीवन और संघर्ष अलग-अलग होता है। इसलिए किसी और से बराबरी करना व्यर्थ है।
मनुष्य को वास्तव में अपनी तुलना केवल अपने बीते हुए कल से करनी चाहिए। दूसरों की नकल करने के स्थान पर उसे अपनी क्षमताओं को पहचानना और निखारना चाहिए। जो कुछ भी उसके पास है, उसकी सराहना करनी चाहिए।
मनुष्य को यह सोचकर कभी दुखी नहीं होना चाहिए कि उसके पास कुछ नहीं है। उसके पास यह नहीं है या वह नहीं है, सोचने के स्थान पर उसे पुनः पुनः यह मनन करना चाहिए कि सीमित समय के लिए मिले हुए इस मानव जीवन में उसके पास क्या-क्या है? उसे अपने जीवन में क्या-क्या करना चाहिए? क्या वह अपने जीवन में कुछ नए मानकों की स्थापना कर सकता है?
मनुष्य को यह बात गाँठ बाँध लेनी चाहिए कि दुनिया की कोई भी शक्ति उसे तब तक नहीं हरा सकती जब तक वह स्वयं ही हार न माने। अपना मनोबल उच्च रखते हुए मनुष्य को संसार सागर में छलाँग लगा लेनी चाहिए। यह निश्चित मानिए कि वह इसे पार करने की सामर्थ्य रखता है। चाहे तो सफलता अवश्य ही उसके कदम चूमेगी।
इसमें कोई दोराय नहीं है कि यदि मनुष्य सही है, उसने कोई गलती नहीं की तो उसे क्रोध नहीं करना चाहिए। अपने बेगुनाह होने की बात को दृढ़तापूर्वक सबके समक्ष रखना चाहिए।
इसके विपरीत यदि मनुष्य ने गलती की हैं तो उसे गुस्सा करने का हक बिल्कुल नहीं है। तब तो यह चोरी और सीनाजोरी वाली बात हो जाएगी जिसकी सराहना किसी तरह नहीं की जा सकती। उस समय क्षमा याचना करने से उसे परहेज नहीं करना चाहिए। अपनी गलती के लिए क्षमा याचना करने वाला कभी छोटा नहीं हो जाता बल्कि उसे महत्त्व दिया जाता है।
घर-परिवार के लोग तथा बन्धु-बान्धव सभी यही चाहते हैं कि उनका प्रियजन अपने जीवनकाल में कुछ अच्छा करे। लेकिन इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि वे कभी नहीं चाहते कि उनका वह प्रियजन उनसे बेहतर करें। जहाँ पर वह उनसे आगे बढ़ने लगता है, सभी उसकी टाँग खींचने में लग जाते हैं। उसे नीचा दिखाकर आत्मतुष्टि करते हैं।
यदि मनुष्य अपने पूर्व निर्धारित दृष्टिकोण में किञ्चित मात्र परिवर्तन कर ले तो उसका काया कल्प सम्भव हो सकता है। इसलिए हर समय को उपयुक्त समय मानते हुए ही मनुष्य को सदा उत्साह और लग्न से अपने दायित्वों का निर्वहण करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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