धर्मपूर्वक आचरण करना हर मनुष्य का नैतिक दायित्व है। कुछ अधिक पाने के लालच में इन्सान अपना बहुत कुछ दाँव पर लगा बैठता है। लोभ सभी बुराइयों की जड़ है। लालच रूपी इस दानव से सदा बचकर रहना चाहिए। सज्जन व्यक्तियों को सम्मान देना चाहिए। सदा धर्म के अनुसार कार्य करने चाहिए और भगवान पर पूरा विश्वास रखना चाहिए। तभी मनुष्य इस लोभ रूपी दानव के चँगुल से बच सकता है, अन्यथा ईश्वर ही मालिक है।
आज एक दृष्टान्त देखते हैं, जिसमें बताया गया है कि लालचवश किया गया गलत कार्य कभी सही नहीं कहा जा सकता। हमारी पुनीत भरतीय संस्कृति में यज्ञों का बहुत महत्व दर्शाया गया है। इन्हें सम्पन्न करने के लिए एक विशेष प्रकार की यज्ञवेदी का निर्माण किया जाता है। अपने लालच के कारण इस पवित्र यज्ञवेदी पर थूकना किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता। इस घोर अपराध का दुष्परिणाम एक गाँव के लोगों को इस प्रकार भोगना पड़ा कि उन्हें किस अपराध की सजा मिल रही है, यह सोचने तक का अवसर ही नहीं मिल सका।
कहते हैं एक स्त्री के मुँह में सुपारी थी। उसने सफाई करते समय गलती से यज्ञवेदी में थूक दिया। उसे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि उतना ही थूक स्वर्ण में बदल गया है। अगले दिन फिर उसने थूककर देखा तो वह भी सोने में बदल गया। इस तरह उसके पास धीरे-धीरे बहुत-सा सोना हो गया।
अन्य महिलाओं में भी यह बात जंगल में आग की तरह तेजी से फैली। फिर कई अन्य महिलाएँ भी अपने-अपने घर में बनी यज्ञवेदी में थूक-थूककर सोना बनाने लगीं। वहाँ एक महिला ऐसी थी जो यह घृणित कार्य नहीं करती थी, अन्य महिलाओं ने उसे बहुत उकसाया, समझाया कि वह भी वैसा ही करे। उसने कहा कि वह अपने पति की अनुमति के बिना यह कार्य हरगिज नहीं करेगी। उसने एक रात डरते-डरते अपने पति से पूछ ही लिया। उसने कहा, “खबरदार जो ऐसा किया तो। पवित्र यज्ञवेदी क्या थूकने की चीज है?”
पति की चेतावनी के आगे बेबस वह चुप हो गई। वह बहुत व्यथित रहने लगी। उसके सूने गले को लक्ष्य कर अन्य स्त्रियाँ अपने नए-नए कण्ठ-हार दिखातीं तो वह मन-ही-मन में घुलने लगी। उसे लगता कि उसका दुर्भाग्य है अथवा कोई पूर्वजन्म का पाप कि उसे एक रत्ती सोने के लिए भी तरसना पड़ता है। उसे अपने पति का यह निर्णय गलत लगता था। वह सोचती कि इस धर्माचरण ने उसे दिया ही क्या है? जिस नियम के पालन से दिल को कष्ट होता है, वह उसका पालन क्यों करे?
वह बीमार रहने लगी। उसका पति इस रोग को ताड़ गया। उसने एक दिन ब्रह्ममुहूर्त में सपरिवार ग्राम त्यागने का निश्चय किया। गाड़ी में सारा सामान लादकर वे सब उस गाँव से रवाना हो गए। सूर्योदय से पहले ही वे बहुत दूर निकल जाना चाहते थे।
किन्तु, अरे यह क्या? ज्यों ही वे गाँव की सीमा से बाहर निकले पीछे एक भयानक विस्फोट हुआ। पूरा गाँव धू-धू करके जल उठा था। सज्जन दम्पती अवाक रह गए। उस स्त्री को अपने पति का महत्त्व समझ में आ गया। वास्तव में इतने दिन गाँव बचा रहा था तो केवल इस कारण कि उसका परिवार गाँव की सीमा में था।
विचारणीय यह है कि गाँव की स्त्रियों का सारा सोना धरा-का-धरा रह गया। लोभवश किया गया घृणित कार्य उनकी मौत का कारण बन गया। इसीलिए मनीषी समझाते हैं कि लोभ रूपी शत्रु पर विजय प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए, अन्यथा इसके वार से बच पाना असम्भव होता है। जहाँ तक हो सके अपनी ईमानदारी की कमाई पर सन्तोष करना चाहिए। दूसरों की होड़ में अनाप-शनाप कार्य नहीं करने चाहिए। आज मनुष्य को एक लालच घेरता है तो कल दूसरा। उनके पीछे-पीछे भागते रहना इसका हल नहीं है। इस लालच रूपी दानव से जितना बचकर निकल जाए उतना ही मनुष्य के लिए श्रेयस्कर है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 7 मई 2018
लालचवश गलत काम
शनिवार, 5 मई 2018
अपनी बुद्धि को महान मानना
अपनी बुद्धि को महान और दूसरों की बुद्धि को कम करके आँकने से बहुत-सी समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। दूसरे हमसे अधिक बुद्धिमान हो सकते हैं, इस सत्य पर सदा विश्वास करना चाहिए। संसार में वही मनुष्य सफल होता है जो मनीषियों की बात को ध्यान से पढ़े, सुने और समय आने पर उस पर आचरण करे। व्यर्थ टीका-टिप्पणी करके स्वयं को अज्ञ साबित नहीं करना चाहिए। इससे विद्वानों के समक्ष अपनी हेठी होती है।
स्वयं को सर्वश्रेष्ठ विद्वान मानना ठीक नहीं है। दुनिया में विविध विषयों पर इतना सारा ज्ञान भरा हुआ है जिसे आयुपर्यन्त ग्रहण करते रहें, तब भी नहीं कह सकते कि सब कुछ जान लिया है। न जाने कितने जन्म लग जाएँगे, फिर भी मनुष्य पूर्णज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए अपने ज्ञान का मिथ्या दम्भ नहीं भरना चाहिए। संसार में रहते हुए जितना ज्ञान मनुष्य चाहे प्राप्त कर ले पर उसकी शर्त है विनम्रता का पाठ भी पढ़ना।
कुछ दिन पूर्व वट्सअप पर एक बहुत लम्बी-सी कथा सार संक्षेप के साथ पढ़ी थी। उसके कुछ अंश को भाषा शुद्ध करके यहाँ प्रस्तुत कर रही हूँ।
बन्दरों का एक समूह फलों के बगीचे से फल तोड़कर खाया करता था। वे माली की मार और डण्डे भी खाते थे यानी रोज पिटते थे।
एक दिन बन्दरों के कर्मठ और जुझारू सरदार ने सब बन्दरों से विचार-विमर्श करके निश्चय किया कि रोज माली के डण्डे खाने से बेहतर है कि हम अपना फलों का बगीचा लगा लें। इससे बहुत सारे मनचाहे फल खाने से उन्हें किसी तरह की रोकटोक भी नहीं होगी और किसी को माली की मार भी नहीं खानी पड़ेगी।
सभी बन्दरों को यह प्रस्ताव बहुत पसन्द आया। जोर-शोर से गड्ढे खोदकर उन्होंने फलों के बीज बो दिए। पूरी रात बन्दरों ने बेसब्री से फलों का इन्तजार किया। सुबह देखा तो फलों के पौधे भी नहीं आए थे। यह देखकर बन्दर भड़क गए और सरदार से गाली-गलौच करने लगे, "कहाँ हैं हमारे हिस्से के फल?"
सरदार ने बन्दरों की मूर्खता पर अपना सिर पीट लिया और हाथ जोड़कर प्रार्थना करते हुए बोला, "साथियों, अभी हमने सिर्फ बीज बोए हैं, फल आने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए थोड़ी प्रतीक्षा करो।"
इस बात को सुनकर तो बन्दर मान गए। दो-चार दिन उन्होंने और प्रतीक्षा की परन्तु फिर भी पौधे नहीं आए। अब मूर्ख बन्दरों के सब्र का बाँध टूट गया। उन्होंने जैसे ही मिट्टी हटाई तो देखा कि फलों के बीज तो जमीन में वैसे-के-वैसे पड़े हैं।
बन्दरों को लगा कि सरदार झूठ बोल रहा है। उनकी किस्मत में तो माली के डण्डे खाने ही लिखे हैं। उस समझदार बन्दर के मना करने पर भी बन्दरों ने सभी गड्ढे खोदकर फलों के बीज निकाल-निकालकर फैंक दिए। पुन: अपने भोजन के लिये माली की मार और डण्डे खाने के लिए चल पड़े।
इस कहानी को पढ़ने के उपरान्त विचार यह करना है कि कहीं हम सभी बन्दरों की तरह मूर्खतापूर्ण व्यवहार तो नहीं कर रहे? यानी कोई बेवकूफी तो नहीं कर रहे। ऐसे व्यवहार से बचना चाहिए जो हमारे विनाश का कारण बन जाए या फिर मुसीब बन जाए। हमारे बीच जो भी विद्वान मनीषी हैं, उनकी दी गई शिक्षा का अनादर करने के स्थान उसे मान लेने में ही भला होता है। ऐसा करके हम उन पर कोई अहसान नहीं करते।
दूसरों से हम बहुत अधिक अपेक्षाएँ रखते हैं परन्तु यह कभी नही सोचते कि हम स्वयं दूसरों के लिए कुछ कर भी रहे हैं या नहीं। सारी समस्याओं की जड़ है हमारा व्यर्थ का अहंकार कि मेरे बराबर कोई और बुद्धिमान हो ही नहीं सकता। जब तक इस भ्रम से बाहर नहीं निकलेंगे तब तक कुछ सीख नहीं सकेंगे। जहाँ तक हो सके विनम्र रहकर शिक्षा लेनी चाहिए, उसी में ही जीवन की सार्थकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 4 मई 2018
मन और बुद्धि की जंग
मन और उसकी बुद्धि दोनों में सदा से ही द्वन्द्व चलता रहता है, उनमें प्रायः सामञ्जस्य नहीं हो पाता। मन किसी कार्य को करने की प्रेरणा देता है तो बुद्धि उसी कार्य को करने से रोक देती है। बुद्धि किसी कार्य को करना चाहती है तो मन अडंगा लगता है। ऐसी स्थिति में कार्य को करने के लिए उचित निर्णय लेना, मनुष्य के लिए बहुत कठिन हो जाता है। इसका कारण है कि ये दोनों अपनी-अपनी हाँकते हैं। ये दोनों विपरीत दिशा में भागते रहते हैं। जब तक इन दोनों को अपने नियन्त्रण में नहीं किया जाएगा तब तक ये बेचारे मनुष्य को इधर-उधर भटकाते रहते हैं।
बहुधा लोग मन और बुद्धि में अन्तर नहीं कर पाते। उन्हें समझ ही नहीं आता कि उनके द्वारा लिया गया निर्णय मन से प्रेरित हो रहा है अथवा बुद्धि से। इन दोनों में से किसी एक के नियन्त्रण में होकर ही निर्णय लिया जा सकता है। इस प्रकार दुविधा की स्थिति समक्ष आ जाने पर मनुष्य उस व्यक्ति विशेष से परामर्श कर सकता है जो उसका हितचिन्तक हो। वही उसे उस कठिन परिस्थिति से उभार सकता है और सही मार्गदर्शन कर सकता है।
मनुष्य कभी मन की सुनता है तो कभी बुद्धि की। बुद्धि के अनुसार सोच-समझकर जो निर्णय लिया जाता है, वह सही होता है। इसका कारण है कि बुद्धि हमेशा किसी भी विषय के गुणों और दोषों पर विचार करते हुए अपना पक्ष रखती है। उस निर्णय पर मनुष्य आँख बन्द करके विश्वास कर सकता है। बुद्धि का निर्णय सदा ही विवेकपूर्ण होता है। बुद्धि के निर्णय सदा तर्क की कसौटी पर कसे जा सकते हैं। जिस रास्ते पर चलने के लिए बुद्धि प्रेरित करती है, वह रास्ता लम्बा या कठिन हो सकता है, पर कभी निराश नहीं करता। उसे मान लेने पर मनुष्य को जीवन में कभी पश्चाताप नहीं करना पड़ता।
इसके विपरीत मन तो मनुष्य की सोच से भी आगे भागता है, इसलिए उसे चञ्चल कहा गया है। उसके निर्णय पर भरोसा नहीं किया जा सकता। हो सकता है कि वह निर्णय मूर्खतापूर्ण हो जिसके कारण जीवन पर्यन्त पछताना पड़ जाए। मन सदा शॉर्टकट की तलाश में रहता है। वह सुविधपूर्वक और सरल मार्ग चुनने का निर्णय लेता है। बिना सोचे-समझे उस रास्ते पर चलने का यह अर्थ होता है अपने पैर पर स्वयं कुल्हाडी मरना। वह मार्ग कुमार्ग भी हो सकता है। उस पर चलना अपने जीवन को बर्बाद करना होता है।
मन और बुद्धि जब किसी विषय पर हमारे समक्ष अपना मत प्रस्तुत करते हैं। तब यह हमारी जिम्मेदारी बनती है कि उन दोनों पर मनन करें। जो भी मत हमारी तर्क की कसौटी पर खरा उतरे, उसी मार्ग का चयन करें। हमारे निर्णय उस समय गलत साबित होते हैं, जब हम सुविधाजनक मार्ग का बिना विचारे चयन कर लेते हैं। जब लगे कि गाड़ी गलत ट्रैक पर चल रही है, उसी समय अपने सही मार्ग का चयन करके गलती को सुधारकर अपनी समझदारी का परिचय दिया जा सकता है।
उपनिषद का कथन विचारणीय है जो कहता है कि मन मनुष्य के रथ रूपी शरीर की लगाम है। बुद्धि को ऋषि ने सारथी कहा है जो रथ को चलाता है। सारथी बुद्धि का यह दायित्व है कि वह मन रूपी लगाम को कसकर रखे ताकि आत्मा रूपी यात्री अपनी मंजिल यानी मोक्ष को प्राप्त करके जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो सके। यदि लगाम को ढीला छोड़ दिया जाए तो इन्द्रियाँ रूपी घोड़े मनमाना आचरण करने लगते हैं। वे यात्री को लक्ष्य पर पहुँचने से पहले ही भटका देते हैं।
मन की हर बात अवश्य सुननी चाहिए पर उस पर आँख मूँदकर नहीं चलना चाहिए। उस पर गम्भीरता से विचार करना बहुत ही आवश्यक होता है। बुद्धि विवेकशील होती है, वह तर्कसंगत बात कहती है। वह किसी भी बात के सारे पहलुओं पर विचार-विमर्श करके ही सलाह देती है। इसलिए बुद्धि और मन की जंग में निश्चित ही बुद्धि की सदा विजय होती है। उसके अनुरूप कार्य करके मनुष्य कभी व्यथित नही होता बल्कि सदा सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 3 मई 2018
आत्मनिर्भर बनना
जिन्दगी जीने के लिए प्रतिदिन एक नया और उपयोगी सूत्र हमें देती है। बस उस पर ध्यान देने की आवश्यकता होती है। जो बुद्धिमान उस सूत्र को समझकर आत्मसात कर लेते हैं, वे आगे बढ़कर सफलता को छू लेते हैं। वे समाज में अलग से अपनी एक पहचान बना लेते हैं। वे जीवन में कभी हार नहीं मानते। जो लोग उसे जानकर भी किसी कारणवश समझना नहीं चाहते, वे कूपमण्डूक बनकर रह जाते हैं। उन्हें मनचाही सफलता नहीं मिल पाती।
अपने लिए एक नियम बना लेना चाहिए कि अपना हर काम स्वयं करेंगे। इस सूत्र को मानने के लिए आयु कोई बन्धन नहीं बनती। हाँ, यदि शरीर पूरी तरह से अशक्त हो जाए तो बात अलग है। घर में बच्चों के होने व भरा पूरा परिवार होने पर भी प्रयास यही करना चाहिए कि यथासम्भव स्वावलम्बी ही बना जाए। एक आयु के बाद यदि वे मना भी करें तो भी अपने कार्य स्वयं ही करते रहना चाहिए। इस तरह मनुष्य में कर्मठता बनी रहती है और बेचारगी का अहसास नहीं होता।
घर-परिवार के साथ रहते हुए भी अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं के लिए पति-पत्नी को एक-दूसरे की सहायता लेनी चाहिए, किसी अन्य की नहीं। इतने वर्षों के वैवाहिक जीवन के उपरान्त वो दोनों एक दूसरे की जरूरतों को अच्छी तरह समझते हैं। इसलिए उन्हें प्यार से एक-दूसरे की जरूरतों को समझ लेना चाहिए। समय के अनुसार उन्हें परस्पर व्यवहार करना चाहिए। यदि एक बार काम करना छोड़ दिया तो दूसरों पर निर्भरता हो गयी समझो। फिर इन्सान का मनोबल टूटने लगता है। उसे लगता है कि वह अब किसी काम का नहीं रह गया है। धीरे-धीरे ऐसा मनुष्य अवसाद ग्रस्त होकर बिस्तर ही पकड़ लेता है। उसका मन इसी उधेड़बुन में ही सदा लगा रहता है कि अपना काम किससे करवाऊँ।
जब तक हाथ-पाँव चलते हैं, तब तक आत्मनिर्भर रहा जा सके तो बहुत ही अच्छा है। बाद में तो चलने के लिए भी दूसरों का सहारा लेना पड़ता है। प्रयास यही करना चाहिए कि महीने में एक दो बार ऐसे ही कहीं घूमने निकला जाए। जब हम घूमना-फिरना बन्द करके खुद को घर में कैद कर लेते हैं तब फिर घर से बाहर निकलने में, अकेले जाने में हिचकिचाहट होने लगती है। तब चाहकर भी मनुष्य अपने बनाए हुए घेरे से बाहर नहीं निकल सकता। उसे पूरी तरह से बच्चों पर आश्रित हो जाना पड़ता है, जो उचित नहीं है।
जिन्दगी भर मनुष्य खूब काम करता है। दिन-रात एक कर देता है अपने घर-परिवार की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए। एक आयु के बाद अपने दायित्वों से मुक्त हो जाने के बाद उसे अपने लिए समय निकालना चाहिए। आजकल कहीं भी जाने-आने में कठिनाई नहीं होती। लोकल जाना हो तो कॉल करते ही टैक्सी हाजिर हो जाती है। यदि देश या विदेश में कहीं घूमने जाने हो तो एजेंट टिकट बुक करा देते हैं या इंटरनेट से भी टिकट बुक करवाई जा सकती है। आजकल टूर पैकेज लेकर भी सुविधा से यात्रा की जा सकती है। घर से स्टेशन या एयरपोर्ट जाने के लिए और वहाँ से होटल में जाने के लिए टैक्सी आ जाती है। इसी प्रकार वापिसी में भी स्टेशन या एयरपोर्ट पर जाने और घर आने के लिए टैक्सी मिल जाती है। होटल में कोई तकलीफ होनी नहीं है।
यदि मनुष्य थोड़ा-सा अपना ध्यान रख सके तो स्वास्थ्य आयु के अनुसार एकदम फिट रहता है। उसे सैर करने, योगासन करने व घूमने-फिरने से परहेज नहीं करना चाहिए। यदि रुचि हो तो फ़िल्म देखने भी जाया जा सकता है। मित्रों से मिलने के लिए भी समय निकाल जा सकता है। उनके साथ घूमने का, पिकनिक मनाने का कार्यक्रम बनाया जा सकता है। इसलिए जहाँ तक सम्भव हो सके, दूसरों का मुँह ताकना छोड़कर आत्मनिर्भर बनने का प्रयास चाहिए। अपने कार्यों के लिए पराश्रित होना छोड़ देना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 2 मई 2018
तोते की तरह रटना
दूसरे की बात को सुनकर, बिना सोचे-समझे यथावत रटकर सुना देने वाला व्यक्ति अपने नाम सदा के लिए गुलामी लिखवा लेता है। लोग ऐसे व्यक्ति को अपना गुलाम समझने की भूल कर बैठते हैं। एक प्रकार से वह उन लोगों के लिए मनोरञ्जन का कारण बन जाता है। इसके विपरीत अपनी बुद्धि का सदुपयोग करने वाला व्यक्ति चाहे कठोर ही क्यों न हो, स्वतन्त्रता का सुख भोगता है। वह किसी के अधीन नहीं रह पाता। उसका अपना ही एक स्वतन्त्र अस्तित्व होता है, जो सदा बना रहता है। वह अपनी ही धुन में मस्त रहता है।
इस बात को हम उदाहरण से समझने का प्रयास करते हैं। एक तोता जो सदा दूसरों को प्रसन्न करने के लिए उनकी बात को सुनकर वैसे का वैसा ही दोहरा देता है, सदा पिंजरे में ही कैद रहता है। उसका यह स्वभाव दूसरों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। लोग बार-बार उससे अपनी कही गयी बात को दोहराने के लिए कहते हैं। वह भी उनके मनचाहे शब्द उन्हें तथा उनके बन्धु-बान्धवों को सुनाकर प्रसन्न करने का प्रयास करता है। इस कारण सारी आयु पिंजरे में गुजरना ही उसकी नियति बन जाती है। वह वहाँ से चाहकर भी स्वतन्त्र नहीं हो पाता। वहीं अपना सिर टकराता रह जाता है पर मुक्त नहीं हो पाता।
इसके विपरीत कर्कश या कटु बोलने वाला कौवा सदा स्वतन्त्र रूप से उड़ता-फिरता है। किसी के घर की मुँडेर पर यदि वह बोले तो उसकी कटु बोली किसी को पसन्द नहीं आती। उसे कंकर मारकर वहाँ से भाग दिया जाता है। इसका कारण है किसी की चापलूसी न करना। जो कहना है साफगोई से कहता है। यानी वह सारा समय स्वेच्छा से इधर-उधर विचरण करता रहता है। किसी की आज्ञा का वह गुलाम नहीं बनता। इसीलिए वह जब किसी प्रिय के आने का सन्देश लाता है तो सबको अच्छा लगता है। और पितृपक्ष में जब अपनी जरूरत होती है तो लोग उसे आदरसहित बुलाकर उसे खिलाते हैं, सम्मानित करते हैं।
एक छोटा बच्चा जब बोलना आरम्भ करता है तब उसे नए-नए शब्दों को सीखने का बहुत शौक होता है। एक-एक शब्द को सीखने, बोलने और समझने में उसे समय लगता है। घर के सदस्य बार-बार एक ही शब्द बोलते हैं और बच्चा बिना उसका अर्थ समझे उन्हें दोहरा देता है। उसे अपने साथ इस प्रकार शब्द दोहराते सुनकर बहुत प्रसन्नता होती है और बच्चा भी खिलखिलाकर हँसता है। उसकी इस अदा पर माता-पिता बलिहारी हो जाते हैं।
परन्तु बड़ा होकर वही बच्चा यदि यही हरकत करे तो उसे सबकी फटकार सुननी पड़ती है, बड़ों के कोप का भाजन बनना पड़ता है। इसका कारण है कि अब उसे समझदार हो जाना चाहिए। उसे बच्चों वाली हरकतें छोड़ देनी चाहिए। कुछ बच्चे जो अपने पढ़ाए गए पाठ का रट्टा लगाकर परीक्षा में सफल होने का प्रयास करते हैं। उन्हें लोग रट्टू तोता कहकर तिरस्कृत करते हैं। यदि परीक्षा में थोड़ा घुमा-फिराकर प्रश्न पूछ लिया जाए तो फिर टाँय-टाँय फिस हो जाती है।
कुछ लोग अपनी बुद्धि का पूर्णरूप से उपयोग नहीं करते। वे कुँए के मेंढक की तरह अपने ज्ञान का दायरा विस्तृत ही नहीं करना चाहते। इसलिए वे रेस में पिछड़ जाते हैं और अपनी जग हँसाई करवा बैठते हैं। ऐसे लोग शून्य में ताकते हुए अपनी मूर्खता का परिचय देते हैं। अपनी अज्ञता को छुपाने के लिए उल्टे-सीधे बहाने गढ़ते हैं। इन लोगों का बस ईश्वर ही मालिक है।
अपने असूलों पर चलने वाला व्यक्ति कड़वा हो सकता है पर किसी का अहित नहीं करता। वह किसी की चापलूसी करके कुछ भी पाना नही चाहता। इसलिए हो सकता है उसका व्यवहार कभी खटक जाए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि वह त्याज्य है। उसके पास जो पूँजी है वह अनमोल है। अतः मानसिक गुलामी की बेड़ियों को काट देना ही श्रेयस्कर हैं। अपने व्यवहारिक ज्ञान के बल पर मनुष्य को आगे बढ़ना चाहिए और समाज में अपना एक स्थान बनाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 1 मई 2018
नैतिक दायित्व
शास्त्रों ने कुछ नैतिक दायित्व मनुष्यों के लिए निर्धारित किए हैं। उनका पालन करना सभी का कर्त्तव्य है। मनुस्मृति के निम्न श्लोक में बताया गया है कि कौन से वे लोगों हैं जो सामने आ जाएँ तो स्वयं मार्ग से हटकर पहले उन्हें जाने देना चाहिए। कुछ दिन पूर्व देश कुमार जी ने मनुस्मृति के इस श्लोक को उदधृत किया था। तभी से इस विषय पर लिखने की इच्छा हुई। प्रस्तुत है मनुस्मृति का यह श्लोक-
चक्रिणो दशमीस्थस्य रोगिणो भारिणः स्त्रियाः।
स्नातकस्य च राज्ञश्च पन्था देयो वरस्य च।।
अर्थात- रथ पर सवार व्यक्ति, वृद्ध, रोगी, बोझ उठाए हुआ व्यक्ति, स्त्री, स्नातक या ब्रह्मचारी, राजा तथा वर (दूल्हा)। इन आठों में से कोई भी आगे आ जाए तो उसे जाने का मार्ग पहले देना चाहिए।
मार्ग में जाते समय सामने कभी रथ पर सवार कोई व्यक्ति आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर उसे मार्ग दे देना चाहिए। आजकल रथ का स्थान चार पहिया वाहनों ने ले लिया है। रथ पर सवार व्यक्ति उच्च राजकीय पदाधिकारी हो सकता है अथवा वह शासक का निकटस्थ व्यक्ति भी हो सकता है। मार्ग न देने की स्थिति में वह हानि पहुँचा सकता है या अहित कर सकता है। इसके अतिरिक्त तेज गति से चलते वाहन को रास्ता न देने पर दुर्घटना हो सकती है। इसमें जान जाने तक का जोखिम उठाना पड़ सकता है। इसलिए सावधानी बरतनी बहुत आवश्यक होती है।
रास्ते में चलते हुए कोई वृद्ध व्यक्ति आ जाए तो पहले उसे मार्ग देना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अनुसार वृद्ध जन सदैव सम्माननीय होते हैं। उन्हें हर स्थिति में जाने के लिए पहले मार्ग देना चाहिए। इसका कारण यह भी है कि आयुप्राप्त वृद्ध लोग शारीरिक रूप से अशक्त होते हैं, उन्हें अधिक समय तक खड़े होने में कष्ट होता है। अतः उन्हें मार्ग पर प्रतीक्षा नहीं करवानी चाहिए। यथासम्भव उनकी सहायता करनी चाहिए। कोई भी ऐसा अवसर चूकना नहीं चाहिए।
रोगी व्यक्ति के साथ सहानुभूति प्रकट करनी चाहिए। वह दया व स्नेह का पात्र होता है। यदि रास्ते में कोई रोगी व्यक्ति सामने आ जाए तो उसे पहले जाने देना ही शिष्टता है। ज्ञात नहीं कि रोगी को किस प्रकार के उपचार की आवश्यकता है। हो सकता है मार्ग में रुकने से उपचार में देरी हो जाने पर उसे किसी विकट परिस्थिति का सामना भी करना पड़ सकता है। उसका जीवन भी दाँव पर लग सकता है। रोगी निर्बल होता है, उसकी सेवा करना बहुत पुण्य काम माना जाता है। हम उसकी सहायता तो नहीं कर रहे, पर उपचार के लिए जाते समय उसके मार्ग में बाधा नहीं पहुँचानी चाहिए।
सामने से बोझ उठाए हुआ व्यक्ति आ रहा हो तो पहले उसे ही जाने देना चाहिए। यह मानवीयता का प्रदर्शन करना कहलाता है। सिर पर बोझ उठाकर चलने वाला सामान्य स्थिति में चलने वाले मनुष्य से अधिक कष्ट का अनुभव कर रहा होता है। ऐसी स्थिति में शिष्टाचारवश हमें उसे ही पहले जाने देना चाहिए। ऐसा विनम्र व्यवहार करने से समाज में मनुष्य का सम्मान बढ़ता है।
महान भारतीय परम्परा के अनुसार हर आयु की स्त्री सम्माननीय होती है। यदि कभी वह मार्ग में आ जाए तो पहले उसे ही जाने देना चाहिए। अंग्रेजी भाषा में भी 'लेडीज फर्स्ट' कहकर उसका आदर किया जाता है। स्त्री के कोमलता आदि गुणों के कारण अनावश्यक ही उसे प्रतीक्षा नहीं करवानी चाहिए। उसका सदा ही आदर करना चाहिए और यह भी उसे मान देने का ही एक स्वरूप है।
मार्ग में आने वाले ब्रह्मचारी यानी विद्यार्थी को पहले जाने देना चाहिए। इसे हम इस प्रकार समझ सकते हैं कि ब्रह्मचारी अपने गुरु के पास अध्ययन के लिए जाता है। गुरु के पास रहकर वह वेदादि ग्रन्थों का ज्ञान प्राप्त करता है। विद्वत्ता के क्षेत्र में सफलता पाने वाला वह सर्वत्र ज्ञान का प्रकाश फैलता हैं। ऐसे समय में विद्वान को पहले मार्ग देना उसका सम्मान करना होता है।
राजा को देश का पिता तुल्य कहा जाता है। वह प्रजा का पालन-पोषण करता है तथा विपत्तियों से उनकी रक्षा करता है। राजा के सभी निर्णय अपनी प्रजा के हित में होते हैं। राजा का हर स्थिति में आदर करना चाहिए। जिस मार्ग पर चल रहे हों और राजा उसी रास्ते पर आ जाए तो स्वयं पीछे हटकर राजा को ससम्मान से जाने देना चाहिए अन्यथा उसके कोप का भाजन बनना पड़ सकता है। अपने झूठे अहं के कारण दण्ड नहीं पाना चाहते तो पहले उसे ही जाने का मार्ग देना चाहिए।
वर यानी दूल्हा वह व्यक्ति है जिसका व्यक्ति का विवाह होने जा रहा है। यदि दूल्हा या बारात मार्ग में आ जाए तो पहले उसे जाने देना चाहिए। ऐसी मान्यता है कि दूल्हा बना व्यक्ति भगवान शिव का स्वरूप होता है अपनी पार्वती स्वरूपा दुल्हन के साथ विवाह करने जा रहा है। ऐसे शुभ अवसर पर उसका रास्ता नहीं रोकना चाहिए अपितु शिष्टाचारवश उसे पहले ही मार्ग देना चाहिए।
इस प्रकार मनु महाराज ने मनुष्य को उसके नैतिक दायित्वों को समझाने का प्रयास।किया है। इनकी अनुपालना हर मनुष्य को करनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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