रविवार, 13 मई 2018

प्रताड़ना

प्रताड़ना चाहे स्त्री की हो अथवा पुरुष की, दोनों के लिए सहन करना बहुत कठिन होता है। स्त्री-पुरुष को लैंगिक आधार पर विभाजित करना वास्तव में सोचे-समझे षडयन्त्र का एक हिस्सा है। आर्थिक और सामाजिक रुप से सक्षम न होने के कारण युवा पुरुष अपने घर-परिवार में अस्वभाविक रूप कहीं पीडित होते हैं। जब किशोरवर्ग उत्साहपूर्वक अपना जीवन आरम्भ करता है तब उसे आटे-दाल का भाव मालूम होता है।
           कहते हैं सपन्न व्यक्ति के पास हर ताले की चाबी होती है फिर भी वह प्रताड़ित हो सकता यदि अपने जीते जी बच्चों को अपना सब कुछ सौंप देता है। कुछ लोग अपने प्रति हो रहे अत्याचार को चुपचाप सहन करते हैं, वे सोचते हैं कि लोग क्या सोचेंगे? बच्चों का क्या होगा? आज अस्सी प्रतिशत पुरुष पत्नी से आतंकित होकर सोचने के लिए विवश हैं।
            घर पर बोलने या कुछ कहने के विषय में पुरुषों की हालत तो जग जाहिर है। पत्नी उसे अपनी माँ जा पल्लू पकड़कर चलने वाला बताती है। उधर माता-पिता उसे जोरू का गुलाम कहकर धिक्कारते हैं। भारतीय पुरुष अपने परिवार की सुख-सुविधा के लिए अपना सर्वस्व न्योछवर करने में कोई कर कसर नहीं छोड़ता। इसके बावजूद एक आयु के पश्चात वृद्ध पुरुषों की दुर्दशा होती है। वे सबसे अधिक उपेक्षित होते हैं। उन्हें समय पर न भोजन मिलता है और न ही किसी का प्यार। उन्हें तिरस्कृत एवं घृणा का सामना करना पड़ता है। इससे उनके आत्मसम्मान को ठेस लगती है और उन्हें मानसिक तनाव झेलना पड़ता है। इससे उनका चोट खाया हुआ अहं अवसादग्रस्त हो जाता है। कुछ पुरुष अपनी जीवन लीला तक समाप्त कर देते हैं। यही कारण है कि पुरुषों का आत्महत्या करने का आँकड़ा कहीं अधिक है।
          पुरुष परिवार में अधिक शोषण का शिकार होता है। कार्यक्षेत्र में उसकी योग्यता और क्षमता को अनदेखा किया जाता है। महिला सहकर्मियों द्वारा पुरुष प्रताड़ना के मामलों में लोगों की स्वभाविक हमदर्दी महिलाओं से होती है। कार्यालय, समाज, राजनीति धर्म इत्यादि में पुरुष केवल अपनी क्षमता तथा योग्यता के बल पर आगे आता है। उन स्थानों पर लाभ या कुछ बेहतर स्थान पाने के लिए महिलाएँ पुरुषों को भावनात्मक रूप से ब्लैकमेल करती हैं।
          पुरुष का खिचाई प्राय: दोस्तों और परिवारी जनों में पति-पत्नी के रिश्तों को लेकर होती है। यहाँ पुरुष बेचारा और सहानुभूति का पात्र होता है। स्त्री हो या पुरुष दोनों की संवेदनाएँ, जरूरतें, दुख-सुख, शोषण और प्रताड़नाएँ एक-सी होती हैं। उनमें अन्तर बस यही होता है कि पुरुष का रेप नहीं होता। उसे नंगा करके घुमाया नहीं जाता। उसका वेश्याकरण भी नहीं किया जाता। यदि किसी अवस्था में उसके साथ कुकर्म होता है तो वह उसकी शिकायत नहीं कर सकता। यह अलग बात है कि आज कुछ युवा जुगालो या स्ट्रिप्टी बनकर पैसा कमा रहे हैं।
         विवाह के बाद वह माता, पिता और बीवी के वह फुटबाल की तरह बन जाता है। परिवार की या माता-पिता की आर्थिक सहायता न कर पाने के कारण उनकी प्रताड़ना झेलता है और उनकी सहायता करने के कारण बीवी की प्रताड़ना झेलता है। दफ्तर में बॉस से अपमानित होता है। पुरुष की सहन शक्ति का कमाल है कि वह न किसी से कुछ कह पाता है और न ही खुल कर रो पाता है। स्त्रियों की तरह वह पुरुषचरित्र भी नहीं दिखा सकता।
          पुरुष का सहज आकर्षण, आपदाओं से भागने की प्रवृत्ति, मनमौजीपन, स्वतन्त्रप्रियता और वहशीपन जैसी कमियाँ उसे निरंकुश और स्वछन्द बना देती हैं। परिणाम की चिन्ता किए बिना एक विवेकी व शक्तिशाली पुरुष अपराधी बन जाता है। उसका बॉस और उसकी पत्नी उसे मानसिक प्रताड़ना देते रहते हैं।
        पत्रिका न्यूज नेटवर्क ने कुछ समय पूर्व प्रकाशित किया था कि घरेलू हिंसा में पतियों के जुल्म की दास्तान सुर्खियाँ बटोरती है। वहीं 'यू एन' के अध्ययन में पतियों पर हुए घरेलू हिंसा में होने वाले के आँकडों का खुलासा किया है। उसके अनुसार इजिप्ट में घरेलू हिंसा के तहत पुरुष सबसे अधिक पीटे जाते हैं। इस श्रेणी में दूसरे नम्बर पर यू. के. है और भारत तीसरे नम्बर पर है। यह अध्ययन सोशल मीडिया पर बहुत वायरल हो रहा है। अध्ययन से पता चलता है कि पतियों को मारने के लिए पत्नियाँ बेलन, बेल्ट, जूते व किचन के अन्य सामानों का इस्तेमाल करती हैं।
          विडम्बना यह कि पुरुष को यह सब अकेले ही सहन करना पड़ता है, किसी के समक्ष वह इसे प्रकट नहीं कर सकता। यदि किसी के सामने अपना दुखड़ा सुनाने का यत्न करेगा तो लोग उसी का उपहास करेंगे। पुलिस भी उसकी बात को सीरियसली नहीं लेती। एक भुक्तभोगी ही यह व्यथा-कथा समझ सकता है। आजकल पुरुष भी पत्नी के अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज उठाने के लिए संगठन बनाने का प्रयास कर रहे हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 12 मई 2018

चिरयुवा रहने के उपाय

चिरयुवा बने रहने के लिए मनुष्य को कुछ विशेष बातों का ध्यान रखना चाहिए। समय निरन्तर प्रवाहमान है। अतः आयु को बढ़ने से कोई रोक नहीं सकता। आयु के हर पड़ाव में मनुष्य कुछ विशेष सावधानियाँ बरतकर स्वस्थ और प्रसन्न रह सकता है। अपनी वृद्धावस्था में जब शरीर अशक्त होने लगता है, उस समय भी निम्न उपायों द्वारा स्वयं को प्रसन्न रखने का प्रयास किया जा सकता है। इससे जीवन में नवीन ऊर्जा का संचार होता है।
           जहाँ तक हो सके सरल व साधारण चीजों का आनन्द लेना चाहिए। जीवन में कैसी भी परिस्थितियाँ आएँ, प्रयास सदा यही करना चाहिए कि प्रसन्न रहा जाए। खूब देर तक और ऊँची आवाज में हँसना चाहिए। हँसना एक प्रकार का व्यायाम है। इससे मनुष्य तनावमुक्त हो जाता है। बहुत से पार्कों में लोग यह अभ्यास करते हुए दिखाई देते हैं। केवल हँसमुख लोगों से दोस्ती रखनी चाहिए। ऐसे लोगों के साथ अपना कुछ समय व्यतीत करना चाहिए जो सकारात्मक सोच रखते हों। पर क्रूर और  चिड़चिड़े लोग सदा नकारात्मक सोच रखते हैं। इनसे मित्रता करने से बचा जा सके तो बहुत अच्छा रहेगा।
          अपने आसपास उन सबको रखिए जो आपको प्रिय हों। आपका परिवार, पालतू जानवर, स्मृतिचिह्न-उपहार, संगीत, पेड़-पौधे, कोई हॉबी या अन्य कुछ भी। आपका घर ही आपकी आश्रयस्थली है। प्रयास यही होना चाहिए कि कुछ नया सीखते रहा जाए। शिल्प, कम्प्यूटर, बागवानी आदि के विषय में कुछ और जानने की कोशिश कीजिए। इनमें मन रमा रहेगा तो दिमाग निष्क्रिय नहीं रहेगा। खाली बैठकर उधेड़बुन करने के स्थान पर सदा सकारात्मक कार्य कीजिए। इस तरह समय भी व्यतीत हो जाएगा। मनीषी कहते हैं कि खाली दिमाग शैतान का घर होता है। अनावश्यक ही पिष्टपेषण करते रहने के कारण अल्झाइमर यानी मनोरोग होने का खतरा बढ़ जाता है। इससे बचना आवश्यक है।
          अनावश्यक ही आयु, कद और वजन आदि के विषय में सोचना छोड़ देना चाहिए। इन सबके बारे में डॉक्टर है न चिन्ता करने के लिए। वह इसके लिए मोटी फीस लेता है और लोग हँसकर उसे पैसा देते है। अपनी सेहत का ध्यान रखिए। जहाँ तक हो सके सादा और पौष्टिक भोजन ही खाना चाहिए। यदि शरीर स्वास्थ्य है तो उसे सम्भालकर रखिए, यदि अस्वस्थ है तो इलाज करवाइए और यदि कोई असाध्य रोग है तो किसी की सहायता लेने से परहेज मत कीजिए।
         खुशी अथवा गम हर समय आँसू आते ही रहते हैं। उन्हें बह जाने दीजिए, रो लीजिए। सुख और दुःख दोनों को महसूस कर लीजिए और फिर स्वस्थ होकर आगे बढ़ जाइए। मनुष्य स्वयं ही एक ऐसा व्यक्ति है जो सारी जिन्दगी अपने साथ रहता है। जब तक यह जीवन है तब तक प्रफुल्लित होकर रहना चाहिए। पता नहीं कब क्या होनी-अनहोनी घटित हो जाए। हर स्थिति के लिए स्वयं को तैयार रखना चाहिए। इससे दुख काम होता है।
         जिन्हें आप प्यार करते हैं उनसे बार-बार अहसास करवाते रहिए कि आप उन्हें कितना चाहते हैं और सदा उन्हें याद करते रहते हैं। जीवन का पैमाना उन साँसों की संख्या से नहीं होता जिन्हें हम अपने भीतर लेते या बाहर छोड़ते हैं बल्कि उनसे होता है जो लम्हे हमारी साँस को लेकर चले जाते हैं। हमें प्रतिदिन अपने जीवन को अपने तरीके से जीने की आवश्यकता है। यह मानकर चलना चाहिए कि हर दिन आखिरी दिन है और हर साँस आखिरी है। इस सोच के साथ जीने से इन्सान को न मृत्यु से डर लगता है और न ही जीवन से। इसे याद करते रहने से जीवनयात्रा सरल और सुगम हो जाती है।
           हर समय स्वयं को दोषी ठहराना बन्द कर दीजिए। अनावश्यक का यह अपराध-बोध जिजीविषा को समाप्त करता है। जब भी मन में उदासी के भाव आने लगें, उस समय किसी मॉल में या बाजार में घूमने चले जाइए, किसी पड़ोसी या किसी मित्र के घर उनसे मिलने चले जाइए। देश-विदेश जहाँ मन करे और साधन आज्ञा दें वहाँ कहीं भी यात्रा के लिए जाइए। जहाँ जाकर मन अशान्त हो वहाँ बिल्कुल नहीं जाना चाहिए। मन को शान्त रखने के लिए पुस्तकें पढ़ सकते हैं। हल्का-फुल्का योग कर सकते हैं, पुराने फोटो देखकर मधुर स्मृतियों का स्मरण कर सकते हैं। इन सबसे भी बढ़कर प्रभु का नाम जप सकते हैं। वही सब दुखों को दूर करने की परम औषधी है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 11 मई 2018

दुर्घटना के समय सूचना

आजकल सड़क दुर्घटनाएँ बहुत अधिक होने लगी हैं। रेल, हवाईजहाज की दुर्घटनाएँ भी यदा कदा हो जाती हैं। ये समाचार प्रतिदिन समाचार पत्रों की तथा टी वी समाचारों की सुर्खियों में बने रहते हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगने लगता है कि लोग यहाँ मर गए अथवा वहाँ मारे गए के अतिरिक्त कोई अन्य समाचार हैं ही नहीं। हर तरफ मानो मृत्यु का ही ताण्डव हो रहा है। इन समाचारों को देख-सुनकर मन बहुत व्यथित हो जाता है।
           आजकल युवाओं को स्पीड का बहुत ही चक्कर रहता है, उन्हें लाख समझा लो उनके कान पर जूँ भी नहीं रेंगती। मोटरसाइकिल चलाने वाले युवा पता नहीं किस नशे में रहते हैं? बाइक को चलते वाहनों के बीच से आड़ा-टेड़ा करके चलाते हैं। बहुत से लोग अपने पूरे पेपर्स साथ लेकर नहीं चलते। कई बार लोग घूमने के उद्देश्य से अपने शहर से बाहर जाते हैं। जरूरी नहीं कि वे अपना पहचान पत्र साथ लेकर चलें। इससे भी बढ़कर समस्या होती है सूचना देने की।
          इन सब घटनाओं के विषय में बात करने के साथ-साथ एक अन्य महत्त्वपूर्ण चर्चा भी करनी है। हम सभी अपने साथ मोबाइल फोन लेकर तो चलते हैं पर अपना परिचयपत्र लेकर नहीं चलते। ईश्वर न करे कभी ऐसी दुर्घटना किसी के साथ हो जाए तो उसकी सूचना उनके परिवारी जनों को कैसे दी जाएगी? मोबाइल पर लिखे फोन नम्बरों से तो ज्ञात नहीं हो सकता कि उनमें परिवार के लोगों का नम्बर कौन-सा है। हम लोग अपने मोबाइल में नाम के साथ ही नम्बर लिखते हैं। हमारे अलावा और कोई नहीं जान सकता कि इनमें से कौन-सा नम्बर हमारे किसी परिवार के सदस्य या नजदीकी रिश्तेदार अथवा मित्र का है।
         समस्या तब होती है जब हम अचानक दुर्घटना ग्रस्त हो जाएँ या घूमने गए हुए हों तब अचानक बीमार पड़ जाएँ। जो कोई व्यक्ति उस समय अस्पताल पहुँचाना चाहता है, उसे हमारा मोबाइल फोन तो मिल जाता है परन्तु वह यह नहीं जान पाता कि फोन किसे किया जाय? क्योंकि मोबाइल में सैकड़ों नम्बर लिखे रहते हैं किन्तु ऐसी आपात स्थिति (Emergency) में किससे सम्पर्क किया जाय?
         मैं अपना ही उदाहरण देती हूँ। हमारे परिवार में अपनी ही जाति में बच्चों की शादी हो, ऐसी कोई रूढ़ि नहीं है। मेरी तीन बहनें हैं और एक भाई है। मेरे भाई का सरनेम गुप्ता है। बहनों में एक का सरनेम गुप्ता है, मंझली बहन का अरोरा और सबसे छोटी बहन का वर्मा है। मेरी छोटी ननद का सरनेम छबड़ा है और बड़ी ननद अब इस दुनिया में नहीं है उनका तलवार है। सोचने की बात है कि मोबाइल की कॉटेक्ट लिस्ट को पढ़कर कोई अनजान व्यक्ति सपने में भी नहीं मेरे सम्बन्धियों का अनुमान नहीं लगा सकता। यदि मेरे सूद सरनेम को देखकर कोई सारे सूद लोगों के नाम छाँटेगा तब फिर हो सकता कुछ सफलता मिल जाए। सारे सूद मेरे सम्बन्धी नहीं हो सकते। हो सकता है कुछ फेसबुक के कारण जुड़े हों और कुछ दूर के सम्बन्धी या मित्र हों।
          यहाँ एक बात और जोड़ना चाहती हूँ कि बहुत लोगों के पास लैण्ड लाइन फोन होता है। उसका नम्बर यदि 'होम' लिखकर सेव कर लिया जा सकता है। उस फोन का कोई भरोसा नहीं होता। हो सकता है कि वह आउट ऑफ सर्विस हो या घर पर उस समय कोई हो ही नहीं। इस तरह बहुत-सा समय नष्ट हो सकता है। हो सकता है चाहकर भी कोई व्यक्ति फोन से सूचना देने के लिए सम्पर्क साधने में विफल हो जाए।
           कुछ दिनों से इस विषय पर मैं बहुत ही गम्भीरता से विचार कर रही हूँ। मेरी बुद्धि ने इसका एक हल निकल है कि अपने परिवार के सदस्यों के नाम लिखने से पहले 'फैमिली' शब्द लिख दिया जाए। इस तरह परिवार के सारे सदस्यों के नाम फैमिली के अन्तर्गत एकसाथ आ जाएँगे। इस तरह उन्हें ढूंढ पाना सरल हो जाएगा। ईश्वर न करे कभी कोई अनहोनी हो, यदि ऐसा कुछ घटित हो जाता है तो तुरन्त परिवारी जनों को सूचना मिल सके। आशा है आप सभी मेरे इस सुझाव अपनी सहमति की मोहर लगाएँगे और इसके अनुरूप ही उपाय भी करेंगे।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 10 मई 2018

रिश्तों का क्रमिक ह्रास

रिश्तों के महत्त्व के विषय में हम बहुत कुछ लिखते, पढ़ते और सुनते हैं। इन्सान अपने रिश्तेदारों और भाई-बन्धुओं से ही सुशोभित होता है। छोटी-मोटी बातें होती रहती हैं, पर रिश्तों को सहेजकर रखना सबका दायित्व होता है। अपने मिथ्या अहं की बलि देकर यदि रिश्तों को बचाना पड़े तो सौदा मँहगा नहीं है। सुख-दुख में जब अपने रिश्ते-नातेदार कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़े होते हैं तब मनुष्य की शान ही निराली होती है।
            कुछ दिन पूर्व रिश्तों के क्रमिक ह्रास को दर्शाने वाली छोटी-सी दस पंक्तियों की कविता पढ़ी थी, मन को छू गईं। उसमें कहा था कि आदमी जब पत्तल में खाना खाता था यानी उस समय घर में कोई विशेष तामझाम नहीं होता था। घर में मँहगी क्रॉकरी आदि नहीं होती थी, दिखावा नहीं होता था तब घर आने वाले रिश्तेदारों या अतिथियों के स्वागत-सत्कार में कोई कमी नहीं रखी जाती थी। उस समय जब कोई मेहमान आता था तो उसे देख कर घर के लोग प्रसन्न हो जाते थे। उसके स्वागत में पूरा परिवार मानो बिछ-बिछ जाता था। तब अतिथि भार नहीं लगता था, बल्कि ईश्वर का रूप प्रतीत होता था।
           उसके पश्चात जब मिट्टी के बर्तनों का चलन आरम्भ होने लगा। उन बर्तनों में खाते हुए वह रिश्तों को जमीन से जुड़कर निभाने लगा। जमीन से जुड़ने का तात्पर्य है कि वह अपना कर्त्तव्य समझकर ही रिश्तेदारों की आवभगत करता था। वह रिश्तों को निभाने के लिए जी-जान से प्रयास करता था। वह रिश्तों का मूल्य जनता और समझता था। उनको निभाने का तौर-तरीका उसे ज्ञात था। इसलिए यथाशक्ति वह अपने दायित्व निभाता था।
           फिर पीतल के बर्तनों का उपयोग घरों में होने लगा था। मनुष्य साल छः महीने में उन बर्तनों को चमका लेता था। उसी प्रकार रिश्तों को भी चमकता रहता था। यानी गाहे-बगाहे बन्धुजनों से मिलने चला जाता था अथवा वे ही मिलने के लिए आ जाया करते थे। इस तरह प्यार और भाईचारा सच्चे मन से निभाया जाता था। वहाँ रिश्तों में दिखावटीपन नहीं होता था। सभी एक-दूसरे के लिए खिंचाव महसूस किया करते थे। इसलिए तब रिश्ते सदा ही चमकते रहते थे।
         उसके बाद वह समय आ गया जब परिवारीजन स्टील के बर्तनों में भोजन खाने लगे। लम्बे समय तक चलने वाले इन बर्तनों की तरह रिश्ते भी दीर्घकालिक हुआ करते थे। उस समय तक भी रिश्तों को लम्बे समय तक निभाने की पुरातन परिपाटी चली आ रही थी। परस्पर भाईचारा और सौहार्द बना रहता था, लोग रिश्तों का सम्मान करते थे। उसके लिए प्रयास भी करते थे और किसी को नाराज नहीं होने देते थे। इस समय भी रिश्तों की मिठास बानी रहती थी और सभी मजबूत बन्धन में बन्धे रहते थे।
         अब काँच के बर्तन जब से घर में बरते जाने लगे हैं। जिस तरह काँच के बर्तनों को हल्की-सी चोट लग जाए तो वे टूटकर बिखर जाते हैं। उनकी किरचें चुभ जाएँ तो बहुत कष्ट होता है। उसी तरह एक हल्की-सी चोट में रिश्ते बिखरने लगे हैं। दूसरे की कही गई बात मन को चुभ जाती है। कोई दूसरे की बात को सहन नहीं कर पाता, इसलिए रिश्ते बिना समय गँवाए चटकने लगे हैं, उनमें दरार आने लगी है। इस दरार को भर पाना असम्भव-सा होने लगा है। इसका कारण यह है कि कोई झुकना नहीं चाहता। अपनी गलती स्वीकार करने के लिए भी कोई तैयार ही नहीं होता।
         अब थर्मोकोल या पेपर से बने बर्तनों का प्रयोग होने लगा है। इसके साथ ही सारे सम्बन्ध भी अब यूज एण्ड थ्रो होने लगे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि आजकल रिश्ते स्वार्थ की बुनियाद पर बनाए जाने लगे हैं। जब तक स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है, तब तक गधा भी बाप होता है। स्वार्थ सधते ही 'तू कौन और मैं कौन' वाला रवैया हो जाता है। सब अपने-अपने रास्ते चले जाते हैं। फिर कोई किसी को पहचानता ही नहीं है।
           रिश्तों की गर्माहट धीरे-धीरे कम होने लगी है। उनमें बर्फ-सी ठण्डक जमने लगी है। पता नहीं कब यह बर्फ पिघलेगी और हमारे रिश्ते पहले की तरह बन्द मुट्ठी के समान मजबूत बन सकेंगे। अथवा यह सब भाव अब कोरी कल्पना बनकर ही रह जाएँगे? ईश्वर से प्रार्थना ही कर सकते हैं कि वह हमारे मनों से मिथ्या अहंकार को दूर करके रिश्तों को सहेजने की शक्ति दे।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 9 मई 2018

ईश्वर से बढ़कर कोई नहीं

अकबर और बीरबल के किस्से बहुत प्रसिद्ध हैं। वे किस्से कितने थे और विद्वानों ने अपनी बुद्धि के अनुसार कितने किस्से उनमें और जोड़े, यह किसी को ज्ञात नहीं। अकबर विभिन्न विषयों पर बीरबल से प्रश्न पूछते थे। बीरबल अपनी सूझबूझ और धैर्य से उन प्रश्नों का उत्तर देकर उन्हें सन्तुष्ट करता रहता था। बाजार में भी इनके किस्सों की पुस्तकें उपलब्ध हैं। बहरहाल आज हम एक ऐसे किस्से पर चर्चा करते हैं जो ईश्वर के प्रति हमारे विश्वास को और अधिक दृढ़ करता है। परमपिता परमात्मा से बढ़कर और अन्य कोई नहीं है जो हमारी झोलियाँ अपनी नेमतों से भर सकता है। हम ही उन्हें पाने के लिए स्वयं को योग्य नहीं बना पाते।
            एक बार राजा अकबर ने बीरबल से पूछा- "तुम हिन्दू लोग दिन में कभी मन्दिर जाते हो, कभी पूजा-पाठ करते हो, आखिर भगवान तुम्हें देता क्या है?"
         बीरबल ने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कुछ दिन का समय माँगा। बीरबल ने एक बूढी भिखारन के पास जाकर कहा- "मैं तुम्हें पैसे भी दूँगा और रोज खाना भी खिलाऊँगा। तुम्हें मेरा एक काम करना होगा।"
बुढ़िया ने कहा- "ठीक है जनाब।"
बीरबल ने कहा- "आज के बाद अगर कोई तुमसे पूछे कि क्या चाहिए तो कहना अकबर? अगर कोई पूछे किसने दिया तो कहना अकबर शहंशाह ने।"
        वह भिखारिन अकबर को बिल्कुल नहीं जानती थी पर प्रतिदिन वह हर बात में अकबर का नाम लेने लगी। कोई पूछता क्या चाहिए तो वह कहती- "अकबर",  कोई पूछता किसने दिया, तो कहती- "अकबर मेरे मालिक ने दिया है।'
         धीरे-धीरे यह सारी बातें अकबर के कानों तक भी पहुँच गई। वह खुद भी उस भिखारन के पास गया और पूछा- "यह सब तुझे किसने दिया है?"
        उसने जवाब दिया- "मेरे शहंशाह अकबर ने मुझे सब कुछ दिया है।
       अकबर ने फिर पूछा- "और क्या चाहिए?"
       बड़े अदब से भिखारन ने कहा- "अकबर का दीदार, मैं उसकी हर रहमत का शुक्राना अदा करना चाहती हूँ, बस और मुझे कुछ नहीं चाहिए।"
       अकबर उसका प्रेम और श्रद्धा देखकर निहाल हो गया और उसे अपने महल में ले आया। भिखारन तो हक्की-बक्की रह गई और अकबर के पैरों में लेट गई- "धन्य है मेरा शहंशाह।"
         अकबर ने उसे बहुत सारा सोना दिया, रहने के लिए घर दिया, सेवा करने वाले नौकर भी देकर उसे विदा किया ।
            तब बीरबल ने कहा-  "महाराज यह आपके उस सवाल का जवाब है। जब इस भिखारिन ने सिर्फ केवल कुछ दिन सारा समय आपका नाम लिया तो आपने उसे निहाल कर दिया। इसी तरह जब हम सारा दिन सिर्फ मालिक को ही याद करेंगे तो वह हमें अपनी दया की मेहर से निहाल और मालामाल कर देगा।"
         एक सांसारिक बादशाह के सिमरन से इतना कुछ मिल सकता है। उस मालिक ने, जिसने सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड और बादशह बनाए हैं, उसके सिमरन से कितनी नेमते मिलेंगी? वह तो बिनमाँगे ही हमें सब कुछ देता रहता है। हमारा आँचल ही छोटा पड़ जाता है। दिनभर, सोते-जागते, उठते-बैठते, चलते-फिरते मालिक का ध्यान करते रहना चाहिए। आठों पहर उसके नाम का सिमरन करते रहना चाहिए। एक बार हमारा ध्यान लग गया तो बस बेड़ा पार हो जाएगा। तब फिर चौरासी लाख योनियों और जन्म-मरण के बन्धनों से मनुष्य को मुक्ति मिल जाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 8 मई 2018

अमृतपान से क्या होगा?

समुद्र मन्थन का आयोजन देवताओं और असुरों ने मिलकर किया था। शेष अन्य रत्नों के साथ विष और अमृत दोनों उससे निकले थे। विष संहारक था, इसलिए कोई भी उसे पीना नहीं चाहता था। अमृत पीकर अमर हुआ जा सकता था, अतः देवासुर सभी उसे पीना चाहते थे। उसके लिए देवताओं और असुरों में झगड़ा भी हुआ। कोई भी अमृत को छोड़ना नहीं चाहता था।
          विचारणीय प्रश्न है कि मनुष्य को यदि अमृत मिल जाए तो क्या उसका पान करना चाहिए? अमृत का पान करने का लाभ क्या है? अमृत को पीकर मनुष्य क्या करेगा? अमर होकर क्या मनुष्य सुखी हो सकता है?
           इन प्रश्नों के उत्तर में मैं एक ही बात काना चाहती हूँ कि अमृत का पान करने का मनुष्य को कोई लाभ नहीं हो सकता। अमर होकर यदि विषय-वासनाओं का गुलाम बनकर रहे तो भी कोई लाभ नहीं होगा। उनसे मुक्ति नहीं मिल सकती। उसके लिए यम-नियम आदि अष्टांग योग का पालन उसे करना ही पड़ेगा। अमृत का पान करके मनुष्य को कदापि सुख नहीं मिल सकता। पूर्वजन्म कृत सभी सुकर्मों और दुष्कर्मों का फल तो उसे फिर भी भुगतना पड़ेगा। उससे मनुष्य को किसी भी सूरत में मुक्ति नहीं मिल सकती। अमृत का पान करके यदि मनुष्य अहंकारी बन जाए तो भी इससे कुछ नहीं होने वाला।
           कहते हैं सिकन्दर उस जल की तलाश कर रहा था, जिसे पीकर मनुष्य अमर हो जाता है। बहुत दिनों तक भटकने के पश्चात उसने आखिरकार उस जगह को खोज लिया था, जहाँ उसे अमृत की प्राप्ति हो सकती थी। यह सोचते हुए वह प्रसन्न हो गया था कि उसने अमृत की प्राप्ति कर ली है। अब उसे पीकर वह अमर हो जाएगा। उसके समक्ष ही अमृत की पावन धारा बह रही थी। वह अपनी अञ्जलि में अमृत को लेकर पीने के लिए झुका ही था कि उस गुफा के भीतर बैठा बूढ़ा व्यक्ति जोर से चिल्लाया, "रुक जा भाई, यह भूल बिल्कुल मत करना।"
           वह वृद्ध व्यक्ति बहुत बुरी अवस्था में था। सिकन्दर ने उससे कहा, "तू मुझे रोकने वाला होता कौन है?"
          बूढे व्यक्ति ने उत्तर दिया, "मैं भी तुम्हारी तरह अमृत की तलाश में इस गुफा आया था। मैंने इस अमृत को पी लिया था। अब मैं मरना चाहता हूँ, परन्तु अमर होने कारण मैं मर नहीं सकता। मेरी हालत देख लो। मैं अन्धा हो गया हूँ, पैर गल गए हैं, अब मैं चीख रहा हूँ, चिल्ला रहा हूँ  कि कोई मुझे मार डाले। पर मेरा दुर्भाग्य कि मुझे मारा भी नहीं जा सकता। अब दिन-रात परमपिता परमात्मा से यही प्रार्थना करता रहता हूँ, "हे प्रभु! मुझे मौत दे दो, मैं जीना नहीं चाहता।"
           यह सुनकर सिकन्दर बिना अमृत पिए चुपचाप गुफा से वापिस लौट गया। वह समझ चुका था कि जीवन का आनन्द उसी समय तक लिया जा सकता है, जब तक मनुष्य उसे भोगने की स्थिति में होता है।
          अतः अपने स्वास्थ्य की रक्षा कीजिए। जितना जीवन मिला है, उसका भरपूर आनन्द उठाइए। दुनिया में सिकन्दर कोई भी नहीं है, बस वक्त ही सबसे बड़ा सिकन्दर है। अमृत का पान करके आसार संसार की सारी ऋतुओं का प्रभाव शरीर पर पड़ेगा। अमर हो जाने के कारण मनुष्य के अपने बन्धु-बान्धव तो सभी साथ छोड़कर चले जाएँगे तो वह अकेला क्या भाड़ झौंकेगा? उसका मरणधर्मा शरीर अशक्त होता जाएगा। उस स्थिति में वह बारम्बार मौत को गले लगाने की गुहार लगता फिरेगा पर मौत उससे मुँह मोड़कर चल देगी।
          जितना जीवन अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर की कृपा से मिला है, उसी का सदुपयोग यदि मनुष्य कर ले तो उसका जन्म सफल हो सकता है। अमृत पाने की चाह में वह
व्यर्थ ही यहाँ वहाँ भटकता रहता है। वास्तविक अमृत स्वरूप उस परमपिता परमात्मा को पाकर मनुष्य धन्य हो सकता है। उसे यह सदा स्मरण रखना चाहिए कि यही वह समय होता है जब उसे जन्मजन्मान्तर के बन्धनों से मुक्ति मिल जाती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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