बुधवार, 6 जून 2018

स्त्री की अवमानना

स्त्री को लाचार या बेबस समझना पुरुष की बहुत बड़ी भूल कही जा सकती है। कहीं कुछ अपवाद हो सकते हैं पर पुरुष असहाय या बेचारा कभी नहीं होता। स्त्री के होने से ही पुरुष का वजूद है, वर्चस्व है। उसके बिना वह किसी तरह से पूर्ण नहीं कहा जा सकता, वह अधूरा ही रहता है। नारी का प्रेम व समर्पण जब उसे प्राप्त होता है तभी वह पूर्ण होता है। नारी के बिना उसकी पूर्णता नहीं होती और वह उसी पर हावी होने का प्रयास करता है। कुछ पुरुष तो पत्नी को अपना साथी न मानकर पैर की जूती समझते हैं।
          स्त्री में गजब की सहनशीलता होती है। पुरुष भूल जाते हैं कि स्त्री यदि सहन करती है या वह झुक जाती है तभी पुरुष के अहंकार का आकाश ऊँचा उठ पाता है और तभी वे अपने पुरुषत्व पर गर्व कर सकते हैं। यदि स्त्री उनकी भाँति दम्भी बन जाए तो उन्हें स्त्री की तरह हर हाल में झुकना पड़ेगा, सहनशील बनना पड़ेगा। स्त्री यदि पुरुष की तरह व्यवहार करने लगेगी तो पुरुष का अस्तित्व ही टूटकर बिखर जाएगा। उसका जन्मजात अहंकार परवान नहीं चढ़ सकेगा। तब उसे स्त्री के समान ही सब सहन करना पड़ेगा और झुकना पड़ेगा। जब पुरुष द्वारा किए गए दुर्व्यवहार पर वह कलपती है, रोती है, बिखरती है, सिसकती है तो विकृत प्रवृत्ति वाले पुरुष उस पर खुलकर अट्टहास करते हैं। हर स्थान पर उसका उपहास करने से बाज नहीं आते।
           एक बात कहना आवश्यक हो समझती हूँ कि स्त्री व्यवस्थित रहती है तो पुरुष अस्त-व्यस्त रहता है। सारे घर को व्यवस्थित करने में उसका अधिकांश समय व्यतीत होता है। घर से अपने काम पर जाने से पहले अधिकतर पुरुष सदस्य घर में अपनी सभी वस्तुएँ इधर-उधर बिखेरकर चले जाते हैं। यदि स्त्री भी वैसा ही करने लगे तो घर दो दिन भी नहीं चल सकेगा।उस समय घर घर न रहकर अजायबघर दिखाई देने लगेगा। ऐसे घर को कोई भी पसन्द नहीं करता। वहाँ रहने वालों का जीना भी मुहाल हो जाता है।
         स्त्री मर्यादित रहती है परन्तु पुरुष सारी सीमाएँ लाँघ जाता है। उसे इस बात का भान नहीं रहता कि समाज ने स्त्री के साथ-साथ उसके लिए भी कुछ मर्यादाएँ निर्धारित की हैं। उनकी अनुपालना उसके लिए आवश्यक है। कुछ पुरुष अपने मिथ्या अहं के कारण उन वर्जनाओं को धत्ता बताकर कुमार्गगामी बन जाते हैं। जिसके परिणामस्वरूप वे बलात्कार जैसे जघन्य अपराध कर बैठते हैं। उनकी मानसिक विकृति स्त्री को प्रताड़ित करके प्रसन्न होती है।
         स्त्री अपने स्त्रीत्व के गुण को बनाए रखती है परन्तु पुरुष अपने पुरुषत्व के गुण को विस्मृत करने के लिए सदा ही तैयार रहता है। उसकी नम्रता के कारण पुरुष का पौरुष पुष्ट होता है। वह मन से पुरुष के प्रति समर्पित रहती है इसलिए वह अपेक्षित और तिरस्कृत रहती है। यदि वह अपने स्वाभिमान को ताक पर न रखे तो पुरुष का मिथ्याभिमान आहत हो जाता है। एक स्त्री इसलिए स्वयं को झुका देती है ताकि पुरुष के अहं को पोषित कर सके। प्रायः पुरुष स्त्री के अहं को तुष्ट करने के लिए प्रयास ही नहीं करते। वे उसे बराबरी के स्थान पर दोयम दर्जा ही देना चाहते हैं। यही मुद्दा दोनों में संघर्ष का कारण बन जाता है।
          पुरुष को सदा ही स्त्री को झुकाने, अपमानित करने, उसके अस्तित्व को तार-तार करने के लिए किसी विशेष अवसर की तलाश नहीं करनी पड़ती। वह जब चाहे ऐसा दुर्व्यवहार कर सकता है। घर के बाहर तिरस्कृत रने वाला पुरुष घर में शेर बन जाता है। इसलिए अपनी पत्नी पर अधिक अत्याचार करता है। स्त्री प्रायः उसे सम्हालने का प्रयास करती है। वह अपने घर को बचाए रखने के लिए अनेकानेक प्रयास करती है।
           मैं नारी मुक्ति मोर्चे की पक्षधर नहीं हूँ। उससे बढ़ने वाली उच्छृंखलता, स्वछन्दता तो किसी भी तरह से स्वीकार्य नहीं। शायद पुरुष द्वारा की जाने वाली ज्यादतियों के विरोध में कुछ क्रान्तिकारी स्त्रियों के द्वारा उठाया गया कदम इसे मान सकते हैं। मेरा तो यह मत है कि 'मैं श्रेष्ठ' वाली सोच से ऊपर उठने का समय आ गया है। अपनी जीवन यात्रा को ठीक से चलने के लिए दोनों को अपने मिथ्या अहं को छोड़कर एक स्वस्थ समाज के निर्माण में कन्धे-से-कन्धा मिलाकर सहयोग करना चाहिए, यही समय की माँग है।      
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 5 जून 2018

किसी का अहित नहीं

मन, वचन और कर्म से किसी का अहित न करना, किसी का दिल न दुखाना सबसे बड़ा धर्म कहलाता है। इससे बढ़कर और कोई पुण्य का कार्य नहीं होता। इस एक विचार में ही जीवन का सार निहित है। यदि मनुष्य यह सोच ले कि मृत्यु का कोई पता नहीं कि वह कब आ जाए, इसलिए अपने जीवनकाल में ऐसे कर्म कर लेने चाहिए जिससे उसे कभी प्रायश्चित न करना पड़े। उसके जीने का उद्देश्य भी पूर्ण हो जाए।
          जब मनुष्य की सोच, उसकी कथनी और करनी में समरसता नहीं होती तब तक उसकी बात का प्रभाव दूसरों पर नहीं पड़ता। पहले अपने जीवन में इन्हें ढालना पड़ता है यानी स्वयं तपना पड़ता है, तभी सामने वाले उसकी कही हुई शिक्षा को आत्मसात करके उस पर आचरण करते हैं।
          सन्तों के नाम पर इस तरह की कथाएँ जुड़ी रहती हैं। सन्त तुकाराम जी के साथ जुड़ी इस कथा को अंजलि मौर्य और अनिल पचौरी दोनों ने इसे फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था। यह कथा मुझे बहुत पसन्द आई इसलिए इसे आप सबके समक्ष रख रही हूँ।
         सन्त तुकाराम अपने आश्रम में बैठे हुए थे। तभी स्वभाव से थोड़ा क्रोधी उनका शिष्य उनके  पास आकर बोला- "गुरुजी, आप अपना व्यवहार इतना मधुर बनाए रखते हैं। न आप किसी पर क्रोध करते हैं और न ही किसी को भला-बुरा कहते हैं? कृपया अपने इस सद व्यवहार का रहस्य बताइए?"
सन्त बोले- "अपने रहस्य के बारे में तो मैं नहीं जानता, पर तुम्हारा रहस्य जानता हूँ।"
“मेरा रहस्य क्या है गुरु जी?” शिष्य ने आश्चर्य से पूछा।
”तुम अगले एक हफ्ते में मरने वाले हो।” सन्त तुकाराम दुखी होते हुए बोले।
          कोई और कहता तो शिष्य इस बात को मजाक में टाल देता पर गुरु के मुख से निकली बात को कैसे झुठला सकता था? वह उदास हो गया और गुरु जी का आशीर्वाद लेकर वहाँ से चला गया। उसके बाद उस शिष्य का स्वभाव बिलकुल बदल गया। वह सबसे प्रेम से मिलता, कभी किसी पर क्रोध नहीं करता। अपना अधिकतर समय ईश्वर के ध्यान और पूजा में लगाता। जिनके साथ उसने कभी गलत व्यवहार किया था, उनसे जाकर वह माफी माँगता।
         देखते-ही-देखते सन्त की भविष्यवाणी को एक हफ्ते होने को आया। शिष्य ने सोचा चलो एक आखिरी बार गुरु जी के दर्शन करके उनका आशीर्वाद लेता हूँ। वह उनके समक्ष पहुँचा और बोला- "गुरुजी, मेरा समय पूरा होने वाला है, कृपया मुझे आशीर्वाद दीजिए।”
उन्होंने कहा- "पुत्र, मेरा आशीर्वाद हमेशा तुम्हारे साथ है। यह बताओ कि पिछले सात दिन तुमने कैसे बिताए? क्या तुम पहले की तरह ही लोगों से नाराज हुए, उन्हें अपशब्द कहे?”
“नहीं-नहीं, बिलकुल नहीं। मेरे पास जीने के लिए सिर्फ सात दिन थे, मैं इसे बेकार की बातों में कैसे गँवा सकता था? मैं तो सबसे प्रेम से मिला और जिन लोगों का कभी दिल दुखाया था उनसे क्षमा भी माँगी,” शिष्य तत्परता से बोला।
सन्त तुकाराम मुस्कुराए और बोले- “बस यही है मेरे अच्छे व्यवहार का रहस्य। मैं जानता हूँ कि मैं कभी भी मर सकता हूँ, इसलिए मैं हर किसी से प्रेमपूर्ण व्यवहार करता हूँ।"
           शिष्य समझ गया कि उसके गुरु ने उसे जीवन का यह पाठ पढ़ाने के लिए ही मृत्यु का भय दिखाया था।
         यह कथा हमें समझाना चाहती है कि यथासम्भव मनुष्य को सबके साथ प्रेमपूर्ण और सौहार्दपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। व्यर्थ क्रोध करके अपनी शक्तियों का ह्रास नहीं करना चाहिए। क्रोध मनुष्य के विवेक का हरण करता है और उसे कभी चैन से नहीं बैठने देता। यही कारण है कि इसे सबसे बड़ा आन्तरिक शत्रु कहा जाता है। इसे वश में करना असम्भव तो नहीं कठिन अवश्य होता है। फिर भी प्रयास करते रहना चाहिए और सबके साथ प्रेमपूर्वक व्यवहार करना चाहिए। दूसरों को कोसते रहने या भला-बुरा कहने से स्वयं को भी मानसिक क्लेश होता है। अतः इससे बचा जा सके तो बहुत अच्छा होगा।
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सोमवार, 4 जून 2018

दहेज रूपी कोढ़

अनेक कुरीतियों ने हमारे भारतीय समाज में अपनी पैठ बना ली हैं। उनमें से एक है दहेज। इसने दानव का रूप ले लिया है। सुरसा के मुँह की तरह इसका चलन बढ़ता ही जा रहा है। इसका अन्त कभी हो सकेगा, इसकी सम्भावना दूर-दूर तक दिखाई नहीं देती। कन्या भ्रूण हत्या का एक कारण शायद यह भी है। जिन घरों की आर्थिक स्थिति अच्छी होती है, वहाँ बेटी को दहेज देने में कोई समस्या नहीं आती। परन्तु जहाँ घर की मूलभूत सुविधाओं को पूरा करना ही कठिन होता है, वहाँ दहेज देना या वरपक्ष की माँग को पूर्ण करना असम्भव-सा हो जाता है।
           प्राचीनकाल में जब नवयुवक अपनी शिक्षा पूर्ण करने के उपरान्त किसी सदगृहस्थ के पास जाकर उसकी कन्या से विवाह करने की इच्छा प्रकट करता था तो कन्या के माता-पिता घर-गृहस्थी की आवश्यकता का सामान उन्हें भेंट में देते थे। धीरे-धीरे यह प्रथा दहेज के नाम से जानी जाने लगी। इसमें बहुत-सी बुराइयों ने जन्म ले लिया है। जिनके पास धन-सम्पदा की प्रचुरता है, वे बेटी के विवाह में करोड़ों भी खर्च देते हैं तो उन्हें बिल्कुल भी अन्तर नहीं पड़ता। बहुत से ऐसे परिवार हैं जो विवाह आदि उत्सवों के लिए अपनी फसल पर निर्भर करते हैं। और भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपना घर बेचकर अथवा कर्ज लेकर बेटी की शादी करते हैं। सारी आयु वे उस कर्ज चुकाने में लगा देते हैं और अपने जीवन को नरक बना लेते हैं।
           इस विषय से सम्बन्धित एक घटना की चर्चा करना चाहती हूँ जिसे कुछ दिन पूर्व पढ़ा था। उसमें लेखक का नाम नहीं लिखा हुआ था। यह घटना वास्तव में सबके लिए प्रेरणादायक है।
            सुनीता की छोटी बहन ने अपने पापा को आवाज लगाते हुए कहा- "पापा, पापा! सुनीता दीदी के होने वाले ससुर आज घर आ रहे है।"
           दीनदयाल जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले- "बेटी उनका कल ही फोन आया था बोले दहेज के बारे में आप से बात करनी है। बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था, कल को उनकी दहेज की माँग पूरी नही कर पाया तो क्या होगा?"
           घर के प्रत्येक सदस्य के मन व चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी। लड़के के पिताजी घर आए। जैसे ही उन्हें पाइन के लिए पानी दिया गया, त्योंहि उन्होंने अपनी कुर्सी दीनदयाल जी की ओर सरकाई और धीरे से बोले- "दीनदयाल जी मुझे दहेज के बारे बात करनी है।"
           दीनदयाल जी हाथ जोड़ते हुए बोले- "बताइए समधी जी।"
            समधी ने धीरे से दीनदयाल जी का हाथ दबाते हुए बस इतना ही कहा- "आप दहेज में जो कुछ भी देगें, वह मुझे स्वीकार है पर कर्ज लेकर दहेज मत देना क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे, वैसी 'कर्ज वाली लक्ष्मी' मुझे स्वीकार नहीं।"      
           इस घटना में लड़के के पिता की सोच और उनका व्यवहार वास्तव में प्रशंसनीय है। अपने सम्बन्धियों के सुख-दुख का ध्यान रखना ही चाहिए अन्यथा सम्बन्धों के बनने के पहले ही उनमें खटास आ जाती है। फिर आयुपर्यन्त दोनों पक्षों में सम्बन्ध मधुर नहीं हो सकते। बहुत बार ऐसी घटनाएँ घट जाती हैं जहाँ बारात के द्वार पर पहुँचने के उपरान्त वर पक्ष की अनुचित माँग के कारण वधु ने उस लालची परिवार में विवाह करने से इन्कार कर दिया और उन लालची लोगों को पुलिस के हवाले कर दिया।
          दहेज के कारण होने वाली असमय मौतों का प्रतिशत दिन-प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। इससे भी बढ़कर नृशंसता तब होती है जब किसी मासूम को दहेज के नाम पर बलि चढ़ा दिया जाता है अथवा उसे जिन्दा जला दिया जाता है। यह समस्या समाज के लिए कोढ़ है, इसका उन्मूलन करने के लिए युवा पीढ़ी को आगे आना चाहिए। बड़े दुख के साथ कहना पड़ता है कि आजकल बहुत-सी लड़कियाँ ऐसी भी मिल जाएँगी जो सोचती हैं कि सारी जयदाद माता-पिता जब भाई को ही देंगे तो वे विवाह के अवसर पर उनसे क्यों न अधिक-से-अधिक खर्च करवाएँ।
           अपने माता-पिता को परेशान करने के स्थान पर बेटियों को उनका सहारा बनना चाहिए। यदि वे अच्छा वेतन पाती हैं तो उन्हें बिल्कुल इस बुराई का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। सबके सम्मिलित प्रयास से ही इस कोढ़ का इलाज सम्भव हो सकता है।    
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 3 जून 2018

मनीषी, प्रभावशाली का प्रभाव

विद्वान मनीषी यदि सहृदयता, सदाशयता का त्याग करके इर्ष्या-द्वेषयुक्त मन वाले हो जाएँगे तो ऐसी स्थिति बहुत कष्टकारी हो जाती है। उनका अनुसरण करने वाले लोग भी भटक जाते हैं। इसी प्रकार उच्च पदासीन अथवा प्रभावशाली व्यक्ति यदि विनम्रता का त्याग करके अहंकारी हो जाते हैं तो जनमानस पर उसका कुप्रभाव पड़ता है। लोग उनकी ओर ही देखते हैं। उनके अनुसार ही आचरण करना चाहते हैं। सद्संस्कार उन पर प्रभावहीन होने लगते हैं।
        कवि भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' में इसी भाव को प्रकट किया है-
         बोद्धारो मत्सरग्रस्ता: प्रभवः स्मयदूषिता:।   
         अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमङ्गे सुभाषितम्।।
अर्थात जब सुभाषित को समझने वाले विद्वान् द्वेषयुक्‍त हो चुके हैं, प्रभावशाली लोग घमण्‍डी हो चुके हैं तथा शेष अन्‍य अज्ञानी हैं। तब सुभाषित का अंग-प्रत्‍यंग जीर्ण हो जाता है।
          कवि के कहने का तात्पर्य यही है कि मनुष्य को सहृदय, दूसरों के दुख को समझने वाला, सरल और मानवोचित गुणों से युक्त होना चाहिए। तभी वह सही अर्थों में मानव कहलाने के योग्य होता है। अन्यथा उसका मूल्य दो कौड़ी का भी नहीं होता। चाहे उसके पास कितनी ही धन-सम्पदा हो या सत्ता हो। इसी तरह यदि वही विद्वान लोग विनम्रता के स्थान पर अपने मूल्यों का त्याग करके ईर्ष्या-द्वेष आदि अवगुणों को अपनाने लगेंगे तो समाज को दिशा देने का कार्य कौन करेगा?
          इसी प्रकार यदि प्रभावशाली व्यक्ति यदि अपने मद में रहने लगते हैं तो सामाजिक व्यवस्थाएँ गड़बड़ाने लगती हैं। यदि वे मद में चूर होकर अपने सामने वाले को कीड़े-मकौडों की तरह समझकर उनके साथ अन्यायी या आततायी की भाँति व्यवहार करेंगे तो आम लोगों पर उनके दुष्कृत्य का कुप्रभाव पड़ता है। जन-साधारण माननीय व्यक्तियों का अनुसरण करता है। वह उन्हीं की तरह बनना चाहता है। उन्हीं की चाल-ढाल की नकल करना चाहता है। यदि आमजन उन अहंकारियों के रंग में रंग जाएँगे तो समाज किस दिशा की ओर चल पड़ेगा? इस पर विचार करना अति आवश्यक हो जाता है।
          सभी लोग यदि अपने मद में चूर रहेंगे तो समाज में अराजकता का वातावरण बन जाएगा। जब कोई किसी की बात सुनने के लिए तैयार नहीं होगा तब दूसरों को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति बलवती होती जाएगी। हर किसी को देख लेने का झूठा दम्भ भरने वाले हावी हो जाएँगे। ऐसे समय में अनाचार और कदाचार ही बढेगा। इस प्रकार समाज बुराइयों का अखाड़ा बन जाएगा। सारा समय लोगों में अनावश्यक ही नूरा कुश्ती चलती रहेगी। या फिर इस प्रकार साधारण लोग अज्ञानियों की तरह बन जाएँगे। वे अपने विवेक को ताक पर रख देंगे और उनका सामना करने के लिए मूर्खता का ढोंग करने लगेंगे।
          ऐसी परिस्थितियों में हमारे सारे जीवन मूल्य धरे-के-धरे रह जाएँगे। हमारे ऋषियों ने जीवन जीने का जो मार्ग दिखाया है, उस समय वह न जाने कहाँ छूट जाएगा। जब समाज में स्वार्थ हावी होने लगते हैं तब मनुष्य अन्धे के समान हो जाता है। उसे अपने और अपने परिवार के अतिरिक्त और कुछ न तो दिखाई देता है और न कुछ सूझता है। तब मानो सब कुछ बेमानी-सा हो जाता है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि समाज धरातल में समा जाने की तैयारी कर रहा है।
          समाज में ऐसी जब विकट परिस्थिति बन जाती है तब सुभाषित यानी सुवचन का प्रत्येक शब्द अपने मायने खोने लगता है। लोगों को फुर्सत ही नहीं होती उन मोतियों को चुनकर अपने जीवन में ढालने की। समाज को इस प्रकार की विकृतियों से बचाने के लिए ईर्ष्या-द्वेष से युक्त विद्वानों और अहंकार से चूर प्रभावशाली लोगों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। हो सके तो उनका सामाजिक बहिष्कार करना चाहिए। समाज स्वस्थ होगा तो हम सबका अस्तित्व भी बचा रहेगा।
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शनिवार, 2 जून 2018

मन पर बोझ न रखें

सही मायने में जीने का अर्थ है कि मनुष्य अपने मन पर किसी प्रकार का बोझ न रहने दे। यह बोझ न हट सकने वाले एक भारी पत्थर के समान होता है जिसके कारण मनुष्य खुलकर साँस भी नहीं ले सकता। यह बोझ किसी भी कारण से हो सकते हैं। मनुष्य किसी-न-किसी कारण से परेशान रहता है, यह उसकी प्रकृति है। कभी बच्चों की समस्याओं के लेकर, कभी पत्नी की आकांक्षाओं के कारण, कभी भाई-बन्धुओं की आवश्यकताओं को लेकर, कभी व्यापार-व्यवसाय या नौकरी के तनाव को लेकर, कभी पड़ोसी से हुई झड़प के कारण यानी कोई भी कारण हो सकता है मनुष्य की परेशानियों का।
          इन सबके बारे में सोचता हुआ वह इन सबके बोझ के तले दबता जाता है। वह हाथ-पैर पटकता रहता है इनसे मुक्त होने के लिए। पर आजीवन अपने मन पर पड़े बोझ से वह छुटकारा नहीं पा सकता। एक समस्या से जूझता हुआ वह सोचता है कि अब शीघ्र ही किनारा मिल जाएगा और वह सुख की साँस ले सकेगा। उस समस्या से अभी वह सुर्खरू भी नहीं हो पाता कि अगला बोझ उसे पीसने के लिए तैयार बैठा होता है। इस तरह यह क्रम अनवरत चलता रहता है।
            एक बार किसी महात्मा जी ने अपने शिष्यों ने पूछा- "सबसे ज्यादा बोझ कौन-सा जीव उठाकर घूमता है।"
           किसी ने कहा गधा तो किसी ने बैल, किसी ने ऊँट। शिष्यों ने अलग-अलग प्राणियों के नाम बताए। लेकिन महात्मा जी किसी के उत्तर से सन्तुष्ट नहीं हुए। महात्मा जी ने हँसकर कहा- "गधे, बैल और ऊँट के ऊपर हम कुछ समय तक बोझ रखते हैं और फिर उसे उतार देते हैं, परन्तु इन्सान अपने मन के ऊपर मरते दम तक विचारों का बोझ लेकर घूमता है। किसी ने उसके साथ बुरा किया है उसे न भूलने का बोझ, आने वाले कल में क्या होगा इसका बोझ, अपने किए गए पापों का बोझ। इस तरह कई प्रकार के बोझ लेकर इन्सान अपना जीवन जीता है।"
             महात्मा जी द्वारा कही गई ये बातें अक्षरशः सत्य हैं। मनुष्य किसी भी अरुचिकर बात को लेकर उसका पिष्टपेषण करता रहता है। इस कारण उसके मन में विद्वेष के बीज और गहरे होते जाते हैं। इसलिए वह चाहकर भी अपने मन से इन अनर्गल बातों के बोझ से निजात नहीं पा सकता। यदि वह अपने मन को थोड़ा उदार बना सके तो बहुत से दुखों से मुक्त हो सकता है। परन्तु बड़े दुख की बात है कि वह ऐसा कर नहीं पाता अथवा करना ही नहीं चाहता। मजे की बात तो यह है कि मनुष्य जानता है कि उसकी सोच गलत है, उसे अपने आचार-व्यवहार में परिवर्तन लाना चाहिर। फिर भी वह अपनी संकुचित सोच से उभर नहीं पाता।
         जिस दिन मनुष्य इस बोझ को अपने मन से उतारकर फैंक देगा, तभी सही मायने में वह जीवन जीने की कला सीख जाएगा। मनुष्य अनावश्यक ही आने वाले कल में होने वाली घटनाओं के विषय में सोचकर व्यर्थ ही दुखी होता रहता है। भविष्य के गर्भ में क्या छुपा है कोई नहीं जानता। इसे केवल ईश्वर ही जानता है। ऊपर बैठे उस मालिक के मन की थाह पा सकना हम मनुष्यों के बस की बात नहीं है। इसलिए बिना मतलब जबर्दस्ती दुखों को अपने पास बुलाने या गले लगाने का कोई औचित्य दिखाई नहीं देता। जब तक वह इस बोझ से स्वयं को मुक्त नहीं करेगा, तब तक उसका मन अशान्त रहेगा। अपने मन को सुखी और शान्त रखने के लिए उसे स्वयं को अपने मन के बोझ से स्वतन्त्र करना ही होगा।
         इसके लिए सज्जनों का सहकार आवश्यक है। उनके संसर्ग से कोई-न-कोई हल निकल आता है। अपने ग्रन्थों का अध्ययन करने से समस्याओं के निदान का मार्ग प्राप्त हो जाता है। सबसे बढ़कर ईश्वर से गुहार लगाओ तो मनुष्य को मन की शान्ति सहज उपलब्ध हो सकती है। कोई भी उपाय करके मन पर पड़े बोझ से छुटकारा पाने का रहस्य जान लेना चाहिए जिससे जीवन सरल और तनावरहित हो जाए।
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शुक्रवार, 1 जून 2018

शुभाशुभ कर्म भोग से मुक्ति नहीं

शुभाशुभ दोनों प्रकार के कर्म मनुष्य अपने जीवनकाल में करता है। कुछ कर्म जानते-बूझते अपनी शेखी बघारने के लिए करता है और कुछ कर्म अनजाने में करता है। कुछ कर्म-कुकर्म वह देश, धर्म और समाज के हित के नाम पर करता है। मनुष्य जब स्वयं को स्वयंभू मानने की भूल कर बैठता है, तब अपने झूठे अहं को तृप्त करने के लिए एक के बाद एक अपराध करता जाता है। वह भूल जाता है कि उनके परिणाम का भुगतान उसे एक दिन करना ही पड़ेगा। वह दिन उसके अपने जीवन के लिए सुखद तो कदापि नहीं हो सकता।
            एक दृष्टान्त लेते हैं। यदि मनुष्य का वेतन पचास हजार रुपए है। यदि उसे अपनी गाड़ी या घर की इ एम आई बीस हजार रुपए देनी है तो वेतन आने के बाद बीस हजार रुपए उसमें से निकल जाएँगे। शेष केवल तीस हजार रुपए ही बचेंगे। ऐसा ही चक्र कर्मों का भी होता है। उसमें समय-समय पर जमा-घटा होती रहती है। अपने सुकर्मों और कुकर्मों का परिणाम हर जीव को भोगना पड़ता है। जब तक वह उन्हें भोग नहीं लेता, तब तक उनसे मुक्त नहीं हो सकता।
           एक बोध कथा की चर्चा हम यहाँ करते हैं। श्राद्ध-भोज के लिए किसी ब्राह्मण ने एक बकरे की बलि चढ़ाने की तैयारी आरम्भ की। उसके शिष्य बकरे को नदी में स्नान कराने ले गये। नहाने के समय बकरा एकाएक बडी जोर से हँसने लगा, फिर उसी पल दु:ख के आँसू बहाने लगा। उसके विचित्र व्यवहार से चकित होकर शिष्यों ने उसका कारण जानना चाहा तो बकरे ने कहा कि कारण वह उनके गुरु के सामने ही बताएगा।
         ब्राह्मण के सामने बकरे ने यह बताया- "मैं पूर्वजन्मों में कभी एक ब्राह्मण था। एक बार मैंने एक बकरे की बलि दी थी, जिसकी सजा आज तक भुगत रहा हूँ। तब से अब तक चार सौ निन्यानवे जन्मों में मेरा गला काटा जा चुका है। अब उसका गला कटने की अन्तिम बारी है। अपने किए गए दुष्कर्म का दण्ड मुझे अन्तिम बार भुगतना है। इसलिए मैं प्रसन्न होकर हँस रहा हूँ। दु:खी होकर मैं इसलिए रोया कि अब से उस ब्राह्मण के भी सिर पाँच सौ बार काटे जाएँगे।"
         ब्राह्मण ने उसकी बात को गम्भीरता से लिया और बलि की योजना स्थगित कर दिया। अपने शिष्यों से उसे पूर्ण संरक्षण की आज्ञा दी। बकरे ने ब्राह्मण से कहा- "ऐसा सम्भव नहीं है क्योंकि कोई भी संरक्षण मेरे कर्मों के विपाक को नष्ट नहीं कर सकता। कोई भी प्राणी अपने कर्मों से मुक्त नहीं हो सकता।"
            शिष्यगण बकरे को लेकर यथोचित स्थान पर पहुँचाने जा रहे थे। रास्ते में किनारे पर लगे एक पेड़ की शाखा पर नरम-नरम पत्तों को देखकर ज्योंही बकरे ने अपना सिर ऊपर उठाया, तभी वज्रपात हुआ। ऊपर पहाड़ी पर स्थित एक बड़ी-सी चट्टान के कई टुकड़े छिटके। एक बड़ा-सा टुकड़ा उस बकरे के सिर पर इतनी ज़ोर से लगा कि पलक झपकते ही उसका सिर धड़ से अलग हो गया।
            अपने कुसंस्कारों के कारण यदि किसी मनुष्य ने पूर्वजन्मों में या इस जन्म में कोई भी शुभाशुभ कर्म किया है तो हर उस कर्म का परिणाम उसे अवश्य ही भोगना पड़ता है। मुक्ति प्राप्त करने का केवल एक ही मार्ग है, वह है अध्यात्म का। यदि पूर्वजन्मों के कुसंस्कारों का कुफल मनुष्य को भोगना होता है तो सत्कर्मों का फल भी वह भोगता है। इस कर्मफल के चक्र से आज तक कोई नहीं बच सका। यह सर्वथा असम्भव होता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, वे भी इस कर्मचक्र में उलझने से बच नहीं सके।
          इसलिए जब तक आयु शेष है, शरीर स्वस्थ है, तब तक मनुष्य को आत्मोन्नति के कार्य कर लेने चाहिए। उसे यथासम्भव शुभकार्यों की ओर अग्रसर होना चाहिए। उसे यत्नपूर्वक अशुभकर्मों की ओर से अपने मन को विलग कर लेना चाहिए। मनीषियों द्वारा कथित चौरासी लाख योनियों के बन्धन से मुक्त होने के लिए अपने कृत कर्मों की ओर निश्चित ही ध्यान देना चाहिए।      
चन्द्र प्रभा सूद
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