इस ब्रह्माण्ड में जो कुछ भी उपलब्ध है वह सब कुछ हम जीवों के लिए बहुत उपयोगी है। किसी भी पदार्थ के विषय में हम यह नहीं कह सकते कि वह तो हमारे लिए अनुपयोगी है। सारी प्रकृति हमारी सेवा में जुटी रहती है। सूर्य, चन्द्रमा, वायु, अग्नि, ग्रह-नक्षत्र, पेड़-पौधे, नदियाँ-समुद्र आदि हमारे ही लिए उपयोगी हैं।
दिन और रात यदि ईश्वर न बनाता तो मनुष्य पागल हो जाता। दिन भर कोल्हू के बैल की तरह परिश्रम करने के पश्चात उसे नींद की आवश्यकता होती है। यदि ईश्वर रात न बनाता तो मनुष्य अपनी नींद पूरी न कर पाता। इससे उसकी कार्यक्षमता पर प्रभाव पड़ता। वह अगले दिन उत्साहपूर्वक अपने कार्य नहीं कर सकता।
सूर्य को गरमी व प्रकाश देने का कार्य सौंपा। इसी के कारण दिन-रात, ऋतु चक्र और मौसम बदलते हैं। चन्द्रमा को रात्रि में प्रकाश और शीतलता देने के लिए बनाया। जल हमारी जीवनी शक्ति है। इसके बिना हम अपने दैनन्दिन कार्यों का संपादन नहीं कर सकते। वायु हमारा प्राण है। इसके बिना सृष्टि पल भर में ही समाप्त हो जाएगी। अग्नि हमारी ऊष्मा का कारण है। हमारे शरीर को पुष्ट करने वाली है, हमारा भोजन इसी की बदौलत पचता है। इस प्रकार ये पञ्च महाभूत हमारे लिए बहुत उपयोगी हैं। इनके बिना हम अपने जीवन की कल्पना भी नहीं कर सकते।
पेड़-पौधे हमारा पेट भरने के लिए हमें स्वादिष्ट फल देते हैं। हमें ताप से बचाने के लिए शीतल छाया देते हैं। हमारे घरों व दफ्तरों की सुरक्षा व सजावट के उपकरण देते हैं। हमें लिखने-पढ़ने के लिए साधन देते हैं। सुन्दर, सुगंधित व रंग-बिरंगे फूल मन को बरबस मोह लेते हैं। चित्र-विचित्र पशु-पक्षी हमारे लिए आकर्षण का कारण बनते हैं। पक्षियों का मधुर कलरव कर्णप्रिय लगता है।
नदियाँ हमारे लिए जल की आपूर्ति करती हैं। उनके कलकल का सुरीला संगीत कानों को भाता है। समुद्र सदा हमारे लिए रहस्य की तरह रहा है। इसकी गहराई की थाह पाने के लिए तैराक और गोताखोर बारबार यत्न करते रहते हैं। यह हमारे लिए सदियों से यातायात का प्रबन्ध करता है।
किसी भी वनस्पति की ओर यदि हम अपनी दृष्टि डालें और उस के विषय में जानकारी एकत्र करने का प्रयास करें तो हम पाएँगे कि वह किसी-न-किसी रूप में हमारे लिए उपयोगी है। आयुर्वेद के अनुसार हर वनस्पति में औषधीय गुण विद्यमान हैं। यह बात और है कि हम सारी वनस्पतियों के विषय में न तो जानते हैं और न ही उनका उपयोग करते हैं। इसी कारण विश्व के हर देश के भोजन में हम विविधता पाते हैं। जबकि उन्हीं सब खाद्य पदार्थों और मसालों का उपयोग हर स्थान पर किया जाता है। उसी प्रकार स्वाद में भी हम वैविध्य ही पाते हैं।
जिन पौधों को हम सब खर-पतवार समझकर तिरस्कृत करते हैं उन्हें पशु खाते हैं और अपनी भूख मिटाते हैं।
मनुष्य पशुओं से अपनी खेती करता है, यातायात के साधन के रूप में उनका उपयोग करता है और अपना मनोरंजन भी करता है। अपने आराम के सारे कार्य उनसे बड़ी हेकड़ी से करवाता है।
ईश्वर ने अपनी पूजा-अर्चना करने के लिए इन्सान को बनाया है। इस सृष्टि के शेष सभी पदार्थ मनुष्य के सुख और आराम के लिए बनाए हैं। हमें हमेशा उस मालिक का धन्यवाद करना चाहिए जिसने हमारी हर सुख-सुविधा जुटाने के लिए सब यत्न किए हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
बुधवार, 7 नवंबर 2018
सब कुछ मनुष्य के लिए
मंगलवार, 6 नवंबर 2018
अप्प दीपो भव
सभी सुहृत् जनों को सपरिवार दीपावली की हार्दिक शुभकामनाऍं।
भगवान बुद्ध का कथन हैं- 'अप्प दीपो भव' अर्थात् अपना दीपक स्वयं बनो।
स्वयं अपना दीपक बनने का अर्थ है कि इस दीपक की लौ में काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष आदि कालुष्य जलकर भस्म हो जाएँ। मन और बुद्धि शुद्ध एवं पवित्र हो जाएँ। मनुष्य खरे कुन्दन की भाँति ऐसी चकाचौंध उत्पन्न करे जिसमें सबकी आँखे चुँधिया जाएँ। इस दीपावली ऐसा ही दीपक बनने का प्रयास कीजिए जिससे घर-बाहर के साथ-साथ अपना अन्तस् भी जगमगा उठे।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
सोमवार, 5 नवंबर 2018
गुलाब की उदासी
सामने देखा मैनें
कोने में पड़ा हुआ
उदास-सा, निस्तेज गुलाब
अपना सिर झुकाए मानो कुछ सोच रहा था।
कभी खिला वह
तब कहलाता था
सर्वप्रिय गुलाब का फूल
बन जाता था सबकी नजरों का आकर्षण।
लोग बहुत हर्षाते थे
बार-बार मेरी खुशबू को
सूँघते हुए वे नहीं अघाते थे
मुझे हाथ में लेकर यूँ ही इतराते फिरते थे।
शुभकार्य हेतु उन्हें
मेरी जरूरत होती थी
मुझे उपहार में दे देना
मानो उनका स्टेटस सिम्बल बन जाता था।
देवता के चरणों
पर चढ़ाकर होते थे
तृप्त सब जन एक दिन
मनोकामना पूर्ण होने की आस होती थी।
मैं सदा रहा अपना
मस्तक ऊँचा जग में
सोचता रहा कि मेरे जैसा
संसार में कोई नहीं आकर्षक, मनमोहक।
पर मैं मूर्ख मानी
दम्भी बनकर बैठा
बस अपने इस मान पर
इतराता रहा, बल्लियों उछलता रह गया।
अब मुझ मलिन
को कोई नहीं देखता
सारा भ्रम टूट गया मेरा
अब कोई आशा नहीं बची है जीवन की।
भूल गया था
जीवन का यह सत्य
जो आया है सो जाएगा
आज मेरा भी जाने का समय आ गया है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 4 नवंबर 2018
स्वयं को साधना
स्वयं को वश में रखना अर्थात अपनी इन्द्रियों को नियन्त्रित करना संसार का सबसे कठिन कार्य होता है। इस कार्य में बड़े-बड़े ऋषि-मुनि असफल होकर अपनी वर्षों की साधना को नष्ट कर बैठते हैं। जब उन्हें वस्तुस्थिति का बोध होता है, तब तक चिड़िया हाथ से निकलकर खेत चुग गई होती है। तब पश्चाताप करने का भी कोई औचित्य नहीं रह जाता। उस समय उनकी स्थिति माया मिली न राम वाली हो जाती है।
मनुष्य अपने शत्रुओं पर साम, दाम, दण्ड, भेद वाली नीति के बल पर विजय प्राप्त कर सकता है। परन्तु अपनी इन्द्रियों को वश में करने के लिए यह नीति कार्य नहीं करती। उन्हें तो बस अपनी इच्छाशक्ति के द्वारा अभ्यास करके जीता जा सकता है। इसके लिए अपने मन को संसार के आकर्षणों से उसी प्रकार विमुख करना होता है जैसे एक बच्चे से उसका मनपसन्द खिलौना लेकर उसे शान्त बैठ जाने के लिए कह दिया जाए। वहाँ तो बच्चा रोएगा, चिल्लाएगा, अपना विरोध किसी-न-किसी बहाने प्रकट करेगा। यहाँ भी इन्द्रियाँ बार-बार अपने आकर्षणों की ओर भागेंगी तथा परेशान करेंगी।
परम विद्वान आचार्य चाणक्य की 'चाणक्यनीति' इस विषय में मनुष्य को समझाते हुए कहती है-
इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं ज्ञात्वा सर्वकार्याणि साधयेत्।।
अर्थात बुद्धिमान व्यक्ति को चाहिए कि वह अपनी इन्द्रियों को बगुले की तरह वश में करे। उसे देश अथवा स्थान, काल और अपनी शक्ति को ध्यान में रखते हुए सभी कार्यों को पूर्ण करना चाहिए।
यहाँ आचार्य कहते हैं कि स्वयं को बगुले की तरह साध लो, फिर अपनी सम्पूर्ण शक्ति से अपने उद्देश्य में जुट जाओ। बगुला तालाब में रहकर पेट भरने के लिए मछलियों का शिकार करता है। मछलियाँ उसके पास अपनी जान जाने के भय से नहीं जातीं। बगुला भी कम शातिर नहीं होता है। उसे ईश्वर ने स्वयं को नियन्त्रित करने की शक्ति दी है। वह अपने शरीर को साधकर तालाब में एक स्थान पर बिना हिले-डुले खड़ा हो जाता है। मछलियाँ निर्भय होकर जब उसके पास आने लगती हैं तब वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर उनका शिकार करता है अर्थात अपना पेट भरने का कार्य करता है।
धर्म, राजनीति, खेल, शिक्षा आदि किसी भी क्षेत्र में मनुष्य यदि सफलतापूर्वक आगे बढ़ने की कामना करता है तो सबसे पहले उसे अपने लक्ष्य का निर्धारण करना चाहिए। फिर उसके अनुरूप साधन जुटाने चाहिए। तत्पश्चात अपनी समग्र चेतना को समाहित करके, एकाग्र मन से बिना इधर-उधर देखे, समय का उचित प्रकार से नियोजन करके ही उसे आगे कदम बढ़ाना चाहिए। जीवन में सफल होने के लिए ऐसे संयमी और विवेकी पुरुष के मार्ग में कोई बाधा रोड़ा नहीं अटका सकती। उसे स्वयं ही हटकर रास्ता देना होता है।
यानी भौतिक कार्यों के कार्यान्वयन के लिए मनुष्य स्वयं को साधता है, लाभ-हानि के थपेड़ों को सहन करता हुआ ही वह लक्ष्यभेदन करने में सफल हो पाता है। आध्यात्मिक सफलता के लिए भी तो साधना करना, अग्नि में तपना और भी आवश्यक होता है। बहिर्मुखी इन्द्रियाँ मनुष्य को बार-बार भटकाकर इस असार संसार की ओर उन्मुख करती हैं। खाने-पीने में, भोगविलास में, सुन्दर दृश्य देखने में, परनिन्दा में और बतरस में इन्द्रियों को बहुत आनन्द आता है। वे इन सबसे विमुख नहीं होना चाहतीं।
अब यह साधक पर निर्भर करता है कि वह सांसारिक विषयों में भटकना चाहता है अथवा ईश्वरोन्मुख होकर अपना लोक-परलोक सुधारना चाहता है। यदि मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति करना चाहता है तब उसे निश्चित ही अपनी इन्द्रियों का निग्रह करना ही होगा। संसार के आकर्षणों में आकर्षित होने वाली इन्द्रियों को बलपूर्वक साधना की और प्रवृत्त करना होगा।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
शनिवार, 3 नवंबर 2018
शान्त रहना
शान्त जल में मनुष्य अपनी परछाई देख सकता है। उसमें आरपार सब दिखाई दे जाता है। यानि जल के भीतर क्या है, सब प्रत्यक्ष हो जाता है। परन्तु यदि उस ठहरे हुए जल में कंकड़ फैंक दिया जाए तो सब गडमड हो जाता है। उस ठहरे हुए शान्त जल में मानो एक झंझावात-सा आ जाता है। तब उसमें कुछ भी नहीं देख सकते। न उसमें मनुष्य अपनी परछाई देख सकता है और न ही जल के भीतर का सच।
इसी प्रकार मनुष्य का मन जब तक शान्त रहता है तब तक वह उसमें सब कुछ साफ-साफ देख सकता है। उसके पास आने वालों को उसके हृदय की पवित्रता आकर्षित करती है। कोई भी ऐसे व्यक्ति से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। उसका औरा दोष रहित होता है। इसलिए उसके पास आने वालों का अशान्त मन भी शान्त हो जाता है।
मनुष्य है कि काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष, अहंकार आदि के कंकड़ उस शान्त मन में फैंकता रहता है और फिर उसे अशान्त बना देता है। तब उसे कुछ भी साफ-साफ दिखना बन्द हो जाता है और अपने मन को भीतर से मैला बना देता है। किसी को भी उसके पास बैठने में अच्छा नहीं लगता। हर व्यक्ति उसके पास से शीघ्र चले जाना चाहता है।
इस प्रक्रिया से गुजरते हुए उसे यह आभास ही नहीं हो पाता कि वह कहाँ-से-कहाँ पहुँच गया है? उसके संस्कार कितना पीछे छूट गए हैं? वह किस ओर भागता चला जा रहा है? इस सबका अन्त कब तक और कैसे होगा?
इन सब प्रश्नों के उत्तर भी मनुष्य को स्वयं अपने अंतस से ही मिल सकते हैं। जितना मनुष्य अधिक गहरे पैठता है, उतने ही अधिक उसे समाधान मिलते जाते हैं। उसे कहीं जाने की आवश्यकता नहीं होती। जब वह शान्त चित्त होकर अपने घर में बैठता है, विचार करता है और अपने अंतस को झकझोरता है, तब वह अपनी मानसिक शान्ति के लिए उतने ही रास्ते सरलता से खोज लेता है।
परन्तु बड़े ही दुःख से कहना पड़ता है कि मनुष्य इन सभी प्रश्नों के समाधान पाने के लिए बाहर भटकता रहता है। तीर्थस्थलों में जाता है, पर्वतों की गुफाओं को तलाशता है, जंगलों की खाक छानता है, तथाकथित गुरुओं की शरण में जाता है, तान्त्रिकों-मान्त्रिकों के द्वार भी खटखटाता है। यानी सभी उपाय कर लेता है, हर जुगत भिड़ा लेता है, फिर भी उसे कहीं कोई लाभ नहीं मिल पाता।
यदि मनुष्य समय रहते चेत नहीं जाता तो उसकी यह भटकन अनन्त काल तक यानी जन्म-जन्मान्तरों तक बनी रह सकती है। कहीं भी टक्करें मार लो, उसका परिणाम तो शून्य ही रहने वाला है। उसका सारा परिश्रम व्यर्थ हो जाता है। उसकी हर समस्या का समाधान उसे अपना विवेक दे सकता है, पर मनुष्य उस पर मानो विश्वास करना ही नहीं चाहता। इसीलिए वह सदा परेशान होकर सदा इधर-उधर भटकता रहता है।
मनुष्य के मन को मन्दिर भी कहते हैं और दर्पण भी। जब तक मन मन्दिर स्वच्छ नहीं रहेगा तब तक उसमें ईश्वर का वास नहीं हो सकता। इसी प्रकार जब तक मन रूपी दर्पण पर धूल-मिटटी जमी रहती है तब तक मनुष्य उसमें अपनी प्रतिच्छाया नहीं देख सकता। इन कार्यों के लिए मन का शुचितापूर्ण होना बहुत आवश्यक होता है।
उजले मन को जब मनुष्य अपनी मूर्खताओं से धूमिल बना देता है तब उसे कुछ भी स्पष्ट नहीं दिखाई देता। उसका अहं, उसके स्वार्थ उस पर हावी होने लगते हैं। उनको पुष्ट करने में वह खो जाता है। अपने चारों ओर वह एक मजबूत दीवार खड़ी कर लेता है जिसे भेदना उसके लिए बहुत कठिन हो जाता है। वहाँ किसी अन्य के लिए कोई स्थान ही नहीं बच पाता।
जहाँ तक सम्भव हो अपने अन्तस को शान्त बनाए रखने के लिए सद् ग्रर्न्थों का अध्ययन करना चाहिए तथा सज्जनों की संगति में रहकर अपने विचारों की शुद्धता के प्रति मनुष्य को सदा सावधान रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
शुक्रवार, 2 नवंबर 2018
डॉक्टरों की योग्यता
कुछ दिन पूर्व वाट्सअप पर डॉक्टरों के एक ग्रुप का वार्तालाप पढ़ा जो सैर करने के उपरान्त चाय पी रहे थे। सामने से लंगड़ाकर आ रहे व्यक्ति को क्या बीमारी हो सकती है, इस विषय में वे सब अपने-अपने ज्ञान के अनुसार टिप्पणी करने लगे। उस व्यक्ति के समीप आने पर, उसकी स्थिति को देखकर 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' वाली उक्ति को सार्थक होता हुआ कह सकते हैं। डॉक्टर लोग पढ़े-लिखे होते हैं, अपने विषय के ज्ञाता होते हैं। इसलिए उनके विषय में यह नहीं कह सकते कि अल्प ज्ञान के कारण व्यक्ति समाज में मूर्ख कहलाता है।
मॉर्निंग वॉक के बाद डॉक्टरों का एक ग्रूप दुकान पर बैठकर चाय पी रहा था। उन्होंने देखा कि दूर से एक आदमी लंगडाता हुआ आ रहा था। उनमें से एक डॉक्टर ने पूछा- "क्या हुआ होगा उसे?"
पहला बोला - "Left knee arthritis."
दूसरा बोला - "न न, मेरे हिसाब से Plantar Facitis."
तीसरा बोला - "कुछ भी क्या? Ankle sprain लग रहा है।"
चौथा बोला - "जरा ठीक से देखो, वह आदमी एक पैर ठीक से उठा नहीं पा रहा। Foot drop जैसा है। उसके Lower motor neurons की लग गयी है।"
पाँचवाँ बोला - "मुझे तो यह Hemiplegia का scissors gate लग रहा है।"
छटा जब तक कुछ बोलता तब तक वह आदमी पास पहुँच चुका था। उसने सबसे बडी विनम्रता से पूछा - "यहाँ आसपास कोई मोची की दुकान है क्या? मेरी चप्पल का अँगूठा टूट गया है। मुझे चलने में दिक्कत हो रही है।"
इस वार्तालाप के उपरान्त शायद वे लोग झेंप गए होंगे। उन सबका ज्ञान धरा-का-धरा रह गया। एक व्यक्ति को चलते देखकर उसकी बीमारी पर चर्चा करने वाले, अपने मरीजों का इलाज क्या करते होंगे? इसकी कल्पना की जा सकती है। उस व्यक्ति को कोई बीमारी नहीं थी बस उसकी चप्पल टूट गई थी। उसकी इतनी छोटी-सी समस्या को वे एक्सपर्ट नहीं समझ सके।
आजकल डॉक्टरी पेशे में यही हो रहा है। अपने आप को स्पेशलिस्ट कहने वाले भी बीमारी को नहीं पकड़ पाते। बीमारी छोटी हो या बड़ी, हर बीमारी के लिए ढेरों टेस्ट करवाते हैं। फिर भी बहुत बार मरीज का गलत इलाज कर दिया जाता है। उसका हर्जाना मरीज को अपनी जान देकर चुकाना पड़ता है। पैसे, धन और समय की बर्बादी होती है सो अलग। इस विषय में समय-समय पर समाचार पत्रों, टी वी और सोशल मीडिया पर दिखाया जाता रहता है।
कभी-कभार मरीज के घर वालों के सब्र का बाँध टूट जाता है और वे मारपीट करने लगते हैं। डॉक्टर के क्लीनिक या अस्पताल में तोड़फोड़ कर बैठते हैं। ऐसी घटनाओं को रोका जाना चाहिए। मैं इस सब का समर्थन नहीं करती।
बिना योग्यता के अथवा बिना किसी डिग्री के जो लोगों का उपचार करते हैं, उन्हें झोलाछाप डॉक्टर कहा जाता है। उन्हें ऐसा कदापि नहीं करना चाहिए। इन तथाकथित डॉक्टरों से गलती हो जाए तो बात समझ में आती है। परन्तु जो पढ़-लिखकर विषय में विशेष योग्यता या एक्सपर्टीज प्राप्त करते हैं, उनसे ऐसी गलती की अपेक्षा नहीं की जाती। लोग उनके पास बड़ी आशा लेकर, उनकी मनचाही मोटी फीस चुकाकर जाते हैं। वे सोचते हैं कि योग्य डॉक्टर की देखरेख में वे शीघ्र ही भले-चंगे होकर अपना कार्य करने लगेंगे। जब किसी मनुष्य की आस टूटती है अथवा बिखरती है तो बहुत कष्ट होता है।
डॉक्टर को भगवान इसीलिए कहा जाता है कि वह जीवन देता है। वह रक्षक कहलाता है। पर जब यही रक्षक भक्षक बन जाएगा तो इन्सान किस पर विश्वास करेगा? मानवता पर से उसका भरोसा ही उठ जाएगा। डॉक्टर का पेशा बहुत ही पवित्र या नोबल होता है। इसे व्यवसाय या लूट की फैक्ट्री नहीं बनाना चाहिए, जैसे आजकल हो रहा है। लूट-खसोट करना डॉक्टरी पेशे का अपमान करना होता है।
एक डॉक्टर को बहुत ही संवेदनशील होना चाहिए। उसे दूसरों को कष्ट में देखकर द्रवित होना चाहिए, न कि मरीज को मुर्गा समझकर हलाल करने की प्रवृत्ति रखनी चाहिए। उसे यह भी विचार करना चाहिए कि जो व्यवहार वह अपने मरीजों के साथ कर रहा है, कल उसके साथ भी हो सकता है। कारण, कभी तो उसे भी अपना या अपने परिजनों के इलाज की आवश्यकता पड़ेगी। उस समय उसके सारे आदर्श याद आ जाएँगे। अपने लिए वे आदर्श धरे-के-धरे नहीं रह जाएँगे।
डॉक्टर और रोगी दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं। जीवनभर में कभी-न-कभी हर मनुष्य को किसी डॉक्टर की आवश्यकता पड़ती ही है। डॉक्टर को भी सहृदयतापूर्वक अपने पास आए हुए रोगी का उपचार करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
गुरुवार, 1 नवंबर 2018
आईना आंखें
आँखे हमारा आईना होती हैं। ये जो आँखे हैं, बहुत ही दुष्ट और नालायक हैं जो कभी हमारा कहना नहीं मानतीं। ये आँखें बहुत चुगलखोर होती हैं जो न चाहते हुए भी हमारे मन के भावों की सबके समक्ष चुगली कर देती हैं। चाहे ऊपर से कितना ही न न करते रहें परन्तु इनकी बदौलत सबकी चोरी पकड़ी ही जाती हैं।
सुख, खुशी, दुख, सन्तोष, ईर्ष्या, क्रोध, वात्सल्य आदि मानव मन के सभी भाव और सारी संवेदनाएँ, उसकी इन आँखों से ही प्रकट होती हैं। जब भी मनुष्य के जीवन में खुशी हो या गम आते है तब मौका मिलते ही ये तालाब की तरह भर आती हैं। गंगा-यमुना की धारा की भाँति ये बहने लगती हैं अथवा फिर बादलों की तरह बरसने लगती हैं। जहाँ मन के विपरीत कोई घटना अथवा बात हो जाए वहीं ये छलकने लगती हैं।
नीली, कजरारी और बड़ी-बड़ी खूबसूरत आँखें कवियों के काव्य के लिए सदा ही प्रेरणा का स्त्रोत रही हैं। इनकी गहराई में डूबते-उतरते हुए कवियों ने इनके सौन्दर्य को लेकर बहुत से काव्य लिखे हैं। यत्र तत्र उन सभी काव्यों की सराहना भी की गई है। उनको पढ़कर ऐसे कवियों को दाद दिए बिना कोई नहीं रह सकता।
इनकी चितोरी चितवन से कोई बच नहीं सकता। इनके कटाक्ष बाण किसी को भी घायल कर सकते हैं। न जाने कितने ही ऋषियों, मुनियों और तपस्वियों की गहन तपस्या इन्होंने भंग की है। आज भी इनके सौन्दर्य से किसी संसारी व्यक्ति का बच पाना सम्भव नहीं है।
गम्भीरता का भाव लिए आँखे व्यक्ति के मन की पवित्रता और गहराई को प्रकट करती हैं। सरलता और सहजता के भाव वाली आँखे मनुष्य के हृदय की विशालता को दर्शाती हैं। बच्चों की तरह चंचल आँखें मानव मन की चंचलता का परिचायक होती हैं। क्रूरता या निर्दयता के भाव वाली आँखों से सभी बचना चाहते हैं। क्रोध से भरी हुई आँखों से डरकर लोग सहम जाते हैं और किनारा करने में अपनी भलाई समझकर कहीं भी छुप जाते हैं।
किसी अपने के मिलन अथवा वियोग के समय ये अनायास ही बिन बुलाए हुए मेहमान की तरह टपक पड़ते हैं। प्रसन्नता आने पर हमारा साथ देते हैं। अत्यधिक कष्ट के समय आकर ये मनुष्य के मनोबल को कमजोर बनाते हैं।
ये आँसू किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को कमजोर बना सकते हैं। स्त्री या पुरुष दोनों पर ये समान रूप से अपना प्रभाव छोड़ती हैं। कठोर कहे जाने पुरुष भी असहनीय कष्ट या किसी अनहोनी के समय अपने इन आँसुओं को रोक नहीं पाते, तब उनकी तथाकथित कठोरता कहीं गायब हो जाती है।
स्त्रियों को तो वैसे भी कमजोर और करुणामयी कहा जाता है। इसलिए उन पर हर स्थिति का प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक होता है। इसीलिए उनके आँसू किसी-न-किसी बात पर छलक आते हैं। पुरुष प्राय: दोषारोपण करते हैं कि स्त्रियाँ इन आँसुओं का अपनी बात मनवाने के लिए हथियार के रूप में इस्तमाल करती हैं। हालांकि यह कहना उनकी सच्चाई पर प्रहार करना ही होता है। निस्सन्देह इसके अपवाद भी हो सकते हैं।
मक्कारों के घड़ियाली आँसुओं से सावधान रहने की बहुत आवश्यकता होती है। पता नहीं इन पर पिघल जाने वालों की पीठ में कब ये छुरा घोंप दें, कुछ नहीं कहा जा सकता। स्वार्थी लोग प्राय: ऐसे ही चकमा देते हैं।
ये आँसुओं से भरी आँखे वास्तव में दो हृदयों को जोड़ने के लिए एक पुल का कार्य करती हैं। इनकी माया अपरम्पार है। जो व्यक्ति इनके जाल में उलझ गया वह तो समझो काम से गया। जो इनसे बचकर निकल गया वह संयमी कुछ भी कर सकने में समर्थ होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp