माँ तो आखिर माँ ही होती है। अपने बच्चे उसके लिए सदा ही छोटे और नासमझ रहते हैं। फिर बच्चे की आयु चाहे दो वर्ष की हो अथवा पचास वर्ष की।वह इस परिवर्तन को समझ ही नहीं पाती कि अब उसका बच्चा बड़ा हो गया है। वह तो जीवन के अन्त तक उसकी छोटी-सी परेशानी में उसी तरह तड़प जाती है, जैसे उसके बचपन में वह बेहाल हो जाती थी। वह उसे अपने जीवन की अन्तिम घड़ी तक, अपने आँचल की शीतल छाया देते रहना चाहती है।
जब माँ बच्चे को छोड़कर दूर देश, परलोक चली जाती है, तब माँ कभी वापिस नहीं आती। उस समय उसे माँ के चले जाने का पता चलता है कि उसने अपने जीवन का एक अनमोल खजाना खो दिया है। तब उसे पश्चाताप होता है कि काश, माँ के जीवित रहते वह उसके प्रति असावधान कैसे हो गया था? उसने उसकी सुध क्यों नहीं ली?
दो साल की आयु में जब बेटा बोलना और समझना शुरू करता है, तब यदि उसे घर में माँ न दिखाई दे, तो वह रोने लगता है और पुकारते हुए कहता है, "मम्मा कहाँ हो? कोई मेरी को बुला दो, मैं मम्मा को देखना चाहता हूँ। मम्मा, तुम कहाँ चली गयी हो?"
चार साल की आयु में जब वह बच्चा स्कूल जाने लगता है, तब कहता है, "मम्मी कहाँ हो? अब मैं स्कूल जाऊँ?" अच्छा बॉय-बॉय। मुझे स्कूल में आपकी बहुत याद आती है। घर आने के बाद वह माँ घर में या अपने सामने न देखकर रोता है। कुछ खाने के लिए दिया जाए तो नहीं खाता। बस माँ की गोद में उसे शान्ति मिलती है।
आठ साल की उम्र तक वह समझदार हो जाता है। माँ को प्यार से कहता है, "मम्मा, आई लव यू, आज टिफिन में क्या दे रही हो? मम्मा स्कूल में बहुत होम वर्क मिला है।" यानी अपनी माँ को फरमाइशें करने लगता है और स्कूल की, अपने साथियों की ऊसर शिकायतें भी करता है।
बारह वर्ष की आयु में यदि माँ घर पर न दिखे, तो पाप से पूछता है, "पापा, मम्मा कहाँ है? स्कूल से आते ही मम्मी नहीं दिखती, तो अच्छा नहीं लगता।" यानी अपनी माँ को देखे बिना वह उदास हो जाता है।
किशोरावस्था यानी चौदह वर्ष की आयु में वह बेटा बड़ा होने लगता है। वह अपनी माँ से मित्रवत व्यवहार करने लगता है। उस समय अपनी माँ से कहता है, "मम्मी आप पास बैठो, मुझे आपसे बहुत सारी बातें करनी हैं।"
युवावस्था के आरम्भ अर्थात अठारह वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते वह स्वयं को बहुत बड़ा समझने लगता है। उसे अब लगने लगता है कि वह कुछ भी कर सकता है और कहीं भी जा सकता है। इसलिए झल्लाते हुए अपनी माँ से कह देता है, "ओफ्फो मम्मी आप समझते नहीं हो, मुझे आज पार्टी में जाना है। मेरे सारे दोस्त आएँगे। यदि मैं नहीं जाऊँगा तो वे क्या सोचेंगे? आप पापा से कह दो, आज मुझे पार्टी में जाने दें।"
कॉलेज में पड़ता हुआ बाईस साल का नवयुवक अपने आपको बड़ा तीसमारखाँ समझने लगता है। वह अपनी माँ हिदायतें देता हुआ कहता है, "क्या माँ? आज जमाना बदल रहा है, आपको कुछ पता भी है? आप कुछ समझना ही नहीं चाहते।"
वह भूल जाता है कि इसी माँ ने उसे पल-पोसकर बड़ा किया है। उसे दुनिया की समझ उससे अधिक ही होती है।
पच्चीस साल का बच्चा जब नौकरी करने लगता है, तब माता-पिता का समझाना उसे अपनी आजादी में खलल डालना लगता है। वह बड़ा होकर, अपने पैरों पर खड़ा होकर अब वह कमाने लगा है। वह सोचता है, "मैं अब दूध पीता बच्चा तो नहीं रह गया। जब देखो माता-पिता मुझे नसीहतें देते रहते हैं।"
विवाह के पश्चात अठाईस वर्ष की आयु में वह माँ को अपनी पत्नी के साथ सामञ्जस्य बिठाने के लिए कहता है, "माँ, वह मेरी पत्नी है, आप कुछ तो समझा करो, अब अपनी मानसिकता को बदल डालो।"
अपनी गृहस्थी सम्हालता हुआ तीस वर्ष का युवा अपनी माँ को समझता है, "माँ, मेरी पत्नी भी माँ है, उसे बच्चों को और घर को सम्भालना आता है। उसकी हर बात में मीनमेख निकलना अब छोड़ दो बस।"
इस अपमान के पश्चात माँ किनारे हो जाती है। बेटा भी अपनी माँ को कभी नहीं पूछता। माँ कब अधेड़ावस्था से वृद्धावस्था में पहुँच गई, उसे पता ही नहीं चलता। माँ तो आज भी वही हैं, बस उसकी उम्र के साथ-साथ बस उसके बच्चों के अन्दाज़ बदलते रहते हैं।
बेटा जब स्वयं पचास वर्ष का हो जाता है, तब अचानक माँ को चुप देखकर वह पूछ बैठता है, "माँ, माँ चुप क्यों हो? बोलो न।" पर माँ नहीं बोलती क्योंकि वह खामोश हो जाती है। यानी इस दुनिया से विदा लेकर दूसरे देश चली जाती है।
कुछ अनकही और कुछ अनसुनी बातें बताने या कहने के लिए, हमारी यह ज़िन्दगी भी एक दिन बीत जाती है। अपनी माँ का सदा आदर और सत्कार करना चाहिए। उसे समझने का प्रयास करना चाहिए। यदि उसका कहा हुआ कुछ न भी पसन्द आए तो उसे अनदेखा कर देना चाहिए। कुछ अनमोल वक्त उसके साथ व्यतीत करना चाहिए। यह समय बड़ा निर्मोही है, किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। हमारे न चाहने पर भी यह समय बस गुज़र जाता है। यह माँ है जो चले जाने के बाद फिर कभी वापिस लौटकर नहीं आती। बस उसकी यादें शेष रह जाती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 5 जनवरी 2019
माँ
शुक्रवार, 4 जनवरी 2019
स्वास्घ्य के लिए व्यायाम
जीवन में स्वस्थ रहने के लिए व्यायाम करना बहुत आवश्यक होता है। मानव शरीर प्रकृति की एक सुन्दर और परिपूर्ण रचना है।यह शरीर जितना चलता-फिरता रहता है, उतना ही स्वस्थ, मजबूत, और लचीला बना रहता है। इसीलिए आजकल जिम जाने का फैशन बढ़ता जा रहा है। वहाँ जाकर लोग वर्कआउट करते हैं। बहुत-सा धन देकर वे स्वयं के लिए प्रवेश पाते हैं। लड़की हो या लड़का यानी हर युवा जिम में जाकर अपनी बॉडी बनाकर फिट रहना चाहता है। नौजवान सिक्स पैक बनाने में गर्व का अनुभव करते हैं। जिम जाकर वे कई प्रकार की एक्सरसाइज करते हैं।
व्यायाम की रूपरेखा इंसान के स्वास्थ्य, जीवनपद्धति, व्यवसाय और आयु को ध्यान में रख कर निश्चित करनी चाहिए। किसी एक इंसान द्वारा किया जाने वाला व्यायाम दूसरे व्यक्ति को भी सूट कर जाएगा, यह आवश्यक नहीं है। कुछ युवा लोग सी डी चलाकर उसके साथ एक्सरसाइज करते हैं। इनके अतिरिक्त कुछ लोग सैर करना स्वास्घ्य के लिए बहुत आवश्यक मानते हैं। कुछ लोग भागकर, वेट ट्रेनिंग लेकर, स्विमिंग करके, कोई खेल खेलकर या डांस करके द्वारा व्यायाम करते हैं। तरीका कोई भी अपनाया जा सकता है।
वास्तव में व्यायाम एक ऐसी गतिविधि है जो मनुष्य के शरीर को स्वस्थ रखती है और साथ ही उसके समग्र स्वास्थ्य को भी बढाती है। माँसपेशियों को मजबूत बनाने, हृदय प्रणाली को सुदृढ़ करने, एथलेटिक कौशल बढाने, वजन घटाने या फिर केवल मात्र आनन्द आदि किसी भी कारणवश इसे किया जा सकता है। कारण कोई भी हो सकता है, पर उद्देश्य एक ही है कि शरीर स्वस्थ रहना चाहिए, नीरोग रहना चाहिए।
व्यायाम अथवा कसरत से जी चुराने वाले आलसी लोग तर्क देते हैं कि एक खरगोश अपने जीवनकाल में दौड़ता है, उछलता कूदता है, मस्ती करता है और फिर भी केवल पन्द्रह वर्ष तक ही जीवित रहता है। इसके विपरीत एक कछुआ है, जो न दौड़ता है और न ही कुछ करता है, फिर भी वह तीन सौ वर्ष तक जीवित रहता है। इसलिए एक्सरसाइज जाए भाड़ में, कौन शरीर को कष्ट दे। अतः निश्चिन्त होकर अच्छी गहरी नींद में सो लिया जाए। आराम से बढ़कर इस जीवन में और कुछ भी नहीं है।
प्रतिदिन दौड़ लगाना भी एक व्यायाम है। दौड़ने से शरीर में बदलाव होते हैं। तनाव से दूर रहने में भी मदद मिलती है। शरीर में जमी वसा नष्ट होती है। इस कारण मोटापा घटाने में मदद मिलती है। इससे अच्छी नींद आती है, इन्सान प्रसन्न रहता है। तनाव से दूर रहने में भी मदद मिलती है और सकारात्मक मानसिकता तैयार होती है। मनुष्य दिन भर फ्रैश रहता है और उसे थकावट नहीं होती। नियमित रूप से दौड़ने से स्ट्रोक, रक्तचाप, डायबिटीज जैसी बीमारियों से दूर रहना संभव होता है।
व्यायाम करते समय कुछ बिन्दुओं की ओर ध्यान देना बहुत आवश्यक होता है। व्यायाम सदा विशेषज्ञ के मार्गदर्शन के बाद ही करना चाहिए। इस बात को समझना आवश्यक है कि व्यायाम की शुरुआत में बदनदर्द होता है, लेकिन बाद में लाभ होता है। व्यायाम हमेशा उतना ही किया जाना चाहिए, जिससे शरीर में थोड़ी थकावट बेशक हो जाए, पर अनावश्यक रूप से थककर चूर नहीं होना चाहिए। व्यायाम के बाद विश्राम करना बहुत आवश्यक होता है।
व्यायाम हमेशा शुद्ध वायु में खाली पेट और शौच के बाद प्रातःकाल करना चाहिए। यदि सम्भव न हो तो भोजन के कम-से-कम चार घण्टे बाद इसे किया जा सकता है। शरीर पर मौसम के अनुसार ढीले वस्त्र होने चाहिए। व्यायाम के तुरन्त बाद पानी पिया जा सकता है, लेकिन उसके आधे घण्टे बाद ही कुछ खाना चाहिए। व्यायाम के पन्द्रह मिनट बाद गुनगुना दूध पीना स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होता है। तेज चलते हुए पंखे के सामने या उसके नीचे व्यायाम नहीं करना चाहिए। इससे अच्छा है कि पंखा धीमा कर दें और पसीना निकलने दें। व्यायाम करते वक्त पसीना पोंछने के लिए अपने पास सूती नैपकिन रखना चाहिए।
झटके से कभी व्यायाम नहीं करना चाहिए। व्यायाम में विविधता बनाए रखनी चाहिए। लगातार एक ही तरह का व्यायाम करने से हमारे शरीर को उसकी आदत होने लगती है। इसलिए धीरे-धीरे उसका सकारात्मक परिणाम दिखाई देना बन्द हो जाता है।
सबसे आवश्यक बात यह है कि व्यायाम में निरन्तरता बनाए रखना जरूरी होता है, अन्यथा सब बेकार हो जाता है। यदि लाभ लेना चाहते हैं, तो व्यायाम नियमित रूप से करना चाहिए। यदि कभी कोई समस्या आ जाए तो सप्ताह में कम-से-कम पाँच दिन व्यायाम अवश्य करना चाहिए।
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो योगाभ्यास करके स्वयं को चुस्त और दुरुस्त रखने का प्रयास करते हैं। अधिकाँशत: लोग योगासन तथा व्यायाम दोनों को एक ही समझते हैं परन्तु ऐसा नहीं है। दोनों ही विधाओं में बहुत अन्तर है और इन दोनों का ही अपना-अपना महत्व है। योग सिर्फ कसरत मात्र नहीं है। व्यायाम में केवल शारीरिक प्रक्रिया की जाती हैं ताकि शरीर स्वस्थ रहे। दूसरी ओर योग मनुष्य को शारीरिक, मानसिक एवं भावानात्मक रूप से सुदृढ़ बनाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 3 जनवरी 2019
सफलता के मायने
सफलता के मायने हर आयु के अनुसार बदलते रहते हैं। बचपन से लेकर वृद्धावस्था तक हम अपनी कमजोरियों को नियन्त्रित करने का प्रयास करते रहते हैं। उसमें हम सफल हो पाते हैं अथवा नही, यह हमारी अपनी इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है। यह आवश्यक नहीं कि प्रथम प्रयास में ही हम अपनी सफलता के झण्डे गाड़ दें। कभी-कभी बहुत बार यत्न करने पर भी निराशा ही हाथ लगती है। कोई बात नहीं, इस स्थिति में थक-हारकर बैठ जाने जैसा कुछ भी नहीं है।
छोटे बच्चे स्वयं पर नियन्त्रण न रख पाने के कारण बार-बार अपने कपड़ों में ही सू सू कर देते हैं। इसी तरह रात को बिस्तर भी गीला कर देते हैं। अपनी चार वर्ष की आयु तक आते आते वे अपने कपड़ों को सूखा रखने में यानी उन्हें गीला न करने में सफल हो जाते हैं। सच्चाई यह है कि उस आयु में पहुँचकर बच्चे अपने कपड़ों को गीला नहीं करते। यानी यही उनके लिए उस आयु की सबसे बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है।
इसके बाद आगे बढ़ते हैं, उम्र के उस पड़ाव पर जब बच्चे की आयु आठ वर्ष हो जाती है। उस उम्र में वह थोड़ा-सा बड़ा हो जाता है और कुछ समझदार हो जाता है। उसे अपने घर वापिस आने वाले रास्ते की पहचान हो जाती है। तब वह अपने घर से बाहर, आस-पास ही कुछ समय के लिए दोस्तों के साथ खेलने चला जाता है। माता-पिता उसे ऐसा करने की अनुमति दे देते हैं। उसके लिए यही सबसे बड़ा साहसिक कदम है कि वह अकेला अपने मित्रों के साथ पार्क आदि किसी स्थान खेल रहा है।
जब बच्चे की आयु बारह वर्ष की हो जाती है, तब उस उम्र में उसकी सफलता यही होती है कि वह अपने अच्छे मित्र बना सकता है। दूसरे शब्दों में कहें तो बच्चे को अन्य बच्चों के साथ मिल-जुलकर रहना आ जाता है। वह अपने दोस्तों के साथ अपनी वस्तुएँ साझा करने लगता है, खेलता है और अपने मन की बात उनसे करने लगता है।
युवावस्था यानी अठ्ठारह वर्ष की आयु में नवयुवा यदि मदिरा और सिगरेट आदि व्यसनों से स्वयं को दूर रख पाता है, तो यह उसकी बहुत बड़ी सफलता कहलाती है। इसका अर्थ है कि इस आयु तक आते आते हर युवा को समझदार हो जाना चाहिए। उसे अपना भला-बुरा पहचानना आ जाना चाहिए अन्यथा कुसंगति में पड़कर उसे आयु पर्यन्त पछताना पड़ता है। यदि वह सन्मार्ग पर चलता रहता है, तो विद्याध्ययन करके योग्य बनता है। फिर पच्चीस वर्ष की आयु तक वह नौकरी पाकर अपने जीवन में सफलता प्राप्त करता है। इस तरह सफल व्यक्ति बनकर तीस वर्ष वर्ष की उम्र तक वह एक पारिवारिक व्यक्ति बन जाता है। तब उसकी सफलता उसके दायित्वों का पूर्ण होना होता है। उनमें किसी प्रकार की कोताही मान्य नहीं की जा सकती।
तत्पश्चात पैंतीस वर्ष की उम्र तक मनुष्य दुनिया की धूप-छाँव को समझने लगता है। अपने भविष्य की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए धन का संचय करना सीख लेता है। यही इस उम्र की सफलता होती है। यदि वह धन का दुरुपयोग करता है तो बच्चों को सेटल करने, उनकी शादी करने जैसे दायित्वों को निभाने में वह कठिनाई का अनुभव करेगा। फिर पैंतालीस वर्ष की आयु तक अपनी युवावस्था को बरकरार रखना अपने आप में बहुत बड़ी सफलता है। इसी कड़ी में पचपन वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते मनुष्य यदि अपने हिस्से की सारी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में सक्षम हो जाता है, तब वह एक सफल मनुष्य की श्रेणी में गिना जाता है।
रिटायरमेंट के बाद पैंसठ वर्ष की आयु में यदि मनुष्य स्वस्थ रहता है तो यह उसकी जीत है। इससे ज्ञात होता है कि उसका आहार, विहार और विचार यानी उसकी जीवनशैली सन्तुलित रही होगी। सत्तर वर्ष की आयु में भी यदि कोई मनुष्य आत्मनिर्भर रहता है यानी किसी पर बोझ नहीं बनता, तो इससे बढ़कर कोई और सफलता उसके लिए हो ही नहीं सकती। यदि वह पिचहत्तर वर्ष की आयु में अपने पुराने मित्रों से रिश्ता कायम रख सके तो मानो उसने जिन्दगी की जग में विजय प्राप्त कर ली है। आत्मनिर्भर रहना और अपने पुराने मित्रों के सम्पर्क में रहने से मनुष्य का समय अच्छे से बीत जाता है। तब उसे अकेलेपन का दंश नहीं झेलना पड़ता।
इस आयु से जीवन चक्र है फिर से घूमकर लौटकर वहीं आ जाता है, जहाँ से उसका आरम्भ हुआ था। यानी अस्सी वर्ष की आयु की सफलता यही है कि मनुष्य को अपने घर तक वापिस आने का रास्ता ज्ञात है। उसे दुनिया की भीड़ में खो जाने का भय नहीं है। यदि पिचासी वर्ष की आयु में वह पुनः अपने वस्त्रों को गिला नहीं करता, तो उसके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि है।
इस लेख को लिखने का उद्देश्य मात्र इतना है कि अंततः यही जीवन का परम सत्य है। इसे जान लें या समझ लें तो जीवन यात्रा सरल हो जाती है। किसी से शिकायत करने की आवश्यकता नहीं रह जाती। अन्यथा सफलता और असफलता का ज्ञान नहीं हो सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 2 जनवरी 2019
बेटी का सम्पत्ति में अधिकार
पितृसत्तात्मक समाज में स्त्री को हर स्थान पर दोयम दर्जे पर ही रखा जाता है। पिता की लाडली और नाजों से पाली हुई पुत्री को उसकी सम्पत्ति में कोई अधिकार नहीं दिया जाता। अधिकांशतः पुत्र को ही यह धन-सम्पत्ति उत्तराधिकार में दी जाती है। बेटी को न जाने क्यों उस अधिकार से वञ्चित कर दिया जाता है। समझ नहीं आता कि बेटा हो अथवा बेटी, जब दोनों ही एक माता-पिता की सन्तान हैं, तो फिर यह भेदभाव क्यों किया जाता है? बेटी शादी करके दूसरे घर के लिए विदा कर दी जाती है तो क्या उसका सम्बन्ध अपने माता-पिता या शेष परिवारी जनों से समाप्त हो जाता है? ये सब विचारणीय विषय हैं।
भारत में 1956 तक यह कानून लागू था, जिसके अनुसार पैतृक सम्पत्ति पर केवल पुत्र को ही उत्तराधिकारी बनाया जाता था। बेटी की उसमें कोई साझेदारी नहीं होती थी। अपवाद स्वरूप उन बेटियों को उत्तराधिकार के रूप में सम्पत्ति मिलती थी, जिनका कोई भाई नहीं होता था। तब वह सम्पत्ति बेटियों में बाँट दी जाती थी।
भारतीय संविधान में लिंग के आधार पर भेदभाव करना कानून अपराध है। अतः सन् 2005 में संविधान में एक नया संशोधन किया गया। नए कानून के अनुसार बेटियों और बेटों दोनों को समान मानते हुए, कानूनी तौर पर पिता की सम्पत्ति में दोनों के लिए बराबरी, साझेदारी और हिस्सेदारी का प्रावधान रखा गया था।
बहुत दुख के साथ कहना पड़ रहा है कि कानून बनने और सामाजिक तौर पर उसे लागू करने की दिशा में आज तक कहीं कोई पहल नहीं की गई। इस कानून की अवज्ञा करने पर सजा का भी कोई प्रावधान नहीं रखा गया। इसलिए सब कुछ पारम्परिक ढर्रे के अनुसार ही चलता जा रहा है। यही कारण है कि बेटियाँ आज भी अपनी पैतृक सम्पत्ति प्राप्ति के अपने अधिकार से वञ्चित हैं। बहुत कम माता-पिता हैं, जो अपनी बेटियों को स्वेच्छा से सम्पत्ति में हिस्सा देते हैं। यदि बेटियाँ अपने अधिकार के लिए पिता और भाई के खिलाफ कोर्ट में मुक़दमा लड़ें, तभी वे उसे प्राप्त कर सकती है। उस स्थिति में उनका मायके से सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है।
हमारी भरतीय संस्कृति के अनुसार संस्कार ही कुछ ऐसे हैं कि प्रायः बहनें या बेटियाँ स्वेच्छा से अपना हक छोड़ देती हैं। चाहे वे स्वयं दुख और परेशानी में क्यों न जी रही हों। आर्थिक विपत्ति के समय, पति के व्यभिचारी, अनैतिक और दुराचारी होने के कारण या तलाक लेकर अलग रहने की स्थिति में भी प्रायः उन्हें अपने पिता और भाई से सहायता नहीं मिलती।
विवाहोपरन्त पिता का घर छोड़कर वह पति के घर आती है। लोग कहते हैं कि बेटी की शादी कर दी है, अब उसका ससुराल की सम्पत्ति पर हक है। इसे विडम्बना ही कहा जाएगा कि उसे न मायके से सम्पत्ति मिलती है और न ही ससुराल से। कुछ लोग यह भी कहते हैं कि यदि उसे मायके की सम्पत्ति में हक दे दिया जाएगा, तो उसके पास मायके और ससुराल दोनों की सम्पत्तियाँ हो जाएँगी। इसके विपरीत बेटे के पास एक ही तरफ की सम्पत्ति रह जाएगी। पर वे भूल जाते हैं कि जो बहू उनके घर आएगी, वह भी तो अपना भाग या हिस्सा लेकर ही आएगी। इस तरह दोनों को अपना अधिकार मिलने से कोई भी पक्ष घाटे में नहीं रहेगा।
आज स्थिति यह है कि विवाह में मिले कुछ उपहार, कुछ कपडे, कुछ गहने या कुछ रुपये ही मात्र स्त्री की पूँजी होते हैं। शायद उनमें से कुछ से ये भी लालची लोगों द्वारा छीन लिए जाते हैं। इससे भी अधिक स्थिति तब कष्टदायक होती है, जब पढ़ी-लिखी, नौकरी करती हुई स्त्री की कमाई को भी उसका पति या उसके ससुराल वाले छीन लेते हैं। इस प्रकार स्त्री को आर्थिक और सामाजिक आधार पर कमजोर रखने की साजिश युगों से रची जाती रही है। स्त्री की ऐसी स्थिति को जानते हुए ही पति नामक पुरुष उसका शोषण करने में अपनी सारी ऊर्जा लगा देता है। इसीलिए कुछ स्त्रियाँ घर खर्च से मिले पैसे में से कुछ धन बचाकर छिपा देती हैं। यदि उसके पास सम्पत्ति हो, अपना पैसा हो तो वह भी समाज में शान से सिर उठाकर चल सकती है और पति के घर में भी सम्मानपूर्वक रह सकती है।
समय धीरे-धीरे परिवर्तित हो रहा है। आज माता-पिता अपनी बेटी को पढ़ा-लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा देखना चाहते हैं। ताकि उसे अपने खर्चों के लिए किसी का मुँह न देखना पड़े। यदि वे उसे उसका दयाद्य यानी सम्पत्ति में उसे अधिकार भी उसे दे दें, तो उसके लिए स्थितियाँ बहुत ही अनुकूल हो जाएँगी। उसे किसी के सामने हाथ नहीं फैलाना पड़ेगा। वह स्वयं को असहाय नहीं समझेगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 1 जनवरी 2019
मन रूपी जिन्न
हमारा मन अल्लादीन के जादुई चिराग से निकलने वाले जिन्न की तरह है। उसमें उठने वाले अनेक प्रकार के विचार उस जिन्न की भाँति शक्तिशाली होते हैं। जिस तरह जिन्न चिराग के अन्दर रहता तो है, परन्तु किसी को दिखाई नहीं देता, उसी प्रकार हमारे शरीर में छिपा हुआ मन भी हमें दिखाई नहीं देते। जब जादुई चिराग को रगड़ते हैं तो एक जिन्न प्रकट होता है। फिर वह गुलाम बनकर चिराग के मालिक की इच्छाओं को सिर झुकाकर पूर्ण करता है।
इसी प्रकार मन रूपी जिन्न को जब मनुष्य मथता है, तब वह उसका गुलाम बनकर उसके इशारों पर तब नाचता है। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि जब उसे नियन्त्रित किया जाए, तभी वह मनुष्य के कथनानुसार झुक-झुककर उसके कार्य करता है। यदि उसे चलाने में मनुष्य से जरा-सी भी चूक हो जाए तो वह मनुष्य को बर्बाद करके ही दम लेता है।
यहाँ एक कहानी याद आ रही है, जिसे कभी बचपन में सुना था। आप सबने भी उसे सुना ही होगा। कहते हैं एक बार एक सेठ के पास के पास एक जिन्न आया। उसने सेठ से कहा, "मुझे नौकरी की तलाश है। क्या आप मुझे नौकरी दोगे?"
सेठ को काम करने वाले एक कर्मचारी की आवश्यकता थी। उसने पूछा, "तुम वेतन क्या लोगे?
जिन्न ने उत्तर दिया, "मुझे कोई वेतन नहीं चाहिए। सिर्फ दो समय का खाना और रहने की जगह मिल जाए तो मैं दिन-रात कार्य करने के लिए तैयार हूँ।"
सेठ मन-ही-मन प्रसन्न हो गया। उसे मुफ्त में काम करने के लिए नौकर मिल रहा था। अब भला उसे और क्या चाहिए था। सेठ ने उसे काम पर रखने के लिए हाँ कर दी।
इस पर जिन्न ने कहा, "सेठ जी, मेरी एक शर्त है।"
सेठ ने उससे पूछा, "शर्त क्या है?
जिन्न ने उत्तर दिया, "मैं खाली बिल्कुल नहीं बैठ सकता। मुझे हर समय कम चाहिए। जिस समय आप मुझे काम नहीं दोगे, उस समय मैं तुम्हारा सिर फोड़ दूँगा।"
सेठ ने मन में सोचा कि घर और दुकान में इतना काम है। इसके खाली बैठने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। उसने प्रसन्न होते हुए कहा, "मुझे तुम्हारी शर्त मंजूर है।"
अब जिन्न काम करने लगा। उसके काम करने की गति इतनी अधिक थी कि सेठ परेशान होने लगा कि अब वह उसे क्या काम दे? उसे परेशानी में देखकर किसी सयाने ने उससे उसकी उदासी का कारण पूछा। तब सेठ ने उसे सारी बात बता दी। उस व्यक्ति ने सेठ को बहुत ही बढ़िया उपाय बताया, "एक सीढ़ी बनवा लीजिए। जब कोई काम न हो तो उसे कहिए कि इस सीढ़ी पर चढ़ो और उतरो।"
इस तरह सेठ को उसकी मुसीबत का हल मिल गया। उसकी साँस में साँस आ गयी। उसने उस व्यक्ति को धन्यवाद दिया।
हमारा अपना मन भी ठीक इसी जिन्न तरह आचरण करता है। यदि उसे काम में लगाकर व्यस्त रखा जाए तो वह ठीक रहता है। उस स्थिति में इस मन में सकारात्मक विचारों का साम्राज्य रहता है। मनुष्य अपनी योग्यता का सदुपयोग करता हुआ सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता रहता है। ऐसा व्यक्ति अपने सद्व्यवहार से शत्रु को भी अपना मित्र बनाने की सामर्थ्य रखता है।
इसके विपरीत यदि इस मन को मनमर्जी करने की छूट दे दी जाए तो वह सब तहस-नहस कर देता है। वह अनावश्यक जोड़-तोड़ करता है। तब मनुष्य के मन में नकारात्मक विचारों का उदय होने लगता है। सदा पिष्टपेषण करता हुआ वह धीरे-धीरे अवसाद में घिरने लगता है। अपने ही प्रियजनों को अपने दुर्व्यवहार से स्वयं से दूर कर बैठता है।
कहने का तात्पर्य है कि यह मन ही मनुष्य के उत्थान और पतन का कारण होता है। वही उसके मोक्ष और बन्धन का कारक भी बनता है। उपनिषदों के अनुसार मन आत्मा रूपी सारथी के रथ की लगाम कहलाता है। यदि बुद्धि रूपी सारथी इस लगाम को कसकर रखता है तो इन्द्रिय रूपी घोड़े सही मार्ग पर चलते हैं। तभी आत्मा रूपी यात्री मोक्ष को प्राप्त करता है।
दुसरीं मन रूपी लगाम को न कसने पर इन्द्रियाँ कुमार्ग पर चलती हैं और यात्री अपने मार्ग से भटक जाता है। वह चौरासी लाख योनियों के चक्कर में फँसा रहता है। मन रूपी जिन्न से कुछ पाने के लोभ का परित्याग करना श्रेयस्कर होता है, उसके जाल में नहीं उलझना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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