मंगलवार, 6 अगस्त 2019

बेटियों की पूजा

बेटी का जन्म जब होता है, तो लोग 'लक्ष्मी घर में आई है' कहकर घर के सदस्यों को बधाई देते हैं। बहुत से पिता अपने घर में बेटी की कामना करते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में ही ऐसा होता है कि लड़की या कन्या को देवी मानकर उसकी पूजा करने का विधान है। भारतीय लोग लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती आदि देवियों के रूप में बेटियों की उपासना करते हैं। उनके साथ प्रेम का व्यवहार करते है।
            प्रतिवर्ष हर छह मास के पश्चात आने वाले नवरात्रों में कन्याओं को पूजा जाता है और भोज कराया जाता है। आठवें दिन विशेष पूजा होती है। घर में कन्याओं को बुलाकर उनके चरण धोकर, उनकी पूजा करके लोग अपनी श्रद्धा से उन्हें धन व वस्त्र उपहार में देते हैं और भोजन खिलाते हैं। गुजरात में शारदीय नवरात्रों के नौ दिनों में विशेष रूप से रात के समय उत्सव मनाया जाता है। इसमें लड़कियाँ बढ़-चढ़कर भाग लेती है।
          किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व कन्याओं की पूजा करके, उन्हें उपहार दिया जाता है। किसी धार्मिक अनुष्ठान को विघ्नरहित सम्पन्न करने के लिए भी विधानपूर्वक कन्यापूजन किया जाता है। इससे भी बढ़कर धार्मिक यात्रा से लौटकर आने पर भी विधिवत कन्यापूजन किया जाता है। ताकि जिस उद्देश्य से उन्होंने धर्मिक अनुष्ठान अथवा उनकी धार्मिक यात्रा की है, वह फलदायी हो। ईश्वर अपने भक्त पर प्रसन्न हो जाए और उसकी मनोकामना पूर्ण कर दे।
          कहने का तात्पर्य यह है कि बेटियों को इतना मान-सम्मान देने की परम्परा हमारे देश भारत में ही है। इसीलिए हमारे शास्त्रों के अनुसार उसे पैर से छूना वर्जित माना गया है। हमारे बड़े-बुजुर्गों का पैर यदि गलती से भी किसी बेटी को छू जाए, तो माथे पर हाथ रखकर, ईश्वर से क्षमा याचना किया करते थे। इसी कड़ी में उसके लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग भी नहीं करने के लिए कहा जाता है।
          बेटियाँ बहुत कोमल हृदय होती हैं। उनकी परवरिश फूलों की तरह की जाती है। माता-पिता का कठोर व्यवहार उस नाजुक-सी बिटिया का हृदय छलनी कर देता है। इसलिए अपनी बेटी के साथ माता-पिता को प्रेम व कोमलता से पेश आना चाहिए। उसे सदा यह अनुभव करवाना चाहिए कि वह अपने माता-पिता पर भार नहीं ह, अपितु उनके कलेजे का टुकड़ा है।
          बेटी को यह अहसास भी करना आवश्यक है कि वह घर का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है, जैसे अन्य सदस्य हैं। उसके बिना घर बहुत सूना हो जाता है। घर के सभी सदस्य उसके बिना उदास हो जाते हैं। उसे सदा प्रोत्साहित करते रहना चाहिए कि उनकी प्यारी बेटी किसी से भी कम नहीं है। उसमें इतनी सामर्थ्य है कि वह किसी तरह का कोई भी कार्य सफलतापूर्वक कर सकती है।
           बड़े दुर्भाग्य की बात है कि कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग, इन बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उनके साथ कुकर्म तक करने से बाज नहीं आते। ऐसे लोगों को कठोर से कठोर दण्ड देना चाहिए, ताकि कोई भी सिरफिरा दुर्जन इस प्रकार के दुष्कर्म करने का दुस्साहस न कर सके। हालॉंकि इन लोगों के लिए कानून में सजा का प्रावधान किया है। उन्हें शीघ्र ही सारे जीवन के लिए सलाखों के पीछे फेंक देना चाहिए।
         माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी को इन दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों के बारे में बताकर सावधान रहने के उपाय बताएँ। हो सके तो उन्हें सुरक्षित रहने के लिए कोई ट्रेंनिग भी करवा दें। इस प्रकार बेटी सुरक्षित रहेगी, तो माता-पिता भी निश्चिन्त हो सकते हैं। अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाकर उसे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रोत्साहित करके अपने दायित्व का निर्वहण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 3 अगस्त 2019

जीवन की वास्तविकता

जीवन में ऊँचाई पर चढ़ने या सफल होने के लिए प्रत्येक मनुष्य का अनुशासन में रहना अनिवार्य होता है। उसे अपने घर-परिवार, माता-पिता, गुरुजनों और समाज के साथ सदा सामञ्जस्य बनाकर चलना चाहिए। मनुष्य की यही समझदारी सामाजिकता कहलाती है। ऐसे मनुष्य को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ता क्योकि उसके चारों ओर उसे अपने ही दिखाई देते हैं।
          अपनों के बिना वह निपट अकेला हो जाता है और अधूरा रह जाता है। सोचने वाली बात यह है कि जब वह सबसे कटकर रहने लगेगा, तो अपनी खुशियाँ किसी के साथ साझा नहीं कर सकेगा। उस समय उसकी सफलता की खुशी एक तरह से बेमानी हो जाती है। तब उसे अपनी गलती का अहसास होता है कि उसने बड़ी भूल कर दी है। उस समय तो कुछ भी नहीं किया जा सकता।
          यहाँ उस घटना का जिक्र करना चाहती हूँ, जिसे वाट्सअप पर बिना किसी के नाम के पढ़ा था। कुछ संशोधन के साथ आपसे साझा कर रही हूँ।
          एक बार बेटे ने अपने पिता से पूछा, "पापा, ये सफल जीवन' क्या होता है?"
         पिता, बेटे को पतंग उड़ाने के लिए ले गए। बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते हुए देख रहा था।
        थोड़ी देर बाद बेटा बोला, "पापा, धागे में बँधे होने के कारण यह पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है। क्या हम इस धागे को तोड़ दें? तब यह और ऊपर चली जाएगी।"
        बेटे की बात सुनकर पिता ने धागे को तोड़ दिया। पतंग थोड़ा-सा और ऊपर उड़ी। उसके बाद वह लहरा कर नीचे आने लगी और दूर किसी अनजान जगह पर जा कर गिर गई।
        तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया, "बेटा, जिन्दगी में जब हम मनुष्य ऊँचाई पर होते हैं, तब हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें जिनसे हम बँधे हुए हैं, वे हमें और ऊपर की ओर जाने में बाधा बन रही हैं।"
          पिता के समझाने का अर्थ यही था कि वास्तव में मनुष्य को लगता है कि अनुशासन, घर-परिवार, माता-पिता, गुरु और समाज से उसे आजाद होना चाहिए। वास्तव में यही वे धागे होते हैं, जो उसे ऊँचाई पर बनाकर रखते हैं। इन धागों के बिना वह एक बार तो ऊपर चला जाएगा, परन्तु बाद में उसका वही हश्र होगा, जो धागे के कट जाने के बाद किसी पतंग का होता है।
         जीवन में मनुष्य यदि ऊँचाइयों पर बने रहना चाहता है, तो उसे कभी भी इन धागों से नहीं रिश्ता तोड़ना चाहिए। इन्हें मजबूती से थामकर रखना चाहिए। उसे सदा यही प्रयास करना चाहिए कि इन धागों में कभी गलती से भी गाँठ न पड़ने पाए। मनुष्य कितने भी ऊँचे पद पर क्यों न पहुँच जाए, अपनों के साथ के बिना वह कुछ भी कर सकता।
          अपने बन्धुजनों के साथ जब तक वह रचा-बसा रहता है, तभी तक मनचाही उड़ान भर सकता है। एक बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि पक्षी की तरह कितनी भी उँची उड़ान मनुष्य भर ले, अन्तत: आना तो उसे जमीन पर ही होता है। इसलिए अपने मन में अहंकार को स्थान नहीं देना चाहिए। न ही उसे अपने अहं के कारण कभी इन सब सम्बन्धों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
         ये सभी उसके अपने प्रियजन उसे निरन्तर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। उनसे प्रोत्साहित होकर ही उसमें कुछ नया कर गुजरने का साहस आता है। जब वह कुछ नया कार्य कर लेता है, तो चारों उसकी वाहवाही होने लगती है। उसकी योग्यता की तूती बोलने लगती है। हर व्यक्ति उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास करने लगता है।
         दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वह समाज में साधारण से विशेष बन जाता है। जो मनुष्य जमीनी वास्तविकता को समझ लेता है, वह कभी अपना आधार नहीं त्याग सकता। आसमान में कितनी लम्बी उड़ान भरने के बाद भी वह अपने पैर धरती पर जमकर रखता है। यही जीवन की सच्चाई है। मनुष्य इसे जितनी जल्दी समझ जाए, उतना ही उसका लाभ होता है।
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शुक्रवार, 2 अगस्त 2019

मर्यादा केवल बेटी के लिए

इक्कीसवीं सदी में हम लोग जी रहे हैं। जहाँ विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है, हम मंगल ग्रह तक पहुँच गए हैं। आज की दुनिया सिमटकर हमारी मुट्ठी में आ गई है। ऐसे समय में भी सारी नैतिकता और सारी मर्यादाएँ केवल बेटी के हिस्से में ही क्यों आती हैं? बेटे को इस सब की शिक्षा क्यों नहीं दी जाती? इस विषय पर गहनता से विचार करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है।        
            जब बेटी किसी मित्र की जन्मदिन की पार्टी के लिए या किसी और उद्देश्य के लिए घर से बाहर निकलती हैं, तो उसके माता-पिता प्रयास यही करते हैं कि वह अकेली न जाए। वे उसे उसकी सहेलियों के साथ भी घर से बाहर नहीं जाने देना चाहते। उसे पिता या भाई छोड़कर आएँ। यदि वे न जा सकें तो माँ ही उसके साथ चली जाए, वहाँ प्रतीक्षा कर और उसे वापिस लेकर आए।
       लड़कियों को ही सदा ये सब हिदायतें दी जाती हैं। उन्हें क्या करना चाहिए? कैसे रहना चाहिए? कैसे बोलना चाहिए? कैसे चलना चाहिए? कैसे उठना चाहिए? कैसे बैठना चाहिए? कहाँ जाना चाहिए? कहाँ नहीं जाना चाहिए? कैसी ड्रेस पहननी चाहिए? उसे घर पर कब तक वापिस लौट आना चाहिए? किन लोगों से मित्रता रखनी चाहिए? किन लोगों का बायकॉट करना चाहिए?
          बेटी की शादी हो जाने पर भी उस पर कई बन्धनों में रखने का प्रयास किया जाता है। शादी के बाद नित्य ही सिन्दूर लगाना, मंगलसूत्र पहनना और बिछिया पहनना आवश्यक हो जाते हैं। उस पर प्रातः जल्दी उठना पड़ता है। माँ-पापा की सर्वगुण सम्पन्न लाडली बेटी ससुराल में आने के बाद महत्त्वहीन हो जाती है। घर में नौकर होने के बाद भी काम करना उसकी मजबूरी बन जाती है।
         मुझे आज तक यह समझ नहीं आया  कि विवाह के उपरान्त उसे पति व सन्तान की दीर्घायु के लिए उसे इच्छा न रहते हुए भी व्रत रखने पड़ते हैं। ये सब धार्मिक कृत्य केवल उसकी पसन्द निर्भर होने चाहिए, उसके साथ किसी तरह की कोई भी जोर जबरदस्ती नही होनी चाहिए। जो लड़की इन सब रूढ़ियों को न माने उसे घर-परिवार में रहते हुए तरह तरह के अपमान और विरोध का सामना करना पड़ता है।
          आज लड़कियाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करके उच्च पदों पर आसीन हो रही हैं। उनके पास इन सबके विषय में सोचने के लिए समय ही नहीं है और न ही वे इन पचड़ों में पड़ना चाहती हैं। कोई कुछ भी कहता रहे वे मस्त रहती हैं। किसी को उनका यह आचरण अच्छा लगे या नहीं, उन्हें इन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है। उनका यह रवैया हो सकता है कुछ लोगों को रुचिकर न लगे, पर वास्तव में यही उचित है।
          चाहे घर हो, बाहर हो अथवा चाहे विद्यालय, सर्वत्र लड़कियों को ही नैतिक शिक्षा (Moral education) दी जाती है। लड़कियाँ पढ़-लिखकर समझदार बन रही है। उन्हें लड़के और लड़की के बीच हो रहे भेदभाव पर वितृष्णा होती हैं। वे अन्याय को सहन नहीं कर पातीं। इसलिए वे मुखर होकर इसका विरोध करती हैं और अपनी बात को तर्कपूर्वक रखने का साहस करती हैं।
          माता-पिता यदि अपने लड़कों या बेटों को भी इस नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ा देते, तो आज हमारे इस समाज से हत्या, बलात्कार, एसिड अटैक जैसी कई बुराइयों का अन्त हो सकता था। उन्हें अपने बेटों पर भी प्रतिबन्ध लगाने चाहिए। उनके बेटों को भी मर्यादा में रहने की बहुत जरूरत है। इस विषय पर ध्यान देने और सजग रहने की महती आवश्यकता है। इस तरह अपनी बेटियों पर माता-पिता को इतने अधिक प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहती।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 28 जुलाई 2019

अन्न ब्रह्म

अन्न को भरतीय संस्कार में ब्रह्म कहते हैं। 'अन्नं वै ब्रह्म' ऐसा कहकर इसके महत्त्व को प्रतिपादित किया है। वैसे भी हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते थे-  'अन्न भगवान होता है। इसे झूठा नहीं छोड़ते। यदि झूठा छोड़ो तो भगवान जी नाराज होते हैं।'
        उपनिषद कहती है- 'अन्न प्राण हैं। इसका अपमान न करो। अन्न से अन्न को बढ़ाओ।'
       यदि अन्न नष्ट करेंगे तो प्राणों का संकट हो जाएगा। प्राण नहीं रहेंगे तो फिर जीवन समाप्त हो जाएगा। यदि हम स्वार्थी बन जाएँ तो शायद अन्न को बरबाद होने से बचा सकते हैं। जो अन्न को नष्ट करता है, ईश्वर उसे क्षमा नहीं करता अपितु नष्ट कर देता है। वर्षा न होने पर अकाल पड़ना इसी अन्न की बरबादी का कारण होता है। ईश्वर हमें समझाना चाहता है, पर हम इतने नासमझ हैं, जो अनजान बन जाते हैं। अतः कष्ट सहन करते हैं।
          मुट्ठी भर अन्न के दानों से न जाने कितने क्विंटल अनाज पैदा होता है। जिस अन्न की हम बरबादी करते हैं वही दूसरों को खाने के लिए नहीं मिलता।
        यह सत्य है कि इस भोजन को पाने के लिए मनुष्य सारे कर्म-कुकर्म करता है, सच-झूठ करता है। वह दिन-रात अथक परिश्रम करके दो जून का खाना जुटाता है। हमारे देश में क्या विश्व में भी बहुत से लोग ऐसे भाग्यहीन लोग हैं जो जी तोड़ मेहनत करने के बाद भी अपने परिवार के लिए दो समय का भोजन नहीं जुटा पाते। इनसे भी अधिक दुर्भाग्यशाली वे लोग हैं जिन्हें कई-कई दिन तक भोजन नसीब नहीं होता। वे और उनके बच्चे कुपोषण का शिकार होकर अनेक बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं और अपने प्राणों तक से हाथ धो बैठते हैं। शायद हम में से बहुत से लोगों ने बच्चों को कचरे में से खाने के पदार्थ ढूँढकर या बाहर फैंके हुए अन्न को खाते हुए देखा होगा जो बड़े शर्म की बात है। यदि इन लोगों के बारे में हम एक बार भी सोच लें, तो अन्न की बरबादी नहीं कर सकेंगे।
      शादियों, पार्टियों एवं होटलों में जहाँ जाते हैं और वहाँ भोजन की थाली में झूठा छोड़ने को हम अपनी शान समझते हैं। कैसी सोच है हमारी कि घर में खाने का नुकसान नहीं करना क्योंकि वह अपने पैसे से खरीदा हुआ होता है। पर घर के बाहर जाते ही वही अन्न हमारी तथाकथित उच्च सोसाइटी के लिए प्रदर्शन का कारण बन जाता है। हम उस समय इस बात को भूल जाते हैं कि वहाँ भी किसी के गाढ़े पसीने की कमाई खर्च की गई है।
        यदि ईश्वर ने दौलत दी है तो कभी-कभार अनाथालयों में जाकर उन यतीम बच्चों को पेटभर भोजन खिलाइए। जिन लोगों को कई-कई दिन तक अन्न का एक भी दाना नसीब नहीं होता उनके लिए लंगर लगवा दीजिए। उनके पेट भरेंगे तो उनके मन से निकली दुआएँ आपको मिलेंगी। इससे लोक व परलोक दोनों सुधरेंगे। दान देने या सामाजिक दायित्व निभा पाने का सुख व संतोष भी मिलेगा जिसको कभी भी दुनियावी सिक्कों से नहीं तौल सकते।
         आजकल कुछ समाजसेवी ऐसा कर रहे हैं कि शादी-पार्टी आदि में बचे भोजन को खरीद कर जरूरतमन्दों को बाँट देते हैं।
अपने घर में हम सब कर सकते हैं कि घर में पार्टी आदि होने पर बचे हुए भोजन को किसी अनाथालय में जाकर दे आएँ या उन्हें बुलाकर दे दें। इसके अतिरिक्त अपने आसपास रहने वाले श्रमिकों या गरीबों को वह भोजन दे दें। इससे अन्न को बरबाद होने से हम बचा सकते हैं और उन लोगों को भी स्वादिष्ट भोजन खाने को मिल सकेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

अच्छा स्वास्थ्य

अच्छा स्वास्थ्य हर मनुष्य चाहता है। यह ईश्वर का वरदान है। इस शरीर का नीरोग रहना बहुत आवश्यक है। हमें महाकवि कालिदास ने समझाते हुए कहा है-
        'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्'
अर्थात् धर्म का पालन करने के लिए साधन शरीर है।
         हम अपने धर्म या कर्त्तव्यों का पालन स्वस्थ रहकर ही कर सकते हैं। यदि मनुष्य अस्वस्थ हो जाएगा, तो उसे हर कार्य के लिए दूसरों का मुँह देखना पड़ता है। जब मनुष्य दूसरों के अधीन बन जाएगा, तो अपने दायित्वों का निर्वहण नहीं कर सकेगा। यह पीड़ा उसे और अधिक रोगी बना देती है।
         हम सभी लोग भली-भाँति अपने घर-परिवार के दायित्वों को पूरा करने के लिए अथक परिश्रम करते हैं। दिन-रात एक कर देते हैं। उसके लिए जो साधन रूपी ईश्वर ने हमें दिया है उसकी हम परवाह नहीं करते। आप शायद कहेंगे मैं गलत कह रही हूँ। हम तो बढ़िया खाना खाते हैं, अच्छे मंहगे मौसमी फल खाते हैं और मेवे भी खाते हैं। जब अस्वस्थ होते हैं, तो डाक्टर के पास जाकर इलाज भी करवाते हैं।
        फिर भी मैं यही कहूँगी कि हम अपना ध्यान नहीं रखते। एक नजर जरा अपनी दिनचर्या पर डालिए। हम प्रातःकाल उठने के पश्चात और रात सोने तक अपने घर और दफ्तर के कार्यों को निपटाने की धुन में लगे रहते हैं। न हमें खाने की चिन्ता रहती है और न ही समय की। ऐसे में हम समय-असमय खाना खाते हैं और कभी-कभी कार्य की अधिकता होने पर खाना भी नहीं खाते। दिनभर चाय-कॉफी पीकर गुजार देते हैं। रात को देर तक जाग-जाग कर काम करते हैं जिससे पूरी नींद भी नहीं ले पाते।
         हम समय पर खाना नहीं खाते और अगर खाते हैं, तो उल्टा-सीधा खाना जल्दी में ठूस कर भागने की करते हैं। न अपनी पूरी नींद सो पाते हैं तो फिर बताइए इस बेचारे स्वास्थ्य का क्या होगा?
       हमारी इस प्रकार की अव्यवस्थित दैनिकचर्या से  शरीर का चक्र डांवाडोल होने लगता है। शरीर में गैस बनने लगती है, इससे उल्टी भी हो सकती है, दिन-प्रतिदिन शरीर कमजोर होने लगता है व हम थके हुए रहते हैं। इनके अतिरिक्त अन्य कई रोग शरीर में घर बनाने लगते हैं। कभी-कभी काम के इस प्रेशर से ब्लडप्रेशर की समस्या हो जाती है। सबसे बढ़कर दिल का दौरा तक पड़ जाता है। फिर कवायद शुरू हो जाती है डाक्टरों के पास जाने की। उधर काम का प्रेशर और इधर डाक्टरों का चक्कर। इन दोनों के बीच में मनुष्य पिसता रहता है।  
         एक मोटर का रखरखाव यदि ठीक से न किया जाए या बिना आराम दिए उसकी क्षमता से अधिक काम उससे लिया जाए, तो वह भी बिगड़ जाती है। वह ठीक से काम करती रहे, इसके लिए उसमें ग्रीस आदि डाली जाती है और कुछ समय चलाने के बाद उसे आराम भी दिया जाता है ताकि वह लम्बे समय तक चलती रहे।
         गृहिणियाँ तो लापरवाही के मामले में बहुत आगे हैं। वे अपने पति व बच्चों के आगे सोच नहीं पातीं। प्रायः महिलाएँ अपने हिस्सा भी उन्हें दे देती हैं। चौबीसों घंटे घर-बाहर के कार्यों को समेटते हुए उन्हें अपने बारे में सोचने का समय नहीं मिलता। इससे भी अधिक जब तक बिस्तर पर पड़ जाने की नौबत न आ जाए तब तक वे अपनी बीमारियों को अनदेखा करती रहती हैं। जब वे बिस्तर पकड़ लेती हैं, तब घर वालों को पता चलता है कि उनकी हालत कैसी है?
         बच्चे जो हर घर की शोभा हैं उनका खानपान सबसे अधिक कष्टदायी है। वे मोबाइल व कंप्यूटर आदि से खेलने के कारण, शारीरिक खेलों से दूर होते जा रहे हैं। आज जंकफूड और शीतल पेयों के कारण बच्चे अल्पायु में ही मोटापा, शूगर, बीपी, आँख के रोग आदि बिमारियों का शिकार हो रहे हैं। उन्हें बचाने की बहुत आवश्यकता है।
          पुरुष हो या स्त्री दोनों का स्वस्थ रहना परिवार के लिए आवश्यक होता है। एक भी रोगी हो जाए तो घर अस्त-व्यस्त हो जाता है। इसलिए घर के हर सदस्य का आहार-विहार सन्तुलित होना चाहिए ताकि स्वस्थ रहकर वह सभी कार्यो को सम्पादित किया जा सके।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 25 जुलाई 2019

सत्य का व्यवहार

इस विषय पर गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है कि हम सब लोग असत्य या झूठ का व्यवहार करते हैं। इसके सहारे अपना सारा जीवन व्यतीत करते हैं। यह चौंकाने वाली बात नहीं है, बल्कि इसके पीछे के कारणों को ढूँढकर उनको हमें ही दूर करना होता है।
      अपने घर-परिवार में माता-पिता बच्चों से झूठ बोलते हैं और बच्चे माता-पिता से। पति अपनी पत्नी से झूठ बोलता है और पत्नी अपने पति से। मित्र अपने मित्र से झूठ बोलता रहता है। बच्चे स्कूल में अपने अध्यापकों से और घर में माता-पिता से झूठ बोलने में अपनी शान समझते हैं। बॉस या मालिक अपने अधीनस्थों से झूठ बोलते हैं और उसी तरह अधीनस्थ कर्मचारी भी अपने मालिक से। प्रायः धर्मगुरु अपने अनुयायियों से झूठ कहते हैं। व्यापारी, राजनेता आदि सभी इस असत्य के व्यापार में संलग्न हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सभी लोग असत्य के व्यवहार में दक्षता या योग्यता प्राप्त करना चाहते हैं।
         सभी जानते हैं कि असत्य बोलना अविश्वास का मूल है। इससे मन अपवित्र होता है। स्वयं को ईश्वर का सच्चा भक्त कहने वाले को तो कदापि असत्य भाषण नहीं करना चाहिए।
        इस असत्य के व्यवहार के विषय में गहराई से सोचने की आवश्यकता है। हम सब लोग सोचकर बहुत ही प्रसन्न होते हैं कि फलाँ व्यक्ति को हमने मूर्ख या उल्लू बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध कर लिया। परन्तु वास्तव में उसकी अपनी हानि होती है या नहीं पर उसके चारित्रिक पतन की शुरूआत अवश्य हो जाती है। असत्य भाषण करने से मनुष्य का कल्याण उसी प्रकार नष्ट हो जाता है जैसे आँधी आने से बड़े-बड़े वृक्ष नष्ट हो जाते हैं। 'योगशास्त्र' का कहना है-
असत्यवचनात् वैरविषादाप्रत्ययावय:।
प्रादु:षन्ति न के दोषा: कुपथ्याद्व्याधयो यथा॥
अर्थात् कुपथ्य का सेवन करने से व्याधियाँ या रोग उत्पन्न होते हैं। असत्य बोलने से वैर-विषाद और अविश्वास आदि कौन से दोष हैं, जो उत्पन्न नहीं होते? अर्थात् सभी दोष मनुष्य में आ जाते हैं।
     'सत्यमेव जयते नानृतम्' कहकर हमारे ऋषियों ने हमें समझाया है कि अन्तत: सत्य की ही विजय होती है झूठ की नहीं। चाहे सात परदों में सत्य को छुपा लो फिर भी वह कस्तूरी की तरह अपनी सुगन्ध बिखेरता हुआ मुस्कुराता हुआ हमारे समक्ष प्रकट हो जाता है। इसके विपरीत असत्य रूपी हींग को कितना ही मुल्लमा चढ़ा कर रख लें वह अपनी दुर्गन्ध छोड़ ही देता है। इसमें तनिक भी सन्देह नहीं है कि चाशनी में डूबा हुआ असत्य भी एक दिन सबके समक्ष प्रकट हो ही जाता है।
         सत्य खरे सोने की तरह होता है, जिसकी चमक कभी फीकी नहीं पड़ती। असत्य को हम चाहे कितना भी गोल्ड प्लेटेड कर लें समय आने पर अपनी चमक खो देता है। तब फिर हम नकली वस्तुओं के पीछे क्यों भागें? खरा सोना ही खरीदकर अपनी पूँजी को बढ़ाने का प्रयत्न क्यों न किया जाएगा?
       असत्यवादी की जब पोल खुलती है, तब उसके सामने मृत्यु के समान कष्टदायी स्थितयाँ उत्पन्न हो जाती हैं। यह सबसे बड़ा अधर्म है, जो जगत के पिता परमेश्वर को बिल्कुल पसंद नहीं है। 'वृहन्नारद पुराण' का मत है-
     असत्यनिरतश्चैव ब्रह्म हा परिकीर्तित:।
अर्थात् असत्य में लगा हुआ व्यक्ति ब्रह्म का हत्यारा कहलाता है।
       वाल्मीकि रामायण में इस विषय में कहा गया है-
      असत्य भाषी व्यक्ति से लोग
     उसी प्रकार डरते हैं जैसे साँप से।
        अपनी सुविधा या आदत के कारण चाहे बच्चा हो या कोई बड़ा व्यक्ति, किसी के भी झूठ की सराहना नहीं की जा सकती। यह भी एक ऐसा रोग है, जिससे छुटकारा पाना कठिन होता है। जिसने इस शत्रु को अपने वश में कर लिया वह संयमी महान् बन जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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