मन बच्चों की तरह अड़ियल या हठी होता है, जब चाहे वह जिद करने लगता है और वहीं अड़कर बैठ जाता है। इससे इन्सान को परेशानी का सामना करना पड़ जाता है। मनुष्य कुछ करना चाहता है, पर यह उसे किसी विचार विशेष पर अटका देता है। उसे वहाँ से आगे बढ़ने ही नहीं देता। बच्चे की तरह इस मन को जिस काम के लिए मना किया जाता है, वह उतना ही उस काम को करना चाहता है।
इसलिए मन को मना मत करो। मन जो वह करना चाहता है, थोड़ी देर के लिए उसे मनमानी करने देनी चाहिए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि उसकी हर गलत बात पर सही होने की मोहर लगा दी जाए। उसकी सोच यदि सही है, तो उस पर विचार कर लेने में कोई हानि नहीं होती। इसके विपरीत यदि उसकी सोच गलत है, तो उसके लिए उसे तत्क्षण डपट देना चाहिए। उस समय अपने मन को उन कुविचारों से हटाकर, अन्यत्र सुविचारों की ओर प्रवृत्त करना चाहिए।
भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हुए, 'श्रीमद्भवद्गीता' में मन को साधने के उपाय बताए हैं -
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तू कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते।।
अर्थात् भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उपदेश देते हुए कहा - हे महाबाहो! निःसन्देह यह मन बहुत चञ्चल है और कठिनता से वश में होता है। हे कुन्तीपुत्र! उसे अभ्यास और वैराग्य के द्वारा अपने वश में किया जा सकता है।
मन को जीतना बहुत ही कठिन है। यह हर समय इधर-उधर भागता रहता है। हठयोग से यानी बलपूर्वक इसे साधा जा सकता है। हठयोग का अर्थ है कि मन बार-बार झाँसा देकर यहाँ वहाँ भागेगा। जैसे अड़ियल बच्चे की जिद पूरी न करते हुए, उसके माता-पिता उसे किसी भी तरह डाँट-डपट करके अथवा समझा-बुझाकर जबरदस्ती वापिस ले आते हैं। उसी प्रकार इस मन को सही मार्ग पर लौटाकर लाने के लिए उसके साथ भी बच्चे की तरह ही कठोर व्यवहार करना पड़ता है।
बार-बार इस मन से हार मानकर हथियार डाल देने से मनुष्य का विनाश होता है। मन हमेशा मनुष्य को पतन की ओर जाता है, उसे गलत कामों और विषय वासनाओं में लिप्त कर देता है। मन को यदि दबाने या मारने का प्रयास किया जाएगा, तो वह और अधिक उपद्रवी बन जाएगा। इसलिए उसे सुधारने की आवश्यकता होती है। जब मन स्वच्छ होता है तब उसमें भक्ति, निष्ठा और प्रेम आदि गुणों का उदय होता है।
उसे नियन्त्रित करना के लिए बार-बार ध्यान करने की आवश्यकता होती है। इससे मन शुद्ध व पवित्र होने लगता है। उसमें व्याप्त होने वाली सभी बुराइयों का धीरे-धीरे नाश होता है। यदि पानी गन्दा होता है या कंकर मारने से उसमें हलचल हो रही है, तो मनुष्य उसमें अपना प्रतिबिम्ब नहीं देख सकता। उसी तरह यदि मन विचलित है या उसमें हलचल हो रही है, तो उस उद्वेलित होते हुए जल में मनुष्य अपना वास्तविक स्वरूप नहीं देख सकता।
मन को साधने के लिए पुनः पुनः अभ्यास करना पड़ता है। अपने मार्ग से भटकने वाले इस मन को सीधे रास्ते पर लाने के लिए कठोर श्रम करना पड़ता है। यहाँ एक उदाहरण लेते हैं। धान की फसल को एक बार बोने के उपरान्त किसान उसे वहाँ से उखाड़कर अन्यत्र बोता है। उसी प्रकार इस चञ्चल मन को सांसारिक वासनाओं से उन्मुख करके आत्मोन्नति या ईश्वर को पाने के मार्ग की ओर प्रवृत्त करना पड़ता है। जो मनुष्य अपने मन को साध लेता है, वही सफलता के सोपानों पर चढ़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 10 अगस्त 2019
मन को साधना
गुरुवार, 8 अगस्त 2019
मेरा पिता महान
सन्तान की नजर में उसके पापा किसी फिल्म के हीरो की तरह होते हैं। उसे लगता है कि पापा उसके पास फटकने वाली सारी कठिनाइयों को पलक झपकते ही सुपरमैन की तरह दूर कर देंगे। उसके पिता उसे हर चिन्ता से, हर परेशानी से मुक्त करने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए वह अपने पिता पर पूरा भरोसा करता है। वास्तव में यह बात पूर्णरूपेण सत्य है। सन्तान को समाज में चारों ओर से सुरक्षित रखने का हर सम्भव प्रयास पिता करता है।
बच्चा जब चलना आरम्भ करता है, तो वह पिता की अँगुली पकड़कर घूमने जाता है। अपने पिता के कन्धे पर चढ़कर वह अपना कद को नापने का यत्न करता है। फिर प्रसन्न होकर वह सबसे कहता है कि वह अपने पिता से बड़ा हो गया है। इस बात को सुनकर पिता का सीना चौड़ा हो जाता है।
बच्चा जब चार वर्ष का हो जाता है, तो सबको यही बताता है कि उसके पापा बहुत महान् हैं। वह उसकी हर इच्छा को पूरा करते हैं। जब वह छह वर्ष का हो जाता है, तब वह सोचता है और गर्व करते हुए कहता है कि उसके पापा सब कुछ जानते व समझते हैं, उनके जैसा बुद्धिमान इस संसार में कोई ओर नहीं हो सकता।
दस वर्ष का होने पर बच्चा कहता है कि मेरे पापा बहुत अच्छे है, परन्तु पता नहीं उन्हें गुस्से बहुत आता है। बारह वर्ष का होने पर वह पिता के विषय में कहता है कि जब वह छोटा था, तब पाप उसके साथ अच्छा व्यवहार करते थे। अब हर समय कुछ-न-कुछ कहते रहते हैं।
सोलह वर्ष की युवावस्था होने पर बच्चे को अपने पिता से शिकायत होने लगती है कि उसके पापा समय के साथ नही चलते। उसे लगता है कि वास्तव में उसके पिता को कुछ भी ज्ञान ही नही है। यानी बच्चे की नजर में अब उसका पिता आधुनिक न होकर दकियानूसी (बैकवर्ड) हो जाता हैं।
अट्ठारह वर्ष के बच्चे को अपने पिता असामान्य से प्रतीत होते हैं। वे उसे दिन-प्रतिदिन चिड़चिड़े और अव्यवहारिक लगते होते हैं। युवावस्था की दहलीज पर कदम रखते हुए बीस वर्ष के बच्चे को अपने पापा के साथ रहना असहनीय लगने लगता है। उसे यह बात समझ में नहीं आती कि उसकी मम्मी उनके साथ कैसे रह पाती हैं? वह अपनी माँ को भी इस बात का उलाहना देने से नहीं चूकता।
पच्चीस वर्ष का बच्चा स्वयं को आवश्यकता से अधिक समझदार समझने लगता है। स्वयं को वह संसार का सबसे बुद्धिमान व्यक्ति समझता है। वह अपने आचार-व्यवहार को नहीं देखता, पर अपने पिता की शिकायत करता रहता है। उसे यही लगता है कि उसके पापा हर बात में उसका विरोध ही करते है, वे सदा उसकी गलतियाँ खोजते रहते हैं। न वे उसे समझ पाते हैं और न ही उन्हें दुनियादरी की समझ है। उन्हें तो बस हर समय उसे सबके सामने डाँटने के लिए बहाना चाहिए होता है।
अपने जीवन में सेटल हो चुका तीस वर्ष का वैवाहिक और बच्चे का पिता बन चुका युवा सोचता है कि उसके लिए अपने छोटे बेटे को जो किसी से नहीं डरता, उसे सम्भालना मुश्किल होता जा रहा है। वह बचपन में अपने पापा से कितना डरा करता था? उनकी बात सिर झुकाकर मान लिया करता था।
आयु बढ़ने के साथ उसे पिता के अनुशासन की समझ आने लगती है। तब चालीस वर्ष की अवस्था में वह सोचता है कि उसके पापा ने उसे बहुत अनुशासन से पाला था, इसीलिए वह इतना अनुशासित है। पर आजकल के बच्चों में तो अनुशासन और शिष्टाचार नाम की कोई बात ही नहीं है। वे दिन-प्रतिदिन उद्दण्ड बनते जा रहे है। उनकी नजर में छोटे-बड़े का कोई लिहाज ही नहीं रह गया है।
दुनिया की ऊँच-नीच को समझकर पचास वर्ष की आयु में उसे आश्चर्य होता है की उसके पापा ने इतनी कठिनाइयों का सामना करके भाई-बहनों को पाल-पोसकर बड़ा किया था। आजकल तो एक सन्तान को बड़ा करने में ही दम निकल जाता है।
पचपन वर्ष की आयु तक पहुँचते हुए उसे फिर अपने पापा पर गर्व होने लगता है। उसे लगता है कि उसके पिता बहुत दूरदर्शी थे। उन्होंने सभी भाई-बहनो के लिये व्यवस्थित आयोजन किए थे। वृद्धावस्था में भी उनका जीवन संयमित है। जब वह स्वयं साठ वर्ष यानी रिटायरमेन्ट की आयु में आता है, तब उसे सचमुच लगता है कि उसके पापा बहुत महान् थे। जब तक जीवित रहे, तब तक उन्होंने घर-परिवार में सबका पूरा ध्यान रखा। किसी को भी कभी शिकायत का अवसर नहीं दिया। पर तब यह सुनने के लिए जब उसके पिता जीवित नहीं रहते। वे परलोक गमन कर चुके होते हैं।
सच्चाई यह है कि अपने पिता को वास्तव में पूरी तरह समझने में बच्चों को सालों लग जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 7 अगस्त 2019
मनुष्य का सच्चा साथी
मनुष्य का सच्चा साथी इस संसार में कौन है? यह प्रश्न किसी मनुष्य के मन में उठना स्वाभाविक है। इस प्रश्न का उत्तर चौंकाने वाला हो सकता है। हम कह सकते हैं कि मनुष्य का सच्चा साथी उसके अपने माता, पिता, पति या पत्नी, बेटा या बेटी, बन्धु अथवा बान्धव नहीं होते, अपितु उसका अपना यह शरीर होता है। यह शरीर जीव को ईश्वर की ओर से उपहार के रूप में मिलता है।
इस शरीर को मनीषी एक रथ की तरह मानते हैं। वह आत्मा रूपी यात्री को उसके गन्तव्य मोक्ष के पथ पर ले जाता है। एक बार जब यह शरीर काम करना बन्द कर देता है यानी अस्वस्थ हो जाता है, उस समय कोई भी उसका साथी नहीं बन सकता। जन्म से मृत्युपर्यन्त यह शरीर मनुष्य का साथ निभाता है। इसलिए इसका ध्यान रखना, इसे स्वस्थ रखना मनुष्य का दायित्व बनता है।
मनुष्य जितनी तन्मयता से इस शरीर की देखभाल करता है, उतने ही लम्बे समय तक यह उसका साथ निभाता है। इसे स्वस्थ रखने के लिए मनुष्य को क्या खाना चाहिए क्या नहीं? स्वस्थ रहने के लिए मनुष्य को क्या करना चाहिए? मनुष्य अपने मन में उठने वाले तनाव के वेग को किस प्रकार वश में करता है? वह सारा दिन काम ही करता रहता है या कभी आराम भी करता है?
यह शरीर जैसा होगा यानी स्वस्थ रहेगा या अस्वस्थ रहेगा, उसी के अनुसार वह उत्साहपूर्वक कार्य करता है अथवा कमजोर होकर अपने कार्य करने में असमर्थ हो जाता है। स्मरण रखने वाली बात यह है कि यह शरीर जीव का एकमात्र स्थायी पता है। मनुष्य का शरीर उसकी अपनी निजी सम्पत्ति होता है, इसका बटवारा वह किसी के साथ नही कर सकता। इसलिए अपने इस शरीर की सार-सम्हाल करना केवल उसी का अपना दायित्व होता है।
मनुष्य को सदा ही चुस्त और दुरुस्त रहने का प्रयास करना चाहिए। अपना ख्याल मनुष्य को स्वयं ही रखना पड़ता है। लक्ष्मी कभी स्थायी होकर नहीं रहती। पैसा आता है और चला जाता है। इसी प्रकार मनुष्य के रिश्तेदार और दोस्त भी स्थायी नही होते। वे जीवन में आते हैं और अपना हित साधकर चले जाते है। इस बात को सदा ही स्मरण रखना चाहिए कि स्वयं के अलावा कोई भी हमारे इस भौतिक शरीर की सहायता नहीं कर सकता।
शरीर के सभी अंग ठीक से कम करते रहें, इसका खास तौर पर ध्यान रखना चाहिए। फेफड़े सुचारू रूप से कार्य करें, इसके लिए नित्य प्राणायाम करना चाहिए, धूम्रपान आदि कुव्यसनों का त्याग कर देना चाहिए। इस शरीर को स्वस्थ रखने के लिए योग-आसन करने चाहिए। अपने दिल की धड़कनों की गति को बनाए रखने के लिए प्रातःकाल और सायंकाल सैर करनी चाहिए।
अपनी आँतों के सही क्रियान्वयन के लिए मनुष्य को सदा घर का बना हुआ सात्विक व सुपाच्य भोजन करना चाहिए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि घर के बाहर खाना नहीं खाना चाहिए। जंक फूड, अधिक तला हुआ गरिष्ठ, बासी अथवा खराब भोजन खाने से परहेज करना चाहिए। उसकी किडनियाँ उसे धोखा न दे सकें, इसलिए दिनभर में बहुत सारा पानी पीना चाहिए।
आत्मोन्नति के लिए मनुष्य को ईश्वर का नियमपूर्वक निरन्तर ध्यान करते रहना चाहिए। इससे मनुष्य को आत्मिक बल मिलता है। अपने मन को साधने का सदा प्रयास करते रहना चाहिए। उसके लिए यथासम्भव अच्छे और सकारात्मक विचार ही अपने मन में लाने चाहिए। नकारात्मक विचार यदि मन पर हावी होने लगें, तो उन्हें बिना समय गंवाए उसी ही पल झटक देना चाहिए।
इस दुनिया में सफलतापूर्वक अपना जीवन व्यतीत करने के लिए यथासम्भव सद् कर्म करने चाहिए। इन कर्मों को करने से मनुष्य का लोक और परलोक दोनों ही सुधर जाते है। इस सबसे पहले मनुष्य को अपने शरीर के साथ सच्ची मित्रता निभानी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 6 अगस्त 2019
बेटियों की पूजा
बेटी का जन्म जब होता है, तो लोग 'लक्ष्मी घर में आई है' कहकर घर के सदस्यों को बधाई देते हैं। बहुत से पिता अपने घर में बेटी की कामना करते हैं। हमारी भारतीय संस्कृति में ही ऐसा होता है कि लड़की या कन्या को देवी मानकर उसकी पूजा करने का विधान है। भारतीय लोग लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती आदि देवियों के रूप में बेटियों की उपासना करते हैं। उनके साथ प्रेम का व्यवहार करते है।
प्रतिवर्ष हर छह मास के पश्चात आने वाले नवरात्रों में कन्याओं को पूजा जाता है और भोज कराया जाता है। आठवें दिन विशेष पूजा होती है। घर में कन्याओं को बुलाकर उनके चरण धोकर, उनकी पूजा करके लोग अपनी श्रद्धा से उन्हें धन व वस्त्र उपहार में देते हैं और भोजन खिलाते हैं। गुजरात में शारदीय नवरात्रों के नौ दिनों में विशेष रूप से रात के समय उत्सव मनाया जाता है। इसमें लड़कियाँ बढ़-चढ़कर भाग लेती है।
किसी भी शुभ कार्य को करने से पूर्व कन्याओं की पूजा करके, उन्हें उपहार दिया जाता है। किसी धार्मिक अनुष्ठान को विघ्नरहित सम्पन्न करने के लिए भी विधानपूर्वक कन्यापूजन किया जाता है। इससे भी बढ़कर धार्मिक यात्रा से लौटकर आने पर भी विधिवत कन्यापूजन किया जाता है। ताकि जिस उद्देश्य से उन्होंने धर्मिक अनुष्ठान अथवा उनकी धार्मिक यात्रा की है, वह फलदायी हो। ईश्वर अपने भक्त पर प्रसन्न हो जाए और उसकी मनोकामना पूर्ण कर दे।
कहने का तात्पर्य यह है कि बेटियों को इतना मान-सम्मान देने की परम्परा हमारे देश भारत में ही है। इसीलिए हमारे शास्त्रों के अनुसार उसे पैर से छूना वर्जित माना गया है। हमारे बड़े-बुजुर्गों का पैर यदि गलती से भी किसी बेटी को छू जाए, तो माथे पर हाथ रखकर, ईश्वर से क्षमा याचना किया करते थे। इसी कड़ी में उसके लिए अपमान जनक शब्दों का प्रयोग भी नहीं करने के लिए कहा जाता है।
बेटियाँ बहुत कोमल हृदय होती हैं। उनकी परवरिश फूलों की तरह की जाती है। माता-पिता का कठोर व्यवहार उस नाजुक-सी बिटिया का हृदय छलनी कर देता है। इसलिए अपनी बेटी के साथ माता-पिता को प्रेम व कोमलता से पेश आना चाहिए। उसे सदा यह अनुभव करवाना चाहिए कि वह अपने माता-पिता पर भार नहीं ह, अपितु उनके कलेजे का टुकड़ा है।
बेटी को यह अहसास भी करना आवश्यक है कि वह घर का एक महत्त्वपूर्ण सदस्य है, जैसे अन्य सदस्य हैं। उसके बिना घर बहुत सूना हो जाता है। घर के सभी सदस्य उसके बिना उदास हो जाते हैं। उसे सदा प्रोत्साहित करते रहना चाहिए कि उनकी प्यारी बेटी किसी से भी कम नहीं है। उसमें इतनी सामर्थ्य है कि वह किसी तरह का कोई भी कार्य सफलतापूर्वक कर सकती है।
बड़े दुर्भाग्य की बात है कि कुछ दुष्ट प्रकृति के लोग, इन बेटियों पर कुदृष्टि डालते हैं। उनके साथ कुकर्म तक करने से बाज नहीं आते। ऐसे लोगों को कठोर से कठोर दण्ड देना चाहिए, ताकि कोई भी सिरफिरा दुर्जन इस प्रकार के दुष्कर्म करने का दुस्साहस न कर सके। हालॉंकि इन लोगों के लिए कानून में सजा का प्रावधान किया है। उन्हें शीघ्र ही सारे जीवन के लिए सलाखों के पीछे फेंक देना चाहिए।
माता-पिता को चाहिए कि वे अपनी बेटी को इन दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों के बारे में बताकर सावधान रहने के उपाय बताएँ। हो सके तो उन्हें सुरक्षित रहने के लिए कोई ट्रेंनिग भी करवा दें। इस प्रकार बेटी सुरक्षित रहेगी, तो माता-पिता भी निश्चिन्त हो सकते हैं। अपनी बेटी को उच्च शिक्षा दिलाकर उसे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए प्रोत्साहित करके अपने दायित्व का निर्वहण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 3 अगस्त 2019
जीवन की वास्तविकता
जीवन में ऊँचाई पर चढ़ने या सफल होने के लिए प्रत्येक मनुष्य का अनुशासन में रहना अनिवार्य होता है। उसे अपने घर-परिवार, माता-पिता, गुरुजनों और समाज के साथ सदा सामञ्जस्य बनाकर चलना चाहिए। मनुष्य की यही समझदारी सामाजिकता कहलाती है। ऐसे मनुष्य को कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना पड़ता क्योकि उसके चारों ओर उसे अपने ही दिखाई देते हैं।
अपनों के बिना वह निपट अकेला हो जाता है और अधूरा रह जाता है। सोचने वाली बात यह है कि जब वह सबसे कटकर रहने लगेगा, तो अपनी खुशियाँ किसी के साथ साझा नहीं कर सकेगा। उस समय उसकी सफलता की खुशी एक तरह से बेमानी हो जाती है। तब उसे अपनी गलती का अहसास होता है कि उसने बड़ी भूल कर दी है। उस समय तो कुछ भी नहीं किया जा सकता।
यहाँ उस घटना का जिक्र करना चाहती हूँ, जिसे वाट्सअप पर बिना किसी के नाम के पढ़ा था। कुछ संशोधन के साथ आपसे साझा कर रही हूँ।
एक बार बेटे ने अपने पिता से पूछा, "पापा, ये सफल जीवन' क्या होता है?"
पिता, बेटे को पतंग उड़ाने के लिए ले गए। बेटा पिता को ध्यान से पतंग उड़ाते हुए देख रहा था।
थोड़ी देर बाद बेटा बोला, "पापा, धागे में बँधे होने के कारण यह पतंग अपनी आजादी से और ऊपर की ओर नहीं जा पा रही है। क्या हम इस धागे को तोड़ दें? तब यह और ऊपर चली जाएगी।"
बेटे की बात सुनकर पिता ने धागे को तोड़ दिया। पतंग थोड़ा-सा और ऊपर उड़ी। उसके बाद वह लहरा कर नीचे आने लगी और दूर किसी अनजान जगह पर जा कर गिर गई।
तब पिता ने बेटे को जीवन का दर्शन समझाया, "बेटा, जिन्दगी में जब हम मनुष्य ऊँचाई पर होते हैं, तब हमें अक्सर लगता की कुछ चीजें जिनसे हम बँधे हुए हैं, वे हमें और ऊपर की ओर जाने में बाधा बन रही हैं।"
पिता के समझाने का अर्थ यही था कि वास्तव में मनुष्य को लगता है कि अनुशासन, घर-परिवार, माता-पिता, गुरु और समाज से उसे आजाद होना चाहिए। वास्तव में यही वे धागे होते हैं, जो उसे ऊँचाई पर बनाकर रखते हैं। इन धागों के बिना वह एक बार तो ऊपर चला जाएगा, परन्तु बाद में उसका वही हश्र होगा, जो धागे के कट जाने के बाद किसी पतंग का होता है।
जीवन में मनुष्य यदि ऊँचाइयों पर बने रहना चाहता है, तो उसे कभी भी इन धागों से नहीं रिश्ता तोड़ना चाहिए। इन्हें मजबूती से थामकर रखना चाहिए। उसे सदा यही प्रयास करना चाहिए कि इन धागों में कभी गलती से भी गाँठ न पड़ने पाए। मनुष्य कितने भी ऊँचे पद पर क्यों न पहुँच जाए, अपनों के साथ के बिना वह कुछ भी कर सकता।
अपने बन्धुजनों के साथ जब तक वह रचा-बसा रहता है, तभी तक मनचाही उड़ान भर सकता है। एक बात सदा स्मरण रखनी चाहिए कि पक्षी की तरह कितनी भी उँची उड़ान मनुष्य भर ले, अन्तत: आना तो उसे जमीन पर ही होता है। इसलिए अपने मन में अहंकार को स्थान नहीं देना चाहिए। न ही उसे अपने अहं के कारण कभी इन सब सम्बन्धों की अवहेलना नहीं करनी चाहिए।
ये सभी उसके अपने प्रियजन उसे निरन्तर आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते रहते हैं। उनसे प्रोत्साहित होकर ही उसमें कुछ नया कर गुजरने का साहस आता है। जब वह कुछ नया कार्य कर लेता है, तो चारों उसकी वाहवाही होने लगती है। उसकी योग्यता की तूती बोलने लगती है। हर व्यक्ति उसके साथ अपना सम्बन्ध जोड़ने का प्रयास करने लगता है।
दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि वह समाज में साधारण से विशेष बन जाता है। जो मनुष्य जमीनी वास्तविकता को समझ लेता है, वह कभी अपना आधार नहीं त्याग सकता। आसमान में कितनी लम्बी उड़ान भरने के बाद भी वह अपने पैर धरती पर जमकर रखता है। यही जीवन की सच्चाई है। मनुष्य इसे जितनी जल्दी समझ जाए, उतना ही उसका लाभ होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 2 अगस्त 2019
मर्यादा केवल बेटी के लिए
इक्कीसवीं सदी में हम लोग जी रहे हैं। जहाँ विज्ञान ने इतनी उन्नति कर ली है, हम मंगल ग्रह तक पहुँच गए हैं। आज की दुनिया सिमटकर हमारी मुट्ठी में आ गई है। ऐसे समय में भी सारी नैतिकता और सारी मर्यादाएँ केवल बेटी के हिस्से में ही क्यों आती हैं? बेटे को इस सब की शिक्षा क्यों नहीं दी जाती? इस विषय पर गहनता से विचार करना हमारे लिए बहुत आवश्यक हो जाता है।
जब बेटी किसी मित्र की जन्मदिन की पार्टी के लिए या किसी और उद्देश्य के लिए घर से बाहर निकलती हैं, तो उसके माता-पिता प्रयास यही करते हैं कि वह अकेली न जाए। वे उसे उसकी सहेलियों के साथ भी घर से बाहर नहीं जाने देना चाहते। उसे पिता या भाई छोड़कर आएँ। यदि वे न जा सकें तो माँ ही उसके साथ चली जाए, वहाँ प्रतीक्षा कर और उसे वापिस लेकर आए।
लड़कियों को ही सदा ये सब हिदायतें दी जाती हैं। उन्हें क्या करना चाहिए? कैसे रहना चाहिए? कैसे बोलना चाहिए? कैसे चलना चाहिए? कैसे उठना चाहिए? कैसे बैठना चाहिए? कहाँ जाना चाहिए? कहाँ नहीं जाना चाहिए? कैसी ड्रेस पहननी चाहिए? उसे घर पर कब तक वापिस लौट आना चाहिए? किन लोगों से मित्रता रखनी चाहिए? किन लोगों का बायकॉट करना चाहिए?
बेटी की शादी हो जाने पर भी उस पर कई बन्धनों में रखने का प्रयास किया जाता है। शादी के बाद नित्य ही सिन्दूर लगाना, मंगलसूत्र पहनना और बिछिया पहनना आवश्यक हो जाते हैं। उस पर प्रातः जल्दी उठना पड़ता है। माँ-पापा की सर्वगुण सम्पन्न लाडली बेटी ससुराल में आने के बाद महत्त्वहीन हो जाती है। घर में नौकर होने के बाद भी काम करना उसकी मजबूरी बन जाती है।
मुझे आज तक यह समझ नहीं आया कि विवाह के उपरान्त उसे पति व सन्तान की दीर्घायु के लिए उसे इच्छा न रहते हुए भी व्रत रखने पड़ते हैं। ये सब धार्मिक कृत्य केवल उसकी पसन्द निर्भर होने चाहिए, उसके साथ किसी तरह की कोई भी जोर जबरदस्ती नही होनी चाहिए। जो लड़की इन सब रूढ़ियों को न माने उसे घर-परिवार में रहते हुए तरह तरह के अपमान और विरोध का सामना करना पड़ता है।
आज लड़कियाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करके उच्च पदों पर आसीन हो रही हैं। उनके पास इन सबके विषय में सोचने के लिए समय ही नहीं है और न ही वे इन पचड़ों में पड़ना चाहती हैं। कोई कुछ भी कहता रहे वे मस्त रहती हैं। किसी को उनका यह आचरण अच्छा लगे या नहीं, उन्हें इन सबसे कुछ भी लेना देना नहीं है। उनका यह रवैया हो सकता है कुछ लोगों को रुचिकर न लगे, पर वास्तव में यही उचित है।
चाहे घर हो, बाहर हो अथवा चाहे विद्यालय, सर्वत्र लड़कियों को ही नैतिक शिक्षा (Moral education) दी जाती है। लड़कियाँ पढ़-लिखकर समझदार बन रही है। उन्हें लड़के और लड़की के बीच हो रहे भेदभाव पर वितृष्णा होती हैं। वे अन्याय को सहन नहीं कर पातीं। इसलिए वे मुखर होकर इसका विरोध करती हैं और अपनी बात को तर्कपूर्वक रखने का साहस करती हैं।
माता-पिता यदि अपने लड़कों या बेटों को भी इस नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ा देते, तो आज हमारे इस समाज से हत्या, बलात्कार, एसिड अटैक जैसी कई बुराइयों का अन्त हो सकता था। उन्हें अपने बेटों पर भी प्रतिबन्ध लगाने चाहिए। उनके बेटों को भी मर्यादा में रहने की बहुत जरूरत है। इस विषय पर ध्यान देने और सजग रहने की महती आवश्यकता है। इस तरह अपनी बेटियों पर माता-पिता को इतने अधिक प्रतिबन्ध लगाने की आवश्यकता ही नहीं रहती।
चन्द्र प्रभा सूद
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