सोमवार, 7 अक्टूबर 2019

आपसी कलह

घर-परिवार की आपसी कलह परिवार का समूल नाश कर देती है। घर टूटकर बिखर जाता है। परिवारी जन एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। चाहे बाद में सभी सदस्यों को अफसोस ही क्यों न हो। पर तीर कमान से निकल जाए तो वापिस नहीं आता। इसी तरह से कार्यालय आदि में बॉस और कर्मचारियों की परस्पर होने वाली तू तू मैं मैं भी वहाँ विनाश का कारण बन जाती है। आपसी कलह से कभी भी किसी का भला नहीं होता। कोई भी समस्या हो, मिल-बैठकर उसका हल निकालना अच्छा होता है।
           कलह चाहे आम परिवार की हो या राजघराने की हो, दोनों का हश्र एक ही होता है, यानी अलगाव, टूटन या बिखराव। आम परिवार में क्लेश का प्रमुख कारण धन का अभाव माना जाता है। परन्तु राजघरानों में या धनी परिवारों में धन कोई कारण नहीं होता। वहाँ सत्ता की लड़ाई प्रमुख कारण होती है। इसी कारण वहाँ दुश्मनी जन्म लेगी है। सभी सदस्य एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे रहते हैं, इस कारण वे कठोर वचनों का आदान-प्रदान करते रहते हैं।
            मित्रता भी परस्पर कटु बोलने से टूट जाती है। मित्र बिना कुछ सोचे-समझे एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने लग जाते हैं। लोग तमाशा देखते हैं और पीठ पीछे मजाक बनाते हैं। कोई व्यक्ति जब कुमार्ग पर चलने लगता है, तो वह सबकी नजरों से गिर जाता है। लोग उसका तिरस्कार करने लगते हैं। क्रोध में आकर धीरे-धीरे वह अलग-थलग पड़ जाता है। तब उस दुष्प्रवृत्ति वाले व्यक्ति का साथी बनने से लोग कतराने लगते हैं।
            'पञ्चतन्त्रम्' ग्रन्थ के इस श्लोक में पण्डित विष्णु शर्मा ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में बताया है-
       कलहान्तानि हर्म्याणि
              कुवाक्यान्तं च सौहृदम् ।
        कुराजान्तानि राष्ट्राणि
                कुकर्मान्तं  यशो नृणाम् ॥
अर्थात् आपसी कलह और वैमनस्य के कारण परिवार  नष्ट  हो जाते हैं, भले ही वह राजघराना क्यों न हो। कटु वचन कहने से दोस्ती समाप्त हो जाती है। जब कोई व्यक्ति बुरे कर्म करने लगता है तो वह लोगों में अपना मान-सम्मान खो देता है । यदि राजा (शासक) अयोग्य और दुष्ट प्रवृत्ति का हो तो राष्ट्र का नाश हो जाता है।
          इस श्लोक का सार यही है कि आपसी कलह और वैमनस्य सदा विनाश को जन्म देते हैं। कटु शब्दों का प्रयोग मित्रता का शत्रु होता है। दुष्कर्म करने वाला व्यक्ति समाज में अपने मान-सम्मान को नष्ट कर देता है। अयोग्य शासक यदि दुर्भाग्य से किसी देश को मिल जाए तो वह उसे बर्बाद कर देता है।
           किसी देश में यदि अयोग्य राजा हो, तो वह स्वयं को योग्य सिद्ध करने के लिए उठा-पटक करता रहता है। इसी कारण वह समाज में हँसी का पात्र बनता है। जो भी व्यक्ति उसकी हाँ में हाँ मिलता है, वही उसका प्रिय बन जाता है। वह अपने स्वार्थों की पूर्ति में व्यस्त रहता है, उसे देश की भलाई से कोई लेना देना नहीं होता। ऐसे देश की प्रजा भी लूट-खसौट करने लगती है। इस तरह राजा यानी शासक और प्रजा मिलकर देश का अहित करने लगते हैं।
         ऐसे रणकता वाले देश पट पड़ौसी राज्य अपनी नजर गड़ाए रहते हैं। ऐसे अराजक देश को पड़ौसी राज्य सदा अपने अधीन करने की फिराक में लगे रहते हैं। इसलिए शासक यदि व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, लूट-खसौट करने वाला और प्रजा का हितचिन्तक न हो, तो उस शासक को जनता को एकजुट होकर सत्ता से शीघ्र उखाड़ फेंकना चाहिए। उसे सत्ता पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं होता।
           हर रिश्ते में धैर्य और सहृदयता की आवश्यकता होती है। उन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए प्रेमपूर्वक व्यवहार तथा समानता का व्यवहार करना चाहिए। सदा प्रयास यही करना चाहिए कि बिखराव की स्थिति न बनने पाए, उससे पहले ही आपस में मिल-बैठकर कोई हल निकल लिया जाए। इस तरह करने से कोई छोटा नहीं हो जाता, अपितु वह महान बन जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 6 अक्टूबर 2019

धन की उपादेयता

अर्थ यानि धन की हम सब के ही जीवन में बहुत उपादेयता है इसके बिना जीवन नरक के समान कष्टदायक हो जाता है। छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा कोई भी कार्य इसके बिना सम्भव नहीं हो पाता। इसको कमाने के जलिए बहुत यत्न करने पड़ते हैं। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहकर मनुष्य को अथक परिश्रम करना पड़ता है।
          जिस धन को कमाने के लिए हम अपना सारा सुख-चैन गंवा देते हैं वह कभी किसी का होकर नहीं रहता। कबीरदास जी कहते हैं- 
          माया महा ठगिनी हम जानी।
        कबीर जी के कहने का तात्पर्य है कि यह माया बहुत ही बड़ी ठग है और बहुत चंचल है। इसका कोई स्थायी निवास नहीं है। यह स्वेच्छा से कहीं भी चली जाती है। किसी की गुलाम बनकर भी नहीं रहती है। कोई भी व्यक्ति इसे अपनी तिजोरी में ताला लगाकर न रख सकता है और न ही रोक सकता है। न ही कोई मनुष्य यह दावा कर सकता है कि सात पुश्तों के लिए जो धन उसने जोड़-तोड़ करके जमा कर लिया है वह सुरक्षित रह पाएगा। यह सबको झाँसा देती रहती है। आज यह लक्ष्मी राजा के पास है, तो कल उसे कंगाल बनाते हुए रंक के पास चली जाएगी और उसे मालामाल कर देगी।
          धन की इन्हीं विशेषताओं को देख व समझकर चेतावनी देते हुए महान विचारक हमें समझा रहे हैं-
          पूत कपूत तो का धन संचै।
          पूत सपूत तो का धन संचै॥
इन पंक्तियों का अर्थ है यदि सन्तान योग्य होगी तो अपनी मेहनत से धन कमा लेगी। आपकी कमाई धन-सम्पत्ति को बढ़ा लेगी। इसलिए धन को कमाने के लिए मारामारी मत करो। अपनी ईमानदारी व सच्चाई के रास्ते पर चलते रहो। इसके विपरीत यदि सन्तान अयोग्य होगी या कपूत होगी तो खुद तो कमाएगी नहीं पर आपका कमाया धन व्यसनों में अवश्य बरबाद कर देगी। ऐसी स्थिति में आप नाजायज तरीकों से धन कमाने का विचार त्याग दो।
        धन के पीछे अपना सुख-चैन गंवाकर दिन-रात दीवानों की तरह मत भागो, यह साथ भी नहीं निभाएगा। धन जिस समय घर में आता है तो सुख और समृद्धि अपने साथ लेकर आता है। इसे दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पैसा बोलने लगता है।
        इसके विपरीत जब किसी के घर में धन जायज-नाजायज किसी भी तरीके से आता है तो अपने साथ बहुत सारे व्यसनों और बुराइयों को लेकर आता है। ये कुटेव उसके घर की जड़ों तक को हिला देते हैं। तब से उस व्यक्ति की बरबादी की कहानी आरम्भ हो जाती है।
          जैसी कमाई करोगे वैसा ही अन्न घर में आएगा। तभी मनीषी हमें समझाते हैं-  
       जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन।
सात्विक अन्न खाकर बच्चे सुसंस्कारी व आज्ञाकारी बनते हैं। ऐसे बच्चे माता-पिता, घर-परिवार व बन्धु-बान्धवों सबकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं।
        दूसरी ओर पापकर्म से कमाए अन्न को खाकर बच्चे संस्कारवान नहीं बनते बल्कि उद्दण्ड होते हैं। वे नैतिक-अनैतिक सभी प्रकार के ही कार्यों में संलिप्त रहते हैं। इन बच्चों से कदापि शुभ की कामना नहीं की जा सकती।
        धन हमारी सभी आवश्यकताओं का पूरक है, पर सब कुछ नहीं है। इससे हम भौतिक सुख-साधन एकत्र कर सकते हैं पर स्वास्थ्य, प्रेम, जीवन, आज्ञाकारी सन्तान व रिश्ते-नाते नहीं खरीद सकते।
          अपने बच्चों को संस्कारी व योग्य बनाइए ताकि अपनी आवश्यकताओं को वे स्वयं के बूते पर पूर्ण कर सकें। उन्हें आपके पैसे की जरूरत ही न हो। अन्यथा आप कितनी भी समृद्धि उनके लिए छोड़कर जाइए वे यही कहेंगे कि हमारे माता-पिता ने हमारे लिए किया क्या है?
        अपने जीवन में सदाचरण से कमाकर अपनी सारी इच्छाओं को पूर्ण कीजिए। परिवार का भरण-पोषण और अतिथि सत्कार करके मानसिक सुख व शान्ति प्राप्त करने का यत्न कीजिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 5 अक्टूबर 2019

जीवन साथी का चुनाव

हर युवा अपने जीवन साथी को लेकर एक सपना बुनता है। यह निश्चित है कि वह अपने जीवन साथी में कुछ विशेष गुणों को देखना चाहता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है। वह अपने साथी को अपने ही सोचे हुए उन मापदण्डों पर खरा उतरता हुआ देखना चाहता है।
        आज युवाओं में प्रेम के मायने बदल गए हैं। भौतिक युग की चकाचौंध ने उनकी आँखों पर पैसे की पट्टी बाँध दी है। पैसे के पीछे भागते हुए वे किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। आपसी विश्वास और वचनबद्धता टूटती हुई दिखाई देती है। सभी तो नहीं परन्तु शायद कुछ युवा मौज मस्ती को ही सब कुछ मानने लगे हैं। इसीलिए उनमें प्रायः वैमनस्य की स्थितियाँ बन जाती हैं।
          युवाओं को अपने भावी जीवन के प्रति सजग रहना चाहिए। उन्हें यथासम्भव ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जो भविष्य में उनके लिए मुसीबत बन जाए। उनका नया गृहस्थ जीवन सुखदायी होने के बजाय कष्टदायी बन जाए। फिर उस समय चिड़िया हाथ से निकल जाने के बाद पश्चाताप करने जैसी स्थिति बन जाती है। तब युवा से न उगलते बनता है और न ही निगलते।
          युवाओं को अपने जीवन साथी का चुनाव करते समय सबसे पहले उसके गुण, कर्म व स्वभाव को परखना चाहिए। उसके चरित्र अथवा चाल-चलन को महत्त्व देना चाहिए। जो व्यक्ति अपने घर-परिवार में मिलजुल कर नहीं रह सकता वह किसी के साथ भी सामञ्जस्य नहीं बिठा सकता। उसकी संगति कैसी है? वह किन लोगों के साथ उठता-बैठता है? यह जानना भी बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। यदि उसकी संगति अच्छे लोगों से नहीं होगी तब वह अपनी कमाई तो बरबाद करेगा ही, साथ ही माता-पिता की मेहनत से कमाई गई धन-संपत्ति को नष्ट करने में देर नहीं लगाएगा। घर के माहौल को देखते ही सयाने लोग बहुत कुछ समझ जाते हैं। इसलिए उनकी राय को महत्त्व देना चाहिए।
          फिल्मों व टीवी की चकाचौंध को देखकर आजकल कुछ नवयुवक फिल्मी हीरोइनों जैसी पत्नी चाहते हैं और नवयुवतियाँ फिल्मी हीरो जैसे पति चाहती हैं। वे इस बात को भूल जाते हैं कि फिल्म वाले सिर्फ़ अपने किरदार का फिल्मी तरीके से पर्दे पर अभिनय करते हैं। असल जीवन में वे भी आम लोगों की ही तरह अपने घर-परिवार के लिए समर्पित होते हैं।
          दो युवाओं को परस्पर संबंध जोड़ते समय यह बात अवश्य सोचनी चाहिए कि उस घर में पैसा यदि अपनी अपेक्षा से थोड़ा कम भी हो परन्तु परिवारी जन आपस में सामञ्जस्य पूर्वक रहते हैं, वे प्यार को ही अपनी पूँजी मानते हैं तो ऐसे घर में किया गया बच्चों का संबंध हमेशा सुखदायक होता है। ऐसे परिवारों में प्रायः तालमेल बिठाने में अधिक दिक्कतें नहीं आतीं।
        आज का युवावर्ग बहुत समझदार है वह अपना भला-बुरा अच्छी तरह जानता है। उसे बस जरा-सी सूझबूझ से सम्हालने की आवश्यकता है। यदि सकारात्मक राह  उसे दिखाई जाए तो वह निश्चित ही सही फैसले लेगा। अपने जीवन में वह कभी पीछे मुड़कर देखने की स्थिति में नहीं भटकेगा। स्वयं तो वह सही राह पर चलेगा ही और देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनकर वह आने वाली पीढ़ी का भी सही मार्गदर्शक बनेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

सुन्दर प्रकृति

ईश्वर निर्मित यह सम्पूर्ण प्रकृति बहुत ही सुन्दर है। इसका सौन्दर्य मनमोहक है। इसके किसी भी अंश पर यदि ध्यान दिया जाए तो उसकी सुन्दरता में मन खो जाना चाहता है। इसे जितना भी गहराई से हम निहारते हैं वह उतना ही मन में गहरे उतरती जाती है।
          एक-से-एक सुन्दर पक्षी हमें दिखाई देते हैं। उनको देखते ही रह जाने का मन करता है। ऊषाकाल में होने वाली उनकी चहचहाहट इस सृष्टि में सदा नवजीवन का संचार करती है। पक्षियों का कलरव जीवनदायनी शक्ति होता है। मोर का नृत्य, तोते की वाचालता, कोयल का मधुर गान किसी को भी प्रभावित कर लेते हैं। इनका मासूम सौन्दर्य तब इनका शत्रु बन जाता है जब हम मनुष्य अपने मनोरंजन के लिए इन्हें पिंजरों में कैद कर लेते हैं।
          इसी प्रकार हम पशुओं के सौंदर्य के विषय में भी कह सकते हैं। हिरण आदि पशु अपने अबोधपन के कारण बहुत ही मोहक लगते हैं। पशुजगत हमारे लिए बहुत ही उपयोगी है। इन्हें हम पालतू बनाकर या कैद इनसे हम विभिन्न प्रकार के कार्यों को कराते हैं।
          समुद्र व समुद्री जीव यानि जलचर सदा से ही हमारे आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। इन्हें भी हम सजावट का सामान समझते हैं। हद तो हम मनुष्य तब पार करते हैं जब इन मासूम सुन्दर जीव-जन्तुओं को मारकर खा जाते हैं।
          सुन्दर और रंग-बिरंगी, मनभावन तितलियाँ इधर-उधर उड़ती हुई बच्चों के साथ-साथ बड़ों का ध्यान भी आकर्षित करती हैं। इन्हें भी पकड़कर बच्चे मनोरंजन करते हैं। विभिन्न प्रकार के सुन्दर, मोहक व सुगन्धित फूल पूरे वातावरण को महका देते हैं। इन्हें तोड़कर हम अपने स्वार्थों की पूर्ति करते है।
        इसी प्रकार नदियाँ, झरने, जल प्रपात व समुद्र भी हमें पल-पल पुकारते हैं। इनका सुन्दर रूप हर किसी को मोह लेता है। लोग इन्हें निहारने के लिए दूर-दूर से अपना समय व पैसा व्यय करके जाते हैं।
      पर्वतों की सुन्दरता का बखान क्या किया जाए? इनके सौन्दर्य प्रेमी न जाने कितने कष्ट उठाकर इन्हें निहारने आते हैं। इनके आकर्षण में बंधे हुए लोग स्वयं को तरोताजा बनाने के लिए अपने साथियों या परिवार के साथ आते हैं। कामकाज की आपाधापी और शहरों के शोर-शराबे से दूर इन शान्त पर्वतों की गोद में समय व्यतीत करके ताजगी के साथ आत्मसंतोष भी मिलता है।
        यदि पहाड़ों की चोटियाँ बर्फ से ढकी हों, रास्तों पर बर्फ का साम्राज्य हो, पेड़ों पर लटकती सफेद बर्फ हो और चारों ओर बर्फ की सफेद चादर बिछी हो तो उस दृश्य के क्या कहने? यह श्वेतिमा मन को आनन्द से सराबोर कर देती है।
          ग्रह-नक्षत्र, चाँद-सितारे हमेशा से ही मनुष्यों के लिए रहस्य रहे हैं। इन सबकी गाथाएँ हम समय--समय पर सुनते व पढ़ते रहते हैं।
          कहने का तात्पर्य है कि इस सृष्टि की प्रत्येक रचना को हम निहारने लगें और उसमें डूबते चले जाएँ तो उस मालिक की प्रशंसा करने की इच्छा होती है। उसने चारों ओर इतनी अधिक सुन्दरता भर दी है जिसकी हम कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते। उस प्रभु की सृष्टि में कोई कमी निकालने की सामर्थ्य हम इन्सानों में तो बिल्कुल नहीं है।
          ईश्वर ने इस सृष्टि को बहुत सुन्दर बनाया है और वह चाहता है कि हम अपने व्यवहार अथवा अपने दुष्कृत्यों से इसे दूषित न करें। हम उसे उसी ही तरह सम्भाल कर रखें, जैसा कि उसने इसे बनाया है।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 3 अक्टूबर 2019

कर्मफल से बचना

कर्म किए बिना मनुष्य एक पल भी खाली नहीं बैठ सकता। कभी वह शुभकर्म करता है, तो कभी अनजाने में अशुभ कर्म कर बैठता है। इसी जन्म के किए कुछ कर्मों का फल वह भोगता है, तो कुछ पूर्वजन्मों के बचे हुए कर्मों का फल उसे भोगना पड़ता है। इन कर्मों का फल उसे भोगना पड़ता है, चाहे वह चाहे अथवा न चाहे। इस कर्मफल को भोगने के लिए उसकी मर्जी नहीं पूछी जाती। अनिवार्य रूप से उसे इन्हें भोगना ही पड़ता है।
          जिन्दगी का केलकुलेशन चाहे कितनी बार क्यों न कर लिया जाए, परन्तु सुख-दुख का अकाऊँट कभी भी समझ में ही नहीं आ सकता। जब टोटल यानी जमा किया जाए तब समझ में आता है कि इस जीवन में इन कृत कर्मों के सिवा और कुछ भी बैलेंस (शेष) नहीं बचता। यही सबसे बड़ा अटल सत्य है, इसे संसार के हर जीव को स्वीकारना ही पड़ता है।
          'महाभारत' में वेदव्यास जी ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में इस कर्मफल के विधान के विषय में लिखा है-
अचोद्यमानानि यथा, पुष्पाणि फलानि च।
स्वं कालं नातिवर्तन्ते, तथा कर्म पुराकृतम्।।
अर्थात् जैसे फूल और फल बिना किसी की प्रेरणा से स्वतः समय पर प्रकट हो जाते हैं और समय का अतिक्रमण नहीं करते, उसी प्रकार पूर्वजन्मां में किए गए कर्म भी यथासमय अपना शुभाशुभ फल देते हैं।अर्थात् अपने कर्मों का फल अनिवार्य रूप से प्राप्त होता है, संसार में उससे कोई बच नहीं सकता।
          इस श्लोक का सार यही है कि इस संसार मे हर कार्य अपने समय पर होता है। वृक्ष पर फल-फूल अपने समय पर लगते हैं। उन्हें कोई निर्देश नहीं देता, उसी प्रकार मनुष्य के शुभाशुभ कर्मों का फल भी उसे उचित समय पर मिल जाता है। उसकी चीख-पुकार या उसके रोने-धोने का कोई असर उस मालिक पर नहीं होता। कर्म करते समय तो मनुष्य बहुत प्रसन्न होता है, पर उसका फल भोगते समय वह न्याय की माँग करने लगता है। जिसका कोई भी लाभ नहीं होता।
         बच्चा चाहे विद्यालय में गलती कर या चाहे घर में करे, उसे अध्यापकों के द्वारा स्कूल में और माता-पिता के द्वारा घर में सजा मिलती है। यदि वह अच्छा काम करता है, तो विद्यालय और घर दोनों स्थानों पर उसकी प्रशंसा होती है। उसी प्रकार मनुष्य को भी गलती करने पर दुख और कष्ट के रूप में सजा मिलती है। अच्छा काम करने पा सुखों के रूप में उसे शाबाशी मिलती है।
           कर्म का सिद्धान्त यही है कि मनुष्य को ईश्वर की ओर से सुख और दुख उसके शुभाशुभ कर्मों के अनुसार ही मिलते हैं। यदि शुभकर्मों की अधिकता होती है, तो मनुष्य को अच्छा घर-परिवार, भाई-बन्धु, धन-वैभव, उच्च शिक्षा, अच्छा व्यवसाय या नौकरी और अच्छा स्वास्थ्य आदि मिलते हैं। इसके विपरीत यदि अशुभ कर्मो की अधिकता होती है, तो सामान्य घर-परिवार, भाई-बन्धु, धन-वैभव, शिक्षा का अभव, साधारण नौकरी और स्वास्थ्य आदि सब मिलते हैं।
         इसीलिए हमारे शास्त्र एवं मनीषी मनुष्य को सदा शुभकर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं। अशुभ कर्मों से मनुष्य को यथासम्भव बचने के लिए परामर्श देते हैं। जो उनकी प्रेरणा से शुभकर्मों की ओर प्रवृत्त होते हैं, वे अपना इहलोक और परलोक सुधार लेते हैं। जो लोग बार-बार समझाने पर भी अशुभकर्मों की ओर आकर्षित होते हैं, वेअपने लोक-परलोक दोनों बिगाड़ लेते हैं।
          जहाँ तक हो सके अपने विवेक का सहारा लेते हुए मनुष्य को शुभकर्मों की ओर कदम बढ़ाना चाहिए, साथ ही दूसरों को भी प्रेरित करते रहना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

ज्ञान प्राप्ति की सामर्थ्य

मनुष्य कितना कुशाग्र बुद्धि है, यह उसकी ज्ञान प्राप्ति की शक्ति पर निर्भर करता है। वर्षों विद्यालय में पढ़ने के उपरान्त भी आवश्यक नहीं कि वह योग्य बन ही गया हो। विद्यालय की शिक्षा ग्रहण करने के बाद भी यह उस बच्चे का दुर्भाग्य होता है कि वह किसी भी कम्पीटिशम में सफल नहीं हो पाता। इसके विपरीत कुछ बच्चे परिश्रम करके हर कम्पीटिशन में सफल होकर मनचाहे क्षेत्र में चले जाते हैं।
         कुछ माता-पिता अपने पैसे के दम पर कैपिटेशन देकर अपने नालायक बच्चों को मनचाहे क्षेत्र में शिक्षा प्राप्ति के लिए भेज देते हैं। परन्तु उनमें योग्यता तो नहीं आ पाती। इसके लिए 'थ्री इडियट' फ़िल्म का उदाहरण लिया जा सकता है। इसी तरह पैसे के बल पर जबरदस्ती डॉक्टर बने 'मुन्ना भाई एम.बी.बी.एस.' फिल्म का उदाहरण भी ले सकते हैं। हम कह सकते हैं कि योग्यता पैसे से खरीदी नहीं जा सकती, उसके लिए दिन-रात एक करके ज्ञानार्जन किया जाता है।       
          निम्न श्लोक में कवि ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में इस सत्य को उजागर किया है-
अधीत्य चतुरो वेदांसर्वशास्त्राण्यनेकश:।
ब्रह्मतत्वं न जानाति दर्वी सूपरसं यथा ।।
अर्थात् चारों वेदों और समस्त शास्त्रों का अनेक बार अध्ययन करने के उपरान्त भी  ब्रह्मतत्त्व का ज्ञान मनुष्य को हो जाए, यह उसी प्रकार आवश्यक नहीं है जिस प्रकार बर्तन (पतीले) से किसी व्यञ्जन को परोसने के लिए प्रयुक्त पात्र (कड़छी या चम्मच) उस व्यञ्जन का स्वाद नहीं जान पाता।
         इस श्लोक के माध्यम से कवि कहना  चाहते हैं कि पतीले या डोंगे में रखी दाल या सब्जी का स्वाद उसे परोसने वाले चम्मच या कड़छी को नहीं होता। उसी प्रकार शास्त्रों में क्या लिखा है, मूर्ख व्यक्ति नहीं समझ सकता। उसे समझने के लिए अथक परिश्रम की आवश्यकता होती है। तभी मनुष्य विद्वान बनकर उनका सार तत्त्व जान सकता है।
           वर्षों गुरुकुल में वेदादि शास्त्रों का अध्ययन करने के उपरान्त भी जब बोपदेव को लगा कि उन्हें कुछ भी नहीं आता, तो उन्होंने घर वापिस लौटने का निश्चय किया। अपने गुरु से आज्ञा लेकर वे घर की ओर चल ही पड़े। रास्ते में एक कुँए के पास विश्राम करने के लिए रुके। उन्होंने देखा कि कुँए के जिस भाग पर रस्सी पानी लाते समय बारबार घर्षण कर रही है, वहाँ एक निशान बन रहा है।
          उस निशान को देखकर उन्हें ज्ञान हो गया कि बारबार अभ्यास करने से ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके बाद वे अपने गुरुकुल वापिस गए। कठोर अभ्यास करके ही उन्होंने संस्कृत व्याकरण लिखी। इसी अभ्यास की बात को एक दोहे के माध्यम से कविवर वृन्द ने कहा है-
करत करत अभ्यास के जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत जात से सिल पर पड़त निसान।।
सारांश यह है कि निरन्तर अभ्यास करने से एक अज्ञ व्यक्ति और एक कुशल व्यक्ति दोनों ही योग्य बन सकते हैं। अभ्यास की आवश्यकता शारीरिक और मानसिक दोनों ही प्रकार के कार्यों में समान रूप से होती है। लुहार, बढ़ई, सुनार, दर्जी, धोबी आदि का कार्य भी परिश्रम साध्य है। ये कलाएँ भी बार-बार अभ्यास करने से ही सीखी जा सकती हैं ।
          सयाने कहते है 'जितना गुड़ डालो, उतना मीठा होता है।' यह उक्ति सत्य ही है। ज्ञानार्जन के लिए जितना अभ्यास और परिश्रम किया जाए, उतना ही मनुष्य ज्ञानी बनता है। ज्ञान प्राप्ति की कोई आयु नहीं होती। ब्रह्माण्ड में इतना ज्ञान है, सारी आयु मनुष्य लगा रहे उसे प्राप्त नहीं कर सकता। पर जितना भी ज्ञान वह अर्जित कर, उसमें उसे पूर्ण योग्यता होनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 1 अक्टूबर 2019

ईश्वर के पास जाने का भय

ईश्वर के पास जाने के नाम से ही हमारा मन क्यों घबराने लगता है? यह एक बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विचारणीय प्रश्न है। हम सब जानते हैं कि यह संसार मरणधर्मा है। जिसका जन्म यहाँ होता है उसे अपनी आयु भोगकर इस संसार से विदा होना पड़ता है। फिर भी हम मृत्यु का नाम नहीं सुनना चाहते। जहाँ मौत शब्द आता है हम उसे सुनकर डर जाते हैं कि जैसे वह अभी भागकर हमारे पास आ जाएगी।
          पहले हम यह विचार करते हैं कि मनुष्य की निश्चित आयु कितनी है? मनुष्य की निश्चित आयु वही है जो हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर ने हमारे लिए निर्धारित की है। जो आयु निश्चित करके ईश्वर जीव को इस संसार में भेजता है वह जब पूर्ण हो जाती है तब उसे यहाँ से विदा होना ही पड़ता है। इसमें जीव की इच्छा या अनिच्छा का कोई मतलब ही नहीं रह जाता।
        इस असार संसार में आने के बाद मनुष्य अपने यहाँ आने का उद्देश्य ही भूल जाता है। कुछ समय के लिए मिले हुए इस जीवन पर अपना जन्मसिद्ध अधिकार मानता हुआ वह मनमानी करने लगता  है। हर प्रकार के कर्म-कुकर्म करने में वह कभी हिचकिचाता नहीं।
        मनुष्य इस संसार में आने से पहले ईश्वर से बहुत से वादे करता है, कसमें भी खाता है पर संसार में आते ही वह सब कुछ भूल जाता है। वह वादों को याद नहीं रख पाता और अपनी कसमें तोड़कर इतराता फिरता है। इसलिए वह उन पर अमल भी नहीं कर पाता। तब वह धीरे-धीरे ईश्वर से विमुख होता जाता है। उसकी यही बेरुखी उसके डर का कारण बनती है। उसके सिर पर मौत की तलवार हर समय लटकी रहती है, जिसे वह उतार फैंकना चाहता है। उसी के लिए सारे प्रपंच करता है। उससे बचने के लिए धर्म का प्रदर्शन करता है। इन्सानों की आँखों में तो वह यदा कदा धूल झौंकता ही है, भगवान को भी धोखा देने से बाज नहीं आता। जब मनुष्य ऐसे कर्म करेगा तो उसके मन में डर तो घर बनाकर बैठ ही जाएगा।
        डर को दूर भगाने के लिए मनुष्य को देश, समाज, धर्म और घर-परिवार के नियमों के अनुकूल कार्य करने चाहिएँ। इस प्रकार के कार्यों को करने से मन में उत्साह बना रहता है। जब गलत काम नहीं किया जाएगा तो मन में ग्लानि का भाव भी नहीं आएगा। सबसे बढ़कर मन प्रसन्न रहेगा।
        ईश्वर उन्हीं लोगों से प्रसन्न होता है जो बिना भेदभाव के उसके बनाए हुए सब इंसानों के साथ सदा समानता का व्यवहार करते हैं। किसी का दिल दुखाने की भूल नहीं करते। अपने कार्यों के संपादन करने में किसी लालच अथवा डर के शिकार नहीं बनते। सच्चे मन से सबकी भलाई और उन्नति करने के लिए प्रयासरत रहते हैं, ढोंग नहीं करते।
        अबू बिन आदम की कथा जो कभी बचपन में पढ़ी थी इस प्रसंग में याद आ रही है। कथा इस प्रकार थी कि जब अबू बिन आदम की मौत हुई और देवदूत उन्हें लेने आए तो लिस्ट में उन अच्छे मनुष्यों में सबसे ऊपर उनका नाम था, जो ईश्वर को प्रिय थे। उन्होंने आए हुए देवदूत से पूछा, "मेरा नाम ईश्वर के प्रिय लोगों में सबसे ऊपर क्यों है? मैं तो ईश्वर की भक्ति ज्यादा नहीं करता था।"
           देवदूत ने उनसे कहा, "तुमने अपने सारे जीवन में लोगों की निस्वार्थ सेवा की है। इसीलिए ईश्वर के प्रिय जनों में सबसे ऊपर है।"
        इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ्य है, मृत्यु दूर है तब तक ऐसे कार्य कर लेने चाहिएँ, जो हमें ईश्वर का प्रिय बना दें। हमारे मन में किसी तरह का कोई भय न रहे और हम निडर होकर मृत्यु के पश्चात उस प्रभु के पास जा सकें।
चन्द्र प्रभा सूद
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