एक गीत की पंक्ति है- 'तेरा राम जी करेंगे बेड़ा पार उदासी मन काहे को करे।'
जब हम सब जानते हैं कि मन को व्यर्थ परेशान करने का कोई लाभ नहीं। जो कुछ भी हमारे मन में व्यथा है या उदासी है उसे ईश्वर ने ही दूर करना है। जब हम सब यह जानते हैं, समझते हैं तो फिर हम अपने मन की गहराई इस तथ्य को स्वीकार करने से क्यों हिचकिचाते हैं?
हमारा मन तभी उदास होता है जब हम कठिनाई में होते हैं। हमें अपने चारों ओर अंधकार दिखाई देता है। ऐसा प्रतीत होने लगता है कि कष्ट की रात बहुत लम्बी हो गई है। ये स्थिति हमारे समक्ष तब उपस्थित होती हैं जब हम रोगग्रस्त होते हैं, जीवन के किसी भी क्षेत्र में असफलता का मुँह देखते हैं, व्यापार या नौकरी में परेशानी होती है अथवा अपयश मिलता है। इनके अतिरिक्त कभी-कभी हम अपने चारों ओर झूठे अहम के कारण अनावश्यक रूप से दीवारें खड़ी कर लेते हैं।
उस समय मन की स्थिति अच्छी नहीं होती। न हमारा मन किसी से बात करने का होता है और न ही घूमने-फिरने का। तब न हम फिल्म देखना चाहते हैं और न खरीददारी करना चाहते हैं। किसी पार्टी, क्लब सभा-सोसाइटी के कार्यक्रमों में भी मन उचाट रहता है। टीवी, रेडियो और कंप्यूटर आदि सब बेमायने हो जाते हैं। कोई परिवारी जन कुछ बात करना चाहे तो अनमने होकर या चिढ़कर हम उसे उत्तर देते हैं। यह भी परवाह नहीं करते कि उसे बुरा लगेगा या वह नाराज हो जाएगा।
हम बस अंधेरे कोने में ही सिमटना चाहते हैं। किसी तरह का कोई प्रकाश हमें नहीं भाता। हम सिर्फ अपनी बनायी घुटन में तड़पते रहते हैं। दुनिया को और दुनिया बनाने वाले को अपनी असहाय अवस्था का दोषी मानते हुए पानी पी-पीकर कोसते हैं। फिर भी हमारे मन को शान्ति नहीं मिल पाती बल्कि वह अशान्त ही रहता है।
ऐसे निराश और हताश हम सबसे कटकर जीना चाहते हैं पर उस मालिक को याद करने के बारे में नहीं सोचते। उस समय हम मन की शान्ति के लिए तथाकथित धर्मगुरुओं व तन्त्र-मन्त्र वालों के पास जाकर अपनी मेहनत की कमाई को व्यर्थ गंवाते हैं। धार्मिक स्थानों व तीर्थ स्थलों की यात्रा करके मन की शान्ति की तलाश करते हैं। नदियों में डुबकी लगाकर अपने दोषों को दूर करने का असफल प्रयास करते हैं। इन सब प्रयासों से मन की शान्ति तो नहीं मिलती पर धन व समय की बरबादी अवश्य होती है।
सब तरफ से थक-हार कर जब हम निराश हो जाते हैं तब उस मालिक की ओर हमारा ध्यान जाता है। तो उस समय हमें महसूस होता है कि हम अनावश्यक ही भटक रहे थे उसकी शरण में अब तक क्यों नहीं आए?
हम कितनी भी मुसीबतों में घिर जाएँ हमें उस परम दयालु प्रभु के अतिरिक्त कोई और नहीं उबार सकता। उसकी शरण में सच्चे मन से जाने पर वह करुण पुकार अवश्य सुनता है और हमारे कर्मानुसार कष्टों को दूर करता है। वह हमारा सच्चा मीत व बन्धु है। उसका दामन थाम लो वह कभी किसी को निराश नहीं करता।
अपने मन को सांसारिक दायित्व निभाते हुए ईश्वर की ओर उन्मुख करना चाहिए। यदि मन ईश्वर के ध्यान में रमने लगेगा तो उसे हर प्रकार की उदासी से छुटकारा मिल जाएगा। कोई उदासी उसके रास्ते का रोड़ा नहीं बनेगी। मनुष्य जब अपने सभी कार्यों को ईश्वर को समर्पित करने लगेगा तो उसका मन प्रफुल्लित और उत्साहित रहेगा।
Blog- http://prabhavmanthan.blogspot.com/2015/05/blog-post_29.html
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP
मंगलवार, 21 जुलाई 2015
उदासी व्यर्थ
सोमवार, 20 जुलाई 2015
मनुष्य खाली हाथ आता है
मनुष्य खाली हाथ इस संसार में आता है और खाली हाथ ही यहाँ से विदा लेता है। जन्म और मृत्यु के बीच का उसका समय ऐसा होता है जिसमें वह और और पाने के लिए भटकता रहता है। आयु पर्यन्त वह कोल्हू के बैल की तरह ही खटता रहता है। यह दिन-रात का भटकाव उसका सुख-चैन सब छीन लेता है। वह बिना समय व्यर्थ गंवाए संसार में सब कुछ हासिल कर लेना चाहता है।
वह इस दुनिया के सारे भौतिक सुख अपनी झोली में डाल लेने के लिए आतुर रहता है। पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही उसे सब मिलता है। मनुष्य इस सत्य को भूल जाना चाहता है या नजरअंदाज करना चाहता है कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले किसी को कुछ नहीं मिलता।
फिर भी हाथ पसारे माँगता रहता है। उसकी एक कामना पूर्ण होती है कि दूसरी के लिए याचना आरंभ हो जाती है। दूसरी के बाद तीसरी, फिर चौथी, पाँचवीं यानि कि यह क्रम चलता रहता है। यदि उसके भाग्य के अनुसार उसकी इच्छा पूरी न हो पाए तो वह उस दाता से नाराज हो जाता है उसे गाली तक दे बैठता है। उस न्यायकारी पर पक्षपात करने का आरोप लगाने से नहीं चूकता।स्वयं को उससे दूर कर लेने की धमकी देता है। हद तो तब होती है जब अपने अहंकार के वशीभूत वह सृष्टि के रचयिता उस स्वामी को रिश्वत देने का प्रयास करता है।
उसे हर उस व्यक्ति से होड़ करनी होती है जिसका भाग्य बलवान है और सब सुविधाओं से संपन्न है। ईश्वर की दया से जिसके पास भौतिक सुख-साधनों की कोई कमी नहीं है।
इस कारण वह कुमार्गगामी हो जाने से परहेज नहीं करता। नीति-अनीति, छल-फरेब, झूठ-सच करने की महारत हासिल कर लेता है। भ्रष्टाचार करना, दूसरों का गला काटना, छीना-झपटी करना, बेईमानी करना, चोरबाजारी करना आदि उसके प्रिय शगल बन जाते हैं। इन समाज विरोधी कार्यों को करते समय वह भूल जाता है कि वह मालिक उसके इन कृत्यों से प्रसन्न नहीं हो रहा। उसे अच्छा नहीं लगता कि उसके बच्चे ऐसे व्यवहार करने वाले बनें।
इस भौतिक संसार में हम अपने बच्चों से सरलता, ईमानदारी व सच्चाई की अपेक्षा करते हैं वैसा व्यवहार वह ईश्वर हमसे भी चाहता है। बच्चों की गलतियों को सुधारने के लिए हम उन्हें कई प्रकार के दण्ड देते हैं, उनकी पिटाई करते हैं या जेब खर्च बंद कर देते हैं आदि। इसी प्रकार वह परम न्यायकारी भी हमें दण्ड देता है। वह हमें मानसिक व शारीरिक कष्ट देता है, प्रयजनों से वियोग करवा देता है, हमें धन, बल व यश से वंचित कर देता है आदि।
अधर्म से कमाए हुए पैसे के कारण अहंकारी हुए मनुष्य का घमण्ड दूर करने के लिए उसे या उसके परिवारी जनों या बच्चों को बुराइयों में उलझा देता है। गलत रास्ते से कमाई धन-संपत्ति को बरबाद कर देता है।
वह प्रभु मनुष्य को सोचने पर विवश कर देता है कि वह इस संसार में खाली हाथ आया था और खाली हाथ ही उसे यहाँ से जाना है। इस संसार से अपने साथ केवल अपने अच्छे व बुरे कर्मों का लेखा-जोखा लेकर जाता है जो जन्म-जन्मान्तर तक उसके साथी बनते हैं। आने वाले जन्मों की सुख-समृद्धि या बदहाली का कारण बनते हैं।
समय रहते यदि मनुष्य जाग जाए तो अपने लिए मुसीबतों के पहाड़ खड़े करने के स्थान पर वह अपने लिए सुख-शांति का पुरस्कार प्राप्त कर सकता है।
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP
रविवार, 19 जुलाई 2015
नश्वर शरीर।
हम इस बात से अनभिज्ञ नहीं हैं कि हमारा यह शरीर नश्वर है। इस असार संसार में जो जीव जन्म लेता है उसे अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार मिला हुआ समय पूर्ण करके इस दुनिया से विदा लेनी पड़ती है। इसमें जीव की इच्छा या प्रसन्नता कोई मायने नहीं रखती।
इस संसार से जाना है तो इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम अपने दायित्वों से मुँह मोड़ लें या पलायनवादी प्रवृत्ति के बन जाएँ। अपने व अपनों के प्रति लापरवाह बन जाएँ। कुछ विद्वान कहते हैं-
'क्या तन माँजना रे आखिर माटी में मिल जाना।'
यह तो पलायनवादी वृत्ति है या अति वैराग्य की स्थिति है कि संसार से जब जाना ही है तो फिर अपने शरीर को न स्वच्छ रखो, न सजाओ और न ही संवारो। उन लोगों का कहना है कि जब शरीर नश्वर है तो इसकी सार संभाल करने या इसको सजाने में सारा समय व्यतीत करने का तो कोई लाभ नहीं। इसको साफ करने या माँजने में समय लगाना उसे व्यर्थ गंवाना है।
हम मानते हैं- 'शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।' अर्थात शरीर धर्म के कार्यों को पूर्ण करने का साधन है। यदि शरीर रोगी हो जाएगा तो मनुष्य अपना ध्यान नहीं रख पाएगा। अपने स्वयं के, धार्मिक, पारिवारिक, सामाजिक सभी दायित्वों का निर्वहण नहीं कर सकेगा। तब वह ईश्वर का स्मरण भी नहीं कर सकेगा। इस शरीर को हृष्ट-पुष्ट रखने के लिए उचित आहार-विहार व स्वास्थ्य के नियमों का पालन करना बहुत आवश्यक है।
धर्म के दस नियमों में भी 'शौचम्' कह कर तन और मन की शुद्धता पर बल दिया गया है।
इस बात को मानने के लिए कदापि इंकार नहीं है कि शरीर की ओर ही सारा समय ध्यान नहीं देना चाहिए। इस कारण दीन-दुनिया को भूल जाएँ या हम अपने दायित्वों से किनारा कर लें यह किसी भी उचित नहीं है।
हम इस बात को भी भूल नहीं सकते कि हमारा यह शरीर तो एक रथ के समान है जो इस शरीर में विद्यमान आत्मा को एक साधन के रूप में मिला है। इसमें बैठे यात्री आत्मा को वह इस सृष्टि की यात्रा करवाता है। अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ईश्वर प्रदत्त आयु पूर्ण करने के उपरान्त ही यह शरीर रूपी रथ आत्मा को उसके लक्ष्य मोक्ष तक ले जाता है। यदि इस रथ में पर्याप्त ईंधन न डाला जाए, इसका रख-रखाव सुचारू रूप से न किया जाए तो रथ अपनी गति से नहीं चल सकता।
हमारा यह भौतिक शरीर ईश्वर की देन है। इसको सजाने-संवारने में अति का समर्थन कोई भी नहीं करेगा। परन्तु फिर भी इसकी देखभाल करने का दायित्व भी तो हमारा ही है। उससे हम कैसे मुँह मोड़ सकते हैं? यदि इसे साफ-सुथरा नहीं रखेंगे तो यह अस्वस्थ होकर हमारे लिए भार बन जाएगा। यदि कई-कई दिन तक वस्त्र नहीं बदलेंगे या स्नान नहीं करेंगे तो मैला संप्रदाय वाले साधुओं की तरह दूर से ही दुर्गन्ध आने लगेगी। कोई भी पास बैठना पसंद नहीं करेगा।
क्षणिक वैराग्य की बात करें तो हमें श्मशान में जाकर आता है। फिर कुछ ही क्षण पश्चात अर्थात वहाँ से बाहर निकलते ही सब सामान्य ढर्रे पर चलने लगता है। हम भी सब कुछ भूलकर दुनिया के व्यापार में जुट जाते हैं।
संसार के आकर्षण इतने अधिक हैं कि इससे वास्तव में वैराग्य होना बहुत ही कठिन है। दुनिया के मोहमाया के बंधनों में फंसे हम मनुष्य वैराग्य के सही मायने नहीं जान पाते। चर्चा करने मात्र से वैराग्य की स्थिति नहीं बनती। उसके लिए मन को संसार से विरक्त करने की आवश्यकता होती है जो वास्तव में टेढ़ी खीर है। जल में कमल की तरह रहना वैराग्य है। राजा जनक की तरह कोई विरला ही मिलेगा जो सही अर्थों में वैरागी या वीतरागी होगा।
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP
शुक्रवार, 17 जुलाई 2015
सफलता का मित्र अकेलापन
गंभीरतापूर्वक विचार करने योग्य यह प्रश्न है कि सफलता ढिंढोरा पीटते हुए क्यों नहीं आती? उसका मित्र अकेलापन ही क्यों बन जाता है?
हम यदि कोई कार्य करते हैं तो उसके लिए आडंबर रचाते रहते हैं, अपनी तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते, जोरशोर से चारों ओर हवा फैलाते हैं। ये सब आप समाचार पत्रों में, टीवी, रेडियो आदि पर प्रतिदिन ही पढ़ते, देखते व सुनते हैं। वे कार्य कितने सफल या असफल होते हैं उनके विषय में समय बताता है।
हम सदा अपनी-अपनी हाँकते रहते हैं। हमें समाज की अथवा जन साधारण की कोई परवाह नहीं होती। ऐसे अवसरों पर मोटी चमड़ी हो जाती है। चिकने घड़े की तरह बनकर निर्लज्ज होकर बस दाँत निपोरते रहते हैं।
जब व्यक्ति जीवन में दिन-प्रतिदिन सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ता जाता है तब वह धीरे-धीरे अकेला होने लगता है। कार्य की अधिकता के कारण उसके पास अपने लिए ही समय नहीं बचता तो घर-परिवार के लिए कहाँ से समय निकाले? प्रातः घर से जल्दी निकलना और देर रात घर पर वापिस लौटना ही उसके कार्यक्रम का अंग बन जाते हैं। यदि वह कभी अस्वस्थ हो जाए तो आराम करने का समय भी अपने लिए नहीं निकाल पाता। उसकी व्यस्तता उसे सबसे काटकर अलग-थलग कर देती है। इसके अतिरिक्त नौकरी या व्यवसाय के कारण कई दिनों तक घर से बाहर देश अथवा विदेश जाना हो तो समस्या और बढ़ जाती है।
उसे माता-पिता, पत्नी, बच्चों, मित्रों व रिश्तेदारों के उलाहनों का सामना तो नित्य प्रतिदिन करना पड़ता है। सबके लिए वह सुख-सुविधाएँ जुटाता है, उसके द्वारा लाए गए कीमती उपहारों की शान सभी बघारते हैं और उनका उपभोग करते हैं पर फिर भी उसे जिम्मेदारियों से भागने का या मुँह मोड़ने का दोष देने से नहीं चूकते। ऐसा करके उसके मन को कष्ट देते हैं।
सभी लोग उससे नाराज रहते हैं। कोई उसकी विवशताओं को समझना ही नहीं चाहता। सभी सोचते हैं कि ऊँची पदवी पर पहुँचा वह किसी के साथ संबंध ही नहीं रखना चाहता क्योंकि उसकी नाक नीची होती है। इसलिए सबसे न मिलने के लिए नित्य नये बहाने बनाता रहता है।
उसकी कठिनाइयों को समझना नहीं चाहता। धीरे-धीरे वह मशीन की तरह हो जाता है। उसके पास इन सब ऊल-जलूल प्रश्नों के उत्तर देने का समय नहीं होता। अपने कार्यों में खोया वह उन्हीं को ही आगे बढ़ाता रहता है।
इस सृष्टि का नियम है कि जो अपने कार्यों का सफलतापूर्वक निर्वहण करता है वह सूर्य की तरह आकाश में अकेला ही चमकता है। सिंह की भाँति जंगल में वह अकेले ही विचरण करता है। उसका तेज उसे दूसरों की तुलना में विलक्षण बनाता है।
एवंविध यह तो सत्य है कि सफलता अपने साथ अकेलेपन को लेकर आती है। ऐसे सफल व्यक्तियों से ईर्ष्या न करके उनसे सीखने की आवश्यकता है। उनके पदचिह्नों पर चलकर महान लोगों की श्रेणी में आने का यथासंभव प्रयास सभी को करना चाहिए।
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP
गुरुवार, 16 जुलाई 2015
अपनी तारीफ की आवश्यकता
मुझे आज तक नहीं समझ आया कि मनुष्य को अपनी तारीफ करने की आवश्यकता क्यों महसूस होती है? उसके कार्य ही ऐसे होने चाहिएँ जो बिना कहे ही बोलें और लोग स्वयं उसकी प्रशंसा करने के लिए विवश हो जाएँ।
अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना तो कोई अच्छी बात नहीं है। ऐसा व्यक्ति जो हमेशा अपनी तारीफों के पुल स्वयं बांधता रहता है लोग उसे नापसंद करते हैं और अहंकारी की पदवी देते हैं। सामने किसी कारणवश उसकी हाँ में चाहे हाँ मिलाएँ पर पीठ पीछे उसकी निन्दा करते हैं।
दूसरों की प्रशंसा में प्रशस्ति गान करना चारण और भाटों का ही कार्य माना जाता था जिन्हें समाज में कोई ऐसा विशेष सम्मान नहीं मिलता था। आजकल भी हमारे आसपास इस केटेगरी के बहुत से लोग विद्यमान हैं या यूँ कहें कि बहुतायत में मिल जाते हैं। 'चमचे या कड़छे' कहकर लोग उनका उपहास करते हैं।
यदि हम दूसरों से अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने व्यवहार को बदलना होगा। अपने अंतस की कमियों को ढूँढ-ढूँढ कर उन्हें दूर करना होगा। देश, धर्म, समाज और अपने घर-परिवार के सभी दायित्वों को दक्षता से पूरा करना होगा। जहाँ तक हो सके अपने मानस को भी आलोचना के लिए भी तैयार करना होगा। दुनिया दुर्जनों की आलोचना करती है तो सज्जनों का विरोध करने से भी नहीं चूकती। इसके लिए बताने की आवश्यकता नहीं है। सभी महापुरुषों, समाजसेवियों को हम इस श्रेणी में रख सकते हैं जिन्हें अपने जीवनकाल में असहनीय कष्टों का सामना करना पड़ा पर वे धीर लोग अपने लक्ष्य से नहीं हटे।न
एक उदाहरण देखते हैं। एक कुम्हार बेटे और गधे के साथ पैदल चल रहा था। किसी ने छींटाकशी की- 'कितना पागल है? सवारी साथ है पर दोनों बाप-बेटा पैदल चल रहे हैं। कुम्हार ने बेटे को गधे पर बिठा दिया और पैदल चलने लगा। थोड़ी देर बाद किसी ने ताना मारा- 'बूढ़ा बाप पैदल चल रहा है और जवान बेटा सवारी कर रहा है।' अब कुम्हार गधे पर बैठ गया और बेटा पैदल चलने लगा। कुछ दूरी तय करने पर किसी ने फिर किसी ने कुम्हार को कोसा। अब वे दोनों गधे पर सवार हो गए तो फिर किसी मनचले ने कटाक्ष किया कि दोनों बाप-बेटा बेजुबान की जान लोगे क्या? अब उन्हें गुस्सा आ गया और वे दोनों गधे को उठाकर चलने लगे तब भी लोगों को चैन नहीं आया और उपहास करने लगे- ' इन बाप-बेटे जैसा मूर्ख नहीं देखा जो गधे जैसी सवारी होते हुए पैदल चल रहे हैं और उसे उठा रखा हैं।'
कहने का तात्पर्य यह है कि दुनिया तो किसी भी तरह जीने नहीं देगी पर हमें हार नहीं माननी है। उसे झुकने पर विवश कर देना है। जब लोग देखते हैं कि व्यक्ति विशेष की कितनी भी आलोचना करो उस पर कोई असर नहीं होता बल्कि इसके गुणों की कीर्ति की सुगन्ध चारों ओर फैलती ही जा रही है तो वे हारकर चुप हो जाते हैं।
लोगों को अपने गुणों का आकलन करने दीजिए। समय बीतते वे स्वयं समझ जाएँगे कि फलाँ व्यक्ति गहरे पैठा हुआ है। उसके गुणों से प्रभावित हुए बिना कोई नहीं रह सकता तो उनका बखान भी वे अवश्य ही करेंगे।
अपनी प्रशंसा में कसीदे पढ़कर ओछा या अहंकारी बनने से अच्छा है कि समाज को परखने का अवसर दीजिए। अपनी अच्छाइयों को आप पर्दों में छिपाकर नहीं रख सकते। वे तो फूलों की तरह सभी दिशाओं को सुवासित करेंगी। शेष सब ईश्वर पर छोड़ दें। वह आपके सद् गुणों व सुचरित्र को निस्सन्देह सराहेगा।
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP
बुधवार, 15 जुलाई 2015
शहरों की नयी उपज
शहरों की नयी उपज
कंक्रीट के इन जंगलों में
अक्सर रिश्तों की गरमाहट को
देखा है सुलगते हुए सिसकते हुए
ऊँची अट्टालिकाओं में
रहने वाले इन हृदयों में अब
शायद वो बात नहीं रह गई है
जो अपनेपन से सहलाया करते थे
किसी की चाहत नहीं
किसी चेहरे से राहत नहीं
दोस्त भी खलने लगे हैं आज
मिलना और बिछुड़ना एक हो गया है
ईंट पत्थर-सा बन रहा
कठोर और नृशंस ये मन
अहम भी सिर ताने खड़ा है
कौन किसकी सुने नहीं पहचानता है
घर की खिड़कियाँ अब
बंद रहने लगी हैं रात-दिन
शीतल बयार भी भाती नहीं
संवेदना शून्य होते जा रहे लोग हैं
ऐसे तो न थे हम कभी
क्योंकर कठोर बन गए
इन जंगलों में भटकते हुए
भूलभूल्लैया में खोते जा रहे लोग हैं
जीना दुश्वार हो जाएगा
गर सबको छोड़ देंगे हम
अजनबी बन करके रह पाना
न हो पाएगा इस भूलोक पर है अब
थाम लेते हैं अब हम
हाथ एक दूसरे का यहाँ
फिर कोई जंगल न डरा पाएगा
न थका पाएगा कोई किसी राह पर है।
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP
मंगलवार, 14 जुलाई 2015
अपनी अचछाई न छोड़ें
हमें अपनी अच्छाई को या अपने सद् गुणों को कदापि नहीं छोड़ना चाहिए। जब दुष्ट व्यक्ति अपनी दुष्टता के व्यवहार को नहीं छोड़ते तो हम सज्जनता के गुणों का त्याग क्योंकर करें।
एक दृष्टान्त दिया जाता है कि एक महात्मा नदी में स्नान कर रहे थे। वहाँ उन्हें एक बिच्छु दिखाई दिया। वे उसे एक पत्ते पर रखकर बचाने लगे पर वह फिर नदी में गिर पड़ा। यह क्रम थोड़ी देर तक चलता रहा तो किनारे खड़े उनके शिष्य ने उन्हें यह कहते हुए रोका कि आप इस बिच्छु को बचा रहे हो और यह आपको काट लेगा। इस पर महात्मा जी ने हंसकर उत्तर दिया कि वह अपना कर्म करेगा और मैं अपना। जब वह जीव अपना धर्म नहीं छोड़ता तो मैं इंसान होकर अपना धर्म कैसे छोड़ दूँ?
यह दृष्टान्त हमें सोचने पर मजबूर करता है और शिक्षा देता है कि हर जीव का कार्य निर्धारित है। वह अपने स्वभाव के अनुसार ही कार्य करेगा। इसी प्रकार साँप को कितना भी दूध पिला दो वह डंक मारने से बाज नहीं आएगा। अपने गुण, कर्म व स्वभाव के अनुसार ही जीव व्यवहार करते हैं। साँप की तरह दुष्ट व्यक्ति को कितना भी अपना बना लो, उसके लिए कितने भी भलाई के कार्य कर लो पर समय आने पर वह वार करने से नहीं चूकेगा।
हम सब जानते हैं कि हर मनुष्य में तीन वृत्तियाँ- सात्विक, राजसिक और तामसिक होती हैं। सत्व गुण की प्रधानता होने पर मनुष्य सत्कर्मों की ओर प्रवृत्त होता है और देवतुल्य बन जाता है। जब मनुष्य में राजसी गुणों की अधिकता होती है तो वह मनुष्यता के गुणों को अपनाता है। वह कभी सात्विक गुणों की ओर बढ़ता है तो कभी उसे तामसी वृत्तियाँ ललचाती हैं। तीसरे तामसी गुणों वाले लोग संसार के आकर्षणों में फंसकर समाज विरोधी रास्ते यानि कुमार्ग पर चल पड़ते हैं। तब उन्हें सुधारना कठिन हो जाता है। इस प्रकार अपने इन विशेष गुणों के कारण ही मनुष्य की पहचान बनती है।
हमें सच्चे, परोपकारी सज्जन लोग बहुत अच्छे लगते हैं। परन्तु अपने को और अपनों को इन गुणों से दूर रखना चाहते हैं। यदि सभी सोचने लगें कि अच्छाई का ठेका क्या हमने लिया है? बाकी और लोग भी हैं वे क्यों नहीं अच्छे बनते? यह सोच समाज के लिए घातक बन सकती है।
समाज को सुधारने का ठेका कुछ मुट्ठी भर लोगों का दायित्व नहीं है, हम सबका बराबर का इसमें योगदान अपेक्षित है। तभी स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकेगा।
ईश्वर ने इस संसार में हम सबको कुछ कर दिखाने का अवसर देकर भेजा है। जो उस अवसर का सदुपयोग करते हैं वे अग्रणी बन जाते हैं। जो अपने अवसर से चूक जाते हैं वे असफल होकर इस दुनिया से विदा लेते हैं।
जो अपनी योग्यताओं को पहचान लेते हैं और अपनी अच्छाइयों के बल पर आगे बढ़ते हैं, वे सभी परिस्थितियों में सम रहकर सबके हृदयों पर राज करते हैं। इसके विपरीत समय की धारा में बहकर आकर्षणों में फंस जाते है, समय बीतने पर वे पश्चाताप करते हैं।
इसलिए दुनिया की परवाह किए बिना अपनी अच्छाइयों को न छोड़ने का संकल्प लें। दूसरों की बुराइयों की ओर ध्यान न देना ही उचित है। हम सबको तो बदल नहीं सकते पर अपने गुणों का दामन कसकर पकड़ सकते हैं।
Twitter- http://t.co/86wT8BHeJP