गुरुवार, 22 सितंबर 2016

मनुष्य जीवन का रहस्य

मनुष्य की जिन्दगी का सबसे बड़ा रहस्य यही है कि वह किसके लिए जी रहा है? यद्यपि वह स्वयं और अपने परिवार की खुशहाली के लिए अपनी सारी ताकत झौंक देता है तथापि सारी आयु इस सत्य से अन्जान रहता है कि उसके लिए कौन जी रहा है? उसकी असली ताकत कौन लोग हैं?
        जिन्दगी हर कदम पर मनुष्य की परीक्षा लेती है। इस परीक्षा में उसे नम्बर तो नहीं मिलते पर उसे उत्तीर्ण होना पड़ता है। लोग यदि सच्चे मन से उसे याद करें तो यह निश्चित है कि वह पास हो गया है।
          इस धरती पर कोई भी ऐसा इन्सान नहीं है जिसे किसी समस्या से दो-चार न होना पड़े। इसी तरह इस पृथ्वी पर कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका कोई समाधान न किया जा सके। मनुष्य को समस्या के बारे में सोचते रहने पर बहुत से अनावश्यक बहाने मिल जाते हैं। इसके विपरीत इसके समाधान पर विमर्श करने से कोई-न-कोई हल अवश्य निकल आता है।
         जीवन का मार्ग बहुत ही कठिन है, काँटों से भरा हुआ है। इसे सरल नहीं बनाया जा सकता। परन्तु स्वयं को मजबूत बना लेने से उसका सामना करने की शक्ति मिलती है। जिन्दगी में ऐसा समय कम ही आता है जिसे हम बहुत अच्छा (golden period) कह सकते हैं। समय को अपने प्रयास व परिश्रम से अपने अनुकूल बनाना पड़ता है।
         जब मनुष्य जीवन में संघर्ष के पथ पर चल रहा होता है, उस समय वह निपट अकेला होता है। जब उसे सफलता मिलती है तब बहुत से लोग उसके साथ चलने लगते हैं। वह उनका आदर्श बन जाता है। परन्तु जब उसे मूर्ख समझकर संसार उस पर हँसने लगता है तब वह हिम्मत करके चमत्कार करता है और नए इतिहास की रचना करता है।
        जिन्दगी का गणित बहुत ही विचित्र है। जितना हो सके अपने व्यवहार से मित्रों की संख्या बढ़ानी चाहिए और शत्रुओं को कम करना चाहिए। अपने दुखों को दूर करने के लिए दूसरों के साथ सहानुभूति पूर्वक व्यवहार करना चाहिए। ऐसा करने पर मनुष्य को मानसिक सुख और शान्ति मिलती है। इस प्रकार परोपकार करके वह अपने अच्छे समय का भी सदुपयोग कर सकता है।
        यथासम्भव अपने अहंकार को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। इस प्रकार करने से मनुष्य को अपनों का प्यार और सहारा मिलता है। इससे उसका शेष जीवन बड़ी सुविधा से व्यतीत होता है।
         मनुष्य की यह जिन्दगी दो पल की है अर्थात कुछ ही समय के लिए उसे यह जीवन मिला है। इसलिए उसे कोशिश यही करनी चाहिए कि वह कुछ ऐसे कार्य अपने जीवन में कर जाए जिससे फूलों की तरह उसकी सुगन्ध चारों ओर बिखरती रहे। लोग उसके इस संसार से चले जाने के बाद भी याद रखें। समस्या यह है कि मनुष्य जब जीना आरम्भ करता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उस समय वह अपने करणीय कार्यों को चाहकर पूर्ण नहीं कर पाता।
        मनुष्य को अपने रिश्तों को मोतियों की तरह सदा सहेजकर रखना चाहिए। यदि कोई सम्बन्धी रूठकर अलग हो जाए तो उसे मनाकर अपने करीब लेकर आना चाहिए। उनके किसी व्यवहार से मनुष्य को अपनी शान्ति नष्ट नहीं करनी चाहिए। इन्सान दुनिया से लड़ सकता है पर अपनों से नहीं। इसका कारण है कि अपनों से उसे होड़ नहीं लगानी होती बल्कि उनके साथ अपना जीवन बिताना होता है। रिश्तों की डोर गलतफहमी होने के कारण कमजोर पड़ती है।
        जिन्दगी में भी तूफान की हलचल मचाने दुख, कष्ट, परेशानियाँ आदि आते रहते हैं। इनका आना भी जरूरी है, नहीं तो एक ही ढर्रे पर सीधा-सीधा चलता हुआ इन्सान उकता जआता है। इसी समय यह पहचान हो पाती है कि कौन हाथ छुड़ाकर भागता है और कौन हाथ पकड़कर चलता है। यानी कौन अपना है, कौन अपनेपन का दिखावा कर रहा है और कौन पराया है। जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे होते हैँ जो मनुष्य को लाभ नहीं पहुँचाते पर अपने साथ से उसे अमीर अवश्य बना देते हैं।
         जीवन जीने के लिए अपनों का साथ और सच्चे सहयोगियों की आवश्यकता होती है। प्रयास यही करना चाहिए कि हितचिन्तकों को अपने से दुर किया जाए और अपने मित्रों की सूची बड़ी करते हुए शत्रुओं को भी अपना प्रिय बनाया जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 21 सितंबर 2016

शरीर में प्राण

प्राणशक्ति जीव के शरीर में रहती है जिसके कारण उसका यह जीवन होता है और जब यह प्राण शरीर से बाहर निकल जाता है तो जीव की मृत्यु हो जाती है। तब उस निर्जीव शरीर का संस्कार कर दिया जाता है। कोई कितना भी प्रिय क्यों न हो उसे विदा करना पड़ता है। हम सभी मोटे तौर पर शरीर में विद्यमान प्राणवायु के विषय में इतना ही जानते हैं।
         आज हम मानव शरीर में रहने वाले दस प्रकार के प्राणों की चर्चा करते है। प्राण को दस भागों में विभक्त किया है। प्राण, अपान, समान, उदान और व्यान आदि पाँच मुख्य प्राण हैं। नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनंजय पाँचों उपप्राण हैं। पाँच महाप्राणों को ‘ओजस’ और पाँच लघुप्राणों को रेतस’ कहते हैं।
         जिस प्रकार दोनों कान, दोनों आँखें, दोनों नथुने, दोनों हाथ और दोनों पैर एक-दूसरे की सहायता करते हैं। उसी प्रकार महाप्राण और लघुप्राण परस्पर सहायक एवं पूरक होते हैं। ये दसों मिलकर हमारे शरीर का संचालन करते हैं-
1. प्राण- हृदय में रहकर श्वास को बाहर-भीतर करने की प्रक्रिया करtता है। है। अन्न पानादि को पचाती है। प्राण वायु मुख, नासिका, हृदय, नाभि, कुण्डलिनी के चारों ओर तथा पादाँगुष्ठ में रहता है।
2. अपान-  मूलाधार में स्थित स्थूल मलों का विसर्जन करता है। देह के भीतर पैदा होने वाले मल, मूत्र, पसीना, कफ, कीचड़, विष आदि विजातीय पदार्थ शरीर से बाहर निकालता है। यह क्रिया न हो सके तो अपच, जुकाम आदि अनेक रोग पैदा हो जायेंगे। अपान पर नियन्त्रण न जानते हुए भी जिन्हें हठपूर्वक ब्रह्मचर्य रखना पड़ता है वे प्राय: रोगों में ग्रसित हो जाते हैं।
3. समान- नाभि में शरीर को यथा स्थान रखने का काम करता है। उदाराग्नि के कला को लेकर सर्वांग में समान रहता है।
4. उदान-  कण्ठ में रह कर शरीर की वृद्धि करता है। सभी संधियों(जोड़ों) तथा हाथों और पैरों में उदान रहता है। उदान विविध वस्तुएँ बाहर से शरीर के भीतर ग्रहण करता है।
5. व्यान- व्यान का काम रक्त-संचार है। सम्पूर्ण शरीर में लेने और छोड़ने आदि का धर्म करता है। कर्ण, नेत्र, कण्ठ, नाक, मुख, कपोल, मणिबँध में व्यान रहता है ।
6. नाग- मनुष्य के मुँह से डकार के रूप में निकालता है।
7. कूर्म-  नेत्रों की पलकों को बन्द करने और खोलने का कार्य कूर्म करता है। कूर्म यदि सुषुप्त अवस्था में होता है तो शारीरिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ होने पर भी गर्भधारण नहीं हो सकता।
8. कृकल- छींक मारने का कार्य कृकल करता है।
9. देवदत्त- जम्हाई लेने का कार्य करता है।
10. धनञ्जय- सारे शरीर में व्याप्त रहता है। शरीर के मृत हो जाने पर यह चार घण्टे तक वहाँ विद्यमान रहता है।
         प्राण के द्वारा शब्द एवं मस्तिष्क का पोषण होता है। प्राण के द्वारा ही हृदय की धड़कन होती है, रक्त सञ्चार होता है और साँस आती है। इसके बाद शरीर की अन्य क्रियाएँ होती हैं। प्राण में शिथिलता आने पर जीवनी शक्ति घटने लगती है और उसके कम हो जाने पर हृदय की धड़कन बन्द हो जाती है।
         समाधि की अवस्था में योगी प्राण को नियन्त्रित करते हैं। इन्हें जीते बिना हृदय में स्थित कमल में ध्यान नहीँ लगाया जा सकता। योगी प्राणों का निरोध करके जब चाहें तब शरीर में प्राण का स्पन्दन बढ़ा लेते हैं। जब तक उनका प्राण ब्रह्माण्ड में संचित रहता है तब तक उनके हृदय की धड़कन बन्द रहती है और शरीर मृततुल्य प्रतीत होता है। इसीलिए उन्हें दीर्घकालीन समाधि सुख मिलता है।
        प्राणों का संयम करके दीर्घकाल तक जीवन स्थिर रखकर भीष्म पितामह की तरह इच्छा मृत्यु पाना सम्भव होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

प्रारब्ध कर्म

जन्म से लेकर मृत्यु पर्यन्त ऐसी अनेक घटनाएँ मनुष्य के जीवन में घटती हैं जिनका कारण उसका प्रारब्ध होता है। प्रारब्ध का अर्थ है- परिपक्व कर्म। हमारे पूर्वकृत कर्मों में जो जब जिस समय परिपक्व हो जाते हैं, उन्हें प्रारब्ध की संज्ञा मिल जाती है। यह सिलसिला कालक्रम के अनुरूप चलता रहता है। इसमें वर्ष भी लगते हैं और जन्म भी। प्रारब्ध तीन तरह के होते है मन्द, तीव्र तथा तीव्रतम।
       कई बार क्रिया भाव में और विचारों का इतना तीव्रतम संयोग होता है कि वे तुरन्त, प्रारब्ध कर्म का रूप ले लेते हैं और अपना फल प्रकट करने में सक्षम सिद्ध होते हैं। प्रारब्ध का अर्थ ही है वह कर्म जिसका फल भोगने से हम बच नहीं सकते। इसे सामान्य जीवन क्रम के बैंक और उसके फिक्स डिपॉजिट के उदाहरण से समझा जा सकता है।
       मनुष्य के कर्म से ही उसका प्रारब्ध बनता है । प्रारब्ध कर्म को अपने वर्तमान जन्म में भोगना होता है। दूसरे शब्दों में इसे उत्पति कर्म कह सकते हैं जिसे व्यक्ति के जींस तय करते हैं कि उसका प्रारब्ध क्या होगा। मनुष्य जब माता के गर्भ में आता है, उसी समय से ही उसका प्रारब्ध निर्धारित हो जाता है। प्रारब्ध कर्म इस जन्म के भोगों का निर्धारण करते हैं। प्रारब्ध कर्म के अनुसार ही मनुष्य की जाति, आयु, गुण और उसके भोग का निर्धारण होता है। ज्योतिषी कुंडली में प्रारब्ध को नवम भाव या नवमेश से देखते है। प्रारब्ध कर्म के विषय में तुलसीदास जी कहते हैं-
            प्रारब्ध  पहले रचा, पीछे  रचा  यह  शरीर।
            तुलसी चिन्ता क्यो करे, भज ले श्रीरघुबीर।।
        कर्मसिद्धान्त कहता है कि प्रत्येक सकारात्मक कर्म मनुष्य के पुण्य का कारक होता है और उसका सकारात्मक फल अर्थात सुख उसे प्राप्त होता है। इसी तरह प्रत्येक नकारात्मक कर्म से मनुष्य पाप को उत्पन्न करता है। उसे नकारात्मक फल यानी दु:ख के रूप में उसे ही भुगतना पडता है। यह कर्मसिद्धान्त अटल है और अपरिवर्तनशील है।
       व्यक्ति का वर्तमान जन्म उस परिवार में होता है जिसकी परिस्थिति उसका प्रारब्ध भोगने के लिए अनुकूल हो। उस परिवार के सदस्यों के साथ उसका पूर्वजन्म का लेन-देन का सम्बन्ध होता है। अपने जीवन की सम्पूर्ण यात्रा में मनुष्य किसी पुराने लेन-देन को चुका रहा होता है या फिर कोई नया लेन-देन कर रहा होता है। यदि यह लेन-देन इस वर्तमान जन्म में न निपट सके तो उसे आगामी जन्मों में बराबर करना पड़ता है। मनीषियों के अनुसार यह संभव है कि आने वाले जन्म में वर्तमान जन्म के परिवार वालों के साथ होने वाला उसका सम्बन्ध और लिंग बदल जाए। हो सकता है कि इस जन्म का पिता है अगले जन्म में उसके बेटे, बेटी या अन्य सम्बन्धी के रूप में जन्म ले।
        मनुष्य का शरीर किसी दिन किस प्रकार व्यवहार करेगा, वह इस बात पर निर्भर करता है कि उस दिन उसका प्रारब्ध किस तरह का है। ज्ञानी जन ही यह रहस्य जान सकते हैं।
       कई बार साधारण प्रतिभा वाले लोगों को उस दिन घटने वाली किसी घटना का ज्ञान हो जाता है। कभी-कभी मनुष्य जब प्रात:काल जागता है तो कुछ विचित्र-सा अनुभव करता हैं। पर वह उसमें छिपे हुए अर्थ को समझ नहीं पाता। स्वप्न में उसे कुछ ऐसे लोग दिखाई देते हैं जिन्हें वह पहचानता है और कुछ लोग ऐसे दिखाई देते हैं जिन्हें वह जानता तक नहीं।
        कुछ स्वप्न भी प्रारब्ध से जुड़े होते हैं। इसका अर्थ यह है कि उस तंत्र में बहुत बड़ी मात्रा में यादें जमा रहती हैं। ये सभी यादें यदि एक साथ मनुष्य के स्वप्न में आ जाएँ तो दिमाग की नसें मानो फटने लगती हैं। ये यादें इतनी अधिक होती हैं कि इन्हें सम्हाल पाना मनुष्य के लिए बहुत कठिन हो जाता है। स्वप्न में हर प्रकार की अजीबोगरीब घटनाएँ शामिल होती हैं।
        इसलिए प्रकृति ने एक ऐसा रास्ता निकाला है कि याददाश्त के एक हिस्से से मनुष्य को एक ही एक बार में निपटना होता है। यह प्रारब्ध का ही एक रूप है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रारब्ध में जो यादें अपना काम कर रही हैं, वे मनुष्य के अंतस में ही विद्यमान हैं। जब वे सामने उभर कर आते हैं तो यदा कदा भविष्य की घटनाओं का संकेत भी दे जाते हैं।
        यदि कोई समझ सके तो प्रारब्ध के स्वप्न कई बातों की ओर संकेत करते हुए बहुत-सी गुत्थियों को सुलझा देते हैं। जो लोग अपने जीवन को बहुत बारीकी से देखते हैं, वे नशीले और उत्तेजक पदार्थों से दूर रहते हैं। अगर ऐसे पदार्थों का सेवन किया जाए तो मनुष्य कोई भी चेतावनी समझ नहीं सकता तब अपने मार्ग से भटक सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 19 सितंबर 2016

अपनों का बिछुड़ना

अपने किसी प्रियजन को जब इस असार संसार से विदा करना पड़ता है तब मन उस अकथनीय पीड़ा से विदीर्ण होने लगता है। यह दुख सहन करना बहुत ही कठिन होता है। जैसे किसी भी कारण से शाखा से टूटा हुआ फूल वापिस उसी टहनी पर नहीं लगाया जा सकता, उसी प्रकार इस दुनिया से विदा हुए मनुष्य को पुनः लौटाकर उसी रूप में वापिस नहीं लाया जा सकता।
       पूर्वजन्म कृत कर्मो के अनुसार जितना भी समय जीव को वर्तमान जीवन में ईश्वर की ओर से मिलता है, उसे भोगने के पश्चात मनुष्य को एक पल की भी मोहलत नहीं मिल पाती। अपनी सारी धन-सम्पत्ति और भौतिक रिश्ते-नातों को इसी धरा पर छोड़कर उसे खाली हाथ परलोक गमन करना पड़ता है।
       संसार मे ऐसा कोई भी एक घर नहीं मिलेगा जहाँ से आज तक किसी की मृत्यु नहीं हुई हो। यदि ऐसा हो पाता तो सभी राजा-महाराजा, महापुरुष और शक्तिशाली लोग तो सृष्टि के आदि से आज तक जीवित होते। तब इस धरती पर तिल रखने जितनी जगह भी हमें न मिल पाती। इस मरणधर्मा संसार में किसी भी जीव के स्थायित्व की कल्पना कर लेना नितान्त असम्भव है।
        एक कथा स्मरण हो रही है। बहुत लोगों ने इसे पढ़ा और सुना होगा। अनेक महात्माओं के साथ जोड़कर यह कथा समझाने के लिए सुनाई जाती है। एक स्त्री के इकलौते बेटे की मृत्यु हो गई। वह बहुत दुखी थी और रो-रोकर उसका बहुत बुरा हाल था। फिर कुछ सोचकर और निर्णय करके अपने गाँव में पधारे हुए सन्त के पास अपने बच्चे के शव को लेकर गई।
       महात्मा जी के पास जाकर उसने उन्हें प्रणाम किया और अपने बेटे के शव को उनके चरणों में रख दिया। उनसे बार-बार आग्रह करने लगी कि उसके जीवन के एकमात्र सहारे उसके बेटे को वे जीवित कर दें। सन्त ने कहा - "जिसकी मृत्यु हो जाती है, उसे जीवित करना किसी के वश की बात नहीं है।

        यह सच है कि ईश्वर के इस न्याय को कोई भी नहीं बदल सकता। परन्तु वह स्त्री हठ ठानकर बैठ गई कि उसे उसका बेटा जीवित चाहिए। उसने कहा कि सन्त-महात्मा चाहें तो कुछ भी कर सकते हैं। महात्मा के लाख समझाने पर भी वह न मानी।
        अन्त में महात्मा ने उस स्त्री से कहा- "ऐसे घर से एक मुट्ठी चावल ले आओ, जिस घर में किसी की मौत न हुई हो। तभी मैं तुम्हारे बेटे को जीवित करूँगा।"
        वह स्त्री महात्मा जी के कहने के अनुसार एक मुट्ठी चावाल लेने गाँव में चली गई। वह आश्वस्त हो गई थी कि अब उसका बेटा अवश्य जीवित हो जाएगा। वह अपने सारे गाँव का चक्कर लगाकर आ गई। पर यह क्या, उसे ऐसा कोई भी घर वहाँ नहीं मिला जहाँ किसी की मृत्यु न हुई हो।
       तब उसे समझ में आ गया कि कुदरत के फैसले को बदला नहीं जा सकता। यह तो सृष्टि का नियम है कि जो इस संसार में आया है उसे यहाँ से विदा लेनी ही पड़ती है। लौटकर उसने महात्मा जी के चरण पकड़ लिए और अपने किए पर पश्चाताप करने लगी।
        यह कथा मनुष्य को मात्र यही शिक्षा देती है कि इस संसार में ईश्वरीय नियम अटल हैं। उन्हें बदलने की सामर्थ्य किसी में नहीं है। मनुष्य तो बस भोक्ता मात्र है। वह अपने पूर्वजन्म कृत शुभाशुभ कर्मों का फल भोगने के लिए इस संसार में आता है। सभी रिश्ते-नाते, भाई-बन्धु उसे जीवन यात्रा पूर्ण करने के लिए मिलते हैं। वह उनके साथ कैसा व्यवहार करता है अथवा उनकी कितनी सहायता लेता है, उस पर निर्भर करता है।
         हमारा प्रिय-से-प्रिय जन भी एक-न-एक दिन अपना हाथ छुड़ाकर हमें रोता-बिलखता छोड़कर परलोक की यात्रा के लिए अकेला ही चला जाता है। हालाँकि अपने प्रियजनों का वियोग सहन कर पाना इतना सहज नहीं होता परन्तु कोई और चारा भी तो नहीं होता। ईश्वर के इस न्याय के आगे सिर झुका देना ही समझदारी है। उस परम न्यायकारी परमात्मा को कोसने या गाली देने से उसका न्याय नहीं बदल सकता। हमें अपनी मानसिकता को ही बदलना पड़ता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 18 सितंबर 2016

आवश्यकतानुसार भोजन लें

अपनी थाली में मनुष्य को उतना ही भोजन परोसना चाहिए जितना वह आराम से खा सकता है। यदि आवश्यकता से अधिक अन्न थाली में डाल लिया जाए तो मनुष्य उसे खाने में असमर्थ हो जाता है। अतः वह बच जाता है और फिर उस बचे हुए भोजन को कूड़ेदान में फैंक दिया जाता है। इस तरह यह अनमोल अन्न बरबाद होता रहता है।
         अन्न का एक-एक दाना बहुत ही मूल्यवान होता है। उस एक दाने को जब बीज के रूप में किसान प्रयोग करता है तब वह उस बीज को बहुत-से अनाज में बदल लेता है। इस अन्न के हर दाने को उपजाने के लिए किसान दिन-रात अथक परिश्रम करता है।
       किसान सरदी, गरमी, बरसात की परवाह नहीं करता। जीवन भर अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओलावृष्टि, बाढ़, भूकम्प, जैसी प्राकृतिक आपदाओं को भी सहन करता है। अपना सारा आराम छोड़कर, अपना खून-पसीना एक करके हम सबके लिए अनाज उपजाता है। बड़े ही दुर्भाग्य की बात है कि हमारा अन्नदाता किसान स्वयं भूखा रह लेता है परन्तु हम सबको पोषित करने का दायित्व बखूबी निभाता है। हम उसके इस परिश्रम का कभी मूल्य नहीं लगा सकते।
        अन्न को बरबाद करके हम अन्न की बरबादी तो करते ही हैं और किसान के खून-पसीने के साथ ही उसके सपनों को भी चकनाचूर करते हैं। फिर भी वह धर्म नहीं त्यागता।
        इस अन्न का मूल्य उन लोगों से अधिक कौन जान सकता है जिनके घरों में कई दिनों तक चूल्हा नहीं जलता। अपने आसपास हम बच्चों को कचरे से बीनकर खाते हुए देखते हैं। जिन स्थानों में दुर्भिक्ष (अकाल) पड़ता है या बाढ़, भूकम्प, तूफान आदि दैवी आपदाओं के कारण लोगों को घर से बेघर होकर विस्थापितों सा जीवन व्यतीत करना पड़ता है। दो जून रोटी कमाने के लिए मनुष्य कितने पापड़ बेलता है, स्याह-सफेद करता है। सभी पाप-दुराचार करता है। संस्कृत भाषा के एक कवि ने कहा है -
                बुभुक्षित:किं न करोति पापम्।
अर्थात भूखा व्यक्ति कौन-सा पाप है जो नहीं करता यानी वह क्या कुछ नहीं कर गुजरता?
इन्सान भगवान से यहाँ तक कह देता है-
                  भूखे भजन न होई गोपाला,
                  ले ले अपनी कण्ठी माला।
यदि मनुष्य गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों के विषय मे सोच ले, कचरे से खाते और भूख से बिलबिलाते बच्चों के बारे में सोच ले तो कभी अन्न की बरबादी करने कआ साहस नहीं जुटा सकेगा।
        यदि मनुष्य भोजन को ईश्वरीय प्रसाद के रूप में मान ले तो वह अनाज को इस तरह कभी बरबाद नहीं कर सकता। जब उसके मन में यह भाव आ जाएगा कि अन्न भगवान का प्रसाद है, तब वह अपनी थाली में उतना ही भोजन लेगा जितना वह खा सकेगा। इस तरह करने से अनाज व्यर्थ नहीं जाएगा। जिसकी बरबादी का कारण भोजन थाली भर-भरकर लेना हैं और न खा सकने की स्थिति में झूठा छोड़ देना है।
        इसके विपरीत प्रसाद को लोग हाथ में लेकर खाते हैं और यदि गलती से वह कभी जमीन पर गिर जाए तो उसे उठाकर अपने माथे से लगाते हैं और फिर उसे खा लेते हैं। प्रसाद का एक भी दाना बरबाद नहीं कर सकते। इसे हम धर्मभीरूता भी कह सकते हैं।
        यदि अन्न को प्रसाद मान लेने से उसे बरबादी से बचाया जा सकता है तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है। हर हाल में अन्न का संरक्षण किया जाना चाहिए।
         यह अहं कदापि नहीं करना चाहिए कि हमारे पास पैसा है तो हम मँहगा-सस्ता कैसा भी हो अनाज खरीद कर अपना पेट भर सकते हैं। अब यह अन्न हमारा है हम चाहे इसे खाएँ या बरबाद करें किसी को हमसे क्या लेनादेना?
        यह प्रवृत्ति बहुत कष्टप्रद है। हम शादी-ब्याह या पार्टियों में अन्न को बरबाद होते हुए देखते हैं। मन को पीड़ा होती है। यही भोजन यदि किसी भूखे व्यक्ति को खाने के लिए दिया जाए तो उसका पेट भर जाए और उसके मन से कितनी ही दुआएँ निकलेंगी। बड़े ही जब इस ओर ध्यान नहीं देते तो बच्चों को वे अन्न को सुरक्षित रखने के लिए क्या समझाएँगे?
         भारतीय सस्कृति में अन्न को ब्रह्म कहते हैं। अन्न का अनादर करना ईश्वर का अपमान करना माना जाता है। इसीलिए भोजन खाने के समय जब थाली में अन्न परोसा जाता है तो पहले हाथ जोड़कर प्रार्थना की जाती है।
         उपनिषद का यह कथन है -  ‘जो अन्न को नष्ट करता है, अन्न उसे नष्ट कर देता है।’ इसलिए अन्न को न सही स्वयं को बचाने के लिए ही अन्न का सम्मान कर लेना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 17 सितंबर 2016

व्यापक और व्याप्त

ईश्वर को हम सर्वव्यापक मानते हैं। वह इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में व्याप्त है। उस परमात्मा की सत्ता का हम अनुभव तो कर सकते हैं पर उसे इन भौतिक चक्षुओं से देख नहीं सकते।
          उसकी इस व्याप्ति का अर्थ हम कर सकते हैं - व्याप्त होने की अवस्था या भाव, विस्तार या फैलाव और सभी अवस्थाओं में प्रायः व्याप्त होने का भाव।
          व्याप्ति के हम दो भेद कर सकते है- 1 संयोग व्याप्ति  2 स्वरूप व्याप्ति
         संयोग व्याप्ति-  इसमें अलग-अलग चीजों का मिलना संयोग होता है। हम दूध और चीनी दो अलग-अलग पदार्थ लेते हैं। यदि दूध में चीनी को मिला दो तो वह दूध में घुल-मिलकर उसी का ही भाग बन जाती है। तब उन दोनों को पृथक करना किसी के लिए भी नामुमकिन हो जाता है। इसी प्रकार आटे में मिलाए नमक को भी हम अलग नहीं कर सकते।
        स्वरूप व्याप्ति-  इसका तात्पर्य है एक ही पदार्थ का स्वरूप परिवर्तित हो जाना। स्वर्ण से यदि हम आभूषण बनाते हैं तो सोने का मात्र रूप बदलता है, इस समय भी वही सोना उसमें रहता है।
         इसी प्रकार ईश्वर और प्रकृति दोनों वैसे तो अलग-अलग हैं पर प्रकृति भी उसी ईश्वर का ही रूप है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी, ग्रह-नक्षत्र, नदियाँ, पर्वत, सागर, पेड़-पौधे सभी उसके ही रूप हैं। इसीलिए इनकी समय-समय पर इनकी उपासना भी की जाती रहती है।
        जब ईश्वर ने कामना की तो उसने अपनी परमात्मा में से अनेक अंश बनाकर जीवों की सृष्टि कर दी। जलचर, नभचर और भूचर सभी जीवों की मालिक ने रचना की। हम मनुष्यों को भी उसने रचा। इन सभी जीवों में व्याप्त उस परमपिता परमात्मा की छवि को हम चाहें तो देख सकते हैं।
        यहाँ तर्कशास्त्र का उदाहरण प्रस्तुत करती हूँ। वह कहता है-
              'यत्र यत्र धूम: तत्र तत्र वह्नि:।'
अर्थात जहाँ जहाँ धुआँ होता है वहाँ वहाँ पर अग्नि होती है।
        कहने का तात्पर्य यही है कि दूर बैठे व्यक्ति को जलती हुई आग नहीं दिखाई दे रही, उसे केवल उड़ता हुआ धुआँ दिखाई दे रहा है। इसका यह अर्थ तो नहीं हो सकता कि सिर्फ धुआँ ही है, आग नहीं। दूसरे शब्दों में कहें तो बिना आग के धुआँ हो ही नहीं सकता।
         व्याप्ति का पूर्ण रूपेण ज्ञान हो गया है यह नहीं माना जा सकता। व्याप्ति का अन्तर् अर्थात मन से प्रत्यक्ष होता है, यह मान्य नहीं हो सकता क्योंकि अन्त:करण या मन बाह्य इन्द्रियों के सर्वथा अधीन होता है। इसीलिए कभी भी मन स्वतन्त्र रूप से बाह्य विषयों को ग्रहण करने के लिए उद्यत नहीं देखा जाता है। व्याप्ति के इस अनुमान का प्रमाण से साक्षात्कार सम्भव नहीं होता।
        अन्य पदार्थों का विश्लेषण न करके हम अपने बारे में विवेचना करते हैं। हम सारा समय साँस लेते हैं, यह वायु हमारी जीवनी शक्ति कहलाती है। फिर भी हम उस वायु को प्रत्यक्ष रूप से नहीं देख सकते, केवल उसका अनुभव कर सकते हैं।
        मन को भी हम नहीं देख सकते, बस यही जानते हैं कि वह है जो हम सबको अपने वश मे करके रखता है। हम उसी के कहे अनुसार उठते-जागते हैं यानी दुनिया के सारे व्यापार करते हैं। चाहकर भी हम उसको नकार नहीं सकते।
        जीव के गुण-दोष आदि सभी स्वभाव के अंश हैं जिन्होंने मात्र अनुभव किया जा सकता है, उन्हें अपनी इन आँखों से देख या छूकर परख नहीं सकते। इसी प्रकार एक नन्हें से बीज में कहीं भी विशाल वृक्ष दिखाई नहीं देता परन्तु समय रहते वह बीज उस महान वृक्ष में परिवर्तित हो जाता है। परिणाम को देखकर हम ये सब अनुमान लगाते रहते हैं। लकड़ी में व्याप्त अग्नि को भी हम देख नहीं सकते पर उसे जलाकर प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं।
         उसी प्रकार  ब्रह्माण्ड के इस विस्तार को देखकर उस प्रभु के अस्तित्व का स्वतः ही बोध हो जाता है। इस पर भी कोई व्यर्थ ही विवाद करे अथवा उसकी परम सत्ता को स्वीकार न करते हुए उसे चुनौती दे तो उससे बड़ा मूर्ख इस संसार में और कौन हो सकता है?
चन्द्र प्रभा सूद
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