मंगलवार, 24 जनवरी 2017

पारस पत्थर

पारस पत्थर के विषय में बहुत सुना है। कहते हैं लोहे को यदि पारस पत्थर छू ले तो लोहा सोना बन जाता है। सोचना यह है कि पारस पत्थर में ऐसी क्या विशेषता है कि वह लोहे को सोना बनाता है।
      हम में से किसी ने ऐसा पत्थर नहीं देखा पर प्रायः सुनते रहते हैं इसके विषय में। वैसे सुनने में बहुत अच्छा लगता है पर स्वप्न जैसा प्रतीत होता है। सभी सोचते हैं काश ऐसा पत्थर हमें मिल जाए तो हम मालामाल हो जाएँ। ऐसा नहीं हो पाता। सब ईश्वरीय इच्छा है यह कहकर संतोष कर लेते हैं। मिलना वही जो हमारे भाग्य में है न उससे अधिक और न उससे कम।
        हम उस काल्पनिक पत्थर की चर्चा तो करते हैं पर हमारे मध्य विद्यमान पारसों को अपने अहम के कारण नहीं पहचान पाते। आप कहेंगे कि यह क्या मजाक है? यदि हमारे आसपास पारस है तो फिर हमें दिखाई क्यों नहीं देता?
        इन सब प्रश्नों के उत्तर में यही कह सकते हैं कि हमारे बीच विद्यमान हंस की भाँति नीरक्षीर विवेकी महापुरुष ही पारस हैं। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि उन्हें अच्छे व बुरे की पहचान होती है। जिस तरह हंस पात्र में पड़े हुए दूध में से दूध और पानी को अलग-अलग कर देता है। उसी प्रकार ये सज्जन पुरुष भी हित-अहित के विषय में हमें चेताते रहते हैं।
         विवेकशील होना ही उनका सर्वोपरि गुण होता है। अपने इस गुण के कारण वे दूसरों में भी सोचने-समझने की शक्ति को विकसित करना चाहते हैं। हम सबके हित चिन्तक  वे सदा हमें सन्मार्ग की ओर प्रवृत्त करते हैं।
       वे महापुरुष या सज्जन इसीलिए हैं कि वे बादलों की तरह जो भी इस संसार से लेते हैं उसे अपने पास न रखकर समाज के हित में लगा देते हैं। वे ऐसे फलदार वृक्ष होते हैं जो अपना सर्वस्व देश, धर्म व समाज के लिए अर्पित कर देते हैं।
        नारियल के फल की तरह वे मन से सहृदय होते हैं ऊपर से चाहे वे कितने ही कठोर दिखाई दें। उनकी कठोरता भी हमारे लिए हितकारी होती है। महाकवि कालिदास ने इस विषय पर मेघदूतम् में कहा है-
            याञ्चा मोघा अधिगुणे नाधमे लब्धकामा।
अर्थात् सज्जन यदि हमारी याचना को ठुकरा दें तो वह दुर्जनों द्वारा पूरी की गई उस प्रार्थना से अधिक अच्छी है।
      यह श्लोकांश यही स्पष्ट करता है कि सज्जन निस्वार्थ होते हैं और यदि हमारी किसी विनती को ठुकराते हैं तो हमारे भले के लिए होता है। दुर्जन हमेशा दूसरों का अहित चाहते हैं। इसलिए उनकी सहायता भी हानिकारक होती है।
       पारस रूपी इन महानात्माओं के संसर्ग में आकर मूर्ख से मूर्ख मनुष्य भी सोना बन जाता है। डाकू वाल्मीकि इसी प्रकार सोना बनकर घर-घर में श्रद्धा से पढ़ी जाने वाली रामायण के रचनाकार बने। अंगुलीमाल डाकू महात्मा बुद्ध के संपर्क से महान संत बने। महामूर्ख कालिदास विद्वानों के सहयोग से महकवि बनकर आज भी विश्व में नक्षत्र की तरह चमक रहे हैं। इतिहास में हमें अनेकों उदाहरण मिल जाएँगें जहाँ लोहे जैसे अज्ञानी सोना बने और उन्होंने संसार को दिशा दी।
        हमें ऐसे पारसों को श्रमपूर्वक ढूंढ कर उनका सानिध्य करना चाहिए ताकि हमारे हृदयों में विद्यमान लौह तुल्य बुराइयों से मुक्त होकर हम पारस रूपी सद् गुणों से युक्त होकर संसार में अपना एक स्थान बना पाएँ। इनके साथ से हमारा चहुंमुखी विकास निश्चित है। अत: घाटे का सौदा छोड़ कर यथासंभव अपना हित साधने का यत्न करें।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 23 जनवरी 2017

आध्यात्म ज्ञान

हमारी वाणी, हमारी श्रवण इन्द्रिय, हमारी नासिका या घ्राण शक्ति, हमारी आँखें, हमारा, हमारा प्राण आदि हमारे होते हुए भी हमारे नहीं होते। अर्थात कुछ समय पश्चात हमारा साथ छोड़ देते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो ये हमें साधन के रूप में निश्चत समय के लिए मिलते हैं। यदि इनका उपयोग हम आत्मोन्नति के लिए करते हैं तो ईश्वर तक पहुँचने की सीढ़ियाँ चढ़ते हैं। अन्यथा चौरासी लाख योनियों में भटकते रहते हैं।
         ईश्वर हमारी इन भौतिक इन्द्रियों की पहुँच से परे है। उसका साक्षात्कार अपने हम ज्ञान चक्षुओं से कर सकते हैं। इस आत्म साक्षात्कार करने की कोई आयु नहीं होती। सौतेले भाई को पिता की गोद में देखकर पिता की गोद में बैठने के लिए मचलने वाले बालक ध्रुव को उसकी माँ ने परमपिता परमात्मा की गोद को पाने के लिए प्रेरित किया। नारद जी के मार्गदर्शन में उसने छोटी-सी अवस्था में यह कठिन अथवा असम्भव-सा प्रतीत होने वाला कार्य कर दिखाया। ऐसी मान्यता है कि आकाश में चमकने वाला और सबको मार्ग दिखाने वाला ध्रुव तारा वही बालक ध्रुव है।
        कठोपनिषद में एक कथा आती है कि ऋषि वाजश्रवा ने मुक्ति की कामना से यज्ञ किया और अपना सर्वस्व दान करने के लिए निश्चय किया। जब दान करने का समय आया तो उनके मन में मोह उत्पन्न हो गया। वे ऐसी गौवें दान करने लगे जो वृद्ध हो चुकी थीं और दूध नहीं देती थीं। उनका पुत्र नचिकेता बालक था। पिता को ऐसा करते देखकर उसे दुख हुआ। उसने पिता से कहा कि मैं आपका सबसे प्रिय हूँ- "मुझे दान में किसको दोगे।"  
          दो-तीन बार उसके पूछने पर पिता ने कहा- "तुझे यमराज यानि मृत्यु के देवता को देता हूँ।"
         यह सुनते ही बालक यमराज के घर गया। वे कहीं गए हुए थे, घर पर नहीं थे, तीन दिन के बाद लौटे।बालक वहीं घर के बाहर बैठकर ही भूखा-प्यासा रहकर उनकी प्रतीक्षा करता रहा। यह जानकर यमराज को बहुत दुख हुआ। उन्होंने उसे तीन वरदान माँगने के लिए कहा।
पहले वर मे नचिकेता ने माँगा- "उसके पिता शान्त संकल्प हों, प्रसन्न मन हों, क्रोध रहित हों और जब मैं यहाँ से लौटकर घर जाऊँ तो मुझसे प्रसन्न होकर बोलें।"
           इतना सब होने के बाद भी वह अपने पिता से नाराज नहीं था। दूसरे वरदान में उसने स्वर्ग साधक अग्नि का उपदेश देने के लिए उनसे कहा। उसकी कुशाग्र बुद्धि से प्रसन्न यमराज ने इस अग्नि का नाम  'नचिकेता अग्नि' रख दिया। फिर उसे तीसरा वरदान माँगने के लिए कहा। संसार की असारता को समझने वाले उस बच्चे ने आत्म ज्ञान का उपदेश देने के लिए कहा।
          यमराज ने उसे धन-सम्पत्ति, दीर्घायु, राज्य सुख, स्वर्ग के नानाविध सुख, सभी मनोकामनाओं की पूर्ति आदि अनेकानेक भौतिक वस्तुओं का लालच दिया पर वह नहीं माना। अन्तत: यमराज ने उसे फिर 'अध्यात्म योग' अर्थात इन्द्रियों को वश में करने का उपदेश दिया। ऐसा कर पाने से इन्द्रियाँ विषय भोगों की ओर आकृष्ट होकर भटकती नहीं हैं, ईश्वर की ओर उन्मुख होने लगती हैं।
         बालक नचिकेता का यमराज से आत्मज्ञान की जिद करना और बालक ध्रुव का जंगलों में जाकर प्रभु प्राप्ति के लिए कठोर तप करना, इसी सत्यता का द्योतक है कि यह संसार मिथ्या है। सत्य केवल परमात्मा है, जिसे पाने के लिए जन्म-मरण का यह प्रपंच रचा गया है।
          आत्मज्ञान को समझना बच्चों का खेल नहीं। बड़े-बड़े ज्ञानी-ध्यानी भी राह भटक जाते हैं, इन बच्चों ने इसे मुमकिन कर दिखाया। मनुष्य चाहे अथवा इच्छाशक्ति को दृढ़ कर ले तो वह कुछ भी पा सकता है। आत्मज्ञान द्वारा जन्म-मरण के बंधन से मुक्त होकर मोक्ष की प्राप्ति कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 22 जनवरी 2017

माँ के चरणों में स्वर्ग

माता के चरणों में सभी स्वर्गिक सुख मिलते हैं। दूसरे शब्दों में माँ का मूल्य स्वर्ग के सुखों से कहीं बढ़कर है। शास्त्रों और मनीषियों ने ऐसा सोच-समझकर ही कहा होगा।
        हर धर्म स्वर्ग की कल्पना करता है। ऐसा माना जाता है कि उन सुखों को पाने के लिए मनुष्य को कठोर तपस्या करनी पड़ती है। तभी मरणोपरान्त उसे स्वर्ग में जाने का अवसर मिलता है। वहाँ जाकर वह सभी प्रकार के सुखों का भोग करता है। अन्यथा नरक में जाकर उसे भयंकर दुखों और कष्टों को सहन करना पड़ता है।
        ईश्वर ने माँ को अपने प्रतिनिधि के रूप में भेजा है। जिसकी गोद का सुख लेने के लिए देवता भी आतुर रहते हैं। फिर हम मनुष्यों की क्या बात करनी? हमें मनुष्यों को तो मालिक ने यह सुख भरपूर दिया है। जो सुख, सुरक्षा और शान्ति बच्चे को माँ की गोद में मिलती है वह अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलती। इसीलिए हर बच्चा माँ की गोद में आने के लिए हर समय मचलता रहता है।
        रामायण में एक प्रसंग आता है कि रावण का वध करने के उपरान्त स्वर्णमयी लंका का राज्य भगवान श्रीराम ने उसके छोटे भाई विभीषण को सौंप दिया। उस समय लक्ष्मण को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा था-
         अपि स्वर्णमयी लंका न मे रोचते लक्ष्मण।
         जननी  जन्मभूमिश्च  स्वर्गादपि  गरीयसी।।
अर्थात हे लक्ष्मण! मुझे स्वर्णमयी लंका भी पसन्द नहीं आती। उसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि जननी या माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
       इस श्लोक का यही अर्थ है कि माँ के चरणों में ही दुनिया के सारे ऐश्वर्य है। जो बच्चा अपनी माँ की आजन्म सेवा करता है, उसे दुनिया में सब कुछ मिलता है। आप पूछेंगे- कैसे?
         इसके उत्तर में मैं केवल यही कहना चाहती हूँ कि जिस मनुष्य की माँ उससे सदा प्रसन्न व सन्तुष्ट रहती है, उसे माता अपने आशीर्वादों की दौलत से मालामाल करती है। ऐसी मान्यता है कि आशीर्वाद फलदायी होते हैं। ऐसे बच्चों का यश दूर-दूर तक फैलता है। घर-परिवार और समाज में सर्वत्र लोग उसे सम्मान की नजर से देखते हैं। समाज में सभी लोग उसके उदाहरण देते हैं। ऐसे लोगों का साथ देने वाले लोग बढ़ते रहते हैं। यानी उसका बाहूबल बढ़ता है।
        जिसने माँ को भगवान मानकर उसकी पूजा-अर्चना की, उसे मन्दिर में जाकर माथा रगड़ने की आवश्यकता नहीं रह जाती। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि माँ के प्रति अपने दायित्वों का बखूबी निर्वहण करना चाहिए। उसके खानपान का ध्यान रखना चाहिए, अस्वस्थ होने पर इलाज करवाना चाहिए। वृद्धावस्था में उसकी छोटी-छोटी जरूरतों को पूरा करना चाहिए।
         घर में बैठी हुई वह उसकी चौकसी करती है। जब तक वह घर में विद्यमान रहती है तब तक घर में ताला लगाने की कोई आवश्यकता नहीं होती। बेटा-बहू अपने कार्यालय जाते हैं तो उन्हें माँ के रहते बच्चों की चिन्ता नहीं रहती। कभी घूमने-फिरने भी जाते हैं तो बच्चों को घर छोड़कर जा सकते हैं।
         पिता एक बार शराब आदि का नशा करके या जुआ आदि खेलकर मस्त रह सकता है पर माता बच्चे के हर सपने को पूरा करने का यत्न करती है। उसकी हर मोड़ पर सहायक बनती है। पिता अकेले सन्तान को नहीं पाल सकती परन्तु माता उसका पोषण करती है। वह माँ के साथ-साथ वह पिता के भी सारे दायित्वों को पूर्ण करती है।
        दादी के बनकर अपने पोते-पोतियों को कहानियों के माध्यम से संस्कारित करने का कार्य करती है। माँ जीवन के हर पड़ाव पर अपने दायित्वों को बखूबी निभाती है।
        इसीलिए माँ का स्थान बहुत उच्च होता है। उसे देवता कहकर मान दिया जाता है। जैसे परमपिता परमेश्वर के पास जाकर मनुष्य को मुक्ति मिलती है, उसी प्रकार माँ के पास जाकर अपने कष्टो को भूल जाता है। तभी माँ के चरणों में स्वर्गं माना जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 21 जनवरी 2017

सौतेली माँ

माँ तो माँ होती है चाहे वह अपनी सगी माँ हो या सौतेली। सौतेली माँ की छवि हमारे दृष्टिपटल पर कोई अच्छा भाव लेकर नहीं आती। इसका कारण है कि सौतेली माँ के विषय मे हमने जितना पढ़ा है या सुना है, उसके अनुसार उसका नकारात्मक चरित्र ही अधिकाँशत: हमारे समक्ष चित्रित किया जाता है।
         इन सबसे उसके विषय में ऐसी धारणा बनती है कि वह बहुत अत्याचारी होती है। बच्चों के प्रति असहिष्णु होती है। उन्हें मारती-पीटती है, उनसे घर का सारा काम करवाती है। खाने और पहनने के लिए नहीं देती। वह पति की पहली पत्नी के बच्चों से बहुत नफरत करती है।
         इसका समर्थन करने वाले बहुत से उदाहरण हमारे समक्ष हैं। भगवान राम की सौतेली माता कैकेयी ने रातोंरात उनका राजतिलक रुकवाकर उन्हें चौदह वर्ष के लिए जंगलों में भटकने के लिए विवश कर दिया था। उसने अपने पति राजा दशरथ की एक भी नहीं सुनी बल्कि उनकी अवमानना ही की।
         भक्त ध्रुव की सौतेली माता ने उस छोटे बच्चे को अपने पिता की गोद में नहीं बैठने दिया। फलस्वरूप उसने महर्षि नारद के आदेशानुसार वन में जाकर कठोर तपस्या की और भक्त ध्रुव कहलाया। ऐसी मान्यता है कि वह आज आकाश में चमकने वाला ध्रुवतारा बनकर सबका मार्गदर्शन करता है।
         इसी प्रकार जिन राजाओं की अनेक पत्नियाँ होती थीं, वहाँ परस्पर ईर्ष्या के चलते अथवा राज्य सत्ता के लालच में षडयन्त्र करके, सौतेली सन्तानों को अनेकानेक यातनाएँ देना, विष देना अथवा उन्हें जान से मरवा देना बहुत सामान्य-सी बात होती है। जिन जातियों में बहु पत्नी प्रथा होती है, वहाँ पर भी कमोबेश ऐसी ही स्थितियाँ होती हैं।
        ऐसे अनेक उदाहरण इतिहास की खोज करने पर मिल सकते हैं जहाँ सौतेली माँ के षडयन्त्रकारी अत्याचारों का वर्णन मिलता है।
        हम अपने आसपास भी कई ऐसी माताओं को देख सकते हैं जिन्हें सौतेली माँ के नाम से अभिहित किया जाता है। इस सौतेली का नाम बहुत बदनाम है। वह कितनी भी अच्छी बनने की कोशिश करे या सौतेले बच्चों की बढ़िया परवरिश करे, फिर भी वह सौतेली ही कहलाती है।
         समाज में ऐसा होता है कि किसी बच्चे की माता की मृत्यु हो जाती है और उसका पिता यदि पुनः विवाह न करना चाहे तो घर-परिवार के लोग उसके पीछे पड़ जाते हैं। परन्तु यदि वह विवाह कर लेता है तो सौतेली माँ के आने से पहले ही उसकी क्रूर छवि उस मासूम बच्चे के मन में बिठा देते हैं। इससे वह बच्चा अनजाने में ही उससे डरने लगता है और नफरत कर बैठता है। इस तरह उन दोनों में न चाहते हुए भी घृणा का रिश्ता बन जाता है जो घर के लिए किसी भी तरह उचित नहीं होता।
          बच्चे अपनी माँ के लिए पोसेसिव होते हैं। कभी-कभी कुछ बच्चे अपनी नई सौतेली माँ को स्वीकार नहीं कर पाते। अपनी माँ के वस्त्र, आभूषण आदि उसके ले लेने पर घर में तूफान खड़ा कर देते हैं। इस तरह अनजाने में ही घर का माहौल बोझिल होकर बिगड़ जाता है।
         टी.वी. धारावाहिकों और फिल्मों में इस सौतेली माता के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही रूपों को प्रमुखता से दर्शाया जाता है।
         बहुत-सी सौतेली माताएँ देखी हैं जिन्होंने बच्चों को कभी सौतेला माना ही नहीं। उन्होंने उन बच्चों को ही अपनी सगी सन्तान की तरह मानकर अपने बच्चों की कामना ही नहीं की। सौतेले बच्चों को अपने कलेजे का टुकड़ा मानकर उनका पालन-पोषण किया। ऐसी ही माताएँ बच्चों के दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिणत कर देती हैं।
        घर-परिवार का यह दायित्व बनता है कि वे आने वाली सौतेली माँ की बुराइयाँ करके बच्चे को भयभीत नहीं करें और न ही उसके कोमल मन में नफरत के बीज बोएँ। उन दोनों के सम्बन्धों में तालमेल बिठाने और मधुर बनाने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

मातृविहीन बच्चे

मातृविहीन बच्चे से बढ़कर अभागा कोई और इन्सान नहीं हो सकता। कुछ बच्चे बहुत दुर्भाग्यशाली होते हैं जिनकी माता उन्हें जन्म देते ही परलोक सिधार जाती है। कुछ बच्चों की माता उनकी बाल्यावस्था में ही इस असार संसार से विदा ले लेती है। इनके अतिरिक्त कुछ वे बच्चे होते हैं जिनके माता-पिता तलाक ले लेते हैं और उनकी कस्टडी पिता को मिल जाती है।
         ईश्वर की कुदरत है कि उसने माता को इतनी सामर्थ्य दी है कि अकेले रहते हुए भी वह अपनी सन्तान का पालन-पोषण बहुत अच्छे से कर लेती है। बच्चे को उसके पिता की कमी का अहसास नहीं होने देती। वह माता और पिता दोनों ही के दायित्वों का भली-भाँति निर्वहण कर लेती है।
          इसके विपरीत पिता अकेले सन्तान को पाल नहीं सकते। यदि दादा-दादी या नाना-नानी आदि का सहारा मिल जाए तो बच्चा प्यार-दुलार पाकर पल जाता है। फिर भी अपनी माँ की कमी से उबर नहीं पाता। परन्तु यदि ऐसी स्थिति न हो और पिता बच्चों के बेहतर भविष्य को देखते हुए अकेले रहने का फैसला कर लेता है, तब उसे बच्चे को आया अथवा नौकर के सहारे से ही पालना पड़ता है।
         इन सबसे बढ़कर यदि वह पुनः शादी कर लेता है तो आवश्यक नहीं कि आने वाली नई माँ बच्चे का ध्यान सगी माता की तरह रख पाए अथवा बच्चा अपनी नई माँ को अपनी माता के स्थान पर रख सके।
         इस परिस्थिति में बच्चा घर में नई माँ के साथ सामञ्जस्य नहीं बिठा पाता। इसलिए प्रतिदिन घर अखाड़ा बनता जाता है। दोनों में तनातनी या खींचतान चलती रहती है। इस तरह घर का माहौल सदा के लिए बोझिल हो जाता है। घर के सभी सदस्य परेशान रहते हैं।
        माँ की कमी ऐसे बच्चों को आजीवन खलती रहती है। वे कभी किसी के घर जाते हैं तो माँ का अपने बच्चे के साथ किए जाने वाले लाड-प्यार को देखते हैं तब उनके मन में यही भाव आता है कि काश उनकी भी माँ जीवित होती तो उन्हें भी ऐसा ही प्यार-दुलार मिलता। इसी तरह पार्टी या शादी-ब्याह के अवसर पर सब साथियों को अपनी माता के साथ देखकर वे अपनी माता को स्मरण करके भावुक हो जाते हैं।
         तलाकशुदा पति-पत्नी के बच्चे को उसके बेचारेपन का अहसास लोग यदा कदा करवाते रहते हैं। उनके साथी भी उन्हें मौके-बेमौके चिढ़ाते रहते हैं। उस समय पिता के पास रहने वाले बच्चे माँ की गोद में सिर रखकर रोने के लिए मचलते हैं।
         ईश्वर ने माँ को अपना रूप देकर, अपने प्रतिनिधि के रूप में पृथ्वी पर भेजा है। उसे तो हम देख नहीं सकते, उसकी गोद में बैठ नहीं सकते पर इस भौतिक माता से अपने सारे लाड लड़ा सकते हैं। इसके न होने की कल्पना मात्र से ही मनुष्य का हृदय काँप उठता है।
       नराभरणम् ग्रन्थ का कथन है कि यदि माता घर में नहीं है तो घर और जंगल में कोई अन्तर नहीं है-
          यस्य माता गृहे नास्ति भार्या चाप्रियभाषिणी।
          अरण्यं तेन  गन्तव्यं  यथारण्यं तथा  गृहम्।।
अर्थात जिसकी माता घर में नहीं है और पत्नी अप्रिय बोलने वाली है। उसे जंगल में चले जाना चाहिए। उसके लिए जैसा वन है, वैसा ही घर है। यानी माँ के होने से घर घर की तरह लगता है।
        इस श्लोक को यहाँ लिखने का मात्र यही उद्देश्य है कि मनुष्य माता के महत्त्व को समझे और आजीवन उसकी देखभाल व सेवा-सुश्रुषा करे। ऐसा न हो कि माँ के परलोक सिधार जाने के पश्चात मन में कसक रह जाए कि काश माँ के जीते जी उसे सुख दिया होता अथवा उसकी सेवा की होती।
         माँ का मूल्य वही बता सकते हैं जिनके पास उनकी माँ नहीं होती। वे तरसते हैं कि काश हमारी माँ होती तो हमारे जीने का अन्दाज ही बदल जाता। उसके साथ अपने मन की बात, अपने दुख और परेशानियाँ साझा कर सकते। उससे रूठते और वह मनाती। यह हसरत उन बच्चों के मन में सदा रहती है। कितने भी सफल व्यक्ति वे क्यों न बन जाएँ पर माँ की कमी को अनदेखा नहीं कर सकते। माँ तो माँ होती है, उसका स्थान इस संसार में कोई नहीं ले सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 19 जनवरी 2017

सात पतन के कारण

अपने जीवन में सदा सुख की कामना करने वाला इन्सान यदि इन सातों के फेर में फँस जाए तो उसके लिए जीना दुश्वार हो जाता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार, ईर्ष्या और स्वार्थ- ये सातों मनुष्य के पतन के कारक हैं।
     हमारे अंत:करण में विराजमान शत्रुओं में काम प्रमुख शत्रु है। इससे मित्रता करने वाले को शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है। एक सीमा तक ही हमें इसका उपभोग करना चाहिए।
      काम के वशीभूत होकर अपनी इस इन्द्रिय का दुरुपयोग करते हैं वे अगले जन्म में नपुंसक बनकर जन्म लेते हैं और समाज में हमेशा तिरस्कृत होते हैं। हमेशा ही वे अपने प्रारब्ध को कोसते रहते हैं। ऐसी ही सजा कुछ लोगों ने पिछले दिनों बलाकारी को देने की माँग की थी।        
       क्रोध सभी बुराइयों की जड़ है। संसार में बंधन कारण है, धर्म का नाश करने वाला बहुत बड़ा शत्रु है। यह विवेक यानी हमारी सोचने-समझने की शक्ति को नष्ट करता है। कहते हैं कि क्रोध में इंसान पागल हो जाता है। ऐसे क्रोधी को कोई भी पसंद नहीं करता। सभी उससे किनारा करने में ही अपनी भलाई मानते हैं।
        महर्षि परशुराम इतने विद्वान व शक्तिशाली थे परंतु फिर भी उन्हें समाज में यथोचित स्थान नहीं मिला।जितना अधिक इस शत्रु को गले लगाएँगे उतना ही घर, परिवार, मित्रों व समाज से कटते जाएँगे।
       लालच के कारण चोरी-डकैती, लूटमार, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, दूसरे का गला काटना, कालाबाजारी, टैक्सचोरी जैसे अपराध करने लगता हैं। लालच की रेस में दौड़ते हुए अपने प्रियजनों से मनुष्य कब विमुख हो जाता है उसे पता नहीं चलता। जब वह चेतता है तो स्वयं को अकेला पाता है। जब उसे अपनों के सहारे की आवश्यकता होती है वह उन्हें खो चुका होता है, तब वह पछताता है और स्वयं को धिक्कारता है।
       मोह मनुष्य को अन्धा बना देता है। इस कारण वह जायज-नाजायज काम कर बैठता है। कैकेयी का राम को वन में भेजना, भरत के लिए राज्य माँगना और राजा दशरथ की मृत्यु इसी के परिणाम हैं। इसी तरह धृतराष्ट्र ने अपने स्वर्गवासी भाई की सन्तानों का हक छीन लिया।
       मनुष्य अपने अहंकार में इतना चूर हो जाता है कि बाकी सारी दुनिया को अपने ठेंगे पर रख लेने का दम भरता है। उसकी सोच केवल मैं तक सीमित हो जाती है।उसे अपने बराबर अन्य कोई बुद्धिमान दिखाई ही नहीं देता। अपने अहम के कारण वह मनुष्य हर किसी को देख लेने का दम भरता है और दुनिया को आग लगा देने की गुस्ताखी करता है। हर कोई उसे कीड़े-मकौड़ों की तरह लगता हैं जिसे वह चुटकी बजाते ही मसलने की बात करता है।
        मनुष्य सुन्दरता, यौवन, विद्या, धन, शक्ति आदि पर घमंड करता है। ये सब समय बीतते नष्ट हो जाते हैं। रावण, कंस, दुर्योधन और हिरण्यकश्यप जैसे बली अहंकारी काल के गाल में समा गए।
        ईर्ष्या मनुष्य को जलाकर राख कर देती है। किसी भी क्षेत्र में अपने से आगे बढ़ने वालों को वह सहन नहीं कर सकता। उन्हें पटखनी देने के लिए षडयन्त्र रचता रहता है। कभी-कभी स्वयं भी उसका शिकार हो जाता है। दूसरों की उन्नति में खुश न होकर वह ईर्ष्या की अग्नि में जलता हुआ अपनी ही हानि कर बैठता है।
         स्वार्थ भी मनुष्य को कभी चैन से जीने नहीं देता। संसार की सारी नेमते सिर्फ उसकी प्रापर्टी बनकर रहें, यह विचार उस पर भारी पड़ जाते हैं। केवल मैं और मेरे परिवार वाली संकीर्ण मनोवृत्ति उसके सोच के दायरे को सीमित कर देती है। इसका दुष्परिणाम से उसे कोई नहीं बचा सकता।
        हमारी भारतीय संस्कृति हमें जो जीवन मूल्य अपनाने का विमर्श देती है, वे शायद ही अन्यत्र कहीं उपलब्ध हों। इन सबकी अनुपालना करके मनुष्य में दैवीगुण आते हैं व वह समाज में अपना अनुकरणीय स्थान बनाते हैं।
       ईश्वर ने मनुष्य को संसार में सर्वश्रेष्ठ जीव बनाकर भेजा है। इसे विवेक शक्ति का उपहार दिया है ताकि वह सोच-समझकर जीवन में आगे बढ़े। पतन के कारण पाँचों महाशत्रुओं, ईर्ष्या और स्वार्थ को अपने वश में करके मनुष्य इहलोक और परलोक संवार सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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