बुधवार, 22 फ़रवरी 2017

गुरु-शिष्य की कसौटी

गुरु की प्रशस्ति में साहित्य में बहुत कुछ लिखा गया है। 'गुरुगीता' नामक एक अलग से भी एक पुस्तक है, जिसके श्लोकों में गुरु का यशोगान किया गया है। यह भी सत्य है कि अपने शिष्यों के जीवन निर्माण में उसकी भूमिका सक्रिय होती है, जिसे हम प्रशंसनीय कह सकते हैं। वह कुम्हार के पात्रों की भाँति अपने शिष्यों के जीवन को गढ़ता है।
       गुरु और शिष्य एक-दूसरे के पूरक होते हैं। दोनों अन्योन्य आश्रित होते हैं। गुरु शब्द का उच्चारण करने मात्र से ही उसके शिष्यों की परिकल्पना भी कर ली जाती है। शिष्य के बिना गुरु को पूछता ही कौन है? इसीलिए वह तब तक अधूरा रह जाता है, जब तब उसके पास शिष्यों की प्रभूत संख्या न हो। उस समय तक समाज में उसके अस्तित्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती।
          गुरु का गुरुत्व उसके शिष्यों की योग्यता की कसौटी पर परखा जाता है। यदि शिष्य विद्वान होते हैं तो गुरु का कद यानी गौरव कई गुणा बढ़ जाता है। इसके विपरीत अयोग्य शिष्यों का गुरु परम विद्वान होते हुए भी समाज में उतना मान-सम्मान नहीं प्राप्त कर पाता, जिसका वह अधिकारी होता है। अतः शिष्यों के गुण, कर्म और स्वभाव से ही गुरु की पहचान बनती है।
          वैसे तो माना यही जाता है कि गुरु हर प्रकार से परखकर अपने लिए शिष्य का चयन करता है। इसी प्रकार शिष्य को भी समझबूझकर यानी ठोक-बजाकर ही अपने लिए गुरु का चुनाव करना चाहिए। अन्यथा भेड़चाल के कारण बाद में उसे पछताना पड़ सकता है। उस समय मर्माहत होने से पहले सावधानी बरतना सर्वथा उचित होता है।
        निम्न पंक्ति में गुरु के लिए चेतावनी दी गई है -
         वरं न शिष्यो न कुशिष्यशिष्यो।
अर्थात एक मूर्ख का गुरु होने से श्रेष्ठ है कि वह बिना शिष्य वाला रहे।
         यह पंक्ति स्पष्ट कर रही है कि यदि शिष्य अयोग्य सिद्ध होता है तो वह गुरु की हार होती है। उससे जिसका भी सम्पर्क होता है वह सबसे पहले यही पूछता है - 'किसने तुम्हें पढ़ाया है? कहाँ से शिक्षा ग्रहण की है? तुम्हें वहाँ ऐसे ही पढ़ाया जाता है?'
         इन प्रश्न को पूछने का सीधा-सा यही तात्पर्य होता है गुरु पर आक्षेप लगाना। इन प्रश्नों का यह अर्थ भी कर सकते हैं कि उसका गुरु ही मानो उस व्यक्ति की सम्पूर्ण मूर्खताओं का उत्तरदायी है। समाज में उस गुरु पर भी एक प्रश्नचिह्न अवश्य लग जाता है। इसी कड़ी में गुरु को समझाते हुए कवि ने कहा है -
         कुशिष्यमध्यापयतः कुतो यशः।
अर्थात एक कुशिष्य को शिक्षा देकर कीर्ति कैसे प्राप्त हो सकती है?
         इस उक्ति को पढ़कर यही कहा जा सकता है कि गुरु की सफलता उसके अपने शिष्य पर ही निर्भर करती है। यदि शिष्य जीवन में सफल हो जाता है और योग्य बन जाता है तो उसके साथ-साथ उसके गुरु को भी उसका श्रेय मिलता है। इसी तरह यदि वह शिष्य योग्य नहीं बन पाता और जीवन में असफल हो जाता है तो उसका दोष स्वभावत: गुरु के माथे ही मढ़ दिया जाता है।
         इसीलिए कवि ने गुरु को सचेत करने का प्रयास किया है कि कुशिष्य को शिक्षा देने का कोई लाभ नहीं होता। उससे गुरु को समाज में यश के स्थान पर सदा ही अपयश मिलता है। अपनी सोसाइटी में भी उसकी और उसके शिष्यों की चर्चा समय-समय पर होती रहती है। वहाँ पर भी उसकी असफलता ही प्रमुख विषय बना रहता है।
         इस प्रकार की मन्दबुद्धि वाले शिष्य प्राचीनकाल में गुरुकुल में गौवें चराया करते थे। उनका सारा समय ऐसे ही व्यर्थ चला जाता था।अब जब कोई कुमति ज्ञानार्जन करना ही न चाहे तो गुरु लाख अपना सिर पटक ले, कुछ भी लाभ नहीं हो सकता। इसलिए उपयुक्त यही है कि उसकी ओर से अपना ध्यान हटाकर योग्य को ज्ञान का लाभ दिया जाए। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि मन्दमति के लिए प्रयास करना छोड़ दिया जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

दूसरों में बुराई खोजना

दूसरों की गलतियों को यत्नपूर्वक खोजते हुए हम छिद्रान्वेषी बन जाते हैं। स्वयं को दूध का धुला मानकर हम चैन की बंसी बजाने लगते हैं। यद्यपि व्यवहारिकता में ऐसा नहीं होता। इस सृष्टि में कोई भी मनुष्य सर्वगुण सम्पन्न नहीं है।हर मनुष्य में कोई-न-कोई कमी अवश्य होती है। यदि किसी मनुष्य में कोई बुराई नहीं होगी तो वह ईश्वर तुल्य बन जाएगा।
         बुराइयों और बुरों को खोजना कोई समझदारी का काम नहीं है। हममें पता नहीं कितनी बुराइयाँ होंगी जिनके विषयमें हम सोचते नहीं हैं। उस ओर से अपनी आँखे मूँद लेते है। इसीलिए कहा है-
        बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोए
        जो मन खोज आपना मुझसे बुरा न कोए॥
अर्थात मैं बुरे व्यक्ति को ढूँढने निकला परन्तु मुझे कोई भी बुरा नहीं मिला। जब मैंने अपने भीतर, अपने मन में खोजा तो मुझे पता चल गया कि मुझसे बुरा कोई और नहीं है। अर्थात मेरे अंदर बुराइयों की कोई कमी नहीं है।
        दूसरों में बुराई की खोज करते हुए हम अनजाने ही अपने अंतस में बुराइयों को जमा करने लगते हैं। यह जान ही नहीं पाते कि कब मानवीय मूल्यों को ताक पर रखते हुए, आँखों पर स्वार्थ की पट्टी बाँधकर हम कूप मण्डूक की तरह बन जाते हैं। तब हमें स्वयं की बुराइयाँ नजरअंदाज करने की आदत पड़ जाती है।
         सच बात तो यह है कि मनुष्य को अपने मित्रों और बन्धुओं को सदा उनकी अच्छाइयों और बुराइयों दोनों के साथ ही स्वीकारना होता है। अगर वह ऐसा नहीं कर सकता और दूसरों की बुराइयों को ढूँढकर सदा उन्हें अपमानित करता रहता है तो सबसे कटकर अलग-थलग पड़ जाता है। हर व्यक्ति यथायोग्य सम्मान चाहता है, अनादर नहीं। सभी लोग उस व्यक्ति को अहंकारी कहकर स्वयं ही किनारा कर लेते हैं। कोई भी उसे सम्मान की दृष्टि से नहीं देखेगा।
        मनुष्य जैसा करता है वैसा ही फल पाता है। यानि मनुष्य को जीवन में वही मिलता है जो वह बोता है। यदि वह नफरत की खेती करेगा तो उसे नफरत मिलेगी और प्यार व अपनेपन की खेती करेगा तो उसके हिस्से में प्यार व अपनापन ही आएँगे। इसीलिए निन्दक अपने करीब रखने की सलाह दी गई है ताकि साबुन और पानी के बिना हमारी बुराइयों को दूर करके हमें एक अच्छा इन्सान बनने में मदद करे।
         कभी-कभी मनुष्य सोच लेता है कि उसने बड़ी सावधानी से लुक-छिपकर अपने गलत कार्य को अंजाम दिया है। किसी को क्या पता चलेगा? हमेशा उसकी सफेदपोशी बनी रहेगी, पर ऐसा होता नहीं है। उसकी की गई बुराई स्वयं ही उसका रास्ता रोककर खड़ी हो जाती है। तब वह हतप्रभ हो जाता है।
       हमारा प्रयास यही होना चाहिए कि हम दूसरों की बुराइयों की ओर ध्यान न दें। जैसा वे करेंगे स्वयं उसका भुगतान कर लेंगे। हम दूसरों को समझा सकते हैं पर विवश नहीं कर सकते। हमें केवल अपने दोषों की ओर देखना है और यथासम्भव उनको यत्नपूर्वक ढूँढकर दूर करना है। मनुष्य चाहे तो उसके लिए कुछ भी कर पाना असम्भव नहीं है।
         सार रूप में यही कह सकते हैं कि अपनी बुराइयों को तो हर हाल में हमें दूर करना पड़ेगा। यह शुभ कार्य हम आज ही कर लें चाहे वर्षों या कई जन्मों के पश्चात। इनसे मुक्त हुए बिना हम कभी मुक्त नहीं हो सकते। तब जन्म-मरण के चक्र में फंसे हम मनुष्यों को फिर चौरासी लाख योनियों में  भटकना ही पड़ता है। मनुष्य को उससे कोई नहीं बचा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

कुशासन में रहना असुरक्षित

यदि किसी देश में कुशासन हो तो समझ लेना चाहिए कि वह देश संक्रमण काल से गुजर रहा है। वहाँ अराजकता का साम्राज्य बना रहता है। उस देश की जनता में भ्रष्टाचार, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी, अनैतिक व्यवहार आदि का प्रचलन बढ़ने लगता है। वहाँ परस्पर आत्मीयता, भाईचारा और विश्वास जैसे नैतिक गुण समाप्त होने की कगार पर पहुँच जाते हैं।
          इसीलिए मनीषियों ने स्पष्ट निर्देश दिया है-
              वरं न राज्यं न कुराजराज्यम्।
अर्थात कुराज्य का राजा होने से अच्छा यही है कि व्यक्ति किसी राज्य का राजा ही न बने।
        प्रायः देशों में आजकल राजप्रथा का प्रचलन नहीं है। यहाँ हम देश के सर्वोच्च पद पर आसीन उस व्यक्ति को राजा के पद पर विद्यमान मान सकते हैं, जिसके हाथ में सत्ता की कुञ्जी होती है। यह पंक्ति हमें समझा रही है कि ऐसे कुराज्य का राजा होने से राजा न होना ही श्रेयस्कर है। ऐसे राज्य का राजा होना कोई गौरव का विषय नहीं है।
         ऐसे राजा के समक्ष डर के कारण कोई निन्दा करे चाहे न कर सके परन्तु परोक्षत: उसकी कुचर्चा ही होती रहती है। सर्वत्र उसकी आलोचना होती है।
         इसी कथ्य को आगे बढ़ाते हुए साथ में यह भी कहा है कि-
             कुराजराज्येन कुतः प्रजासुखम्।
अर्थात कुशासित राज्य में प्रजा को सुख कहाँ?
        कहने का तात्पर्य मात्र इतना ही है कि जिस देश में सुशासन कुशासन में बदल जाता है, वहाँ नैतिक मानवीय मूल्यों का अवमूल्यन अर्थात् ह्रास हो जाता है, उस देश की प्रजा को कभी भी सुख और शान्ति  नहीं मिल सकती। वे चैन की बाँसुरी नहीं बजा सकते। उस देश में सर्वत्र लूट-खसोट का वातावरण बना रहता है। जिसका मन चाहता है वही अवसर का लाभ उठा लेना चाहता है, उसे किसी भी शर्त पर चूकना नहीं चाहता।
          जन साधारण का कुछ भी वहाँ सुरक्षित नहीं रह जाता। चाहे उसकी अस्मिता हो अथवा उसका आत्मसम्मान हो। उसका सब कुछ दाँव पर लगा रहता है। उसके दिन और रात सभी परेशानी में व्यतीत होते हैं। हर समय उसके मन में खटका लगा रहता है कि भविष्य में उसका क्या होगा? वह इसकी कल्पना मात्र से सदा भयभीत रहता है।
         जब वहाँ पर भाई-भतीजावाद का बोलबाला होने लगता है तब वहाँ कानून- व्यवस्था चरमराने लगती है। पैसे का सर्वत्र बोलबाला हो जाता है। इसलिए हर समर्थ व्यक्ति चाहे कैसा भी अपराध करे पर उसे मुक्ति मिल जाती है और निर्दोषों को अनावश्यक ही सजा मिलने लगती है। यानी वहाँ 'अँधेर नगरी चौपट राजा' वाली स्थिति बन जाती है।
         यह सत्य है कि जब किसी देश में ऐसी अराजक परिस्थितियाँ बन जाती है जिसके लिए राजा और प्रजा सभी दोषी होते हैं। तब आपसी फुट के चलते देश धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है। लोगों के स्वार्थ उन पर इतने अधिक हावी हो जाते हैं कि अपने देश की अस्मिता उनके लिए कोई मायने नहीं रखती। उसे गिरवी रख देने में उन्हें तनिक भी हिचचिकाहट नहीं होती।
        उस समय वे भूल जाते हैं कि अपनी जन्मभूमि की सुरक्षा करना उस देश के हर नागरिक का कर्त्तव्य होता है। यह वही धरती है जिसका अन्न खाकर और जल पीकर वे बड़े और पुष्ट हुए है। उस देश के जयचन्द चन्द सिक्कों के बदले अपने देश की गुप्त जानकारियों को बेचने के लिए तैयार हो जाते हैं। उन्हें इस बात की तनिक भी चिन्ता नहीं होती कि ऐसा करने के बाद उनका अपना क्या होगा?
          इस तरह कमजोर होते हुए देश पर कोई भी पड़ोसी देश आक्रमण करके, उस पर अपना अधिकार जमाने मे सफल हो सकता है। हर नागरिक को यह बात अपने मन में गहरे बिठा लेनी चाहिए कि देश है तो उनका अस्तित्व है। अन्यथा गुलाम देश में बहुत दुर्गति होती है। अपनी स्वतन्त्रता को किसी भी मूल्य पर दाँव पर नहीं लगाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 19 फ़रवरी 2017

अपनी जड़ों से जुड़ाव

मनुष्य की पहचान उसके अपने ही देश से होती है। उस देश की सांस्कृतिक विरासत उसका गौरव होती है। उसे अपने देश का नागरिक होने पर मान होना चाहिए। अपने देश में लाख कठिनाइयों का सामना क्यों न करना पड़े, उसे स्वप्न में भी छोड़ने का विचार नहीं करना चाहिए। जो सुख अपने बन्धु-बान्धवों के साथ मिलकर रहने में है, वह अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकता।
        वह किसी भी दूसरे देश में अपनी आजीविका के कारण रहता हो, चाहे उस देश की नागरिकता भी उसने ले ली हो परन्तु पहचाना अपने मूल देश के निवासी के रूप में ही जाता है। वह कितनी ही पीढ़ियों से विदेश में रह रहा हो, फिर भी अपने मूल देश कि नाम उससे जुड़ा रहता है। उससे अलग वह नहीं हो सकता। यही उसकी थाती होती है।
        उच्च शिक्षा ग्रहण करने के लिए भी अनेक बच्चे विदेश जाते हैं। उनमें से बहुत से बच्चे अपने देश वापिस लौट आते हैं और कुछ वहीं अपनी आजीविका पाकर रहने लगते हैं। स्वदेश वापिस लौटकर आने वाले युवाओं को शायद अपने देश की मिट्टी से अपेक्षाकृत अधिक मोह होता है। इसलिए वे आजन्म वहाँ रचना-बसना नहीं चाहते।
        विदेशी धरती पर रहने वालों को कोई ऐसा काम नहीं करना चाहिए जिससे उनके अपने देश के नाम पर बट्टा लगे अथवा उस देश की सरकार को मजबूर होकर उन्हें वहाँ से निष्कासित करना पड़ जाए। यदि ऐसा हो जाए तो उनके लिए समस्याएँ खड़ी हो जाती हैं। इसलिए उन्हें हमेशा ही अपना कदम फूँक-फूँककर रखना चाहिए, जिससे उन्हें परदेश में कभी अपमानित न होने का अवसर न मिले।
          पहली पीढ़ी जो विदेश में जाकर बस जाती है, उसे उस नए स्थान पर सामञ्जस्य स्थापित करने में बहुत सारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वह अपने संस्कारों को भूल नहीं पाती और नए रीति-रिवाजों को अपनाने में उसे  हिचचिकाहट होती है।
          यह ऊहापोह की स्थिति हर समय उसे अपनी जड़ों की ओर ले जाने के लिए बेताब रहती है। हाँ, छोटे बच्चे फिर भी उस नए वातावरण में शीघ्र ही बिना कठिनाई के सरलता से घुलमिल जाते हैँ। परन्तु नई पीढ़ी जिनका जन्म ही वहाँ होता है, उनके सामने ऐसी समस्याएँ नहीं आतीं। उन्हें वहाँ रचने-बसने में दिक्कत नहीं आती क्योंकि वे अपनी आँखें उसी माहौल में खोलते हैं। इसलिए निस्सन्देह वे वहीं के ही होते हैं।
        कार्यक्षेत्र से अवकाश न मिल पाने के कारण समय की, और कभी-कभी धन की विवशताएँ आड़े आ जाती हैं। घर-गृहस्थी की समस्याएँ भी इसके मूल में रहती हैं। इसलिए उनका अपने देश में आवागमन इतनी सरलता से नहीं हो पाता। सबसे अधिक पारिवारिक सुख-दुख में शामिल न हो पाने की मजबूरी उनके हृदय को तार-तार कर देती है।
        यही वह कठिन परीक्षा की घड़ी होती है जब उन्हें लगता है कि काश उनके पास पंख होते तो वे उड़कर चले जाते और अपनों के साथ उनके सहयोगी बन पाते। पर यह सब अपने हाथ में नहीं होता। मनुष्य की विवशताएँ मुँह बाए उसका दामन थामकर साथ-साथ चलती रहती हैं। उन पर किसी का वश नहीं चल पाता। वह तो बस मूक दर्शक की तरह परिस्थितियों का गुलाम बनकर रह जाता है।
        अपने देश की मिट्टी जिसमें लोट-लोटकर मनुष्य बड़ा होता है, जिसका अन्न खाकर और अमृत तुल्य जल पीकर वह पुष्ट होता है, उसकी कशिश आजीवन हमेशा बनी रहती है। तभी तो इन्सान मनोनुकूल व्यवसाय से प्रभूत धनार्जन करके, सभी सुखों को जुटाकर भी स्वयं को पूर्ण नहीं समझ सकता।
        इन्सानी कमजोरी है कि जो उसके पास नहीं होता, उसे वह पाना चाहता है और जो उसके पास होता है, वह उसकी कद्र नहीं करता। यही भटकाव की स्थिति ही उसकी समस्या का मूल कारण बन जाती है। इसी धुन के कारण वह सदा ही असन्तुष्ट रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

मनुष्य का मिथ्या अहं

प्रत्येक मनुष्य अपने सम्पूर्ण जीवनकाल में अनथक परिश्रम करता हुआ धन-वैभव जुटा लेता है। तब सोचने लगता है कि वह इतना सामर्थ्यवान हो गया है कि मानो अलाद्दीन का चिराग उसके हाथ लग गया है। अब वह दुनिया की हर वस्तु खरीद सकता है, अपनी मुट्ठी में कर सकता है। इस संसार की कोई भी ऐसी वस्तु नहीं हो सकती, जिसकी वह कामना करे और उसे पा न सके यानी वह वस्तु उसकी पहुँच से परे हो।
       अपने समक्ष उसे दूसरे सभी लोग बौने प्रतीत होने लगते हैं। वह हर किसी को चींटी की तरह मसल देने की बात करने लगता है। वह मानने लगता है कि उसके आगे सिर उठाने की जुर्रत कोई नहीं कर सकता। जो भी अपना सिर उसके सामने उठाने की हिमाकत करेगा तो वह उसका सिर कुचलकर रख देगा। पद और सम्मान को पाकर वह उसके मद में वह अन्धा हो जाता है।
       मनुष्य भौतिक सुख-सुविधाओं के साधन तो जुटा सकता है परन्तु वास्तविक सुख, मानसिक शान्ति, आज्ञाकारी सन्तान, अच्छे पड़ोसी आदि नहीं खरीद सकता। इसी प्रकार वह चाहे भी तो मनचाहे बन्धु-बान्धव भी नहीं पा सकता। वह मँहगे-से-मँहगा इलाज करवा सकता है पर किसी भी शर्त पर अच्छा स्वास्थ्य खरीद सकने में असमर्थ रहता है।
        मनुष्य जन्म और मृत्यु का समय अपनी इच्छानुसार तय नहीं कर सकता। अन्तिम समय में यदि वह चाहे कि उसके कुछ काम अधूरे रह गए है, उन्हें पूरा करने के लिए यदि उसे थोड़े-से पलों की मोहलत मिल जाए तो चाहकर भी वह उस समय को खरीद नहीं सकता। न ही उसे वह मनचाही मोहलत खैरात में मिल सकती है।
         वह यदि चाहे कि संसार के सारे कार्य-व्यवहार उसकी इच्छा से होने लग जाएँ तो यह सर्वथा असम्भव है। ऐसा कभी नहीं हो सकता। ब्रहाण्ड में होता वही है जो ईश्वर चाहता है। तुलसीदास जी ने बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
              होगा सोई जो रामरचि राखा।
       इसी कड़ी में यह भी जोड़ा जा सकता है कि इस दुनिया में आज तक कोई भी व्यक्ति इतना अमीर नहीं हो सका कि वह अपने बीते हुए कल को खरीदकर लौटा सके। एवंविध न ही कोई व्यक्ति इतना गरीब हो सकता है कि वह अपने आने वाले कल को संवारने की सामर्थ्य न रख सके।
          पुरुषार्थ करना तो प्रत्येक व्यक्ति का कर्त्तव्य होता है। अपने हाथ-पर-हाथ रखकर वह कभी निठल्ला बैठ नहीं सकता, इसलिए कुछ-न-कुछ जोड़-तोड़ करते रहना उसका स्वभाव बन जाता है। वह या तो सकारात्मक विचार रखेगा अथवा फिर नकारात्मक। जीवनकाल में उसे क्या प्राप्त होगा और क्या नहीं? यह उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। उसके पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार सब उसे बिना कहे यथासमय मिल जाता है।
        मनुष्य ने यदि पूर्व जन्मों में सत्कर्म किए होते हैं तो इस जन्म में वह स्वर्ग के समान सुखों का उपभोग करता है। इसके विपरीत यदि उसने दुष्कृत्य किए होते हैं तो उसे कष्टों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है। हर व्यक्ति अपने लिए शुभ की कामना करता है। परन्तु जाने-अनजाने उससे कुछ-न-कुछ ऐसे अनुचित कार्य हो ही जाते हैं, जिनका दुष्परिणाम यथासमय उसे भुगतना पड़ जाता है।
        सबसे प्रमुख बात है अपने अहं को वश में करना। यह अधिकांश मुसीबतों का कारण है। यही है जो मनुष्य के विवेक का हरण करके, उसके सोचने-समझने की शक्ति को क्षीण करता है। फिर उसे संकट में धकेल देता है। अपने मिथ्याभिमान को यद्यपि नियन्त्रित करना कठिन है परन्तु असम्भव कदापि नहीं है।
       अपने अहंकार को वश में करने वाला मनुष्य स्वयं को धरती पर अंगद के पैर की तरह जमाकर रखता है, अनावश्यक ही गुब्बारे की तरह हवा में इधर-उधर उड़ता नहीं फिरता। वह जमीनी हकीकत से जुड़ा रहता है। इसीलिए वह परेशानियों से बचा रहता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 17 फ़रवरी 2017

बच्चे के विकास में पिता की भूमिका

बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए पिता की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण होती है। वह अपनी सन्तान के सुरक्षित भविष्य के लिए स्वयं स्वेच्छा से खटता रहता है। दिन-रात उसके उज्जवल भविष्य की चिन्ता में ही घुलता रहता है। 'नीतिशास्त्रम्' ग्रन्थ की निम्न उक्ति हमें समझाते हुए कह रही है-
           स पिता यस्तु पोषक:।  
अर्थात पिता वही है जो पोषक है।
           इस उक्ति का यही महत्त्वपूर्ण सन्देश है कि पिता अपनी सन्तान का भरण-पोषण करता है, उसको पालता है। उसके लिए सुख-सुविधा के सारे साधन जुटाना चाहता है जो इस दुनिया में विद्यमान हैं। इसीलिए वह पिता कहलाता है।             
        पिता के कन्धे पर बैठा हुआ बेटा जब वहाँ खड़ा होकर उससे यह कहता है- 'देखो पापा मैं आपसे बड़ा हो गया हूँ।' तो पिता उसकी नादानी पर मुस्कुरा उठता है।
        वह उसे समझाते हुए कहता है- 'बेटा इस गलतफहमी में मत रहना। जिस दिन मेरा हाथ छूट गया, उस दिन तेरे सुन्दर-से रंगीन सपने के साथ तेरा कोमल हृदय भी तार-तार हो जाएगा।'
        वास्तव में उस समय बच्चे के पाँव जमीन पर नहीं होते। वह ऊँचा दिखने की होड़ में ऐसे प्रयास करता रहता है। पिता को वास्तविक खुशी उस समय मिलती है जिस दिन उसका बेटा जमीनी सच्चाई को समझकर वास्तव में सही मायने में बड़ा हो जाता है। योग्य बनकर वह अपनी एक विशेष पहचान बना लेता है। उस समय वह अपने पिता के कन्धे पर खड़ा नहीं होता बल्कि उसके पैर जमीन पर होते हैं। तब उसे नीचे गिरने का भय नहीं होता।
         जिन बच्चों के पिता का देहावसान उनके जन्म से पहले या उनकी अल्पायु में हो जाता है, आयुपर्यन्त उनकी इस कमी को कोई पूरा नहीं कर सकता। यद्यपि माता अपनी ओर से बच्चे की सारी सुविधाओं का ध्यान रखती है, तथापि उसके मन का कोई कोना रीता रह जाता है। चाहकर भी वह उस स्थान को भर नहीं सकता। उसके मन में पिता के न होने की कसक जीवनभर बनी रहती है।
         बच्चा जब पिता से अधिक योग्य बनकर उच्च पद पर आसीन हो जाता है अथवा अधिक कमाने लगता है तब पिता का सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। उस समय उसे अपनी सन्तान से किञ्चित भी ईर्ष्या नहीं होती अपितु वह उस पर मान करते नहीं थकता। सारी कायनात को वह अपनी सन्तान के होनहार बन जाने की सूचना देने के लिए लालायित हो जाता है।
          'वाल्मीकिरामायणम्' में महर्षि वाल्मीकि पिता के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए कहते हैं-
            नह्यतो धर्माचरणं किञ्चिदस्ति महत्तरम्।
            यथा पितरि सुश्रुषा यस्य वा धर्मक्रिया।।
अर्थात पिता की सेवा अथवा उनकी आज्ञा का पालन करने जैसा महत्त्वपूर्ण कार्य और धर्माचरण इस संसार में और दूसरा कोई नहीं है।
         पिता जो अपने बच्चे का मान होता है, उसका आदर्श होता है, उसकी अवहेलना करने के बारे में मन से भी कभी नहीं सोचना चाहिए। आयुपर्यन्त पिता की आज्ञा का पालन करना और उसकी सेवा-शुश्रुषा करना हर सन्तान का परम कर्त्तव्य है। इस दायित्व से उसे कभी भी मुँह नहीं मोड़ना चाहिए।
          अपनी सन्तान के सुख में, दुख में यानी हर कदम पर पिता उसके साथ खड़ा रहता है। विपरीत परिस्थितियों से उसे अपनी ओर से उबारने का यथासम्भव यत्न करता है। जितनी उसकी सामर्थ्य होती है, उससे भी बढ़कर वह अपनी सन्तान के हित के लिए सोचता है और सहायता भी करता है।
         पिता का मूल्य किसी भी तरह से कम नहीं आँकना चाहिए। कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो यही कहा जा सकता है कि उसके होने से ही सन्तान का अस्तित्व होता है और उसकी सुरक्षा होती है। उसके होने से ही सन्तान का हित होता है। उसके मार्गदर्शन में बच्चे फलते-फूलते हैं और समाज में अपना एक मुकाम बना पाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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