शुक्रवार, 21 अप्रैल 2017

सफलता में उड़ें नहीं

मनुष्य को अपने जीवनकाल में यदि कोई भौतिक उपलब्धि हो जाती है तो वह मानो आकाश में ऊँचे उड़ने लगता है, उसके पैर जमीन पर नहीं पड़ते। फिर वह स्वयं को अघोषित स्वयंभू मानने लग जाता है और अपने आप को महान लोगों की श्रेणी में सम्मिलित हुआ जान लेता है, चाहे उसे कोई दूसरा पूछे या नहीं। सामने वाले सभी लोग उसे अपने से कमतर अथवा हीन प्रतीत होने लगते हैं।
        मनुष्य को सदा स्मरण रखना चाहिए कि इस संसार में वह खाली हाथ आता है। इसी प्रकार दुनिया से विदा लेकर खाली हाथ ही प्रस्थान करता है। यानी इस धरा पर खून-पसीना बहाकर कमाई गई सारी धन-दौलत, गाड़ी व जमीन-जयदाद धरी रह जाती है। अपना सब कुछ यहीं छोड़कर चल पड़ता है। उसे यह देखने की मोहलत भी नहीं मिल पाती कि वह देख सके कि उसके उत्तराधिकारी उसकी धन-सम्पत्ति का सदुपयोग कर रहे हैं अथवा उसे बरबाद कर रहे हैं।
        यहाँ बर्फ का दृष्टान्त देते हैं, जिसे मैंने वाट्सअप पर पढ़ा था। एक बार किसी व्यक्ति ने बर्फ से पूछा - आप इतनी ठण्डी क्यों हो?
बर्फ ने बड़ा अच्छा जवाब दिया - मेरा अतीत पानी था और मेरा भविष्य भी पानी है। फिर मैं गरमी किस बात की रखूँ?
      बड़ी साधारण-सी बात है परन्तु हृदय पर बहुत गहरा वार करती है। बर्फ अपने भूत को नहीं भूली। उसे याद है कि बर्फ बनने से पहले वह पानी थी। और फिर जब पिघल जाएगी तो पुनः पानी में परिवर्तित हो जाएगी। इसलिए उसे गरमी रखने की आवश्यकता नहीं है। वह अपने स्वभाव को जल की भाँति निर्मल और प्रवाहशील बनाना चाहती है।
       इसी प्रकार मनुष्य की भी स्थिति है। उसका अतीत भी खाली हाथ था एवं भविष्य भी खाली हाथ ही है। अर्थात वह इस दुनिया में खाली आया था और यहाँ से खाली हाथ विदा लेगा। उसे बर्फ की तरह शान्त और गर्वरहित होना चाहिए। फिर भी वह न जाने किस-किस बात का घमण्ड करता है?
         घमण्ड करने के लिए उसने कई तर्क खोज लिए हैं। कभी उसे अपनी सफलता पर गर्व होता है तो कभी उसे अपनी बुद्धि अथवा ज्ञान पर मान होता है। अपने धन-वैभव पर वह इतराता फिरता है। अपनी सुन्दरता, अपनी शिक्षा, अपने पद का मद उसे होता है। वह योग्य व होनहार बच्चों के लिए गर्वित होता रहता है। वह अपनी शक्ति पर सदा सीना चौड़ा करके गुब्बारे की तरह उड़ता रहता है।
          उसे इस सत्य को स्मरण करने की आवश्यकता ही नहीं रह जाती कि उसके अहंकार के ये सभी हेतु क्षणिक होते हैं। धन, सत्ता, सौन्दर्य, स्वस्थ, शक्ति आदि सदा उसका साथ नहीं निभाएँगे। समय बीतते उसे छोड़ देंगे। उस समय उसे कोई नहीं पूछता। वह निपट अकेला रह जाता है। तब वह सोचता है कि उसके साथ ऐसा अन्याय क्यों हुआ?
         इतना सब हो जाने पर भी वह इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं होता कि उसने कोई गलती है। वह बस दूसरों पर दोषारोपण करके अपने झूठे अहं की तुष्टि कर लेना चाहता है। उसका वश चले तो वह सारी दुनिया को ही आग के हवाले कर दे। अपने सामने सिर उठाने वाले किसी भी व्यक्ति का सिर कुचलकर रख दे। अपने समक्ष उसे सभी अन्य लोग बौने प्रतीत होते हैं।
         मनुष्य यदि संसार की क्षणभंगुरता का सदा स्मरण कर सके तो वह दूसरों पर कभी अन्याय अथवा अत्याचार नहीं कर सकता। तब उसे हर पल का हिसाब ईश्वर को देने की चिन्ता रहेगी। वह किसी के बहकावे में आकर भी कुमार्गगामी नहीं बन सकेगा। वह अपने हितार्थ स्वयं के द्वारा निर्धारित किए गए नियमों की अनुपालना, बिना बोझ समझे स्वतः ही सहर्ष करने लगेगा।
        इस प्रकार ईर्ष्यारहित, निरहंकार रहकर, सद्भावना का आचरण करके मनुष्य खाली हाथ विदा लेते हुए भी इतना यश कमा जाता है कि युगों तक समाज उसे स्मरण करता है। उसके इहलोक और परलोक दोनों सुधर जाते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

स्वयं को तुच्छ न समझें

मनुष्य की सोच का दायरा विस्तृत होना चाहिए। मात्र विचार से कुछ नहीं हो सकता उस पर क्रियान्वयन भी करना चाहिए। छोटा अथवा बड़ा होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता, उसकी कथनी और करनी से फर्क पड़ता है। मनुष्य के अन्तस में यदि एक दीपक सदैव प्रज्ज्वलित होता रहेगा, तभी मनुष्य का दिन शुभ होगा, जीवन सुखी रह पाएगा और उसका समय अनुकूल बन सकता है।
        हम सब प्रत्यक्ष अनुभव कर सकते हैं कि सूर्यास्त के बाद यदि दीपक अथवा प्रकाश की व्यवस्था न हो सके तो समस्त विश्व में सन्नाटा छा जाएगा। चारों ओर अन्धकार का साम्राज्य छा जाएगा और सर्वत्र त्राहि त्राहि मच जाएगी। ऐसे विकट समय में यदि एक नन्हा-सा दीपक ही जला दिया जाए तब अन्धेरे से निजात पाने की समस्या को काफी हद तक सुलझाया जा सकता है।
       दीपक अपना पूरा प्रयास करता है कि उसका प्रकाश अन्धेरे को चीरकर सबका पथ-प्रदर्शक बन जाए। आँधी आ जाए या तूफान, उनसे संघर्ष करता हुआ वह नन्हा दीपक टिमटिमाता रहता है। अपना प्रकाश चारों ओर प्रसारित करता है। यद्यपि वह सूर्य की भाँति शक्तिशाली नहीं है, फिर भी अपने प्रयास में वह अडिग रहता है। वह किसी से हार नहीं मानता। केवल अपने लक्ष्य के लिए डटा रहता है।
        सूर्य महान व शक्तिशाली है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि वह अपनी मनमानी करने के लिए अब स्वतन्त्र हो गया है। उसे सबको सताने का मानो लाइसेंस मिल गया है। अपना प्रकाश फैलाने और ऊष्मा प्रदान करने के लिए उसे भी निरन्तर संघर्ष करना पड़ता है। वास्तव में इसे ही विधि का विधान कहा जा सकता है।
       चमकते हुए सूर्य को कभी बादल आच्छादित कर लेते हैं तो कभी उसे ग्रहण लग जाता है। सारे संसार पर जब अन्धेरे का साम्राज्य छा जाता है तब वह कुछ समय के लिए अवश्य ही सबकी दृष्टि से ओझल भी हो जाता है। फिर भी अपने कर्त्तव्य मार्ग से वह भटकता नहीं है। बारबार अन्धकार का सीना चीरते हुए पूर्व दिशा से मुस्कुराता हुआ अपनी पूरी शक्ति को लगाकर उदित हो जाता है। ऐसे ही बादलों से आँख मिचौली का खेल खेलते हुए अचानक दृष्टि गोचर हो जाता है। इसी प्रकार ग्रहण से बेदाग निकलकर अपना दायित्व निभाता है।
      यह मात्र सूर्य और दीपक के सघर्ष की कथा नहीं है अपितु सृष्टि के हर जीव की यही कहानी है। उसे हर कदम पर, हर पल संघर्ष करना ही पड़ता है। इससे बचने के लिए उन्हें कोई रास्ता नहीं मिल सकता। जीवनपर्यन्त सफलता को प्राप्त करने के लिए कठोर परिश्रम करना पड़ता है। यदि मनुष्य हाथ पर हाथ रखकर निठल्ला बैठ जाए और अपने मंगल की कामना करे तो यह असम्भव है।
        यहाँ एक बात और कहना चाहती हूँ कि सामने पड़ी परोसी हुई भोजन की थाली को देखकर किसी का पेट नहीं भर सकता। उसके लिए मनुष्य को रोटी का निवाला तोड़कर अपने मुँह में डालना ही पड़ता है। तभी वह भरपेट भोजन खाकर तृप्त हो सकता है अन्यथा उसे भूखे ही रह जाना पड़ता है। यानी रोटी कमाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है, उसे पकाने के लिए भी श्रम करना पड़ता है और खाने के लिए भी मेहनत करनी पड़ती है।
          तात्पर्य यही है कि जो भी सुख-समृद्धि मनुष्य अपने और अपनों के लिए पाना चाहता है, उसी के अनुपात में उसे अपने ऐशो आराम छोड़कर अथक परिश्रम करना पड़ता है। शेखचिल्ली की तरह केवल योजनाएँ बनाते रहने से कामनाएँ कभी पूर्ण नहीं हो सकतीं। हाँ, मनुष्य की जगहँसाई अवश्य होती रहती है। सभी बन्धु-बान्धव उसकी पीठ पीछे और सामने उसका उपहास करते है।
        स्वयं को दीन-हीन, छोटा अथवा असमर्थ कहकर अपना शत्रु बनने के स्थान पर मनुष्य को सदा कर्मठ बनना चाहिए और अथक परिश्रम करते हुए अपने इच्छित मार्ग पर निरन्तर अग्रसर होना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

स्त्री-पुरुष पूरक

स्त्री और पुरुष एक-दूसरे के पूरक हैं, इस बात का कोई भी विरोध नहीं कर सकता। दोनों ही उस ईश्वर की विशेष रचना हैं। वे दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे रह जाते हैं। यद्यपि एक नार्थपोल की तरह है तो दूसरा साऊथपोल की भाँति है। एक-दूसरे के पूरक होने के बावजूद इन दोनों में कई अन्तर भी हैं जिन्हें प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
       इससे इन्कार नहीं किया जा सकता कि इन दोनों की आवश्‍यकताएँ लगभग एक जैसी हैं। परन्तु दोनों की भावनात्‍मक आवश्‍यकताएँ अलग-अलग होती हैं। उनकी मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति, उनके सुख-दुख, उनके दायित्व आदि कमोबेश मिलते-जुलते हैं। उनकी शारीरिक संरचना, उनके संस्कार तथा उनकी विचारधारा व स्वभाव में भिन्नता होती है।
         स्त्रियाँ घर की जिम्‍मेदारियों के साथ-साथ आफिस के दायित्व अधिक सुघड़ता से निपटाती हैं। स्त्री पुरुष के बिना अकेले जीवन-यापन कर सकती है, अपने बच्चों का भरण-पोषण कर सकती है। वह बच्चों को पिता की कमी का अनुभव नहीं होने देती। इसके विपरीत पुरुष स्त्री के बिना तो एक कदम भी नहीं चल सकता। आपने बच्चों की देखरेख करने में असमर्थ रहता है। वह पत्नी के न रहने पर चार दिन भी उसकी याद में अकेला नहीं रह पाता।
         निस्सन्देह शारीरिक रूप से दोनों में कुछ अन्तर हैं। इनके हार्मोंस में भी भिन्‍नता होती है, इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता कि स्त्री किसी भी मायने में पुरुष से कमतर है। हार्मोनल प्रभाव के कारण पुरुषों के अपेक्षा स्त्रियाँ कम उम्र में अधिक समझदार हो जाती हैं। इसी प्रकार महिलाएँ पुरुषों के मुकाबले जल्‍दी जवान तथा बूढ़ी हो जाती हैं।
       इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि ईश्वर ने महिलाओं को बनाया ही ऐसा है कि उन्हें हर अवसर पर सजने और संवरने के लिए प्रायः पुरुषों अधिक समय लगता हैं। यह सर्वथा सत्य है कि एक पुरुष और एक स्त्री कभी मित्र नहीं हो सकते। विद्वानों का कथन है कि किसी पुरुष की महिला के साथ दोस्ती के मूल में यौनाकर्षण ही प्रमुख कारण होता है। जबकि महिलाएँ पुरुषों के साथ निस्वार्थ दोस्ती करती हैं। जब उनका स्वयं का रिश्ता चरमराने लगता है तभी वे अपने मित्र से कुछ अधिक की आशा करती हैं।
        पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ अपनी प्रशंसा सुनना अधिक पसन्द करती हैं, चाहे वह सत्य हो अथवा असत्य। उन्हें पुरुषों की अपेक्षा तनाव अधिक होता है। इसका प्रमुख कारण आधुनिक जीवन शैली को मान सकते है। उन पर अपने घर-परिवार तथा बच्चों की समस्याओं के अतिरिक्त कैरियर को लेकर भी बहुत प्रेशर रहता है। दूसरी ओर पुरुषों में यह अवसाद अपेक्षाकृत कम दिखाई देता है।
      महिलाएँ पुरुषों के मुकाबले अधिक प्रसन्न रहती हैं। इसका कारण महिलाओं के मस्तिष्क में ‘एमएओए’ नामक पाया जाने वाला जीन है। मोटापे का प्रभाव दोनों पर समान रूप से होता है। मोटापे के कारण डायबिटीज, दिल से सम्बन्धित बीमारियों के साथ-साथ उनकी प्रजनन क्षमता पर भी प्रभाव पड़ता है।
         आधुनिक परिवेश में अधिकांशत: महिलाओं का यह विचार है कि प्रायः पुरुष स्वार्थी प्रकृति के होते हैं और सदा अपना हित साधने के फेर में रहते हैं। ऐसी स्थिति में निस्वार्थ भाव से दूसरों की सहायता करने वाले पुरुष उन्हें अधिक भाते हैं। उन्हें लगता है कि दूसरों का ध्यान रखने वाले (केयरिंग प्रकृति) पुरुष उनका ध्यान रखने में भी सक्षम हो सकते हैं।
         एवंविध विश्लेषण करते हुए अनेक तथ्य प्रस्तुत किए जा सकते हैं। परन्तु यही वास्तविकता है कि प्रकृतिजन्य अन्तर के साथ स्त्री और पुरुष में बहुत कुछ विभिन्नताएँ भी हैं। अतः एक-दूसरे को नीचा दिखाने के स्थान पर उन्हें परस्पर कदमताल करते हुए जीवन में आगे बढ़ना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 18 अप्रैल 2017

जीवन सुगमता से जिएँ

मनुष्य को अपने जीवनकाल में इस बात की चिन्ता छोड़ देनी चाहिए कि कौन उसे दुख पहुँचाता है या उससे नफरत करता है बल्कि उसकी चिन्ता करनी चाहिए कौन उसे प्यार करता है। क्योंकि मनुष्य की सारी खुशियाँ उसी प्यार से जुड़ी होती हैं यानि मौजूद होती हैं। जिन्दगी में जितना अधिक हसीन पलों को याद किया तो जीना उतना ही सुखद व सुगम हो जाता है।
          परस्पर प्यार व आपसी विश्वास दुनिया का वह सबसे खूबसूरत पौधा है जो जमीन पर नहीं दिलों में उगता है। जिस प्रकार कड़वी गोलियाँ चबाई नहीं निगल ली जाती हैं। उसी प्रकार ही अपमान, धोखे, असफलता जैसी कड़वी बातों को भी सीधे गटक लिया जाए तो आपसी कड़वाहट समय रहते समाप्त हो जाती है। यदि उन्हें चबाते रहेंगे यानि पिष्टपेषण करते रहेंगे तो जीवन दुष्वार हो जाता है और जीने का आनन्द नहीं रहता। अपना मन ही कलुषित होता रहता है।
        मनुष्य यदि यही सोचता रहे कि फलाँ व्यक्ति ने उसको उस समय यथोचित मान-सम्मान नहीं दिया अथवा यही विचार करके हलकान होता रहे कि उसने मुझे नहीं पूछा तो मैं सम्बन्ध क्यों रखूँ, तो जीना मुहाल हो जाता है।
           सम्बन्धों अथवा रिश्तों की सिलाई यदि भावनाओं के पक्के धागे से की जाए तो उनका टूटना मुश्किल होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो कोई कितना भी यत्न कर ले उन रिश्तों को नहीं तोड़ सकता। यदि रिश्तों की बुनियाद स्वार्थ पर रखी गई है तो उनका लम्बे समय तक टिकना मुश्किल है। स्वार्थों की पूर्ति होते ही वे रिश्ते समाप्त हो जाते हैं। तब फिर वहाँ एक-दूसरे को पहचानना भी नागवार हो जाता है।
         इस  क्षणभंगुर जीवन का कोई भरोसा नहीं है। कौन इस संसार से पहले विदा लेगा और कौन बाद में, इसके विषय में कोई नहीं जानता। सब भविष्य के गर्भ में छुपा हुआ है। बाद में अपनों को खोकर बहुत आघात लगता है और मानसिक सन्ताप होता है। उस समय केवल हाथ मलते हुए रह जाना पड़ता है। इसलिए पश्चाताप करने से अच्छा है रिश्तों में अनावश्यक आने वाली दूरियों को पाट दिया जाए। सम्बन्धों की गरिमा को बनाए रखने के लिए सबसे सामञ्जस्य बनाए रखना चाहिए।
            मन को लघु अथवा उदार बनाना होता है। यदि मन को लघु बना दिया तो मनुष्य की चिन्तन शक्ति संकीर्ण हो जाती है। वह मैं, मेरा घर, मेरे परिवार आदि तक ही सिमटकर रह जाता है। उसकी स्वार्थी प्रवृत्ति उस पर हावी होने लगती है। उसमें किसी अन्य के लिए कोई जगह नहीं बच पाती। ऐसे लोग आत्मकेन्द्रित हो जाते हैं और पूर्वाग्रहों को पाल लेते हैं। इनके लिए सभी रिश्ते-नाते बस नाममात्र के ही रह जाते हैं।
        इसके विपरीत मन को थोड़ा उदार या विशाल बना लेने से बहुत-समस्याएँ स्वयं ही समाप्त हो जाती हैं। सबको साथ लेकर चलने की इनकी प्रवृत्ति इन्हें सबका प्रिय बना देती है। रिश्तों को तोड़ने के बजाय उन्हें बनाए रखने में ये लोग अधिक विश्वास रखते हैं। दूसरों से होड़ करने के स्थान पर उन्हें साथ लेकर चलना ही समझदारी होती है। ऐसा व्यवहार करने से मनुष्य की आत्मा प्रफुल्लित रहती है और उसमें उत्साह बना रहता है।
           सकारात्मक सोच रखने वाले लोग हर हाल में अपेक्षाकृत अधिक सुखी रहते हैँ। नकारात्मक सोच रखने वालों को सदा ही मानसिक पीड़ा का अनुभव होता है। वे जीवन से हमेशा निराश रहते हैं।
         जहाँ तक हो सके रिश्तों को फटने मत दो और यदि दुर्भाग्य से कभी ऐसा हो जाए तो उनको इतनी खूबसूरती से रफू कर दो कि किसी को कभी पता ही न चल सके कि कभी उनमें कभी पैबन्द लगाने की आवश्यकता हुई थी।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 16 अप्रैल 2017

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हमारा भारतीय संविधान हर भारतवासी को देता है। अपने विचारों का अदान-प्रदान करना आवश्यक होता है। यदि अपने विचारों को दूसरों के समक्ष न रख सकें तो कोई हमारे विषय में जान नहीं सकेगा।
           स्वतन्त्रता का अर्थ उच्छ्रंखलता कदापि नहीं होता। मर्यादित विचारों की अभिव्यक्ति जहाँ मन को प्रफुल्लित करती है वहीं श्रोता को भी अभिभूत करती है। यहाँ आत्मानुशासन की लगाम का होना बहुत अनिवार्य होता है। जब तक सद् बुद्धि का चाबुक न पकड़ा जाए तब तक विचारों के प्रदूषित होने का खतरा मंडराता रहता है। यह दूषण सहृदय जनों के कष्ट का कारण बनता है। इससे हर बुद्धिमान व्यक्ति को बचना चाहिए।
           बोलने से पहले मनुष्य को दस बार सोचना चाहिए कि कहीं ऐसा कुछ न कह दिया जाए जो सामने वाले को आहत कर दे अथवा उसके आत्मसम्मान को ठेस लग जाए। शब्द रूपी बाणों से यदि किसी को घायल कर दिया जाए तो मर्मान्तक पीड़ा होती है। इसीलिए हमारे मनीषी कहते हैं -'पहले तोलो फिर बोलो।'
          जिस मनुष्य को अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं है वह इन्सान कहलाने के योग्य ही नहीं है। यही वाणी मनुष्य को सबके सिरों पर बिठाकर यश और मान देती है। दूसरी ओर सबकी नजरों से गिराकर अपमान का दंश झेलने के लिए विवश करती है।
           जिस देश में हम रहते हैं, जिसका अन्न खाते है, जिसका जल पीते हैं, उसके प्रति हमारा दायित्व बढ़ जाता है। जिस मातृभूमि की गोद में खेलकर बड़े हुए हैं, उसका सम्मान करना बहुत ही आवश्यक है। विश्व के किसी भी व्यक्ति को अथवा किसी भी देशवासी को यह अधिकार नहीं है कि वह उसका अपमान करे। चाहे जननी हो अथवा जन्मभूमि हो, इन दोनों का निरादर करने वालों को किसी भी सूरत में क्षमा नहीं किया जा सकता।
          अपने तुच्छ स्वार्थों के लिए देश का सौदा करने वालों और  उसके साथ द्रोह करने वालों को नरक में भी स्थान नहीं मिलता। ईश्वर भी ऐसे अहसानफरामोशों से नाराज हो जाता है।
           सोशल मीडिया, समाचार पत्रों, टी.वी. चैनलों और रेडियो सबका नैतिक दायित्व है कि वे सभी एकजुट होकर देश विरोधी गतिविधियों में शामिल लोगों के विरूद्ध जनजागरण की मुहिम चलाकर उन देशद्रोहियों को उनके अन्जाम तक पहुँचाने में सरकार की सहायता करें।
          राजनेताओं का दायित्व बनता है कि वे अपने देश के प्रति वफादारी निभाएँ और जन साधारण को भी जागरूक बनाएँ। देशद्रोहियों को अनावश्यक प्रश्रय न दें। तुच्छ राजनैतिक लाभ के लिए देश को हानि पहुँचाने के बारे में स्वप्न में भी न सोचें।
            जो भी व्यक्ति देश में अलगाव की स्थितियाँ पैदा कर रहे हैं अथवा देश की अखण्डता पर प्रहार कर रहे हैं, उन सब देशद्रोहियों को किसी प्रकार की सुरक्षा प्रदान न करके उन्हें अविलम्ब कानून के हवाले करके राजद्रोह का अभियोग चलाना चाहिए। किसी भी तरह की रियायत न देकर कठोर-से-कठोर दण्ड देकर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए ताकि भविष्य में कोई भी व्यक्ति हमारे देश भारत विरोधी गतिविधियों में शामिल होने का दुस्साहस न कर सकें।
           जो लोग केवल अपने अधिकारों की दुहाई देते हैं और उन्हें कर्त्तव्यों का भान नहीं है, उन्हें अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता से वंचित कर देना चाहिए। जो सब लोग स्वतन्त्रता पाने के इच्छुक हैं, उनके समक्ष उसका सदुपयोग करने की शर्त रखी जानी चाहिए ताकि कोई भी उसका दुरूपयोग न कर सके।
           केवल सरकार या कानून को इसके लिए कभी भी चाबुक न चलाना पड़े बल्कि आत्मानुशासन का पालन करके बोलने की स्वतन्त्रता का आनन्द उठाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 15 अप्रैल 2017

शार्टकट से बचें

किसी भी कार्य को सावधानी पूर्वक करना चाहिए। कार्य की सफलता के लिए मनुष्य के पास दो रास्ते होते हैं। एक रास्ता होता है शार्टकट वाला, यानि गलत मार्ग। जबकि दूसरा रास्ता लम्बा और सीधा होता है। 
         यह व्यक्ति विशेष पर निर्भर करता है कि वह कितना धैर्यशाली है? वह किस मार्ग का चुनाव करना चाहता है?
          मनुष्य यदि धैर्यवान एवं निष्ठावान होगा तो वह अपने लक्ष्य को पाने के लिए प्रयास करेगा। दिन-रात मेहनत करके अपने उद्देश्य में अवश्य सफल होगा। उसे अपने रास्ते पर चलते हुए अनेक प्रलोभन दिए जाते हैं, अनेक कठिनाइयाँ उसका रास्ता रोकती हैं। वह लगनशील व्यक्ति उन प्रलोभनो से किनारा करता हुआ, सभी कठिनाइयों को सुलझाता हुआ अपने सीधे रास्ते पर चलकर मंजिल तक पहुँच जाता है। ऐसे ही कर्त्तव्यनिष्ठ पुरुषार्थियों का लक्ष्य उनका रास्ता बड़ी ही बेसबरी से देखता है।
            इनके विपरीत सुविधाभोगी लोग हमेशा सरल मार्ग ढूँढते रहते हैं। इस सरलता की खोज करते हुए वे यदा कदा भटक जाते हैं और गलत हाथों में पड़ जाते हैं। उनके समाज और न्याय व्यवस्था के अपराधी बनने में देर नहीं लगती।
          अधीरता सदा ही हानिकारक होती है। उसके दूरगामी परिणाम निराशाजनक होते हैं। जल्दबाजी में भी जो कार्य किए जाते हैं वे सुलझने के स्थान पर उलझ जाते हैं। तब मनुष्य उनको सुलझाने में और अधिक दुखी हो जाता है।
            'महाभारत' के शान्तिपर्व में महर्षि वेद व्यास जी कहते हैं -
          नासम्यक् कृतकारी स्यात् अप्रमत्त: सदा भवेत्।
           कण्टकोSपि हि दुश्छिन्नो विकारं कुरुते चिरम्॥
अर्थात् अनुचित तरीके से काम नहीं करना चाहिए, सदा सावधान रहना चाहिए। काँटा भी यदि सही ढंग से न निकाला जाए तो वह भी हानिकारक होता है।
            इस श्लोक का यही कथन है कि हमेशा चौकस रहना चाहिए। गलत तरीके से किए गए कार्य का परिणाम दुखदायी होता है यहाँ काँटे का उदाहरण देते हुए वे कह रहे है कि यदि काँटा चुभ जाए तो उसे ध्यान से निकालकर फैंक देना चाहिए। यदि उसका कुछ भी अंश शरीर में बचा रह जाए तो नासूर बन जाता है। तब आपरेशन करवा  करके उसे निकलवाना पड़ता है। फिर भी कोई गारंटी नहीं कि मनुष्य पूर्णरूपेण ठीक हो पाएगा।
          उसी प्रकार अपनी सुविधा के लिए पथभ्रष्ट होकर कुमार्ग का अनुसरण करने वाले व्यक्ति की भी कोई गारंटी नहीं है कि वह समाज के लिए नासूर नहीं बन जाएगा। अथवा पूरे मन से सन्मार्ग का पुन: पथिक बन सकेगा। यदि वह मुख्य धारा का मन से अनुगामी बन जाए तो उसका सौभाग्य होगा।
           यदि वह अपने कुमार्ग का परित्याग नहीं करता तो समाज ही उसका बॉयकाट कर देता है। उसे सम्मान के स्थान पर तिरस्कार मिलता है। वह नासूर बनकर समाज को दूषित न करे इसलिए उसे अलग-थलग करके सलाखों के पीछे धकेल दिया जाता है। उसके अपने प्रियजन भी समाज के डर से उस समय उससे किनारा कर लेते हैं।
         गलत तरीके से कमाया हुआ धन-वैभव, अर्जित की गई विद्या अथवा अन्य कोई सम्मान समय बीतते सबके समक्ष प्रकट हो जाते हैं। तब मनुष्य को अपनी पोल खुल जाने पर सबके सामने सिर नीचा करना पड़ता है।
            मनीषी जन इसीलिए उचित मार्ग से अपने कार्यों की सिद्धि और अनुचित मार्ग का त्याग करने का परामर्श देते हैं। जीवन में कल्याण की कामना करने वाले मनुष्यों को इस आत्म अनुशासन का मन से पालन करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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