दिन-रात, सोते-जागते, उठते-बैठते हर समय मनुष्य को परमपिता परमात्मा का धन्यवाद करते रहना चाहिए। एक वही ऐसा है जो सबकी झोलियाँ खजानों से भरता है। हम मनुष्यों की भाँति कभी किसी पर अहसान भी नहीं करता। इसलिए ऐसी प्रार्थना करना हर मनुष्य का दायित्व है - 'हे ईश्वर! तुम्हारा धन्यवाद', 'ईश्वर तुम महान हो' या 'ईश्वर! मेरी मदद करो'। इस तरह कृतज्ञता ज्ञापन करने से मनुष्य के मन का अहं भाव दूर होने लगता है।
दूसरे शब्दों में कहें तो उस समय मनुष्य अपने सभी कर्म उस प्रभु को मन से सौंपने के लिए तैयार हो रहा होता है। इस प्रकार के आचरण से मनुष्य के मन से कर्तापन का भाव दूर होने लगता है। यहाँ से उसके अंत:करण का शुद्धिकरण होने लगता है। तब धीरे-धीरे वह ईश्वर के और और अधिक समीप होकर उसका प्रिय बनने लगता है।
इस भौतिक संसार में कोई व्यक्ति, किसी भी रूप में हमारी सहायता करता है तो उसे हम धन्यवाद, शुक्रिया या थैंक्स कहते नहीं अघाते। दिन में न जाने कितनी बार अपना आभार व्यक्त करते हैं। इसका सीधा-सा यही अर्थ है कि अपने लिए किए गए किसी के उपकार के बदले यदि आभार व्यक्त न किया जाए तो दूसरे लोग घमण्डी समझकर अवहेलना करने लगते हैं। लोग उसकी बुराई करने से नहीं चूकते।
इसके विपरीत यदि हमारे द्वारा किए गए उपकार के बदले कोई हमारा आभार व्यक्त नहीँ करता तो हमें बहुत क्रोध आता है। उसे हम कोसते हैं या लानत-मलानत करते हैं। उसे असभ्य होने का तमगा भी दे देते हैं। उसकी बुराई करके हम अपने मन को शान्त करने का भरसक प्रयास करते हैं। भविष्य में किसी की सहायता न करने का बचकाना प्रण भी कर लेते हैं।
अब विचार इस विषय पर करना है कि वह परमपिता परमात्मा हम मनुष्यों की हर कदम पर सहायता करता है। हमारी सारी आवश्यकताओं का ध्यान रखता है। किस समय हमें किस वस्तु की जरूरत होगी, उसी के अनुसार हमारे बिना कहे उपलब्ध करवा देता है। समय और परिस्थितियों के अनुसार उसमें कभी-कभी उसमें विलम्ब भी हो सकता है। यह देरी हमारे पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार होती है। इसके लिए हम उस मालिक को किसी भी तरह दोष नहीँ दे सकते।
यदि किसी वस्तु की प्राप्ति होने पर हम धन्यवाद देते हैं तो वह चीज बढ़ती रहती है। अगर धन अथवा वैभव के लिए हम धन्यवाद करते हैं तो समृद्धि बढ़ती है। यदि मनुष्य अपना प्रेम बढ़ाने के लिए धन्यवाद देता है तो निस्सन्देह उसका प्रेम परवान चढ़ने लगता है। ज्ञान देने वाले गुरु को यदि धन्यवाद करते हैं कि उसने ज्ञान देकर हम पर महान उपकार किया है। तब विनम्र हुआ व्यक्ति निश्चित ही ज्ञानवान बनता है। अपने जीवन में योग्य बनकर एक सफल इन्सान कहलाता है।
जो लोग अपने चारों ओर चापलूसों की फौज तैयार कर लेते हैं और उनके स्वार्थवश झूठे प्रशस्ति गीतों को सुनकर स्वयं को भगवान से भी महान समझने की भूल करने लगते हैं। ऐसे लोग आजन्म झूठ का मुलम्मा चढ़ाकर जीते हैं और फिर उसी तरह सत्य से अनजान रहकर इस संसार से विदा हो जाते हैं। इस असत्य यशोगान सुनने से मनुष्य को यथासम्भव बचने का प्रयास करना चाहिए।
ईश्वर ने हमें इस संसार में जन्म देकर और सारे भौतिक सुख प्रदान करके बहुत उपकार किया है। इस अहसान के लिए उसका धन्यवाद देना हमारा कर्त्तव्य बनता है। अन्यथा लोग हमें भी कृतघ्न कहेंगे। वह मालिक भी सोचेगा कि मेरी सन्तान ये जीव कैसे कृतघ्न हैं जो स्वयं पर परोपकार करने वाले को किसी श्रेणी में ही नहीं गिनते। इस अपरिहार्य स्थिति से स्वयं को बचाने के लिए कृतघ्न न होकर कृतज्ञ बनना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 23 मई 2017
ईश्वर के प्रति कृतज्ञ बनें
सोमवार, 22 मई 2017
जिजीविषा बनाए रखें
जिजीविषा(जीने की इच्छा) का हर मनुष्य में होना बहुत ही आवश्यक होता है। यदि मनुष्य जीवन से इसे निकाल दिया जाए तो शेष सब शून्यवत हो जाता है।
जिस इन्सान के मन में जीने की इच्छा नहीं रहती है, वह मनुष्य मृत तुल्य हो जाता है। बहुत समय से असाध्य बिमारी से जूझते हुए या बिस्तर पर लम्बे समय से पड़े, दूसरों से अनिच्छा से सेवा करवाते हुए मनुष्य में जिजीविषा का न होना समझ में आता है। वह अपने जीवन से निराश होकर ईश्वर से मृत्यु की कामना कर सकता है।
परन्तु यदि एक स्वस्थ व्यक्ति उठते-बैठते मृत्यु की कामना करे तो यह समझ से परे की बात है। हर मनुष्य के जीवन में उतार-चढ़ाव का समय आता है। जिन्हें हम भगवान मानते हैं, मनुष्य रूप में अवतरित होने पर उन्होंने भी अनेक कष्टों का सामना किया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि उसके कारण मनुष्य निराशावादी बन जाए। ईश्वर को और इस दुनिया के लोगों को बैठा-बैठा बस कोसता रहे। सबके खून सफेद होने का रोना रोता रहे। इस संसार के कष्टों से उकताकर वह आत्महत्या जैसा जघन्य अपराध कर बैठे।
जिस रोगी व्यक्ति के मन में जीने का उत्साह नहीं रहता, उसका स्वस्थ हो जाना कठिन हो जाता है। अस्वस्थ होते हुए भी यदि जीने की इच्छा प्रबल होती है तो वह मौत के मुँह से भी बचकर वापिस आ जाता है। ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जो हमें अपने आसपास देखने को मिल जाते हैं। फिल्मों में और टी.वी. सीरियल में भी ऐसी घटनाएँ यदा कदा दिखाई जाती हैं।
हमारे महान ग्रन्थों में 'जीवेम शरद: शतम्' कहकर ईश्वर से सौ वर्ष आयु की कामना की गई है। यदि मनुष्य जरा से कष्ट को देखकर हिम्मत हार जाएगा और अपने हाथ-पैर छोड़ देगा तो किस तरह इस आयु तक पहुँच सकेगा? ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य से इतनी आशा की जाती है कि वह जीवन की सच्चाइयों को समझे। उनके अनुरूप ही अपना आचरण करे। ऐसे निराशावादी का साथ कोई दूसरा व्यक्ति पसन्द नहीं करता। उसके अपनी पत्नी, बच्चे एवं परिवारी जन भी उससे परेशान रहते हैं।
मनुष्य को जीवन में जब कभी अपरिहार्य विपरीत स्थितियों का सामना करना पड़े तब उसे सज्जनों एव विद्वानों की संगति में जाकर बैठना चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों का अध्ययन करना चाहिए। इस तरह करने से उसके मन में आई हुई निराशावादिता और हीन भावना दूर होती है। उसके मन में विपरीत परिस्थितियों से जूझने की स्वयं ही सामर्थ्य बढ़ती है। तब उनसे लड़ता हुआ मनुष्य उन्हें अपने पक्ष में मोड़ लेने के लिए आत्मिक बल प्राप्त कर लेता है।
ऐसे कठिन समय में अपना धैर्य बनाए रखने के लिए वह अपने आप को समाज सेवा के कार्य में व्यस्त रख सकता है। अपने से अधिक दुखी लोगो को देखकर अपने मन को हतोत्साहित होने से बचा सकता है। अपनी किसी हाबी में स्वय को व्यस्त रखने का प्रयास कर सकता है।
इनके अतिरिक्त ईश्वर की शरण में जाने से भी उसे सुख और शान्ति मिलती है। वह उन निराश करने वाले हालातों से उभर जाता है, उसका मनोबल प्रभु की कृपा से डगमगाता नहीं है। वह दृढ़ होकर हर स्थिति से दो-दो हाथ करने के लिए कमर कसकर तैयार हो जाता है।
कैसी भी परिस्थिति मनुष्य के जीवन में क्यों न आ जाए उसे सदा अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना चाहिए। उसे खण्डित होने से बचाना चाहिए। तभी उसमें जिजीविषा बनी रह सकती है। इस जिजीविषा के कारण ही वह आकाश की बुलंदियों को छूने का हौंसला कर सकता है और जीवन के हर क्षेत्र में सरलता पूर्वक सफल हो सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 21 मई 2017
समय रहते चेत जाओ
समय पल-पल करके बीतता जा रहा है, इसे मनुष्य एक चेतावनी समझ सकता है। जो भी उसने योजना बनाई हुई है, उसे साकार कर लेना चाहिए। ताकि बाद में पश्चाताप करने की उसे कभी आवश्यकता न पड़े। यदि मनुष्य कोई षडयन्त्र करने का विचार कर रहा है तो समय रहते चेत जाना चाहिए। उसे उस नकारात्मक कार्य को करने से यथासम्भव बचना चाहिए। उसका दुष्परिणाम तब भुगतना पड़ता है तो बहुत कष्टों का सामना करना पड़ता है।
एक बोध कथा की चर्चा करना चाहती हूँ जिसे बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा। एक दोहा सबके उत्थान का कारक बना। बहुत समय से राज्य का भोग करते हुए एक राजा के बाल सफेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखने का विचार किया। अतः अपने गुरु तथा मित्र देश के राजाओं को भी आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए अपने राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को बुला भेजा। राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्राएँ अपने गुरु को दीं ताकि नर्तकी के अच्छे नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात उसका नृत्य चलता रहा। सुबह होने वाली थी, नर्तकी ने देखा कि उसका तबले वाला ऊँघने लगा है तो उसे जगाने के लिए नर्तकी ने निम्न दोहा पढ़ा -
बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई।
एक पलक के कारने, न कलंक लग जाए॥
अब इस दोहे का अर्थ अलग-अलग व्यक्तियों ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप अर्थ किया। वह तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब ये बात गुरु ने सुनी तो उसने सारी मोहरे उस नर्तकी को दे दीं। उसी दोहे को सुनकर राजकुमारी ने अपना नौलखा हार दे दिया और राजकुमार ने अपना मुकट उतारकर दे दिया। राजा ने कहा - 'नर्तकी, तुमने बस एक दोहा सुनाकर सबको लूट लिया है।'
जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी तो उनके नेत्रो में आँसू आ गए और कहने लगे - 'राजा, इसे नर्तकी न कह यह अब मेरी गुरु है। इसने मेरी आँखे खोल दी हैं। मै सारी उम्र जंगलो में तपस्या करता रहा और आखरी समय मुजरा देखकर अपनी साधना नष्ट करने आ गया। भाई मै तो चला।'
राजकुमारी ने कहा - आप मेरी शादी नहीं करवा रहे थे, आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। इसने मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी। क्यों अपने पिता को इस आयु में कलंकित करती है?'
राजकुमार ने कहा - 'आप मुझे राज्य नहीं दे रहे थे। मैं सिपाहियों के साथ मिलकर आपका कत्ल करवाने का घृणित कार्य करने वाला था। इसने समझाया - 'आखिर राज्य तो तुम्हेँ ही मिलना है। क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेते हो?'
जब राजा ने ये सारी बातें सुनी तो उसे भी आत्मज्ञान हुआ - ' गुरु मौजूद हैं, क्यों न मै अभी राजकुमार का राजतिलक कर दूँ।'
उसी समय राजा ने अपने बेटे का राजतिलक कर दिया और बेटी से कहा - 'बेटी! मैं जल्दी ही योग्य वर देखकर तुम्हारा विवाह कर दूँगा।'
यह सब देखकर नर्तकी ने कहा - 'मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए पर मैं आज तक नहीं सुधरी। आज से मैं भी अपना धन्धा बन्द करती हूँ। हे प्रभु! आज से मै भी तेरे नाम का सुमिरन करूँगी।'
समझने की बात है कि दुनिया को बदलते देर नहीं लगती। दोहे की दो पंक्तियाँ से भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है। केवल थोड़ा धैर्य रख कर चिन्तन और मनन करने की आवश्यकता होती है। इस धरती पर विद्यमान सब पदार्थ यहीं धरे रह जाते हैं। मनुष्य अपने साथ न कुछ भी लेकर आता है और न ही कुछ लेकर जा सकता है। वह मुट्ठी बाँधे खाली हाथ इस संसार में आता है और उसी प्रकार अपनी सारी धन-दौलत छोड़कर विदा लेनी होती है। यही सृष्टि का अटल नियम है जो किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए भी नहीं बदला जा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 20 मई 2017
दान मन से दें
मनीषी कहते हैं कि अन्धेरे में छाया, बुढापे में काया और अन्त समय में माया किसी का साथ नहीं देती। इसलिए अपने हाथों से जो दान कर सको, वही अपना है। यानी जन्म-जन्मान्तरों तक वही साथ निभाता है। मालिक निस्वार्थ भाव से हमारे बिना माँगे ही हम सबकी झोलियाँ भरकर हमें मालामाल करता है। वह अपने लिए हमसे कुछ भी नहीं चाहता।
हमारा भी दायित्व बनता है कि हम उसके बनाए जीवों के विषय में सोचें और उनके लिए कुछ करें। दान देने से किसी की कोई भी वस्तु कम नहीं होती। अपितु कई गुना बढ़कर ही उसे मिलती है। लेने वाले से देने वाला कहीं अधिक महान होता है। कहीं एक बोधकथा पढ़ी थी, जो हम में से कई लोगों ने पढ़ी होगी। उसकी चर्चा करते हैं।
प्रतिदिन की तरह प्रात:काल एक भिखारी भीख माँगने के लिए अपने घर से निकला। यह अन्धविश्वास प्रचलित है कि भिक्षाटन के लिए निकलते समय भिखारी अपनी झोली खाली नहीं रखते। अतः चलते समय उसने अपनी झोली में मुट्ठी भर जौ के दाने डाल लिए। उसे देखकर दूसरों को लगता है कि इसे पहले से ही किसी ने कुछ दे रखा है।
पूर्णिमा का दिन था। भिखारी सोच रहा था कि आज अगर ईश्वर की कृपा रही तो मेरी झोली शाम से पहले भर जाएगी। अचानक ही उस देश के राजा की सवारी सामने से राजपथ पर आती हुई दिखाई दी। भिखारी खुश हो गया। उसने सोचा कि राजा के दर्शन और उनसे मिलने वाले दान से आज उसकी सारी दरिद्रता दूर हो जाएगी और उसका जीवन सँवर जाएगा। जैसे-जैसे राजा की सवारी निकट आती गई, भिखारी की कल्पना और उत्तेजना बढ़ती गई। राजा ने भिखारी के निकट आकर अपना रथ रुकवाया और उतर कर उसके पास गया।
भिखारी की तो मानो साँसें ही रुकने लगीं। राजा ने उसे कुछ भी नहीं दिया अपितु अपनी बहुमूल्य चादर उसके सामने फैलाकर उससे भीख की याचना करने लगा। भिखारी को समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? राजा को भिक्षा दे या नहीं, अभी वह निर्णय कर ही नही पा रहा था कि राजा ने पुनः याचना कर डाली। भिखारी ने अपनी झोली में हाथ डाला। हमेशा दूसरों से लेने वाले का मन राजा को कुछ देने के लिए मान ही नहीं रहा था। जैसे-तैसे बड़ी मुश्किल से उसने जौं के दो दाने राजा की चादर में डाल दिए।
हालाँकि उस दिन भिखारी को अपेक्षा से अधिक भीख मिली थी लेकिन अपनी झोली से गए जौ के दो दाने देने का मलाल उसे सारा दिन रहा। शाम को उसने अपनी झोली पलटी तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। अपने साथ झोली में ले गए जौं में से दो दाने सोने के हो गए थे। अब उसे समझ आया कि यह दान की ही महिमा है।
उस समय उसे बहुत पश्चाताप हुआ। वह सोचने लगा - 'काश! उसने राजा को और अधिक जौं दे दिए होते तो उसके पास बहुत से सोने के जौं होते।' परन्तु अब तो कुछ भी नहीं हो सकता था। कमान से तीर निकल चुका था। आदत से लाचार वह अपने मन को दान देने के लिए तैयार नहीं कर सका था।
यह बोधकथा यही समझाना चाहती है कि दान देने वाले को ईश्वर कोई कमी नहीं आने देता। उसका वैभव दिन दोगुना और रात चौगुना बढ़ता है। बस अपने मन को तैयार करना होता है कि उसे सामाजिक कार्यों के लिए कुछ देना चाहिए। अर्थात समाज में जो लोग असहाय है, निर्बल हैं उनके उत्थान के प्रति उसका दायित्व है। उसका निर्वहण प्रत्येक मनुष्य को करना चाहिए।
यथासम्भव प्रयत्न यही करना चाहिए कि अपने द्वार पर आया कोई भी याचक खाली हाथ न लौटे। पता नहीं उसकी क्या विवशता होगी जो आपके पास सहायता के लिए आया है। प्रत्येक समर्थ मनुष्य को सदा सर्वदा ईश्वर का धन्यवाद करना चाहिए कि मालिक ने उसे इतना सामर्थ्यवान बनाया है कि वह किसी के काम आ सका।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 18 मई 2017
अर्जित ज्ञान का क्रियान्वयन
मनुष्य को मात्र पुस्तकीय ज्ञान नहीं अर्जित करना चाहिए बल्कि उसका प्रैक्टिकल भी करना चाहिए। कवि ने कहा है - 'ज्ञानं भार: क्रियां विना' अर्थात वह ज्ञान भार यानि बोझ बन जाता है जिसका क्रियान्वयन न किया जाए। यहाँ गधे का प्रसंग लेते हैं, उसके ऊपर कितना भी भार लाद दो, उसे ज्ञात ही नहीं होता कि उसके ऊपर क्या लड़ा गया है।
जो व्यक्ति बिना अर्थ समझे तोते की तरह केवल रटने का कार्य करता है, उसकी स्थिति भी भारवाहक गधे की भाँति होती है। जितना भी ज्ञान अर्जित किया जाए उसे अपने जीवन पर अक्षरशः उतारना ही ज्ञान का क्रियान्वयन कहलाता है। यानी अपने जीवन पर उसको उतारना या प्रैक्टिकल करना चाहिए। अपनी बात को स्पष्ट करने के लिए 'पञ्चतन्त्र' की इस कहानी को देखते हैं, इसे कुछ दिन पूर्व अनिल पचौरी ने फ़ेसबुक पर पोस्ट किया था।
किसी प्रदेश में चार ब्राह्मण रहते थे। वे विद्याभ्यास के लिये कान्यकुब्ज गये। वहाँ बारह वर्षों तक विद्याध्ययन करके, सम्पूर्ण शास्त्रों में वे पारंगत हो गए। परन्तु उन चारों में ही व्यवहारिक बुद्धि नहीं थी। विद्या ग्रहण करने के पश्चिम चारों स्वदेश लौटने लगे। कुछ देर चलने के बाद उन्हें मार्ग दो ओर जाता दिखाई दिया। ’किस मार्ग से जाना चाहिए’ इसका निश्चय न कर पाने के कारण वे वहीं बैठ गए।
तभी वहाँ से एक वैश्य बालक की अर्थी निकली। अर्थी के साथ बहुत से लोग जा रहे थे। ’महाजन’ नाम से उनमें से एक को कुछ़ याद आ गया। उसने पुस्तक के पन्ने पलटकर देखा तो लिखा था - 'महाजनो येन गतः स पन्थ:' अर्थात् जिस मार्ग से महान जन जाएँ, वही रास्ता होता है। पुस्तक में लिखे वाक्य को ब्रह्म-वाक्य मानने वाले चारों पण्डित महाजनों के पीछे-पीछे श्मशान की ओर चल पड़े।
उन्होंने श्मशान में कुछ दूरी पर एक गधे को खड़े हुआ देखा। गधे को देखते ही उन्हें शास्त्रोक्त वचन याद आ गए - 'राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः' अर्थात् राजद्वार और श्मशान में जो रहता है, वही बन्धु होता है। फिर क्या था, चारों ने श्मशान में खड़े उस खड़े गधे को अपना बन्धु मान लिया। कोई उसके गले से लिपट गया तो कोई उसके पैर धोने लगा।
इसी बीच एक ऊँट उधर से गुज़रा। उसे देखकर सब हैरान रह गए कि यह कौन-सा जीव है? ऊँट को वेग से भागते हुए देखकर उनमें से एक को पुस्तक में लिखा यह वाक्य याद आ गया - 'धर्मस्य त्वरिता गतिः' अर्थात् धर्म की गति बड़ी तीव्र होती है। उन्हें निश्चय हो गया कि वेग से जाने वाली यह वस्तु अवश्य ही धर्म है।
कुछ समय पश्चात उनमें से एक को याद आया - 'इष्टं धर्मेण योजयेत्' अर्थात् धर्म से इष्ट को जोड़ो। उनकी समझ में इष्ट गधा था और ऊँट धर्म। दोनों का संयोग कराना उन्हेँ शास्त्र के अनुसार उचित लगा। बस, खींचकर उन्होंने ऊँट के गले में गढ़े को बाँध दिया जो एक धोबी का था। जब धोबी को पता लगा तो वह भागकर वहाँ आया। उसे अपनी ओर आता देखकर चारों विद्वान पण्डित वहाँ से भाग खडे़ हुए।
थोड़ी दूरी पर एक नदी में पलाश का एक पत्ता तैरता हुआ आ रहा था। उसे देखकर एक को याद आया - 'आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारयिष्यति" अर्थात् जो पत्ता तैरता हुआ आयगा, वही हमारा उद्धार करेगा। उद्धार की कामना करता हुआ वह 8मूर्ख पण्डित पत्ते पर लेट गया। पत्ता पानी में डूब गया तो वह भी डूबने लगा। केवल उसकी शिखा पानी से बाहर रह गई।
इस तरह बहते हुए जब वह दूसरे मूर्ख पण्डित के पास पहुँचा तो उसे भी शास्त्रोक्त वाक्य याद आ गया - 'सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्धं त्यजति पण्डितः' अर्थात् सम्पूर्ण का नाश हो रहा हो तब आधे का त्याग कर देना चाहिए। उसने बहते हुए पूरे आदमी का आधा भाग बचाने के लिये उसकी शिखा पकड़कर गरदन काट दी। शरीर तो पानी में बह गया किन्तु उसके हाथ में केवल सिर का हिस्सा ही आया।
अब वे चार में से तीन रह गए थे। गाँव पहुँचने पर तीनों को अलग-अलग घरों में ठहराया गया। वहाँ उन्हें काने के लिए भोजन दिया गया। एक ने सेवियों को यह कहकर छो़ड़ दिया - 'दीर्घसूत्री विनश्यति' अर्थात् दीर्घ सूत्र वाली वस्तु नष्ट हो जाती है। दूसरे को रोटियाँ दी गईं तो उसे याद आ गया - 'अतिविस्तारविस्तीर्णं तद्भवेन्न चिरायुषम्' अर्थात् बहुत फैली हुई वस्तु आयु को घटाती है।
तीसरे को छिद्र वाली वटिका दी गयी तो उसे याद आ गया- ’छिद्रेष्वनर्था बहुली भवन्ति’ अर्थात् छिद्र वाली वस्तु में बहुत अनर्थ होते हैं । परिणाम यह हुआ कि तीनों की जगहँसाई हुई और तीनों भूखे भी रह गए।
पञ्चतन्त्र की यह कथा समझाती है कि ज्ञान चाहे कितना भी अर्जित कर लो, पर काम वही आएगा जिसे अपने आचरण में लाओगे। हमारा ज्ञान और हमारा धन तभी साथ निभाते हैं, जब तक अपने पास हैं अन्यथा किसी काम के नहीं हैं। यही भाव निम्न श्लोक में कवि ने प्रकट किया है -
पुस्तस्था तु या विद्या परहस्तगतं धनम्।
कार्यकाले समुत्पन्ने न सा विद्या न तद्धनम्॥
अर्थात पुस्तकीय ज्ञान और दूसरे को दिया हुआ धन होता है, आवश्यकता पढ़ने पर न वह विद्या काम आती है और न ही वह धन अपना होता है। इसलिए अपने ज्ञान को बोझ न बनने दें बल्कि उससे अपना जीवन सफल बनाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 17 मई 2017
ज्ञान किसी से भी लें
ज्ञान किसी की बपौती नहीं। वह जहाँ से भी मिले उसे ग्रहण कर लेना चाहिए। उस समय किसी प्रकार के शुभाशुभ फल का विचार करने नहीं बैठना चाहिए और न ही कि उपदेशक कौन है? वह शत्रु है या मित्र, साधु है या अज्ञ बालक। ज्ञान पिपासा को शान्त करने के लिए मनुष्य को अपने अहं का त्याग करके शिष्यत्व भाव को अपनाना चाहिए। तभी वह प्राप्त ज्ञान को आत्मसात कर सकता है। अन्यथा पहले से ही भरे हुए पात्र में कुछ भी नहीं समा सकता।
यहाँ रामायण का एक प्रसंग देना चाहती हूँ जो किसी भी भारतीय के लिए नया नहीं है। राम और रावण का युद्ध समाप्त हो चुका था। रावण मरणासन्न अवस्था में था। भगवान श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण से कहा - 'अपने समय का परम विद्वान रावण अपनी अन्तिम साँसें गिन रहा है। जाओ जाकर उससे शिक्षा ग्रहण करो।'
लक्ष्मणजी ने रावण के सिर के पास खड़े होकर तीन बार प्रार्थना की- 'मुझे नीति की शिक्षा दें।' लेकिन रावण ने एक शब्द भी नहीं कहा।
लक्ष्मण वापिस लौट आए तो श्रीराम ने पूछा - 'क्या शिक्षा लेकर आए हो?"
लक्ष्मण ने उन्हें सारी बात बताई। भगवान श्रीराम ने उन्हें समझाते हुए कहा - 'तुम रावण को शत्रु समझकर उसके पास गए थे। इसलिए तुम्हारा व्यवहार वैसा ही था। अब एक शिष्य की तरह उसके पास जाकर उससे ज्ञान देने की याचना करो।'
लक्ष्मण ने बड़े भाई की आज्ञा का पालन किया। तब रावण ने लक्ष्मण को नीति का ज्ञान दिया। पहली बात रावण ने लक्ष्मण को बताई कि शुभ कार्य जितनी जल्दी हो कर लेना चाहिए और अशुभ को जितना टाल सकते हो टाल देना चाहिए। रावण ने लक्ष्मण को कहा - ‘मैं श्रीराम को पहचान नहीं सका, उनकी शरण में आने में देर कर दी, इसीलिए मेरी यह दशा हुई।’
रावण ने दूसरी बात बताई - “अपने शत्रु को कभी छोटा नहीं समझना चाहिए, वह आपसे भी अधिक बलशाली हो सकता है। मैंने श्रीराम को तुच्छ मानव समझकर सोचा कि उन्हें हराना मेरे लिए बहुत सरल होगा, लेकिन यह मेरी सबसे बड़े भूल थी।'
रावण ने फिर आगे कहा, “मैंने जिन्हें साधारण वानर और भालू समझा उन्होंने मेरी पूरी सेना को नष्ट कर दिया। मैंने जब ब्रह्माजी से अमरता का वरदान माँगा था तब मनुष्य और वानर के अतिरिक्त कोई और मेरा वध न कर सके। ऐसा क्योंकि मैं मनुष्य और वानर को तुच्छ समझता था। यह भी मेरी गलती थी।
रावण ने लक्ष्मण को तीसरी और अन्तिम यह बात बताई कि अपने जीवन का कोई रहास्य किसी को भी नहीं बताना चाहिए। विभीषण मेरी मृत्यु का राज जानता था। यदि मैंने उसे न बताया होता तो शायद आज मेरी यह अवस्था न होती।'
उसके बाद रावण ने कहा - 'लक्ष्मण, मैं अपने जीवनकाल में चार कार्य करना चाहता था पर असफल रहा। सबसे पहले अपनी लंका के आसपास के सौ योजन समुद्र का जल मीठा करना। दूसरा कार्य था अपनी सोने की लंका को सुगन्धित करना। तीसरा कार्य जो मैं करना चाहता था, वह था स्वर्ग तक जाने के लिए सीढ़ियाँ बनवाना। चौथा कार्य था मृत्यु को अपने वश में करना।'
मैं ये चारों कार्य बहुत सरलता से चुटकी बजाते ही सम्पन्न कर सकता था। किन्तु चाहकर भी इन्हें पूर्ण नहीं कर पाया, ये अधूरे रह गए। मैं इन्हें मामूली कार्य कहते हुए टालता रहा। यही कारण है कि आज मैं अपने इन इच्छित कार्यों को बिना पूर्ण किए इस संसार से विदा ले रहा हूँ। किसी भी कार्य की अवहेलना करना अथवा उसे छोटा मानकर आजकल करते हुए टालमटोल करना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल कहलाती है।
मैं जो भी कार्य सम्पादित करना चाहता था, उन्हें नहीं कर सका। अपनी इन गलतियों का अब मैं प्रायश्चित कर रहा हूँ पर सब व्यर्थ है। लक्ष्मण, इसलिए मेरा परामर्श यही है कि अपने जीवन मैं तुम ऐसी गलती कभी मत करना।' यह कहकर रावण की आँखें बन्द होने लगीं।
नीति-उपदेश ग्रहण करने के पश्चात लक्ष्मण रावण की पार्थिव देह को प्रणाम करके अपने शिविर में भाई के पास वापिस लौट आए।
रावण ने यह बात बहुत अच्छी कही कि आज का काम कल पर नहीं छोड़ना चाहिए। इस तरह बारबार कार्य को टालते रहने से उसके पूर्ण होने की सम्भावना क्षीण हो जाती है। बाद में मनुष्य के लिए केवल प्रायश्चित करना ही शेष बचता है। समय बीत जाने के बाद जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तब पछताने का भी कोई लाभ नहीं होता। बस लकीर ही पीटते रह जाना पड़ता है। अपने रहस्य भी उजागर नहीं करने चाहिए और किसी को तुच्छ नहीं समझना चाहिए।
इस घटना को पुनः स्मरण करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि शत्रु से ज्ञान प्राप्त करना यदि नीति के विरुद्ध होता तो भगवान श्रीराम अनुज लक्ष्मण को अपने परम शत्रु व अहंकारी परन्तु उच्चकोटि के ज्ञानी रावण के पास उपदेश लेने के लिए कभी न भेजते। जिस प्रकार सोने को कहीं से भी प्राप्त करने से उसकी गुणवत्ता कम नहीं होती, उसी प्रकार ज्ञान भी अमूल्य रहता है। इसलिए जब और जहाँ अवसर मिले उसे ग्रहण करने से चूकना नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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