इस संसार में मुट्ठी बाँधे मनुष्य केवल खाली हाथ आता है। न वह धन-दौलत अपने साथ लेकर आता है और न ही ऐश्वर्य का साजो-सामान। उसे बन्धु-बान्धव भी इसी दुनिया में अपने पूर्वजन्म कृत कर्मों के अनुसार ही मिलते हैं। सारा जीवन वह उन सबको साथ लेकर चलने का यत्न करता रहता है। सबको प्रसन्न रखने का प्रयास करता है, परन्तु चाहकर भी वह अपने इस उद्देश्य में पूर्णतः सफल नहीं हो पाता।
जीवनभर मनुष्य दिन-रात एक करके अथक परिश्रम करता है तब जाकर वह प्रभूत धन कमा पाता है। तिनका-तिनका जोड़कर वह अपने लिए घर बनाता है, अपनी गृहस्थी बसता है। अपने कमाए हुए धन से वह संसार में विद्यमान सभी सुविधाओं को जुटाता है जिससे उसका और उसके परिवार का जीवन निर्वाह सुविधापूर्वक हो सके। वह चाहता है कि उसके बच्चे उच्च शिक्षा ग्रहण करके योग्य बने जाएँ और उच्च पद पर आसीन होकर उसका समाज में मान बढ़ाएँ। जब उसका यह सपना साकार हो जाता है तब उसके वे उच्च पदासीन बच्चे उसे छोड़कर कहीं अन्यत्र अपना बसेरा बना लेते हैं। वह उनकी याद में पलक पाँवड़े बिछाए प्रतीक्षारत रहता है।
अपने बन्धु-बान्धवों के साथ उसे खट्टे-मीठे अनुभव होते रहते हैं। उसका सारा जीवन उनके साथ सामञ्जस्य बिठाते हुए बीत जाता है। कभी कोई नाराज हो जाता है तो कभी कोई। मित्रों के दुर्व्यवहार पर उन्हें किनारे कर देना, उनसे मुँह मोड़ लेना अपेक्षाकृत आसान होता है। परन्तु अपने सम्बन्धियों से सदा के लिए दूरी बना सकना आसान नहीं होता। न चाहते हुए भी लोकलाज के कारण उन्हें त्याग नहीं जा सकता।
अपनी नौकरी या व्यवसाय करते समय भी वह सारा जीवन मानो शतरंज की बिसात ही बिछाए बैठा रहता है। जोड़तोड़ करते हुए ही उसका जीवन व्यतीत हो जाता है। अपने जीवन का अधिकांश समय जहाँ वह बिताता है, सहयोगियों के साथ अपने सुख-दुःख साझा करता है, वहाँ से एक निश्चित अवधि के पश्चात यानी रिटायरमेंट के बाद उसे वहाँ से बेगाना बना दिया जाता है। तब वह सोचता है कि अब मेरे पास पैसा है तो आराम से जी लूँगा।
इस समय उसका शरीर अशक्त होने लगता है, तो वह स्वयं को असहाय समझने लगता है। अपनी दैनन्दिन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए भी उसे किसी-न-किसी के सहारे की जरूरत होने लगती है। वह इसी बात के लिए परेशान होता रहता है कि अब वह असमर्थ होने लगा है और इस धरती पर बोझ बनने लगा है। ईश्वर से बार-बार प्रार्थना करने लगता है कि वह जीना नही चाहता, उसे वह अब अपने पास बुला ले।
जीवन की भागमभाग से निवृत्त होकर जब इन्सान सोचता है कि अब वह शान्ति से रहेगा। अपनी सारी जिम्मेदारियों से वह मुक्त हो गया है और अब जीवन अपनी शर्तों पर जिएगा तो तभी वह मालिक घंटी बजा देता है। वह कहता है कि बेटा सब कामों से निपट गया है तो अब आ जा फिर। उसे कुछ पल अपनी इच्छा से जीने की मोहलत भी नहीं देता। जो धन-वैभव उसने सारा जीवन लगाकर जुटाया होता है, वह उसका भोग भी नहीं कर पाता। उसके लिए सब व्यर्थ हो जाता है।
मनुष्य न चाहते हुए भी अनिच्छा से कलपता हुआ परलोक की यात्रा के लिए चल पड़ता है। इसका कारण सुन्दर सृष्टि को छोड़कर वह नहीं जाना चाहता। जिस प्रकार वह खाली हाथ इस संसार में जन्म लेकर आता है, उसी प्रकार अपने खुले हाथों से इस दुनिया से विदा लेता है। मानो वह यह दिखाना चाहता हो कि मेरा जुटाया हुआ सारा वैभव इसी धरा पर राह गया है और मैं सब यहीं छोड़कर जा रहा हूँ। मेरे साथ यदि कुछ है तो मेरे सत्कर्म अथवा दुष्कर्म हैं जिनका भोग मुझे अगले जन्म में करना है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
गुरुवार, 23 नवंबर 2017
मनुष्य खाली हाथ आता
बुधवार, 22 नवंबर 2017
मृत्यु का समय नहीं
हमारे मनीषी 'जीवेम शरद: शतम् ' कहकर ईश्वर से प्रार्थना किया करते थे कि वे सौ वर्षों तक स्वस्थ जीवन जीएँ। पर आजकल तो यह अवधारणा टूटती जा रही है। हम कहते रहते हैं कि मनुष्य की आयु सौ वर्ष है, परन्तु वास्तव में ऐसा नहीं होता। मनुष्य के जीवन का कोई भरोसा नहीं। कब उसका बुलावा आ जाए और वह अपना सब कुछ इस संसार में छोड़कर खाली हाथ ही यहाँ से विदा हो जाए। मृत्यु न तो मनुष्य की आयु ही देखती है और न ही उसका रुतबा। उसे तो बस अपने नियम का पालन करना होता है।
एक घटना कहीं पढ़ी थी, उस पर विचार करते हैं। एक सन्त प्रतिदिन सत्संग किया करते थे। उस समय सर्दी का मौसम था। एक छोटा-सा लड़का उनके पास आकर सत्संग में बैठ जाता था।
एक दिन सन्त ने उससे पूछा- "बेटा, इतनी सर्दी के समय प्रात:काल जल्दी से उठकर सत्संग सुनने क्यों आते हो?"
उस छोटे लड़के ने उत्तर दिया- "महाराज, पता नहीं मौत कब आकर मुझे ले जाए?"
सन्त ने उसकी बात सुनकर हैरान होते हुए कहा- "तुम इतनी छोटी-सी उम्र के बच्चे हो, अभी तुम्हे मौत थोड़ा ही मारेगी? अभी तो तुम जवान होवोगे, धीरे-धीरे बूढ़े हो जाओगे, फिर मौत तुम्हे लेकर जाएगी।"
लड़के ने कहा- "महाराज, मेरी माँ चूल्हा जला रही थी, बड़ी-बड़ी लकड़ियों को जब आग ने नहीं पकड़ा तो उन्होंने मुझसे छोटी-छोटी लकड़ियाँ लेन के लिए कहा। जब माँ ने छोटी-छोटी लकड़ियाँ डालीं तो आग ने उन्हें एकदम पकड़ लिया। हो सकता है इसी तरह एक दिन मुझे भी छोटी उम्र में ही मृत्यु पकड़कर ले जाए। इसीलिए मैं बिना समय गँवाए अभी से ईश्वर की उपासना करना चाहता हूँ।"
मृत्यु मनुष्य के पास कब आ जाएगी, इसके विषय में किसी को कोई भी ज्ञान नहीं है। कबीरदास जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में इस विषय में कहा था-
माली आवत देखकर कलियाँ करें पुकार।
फूल फूल चुनी ले गए कल को हमारी बार।।
अर्थात बगीचे में फूल तोड़ने आए हुए माली को देखकर कलियाँ आपस में बात कर रहीं हैं कि खिले हुए फूलों को माली आज तोड़कर ले जा रहा है। कल जब हम खिलकर फूल बन जाएँगी तब माली हमें भी तोड़कर ले जाएगा।
ऐसा प्रतीत होता है कि मनुष्य को काल कब अपना ग्रास बना लेगा इसका कोई नियम नहीं है। पैदा होते बच्चे से लेकर किसी भी आयु के व्यक्ति की मृत्यु कभी भी, किसी भी कारण से हो सकती है। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि माँ के गर्भ में होते हुए बच्चे की भी मृत्यु हो जाती है जिसने अभी इस दुनिया में कदम भी नहीं रखा होता। किसी विद्वान ने सत्य कहा है-
जल्दी से जतन करके राघव को रिझाना है।
थोड़े दिन ही तो रहना है, माया की कुठरिया में।।
अर्थात जितनी जल्दी हो सके ईश्वर का स्मरण कर लेना चाहिए। इस मायावी कोठरिया में कुछ समय के लिए ही रहना है। निश्चित समय के पश्चात उसे खाली करके मनुष्य को चले जाना होता है।
यह घटना हमें समझा रही है कि समय को गँवाए बिना जितनी जल्दी हो सके ईश्वर की पूजा-अर्चना कर लेनी चाहिए। यह मत सोचिए कि जब वृद्ध होंगे तब ईश्वर की उपासना करेंगे। उस समय मनुष्य अशक्त हो जाता है तब यह सब सम्भव नहीं हो सकता। वास्तव में उस प्रभु से प्रेम करके ही इस जीवन सफल बना लेना चाहिए। हमारी इन साँसों से बड़ा और कोई भी धोखेबाज नहीं हो सकता। ये कब इस शरीर को छोड़कर परलोक चल दें कुछ भी भरोसा नहीं। इसलिए परमपिता परमात्मा का स्मरण समय रहते कर लेना चाहिए। कहीं ऐसा न हो जाए कि अन्त समय में पश्चाताप करना पड़ जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
मंगलवार, 21 नवंबर 2017
मृत्य अटल सत्य
मृत्यु एक अटल सत्य है। जो भी जीव इस मरणधर्मा संसार में जन्म लेता है उसकी मृत्यु निश्चित है। फिर भी इस मृत्यु से सभी डरते हैं। इसका कारण शायद यही है कि इस खूबसूरत दुनिया को छोड़कर कोई नहीं जाना चाहता। अथवा इसका अन्य कारण है कि पूरा जीवन हम अपनी इच्छा से, अपनी शर्तों से जीते हैं। जब मृत्यु का समय आता है या वह सामने खड़ी होती है तब मनुष्य को लगता है कि जिस काम के लिए उसने इस संसार में जन्म लिया था, उस कार्य को तो भूल गए।
संसार में आने से पहले माता के गर्भ में जीव अंधेरे और अकेलेपन से डरकर ईश्वर से वादा करता है कि मुझे इस अंधेरे से मुक्ति दो। संसार में जाकर तुम्हारा स्मरण करूँगा और मोक्ष प्राप्त करूँगा। इस संसार का आकर्षण मनुष्य को अपने जाल में फंसा लेता है। मनुष्य उस मकड़जाल में उलझकर इस दुनिया में मस्त होने लगता है। तब न उसे अपना किया हुआ वादा याद रहता है और न ही मौत। वह इस धरती पर स्वयं को तीसमारखाँ समझने की भूल कर बैठता है।
महाभारत के युद्ध में महान धनुर्धर अर्जुन अपने बन्धु-बन्धों को समक्ष देखकर भय के कारण शिथिल हो जाते हैं। तब योगेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का उपदेश देकर यानी सांख्य योग के द्वारा इस शरीर और आत्मा के विषय में समझाया। उस ज्ञान को सुनकर और समझकर अर्जुन निर्भय बन गया था। उसका परिणाम कौरवों की पराजय और पाण्डवों की विजय के रूप में हम सबके समक्ष है। यह मृत्यु से न डरने का ही परिणाम कहा जा सकता है।
अपने अहं को जीवनभर पुष्ट करने वाला और किसी से न डरने वाले मनुष्य मृत्यु से शायद इसलिए डरता है कि उसने अपने प्राप्त किए गए समय का सदुपयोग नहीं किया होता। ईश्वर से जो उसने वादा किया होता है, वह भूल गया होता है। जब उसे अन्तकाल का सामना करना पड़ता है तब उसकी आँखों के सामने उसका सारा जीवन एक चलचित्र की भाँति घूम जाता है। उसे यह अहसास हो जाता है कि उसने वादा खिलाफी की है। अब सब कुछ सुधार ल्ने का उसका समय बीत गया है। उस समय एक पल की भी मोहलत उसे किसी भी शर्त पर नहीं मिल सकती।
मनुष्य अध्यात्म में रुचि ले और अपने सदग्रन्थों का अध्ययन करे। इसके साथ ही योगाभ्यास करे जिससे चित्त की वृत्तियों पर नियन्त्रण होता है। योगशास्त्र का कथन है-
योगश्च चित्तवृत्ति निरोध:।
इस प्रकार कर लेने से मनुष्य का आत्मिक बल बढ़ता है और वह निर्भय हो जाता है। तब वह किसी शस्त्र से नहीं डरता यानी उसके मन से मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है। उसे भगवान कृष्ण की वाणी सदा स्मरण रहती है कि-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।।
अर्थात इस आत्मा को न शास्त्र काट सकते हैं, न अग्नि जला सकती है, न जल गीला कर सकता है और न वायु सुखा सकती है।
कहने का तात्पर्य यह है कि आत्मा पर इन भौतिक पदार्थों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये सभी पदार्थ केवल इस मरणधर्मा शरीर को प्रभावित करते हैं। इसलिए जो इस सत्य को जान लेता है वह निर्भय होकर संसार में विचरण करता है।
बहुत से महापुरुषों के बारे में हमने पढ़ा और सुना भी है कि उन्होंने देश, धर्म और समाज के लिए हँसते-हँसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। इसका कारण है कि वे इस तत्त्व को जानते थे जानते थे कि यह शरीर नश्वर है। इसलिए उनके मन में मृत्यु का भय नहीं रह गया था। अतः मृत्यु से डरना अनावश्यक है। इस डर से मुक्त होकर जीवन व्यतीत करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
रविवार, 19 नवंबर 2017
मुस्कुराहट संजीवनी बूटी
मुस्कराहट एक संजीवनी बूटी है जो सामने वाले को जीवन दान देने का कार्य करती है। उसके कोई मूल्य नहीं चुकाना पड़ता। यह तो मनुष्य की प्रसन्नता और संपन्नता की पहचान है। उसकी मुस्कराहट कई चेहरों को मुरझाने से बचा सकती है और उन्हें खुशियाँ दे सकती है।
प्रातःकाल पूर्व दिशा से मुस्कुराते हुए जब सूर्य देवता का उदय होता है उस समय ब्रह्माण्ड में चारों ओर ही खुशियाँ छा जाती हैं। प्रकृति जब रंग-बिरंगे फूलों के रूप में मुस्कुराती है तब उनके पास से गुजरने वाला हर व्यक्ति उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता।
एक मधुर मुस्कान युक्त किसी व्यक्ति किसी के लिए भी आकर्षण का केन्द्र बन जाता है। अपने समक्ष आने वाले हर इन्सान के लिए वह जादू का काम करती है, उसके दुःख-दर्द पालक झपकते ही स्वयं कम हो जाते हैं। यह जादू की झप्पी का काम करती है।
हम सबने अनुभव किया है कि कष्ट और परेशानी से तड़पता हुआ मरीज यदि डॉक्टर के पास जाता है और वह मुस्कराते हुए उस मरीज की परेशानी को सुनकर कर उसका इलाज करता है, उसके दर्द पर अपना स्नेहासिक्त हाथ रखता है तो मरीज को ऐसा लगता मानो उसकी आधी बिमारी वहीँ दूर हो गयी। रोगी का डॉक्टर के प्रति विश्वास बढ़ जाता है। उसके मन में यह विचार घर कर जाता है कि वह शीघ्र ही स्वस्थलाभ करेगा।
सामान खरीदने के लिए यदि किसी कोई व्यक्ति मॉल या दुकान में जाता है और वहाँ का सेल्समेन अथवा दुकानदार उसका मुस्कुराकर स्वागत करेगा, ध्यान देते हुए इच्छित वस्तुएँ दिखाएगा तो मनुष्य प्रसन्न हो जाता है। बार-बार वहाँ आकर ही अपना मनचाहा सामान खरीदेगा।
एवंविध कोई व्यापारी हैं अथवा बॉस प्रसन्न होकर मुस्कुराते हुए अपने दफ्तर में प्रवेश करता है। कर्मचारियों के मन में रहने वाला प्रेशर कम हो जाता है। आफिस का माहौल खुशनुमा होने से सभी कार्य सुचारू रूप से और व्यवस्थित होने लगते हैं। इस प्रकार वह कम्पनी या कार्यालय सबके लिए एक आदर्श बन जाता है।
एक अध्यापक यदि मुस्कुराते हुए अपनी कक्षा में प्रवेश करता है तो वहाँ विद्यमान सभी बच्चों के चेहरों पर स्वयं ही मुस्कान खिलने लगती है। उस कक्षा का वातावरण खुशनुमा बन जाता है, छात्रों का मन भी पढ़ने में लगता है। पढ़ने-पढ़ाने का आनन्द कई गुणा बढ़ जाता है।
जब हम अपनी फोटो खिंचवाते है तो फोटो खींचने वाला यही कहता है- smile please. यदि जरा-सा मुस्कुरा देने से हमारी फोटो अच्छी आ सकती है तो फिर खुलकर हँसने से जिन्दगी की सारी तस्वीर बहुत सुन्दर हो सकती है।
सदा ही मुस्कुराहटें बिखेरने वाला व्यक्ति यदि उदास हो जाए तो किसी को भी अच्छा नहीं लगेगा। उससे लोग पूछने लग जाते हैं कि भाई कि बात है आज उदास क्यों हो गए? इसका कारण यही है कि सदा मुस्कान बिखेरने वाले लोग अपने आसपास बहुत कम मिलते हैं।
यदि इन्सान दिन भर के काम की थकान के बावजूद शाम को मुस्कुराते हुए घर में प्रवेश करे तो पूरा परिवार आनन्दित हो जाता है। ऐसे खुशगवार माहौल में आकर व्यक्ति की अपनी थकावट भी दूर हो जाती है और परिवारी जनों के साथ की जाने वाली गपशप से मन बहलने के साथ-साथ घर-परिवार की कई समस्याएँ भी सुलझ जाती हैं।
कुटिल मुस्कान वालों से बचकर रहना आवश्यक होता है। वही बात कि सावधानी हटी दुर्घटना घटी। यांनी जहाँ हमने इन्सान को समझने की भूल की वहीँ उसके जाल में उलझकर दलदल में फंसने जैसी बात हो जाती है। सावधानी रखने से ऐसे लोगों को परखकर किनारे किया जा सकता है।
हँसने और मुस्कुराने का वरदान ईश्वर ने केवल मनुष्य को ही दिया है। छोटे बच्चे की एक मुस्कान पर सारा घर बलिहारी होने लगता है। उसी प्रकार किसी भी भी मनुष्य की सरल और सहज मुस्कान सबको हरने वाली होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
शनिवार, 18 नवंबर 2017
सत्य
जीवन में सत्य का बहुत महत्त्व होता है। सच में बहुत शक्ति होती है वह बड़े-बड़े साम्राज्य तक हिला देती है। दूर क्या जाना. महात्मा गांधी का उदाहरण हमारे समक्ष प्रत्यक्ष है जिन्होंने अंग्रेजों के विदेशी शासन को इसी शक्ति से देश के बाहर निकाल फैंका था और हमारे भारत देश को स्वतन्त्र करवाकर हमारे ऊपर महान उपकार किया था।
असत्य का व्यापार बच्चे घर में बचपन से ही देखते हैं। छोटे बच्चे अपने माता-पिता को किसी आवश्यक कार्य के लिए जाने को तैयार देख जब उन्हें घर से बाहर नहीं देना चाहते या उनके साथ जाने की जिद करते हैं, तब प्रायः वे उन्हें यह कहकर घर से जाते हैं कि आफिस जा रहे हैं या डाक्टर के पास इन्जेक्शन लगवाने जा रहे हैं। बच्चे उस झूठ को सच मानकर अपना दुराग्रह छोड़कर घर में रह जाने के लिए मान जाते हैं। वे कभी विश्वास भी नहीं सकते कि हर समय सत्य बोलने के पक्षधर उनके माता-पिता असत्य का पालन कर सकते हैं। बच्चों को झूठ बोलने पर घर-बाहर या विद्यालय हर स्थान पर डाँट पड़ती है या सजा मिलती है परन्तु हम बड़े होकर भी हर समय इसे भूल जाते हैं।
कभी-कभी माता या पिता घर आए किसी जानकार या मित्र से मिलना नहीं चाहते तो बच्चे से, घर के किसी सदस्य से या नौकर से कहला देते हैं कि वे घर पर नहीं हैं। कभी यह विचार हमारे मन में नहीं आता कि बच्चे वही सीखेंगे जो उदाहरण हमे उनके समक्ष रखेंगे। बच्चे बड़ों की देखा-देखी जब धीरे-धीरे इस असत्य आचरण के अभ्यस्त होने लगते हैं, तब हम स्वयं को दोषी न मानते हुए उनको डाँट-डपट करते हैं और कोसते हैं।
कमोबेश हम सब की यही स्थिति है। हम चाहे असत्य का आचरण कर लें पर किसी दूसरे के झूठ की अनुपालना हमें स्वीकार नहीं होती। शायद इस विषय पर विचार करने की आवश्यकता ही हम नहीं समझते।
हमें इस विषय पर मनन करने की बहुत आवश्यकता है। पूरी प्रकृति सत्य या ऋत का पालन करती है। अपने नियम का पालन करती है तभी तो हमें इन सारी छह ऋतुओं की सौगात मिलती है। पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि व आकाश पाँचों महातत्व हमारी सारी जरूरतों को पूरा करते हैं।
जगत् गुरू शंकराचार्य कहते हैं-
'ब्रह्म सत्य जगत् मिथ्या।'
अर्थात् ईश्वर सत्य है और यह जगत मिथ्या या असत्य है। तो फिर हमें सत्य का व्यवहार करते हुए अपने धर्म का पालन करना चाहिए।
सौ परदों में छुपकर किया गया असत्य आचरण समय आने पर सबके सामने उजागर हो जाता है। उस समय हमें लोगों की जिल्लत सहनी पड़ती है। सबकी अवहेलना सहते हुए हम अलग-थलग पड़ जाते हैं।
सबसे मुख्य यह है कि हम किससे छुपकर ऐसा करते हैं? दुनिया से बच सकते हैं पर वो जो कण-कण में, जर्रे-जर्रे में विद्यमान है उसकी नजर से नहीं बच सकते। चलिए सबसे बचने का जुगाड़ हम कर भी लेंगे परन्तु अपने अन्त:करण से बचकर कहीं नहीं जा सकते। वह हरपल हमें इस असत्य आचरण के लिए कचोटता रहेगा।
इसीलिए ऋषि ईश्वर से प्रार्थना करते हैं-
असतो मा सद् गमय
अर्थात् हे ईश्वर! हमें असत्य के मार्ग से हटाकर सत्य की ओर ले चलो।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
शुक्रवार, 17 नवंबर 2017
शून्य होने से बचें
शून्य का अपने आप में कोई भी महत्त्व नहीं होता परन्तु जब वह एक से नौ तक किसी भी संख्या के साथ जुड़ जाता है तब उसका मूल्य बढ़ जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि शून्य को एक के साथ जोड़ दिया जाए तो वह दस बन जाता है।
इसी प्रकार से क्रमशः बीस, तीस, चालीस, पचास, साठ, सत्तर, अस्सी और नब्बे बन जाता है। यदि किसी संख्या के साथ एक से अधिक शून्य जोड़ दिए जाएँ तो अरबों-खरबों तक की संख्या बन जाती है। कहने का तात्पर्य है किसी भी संख्या के साथ यदि शून्य बढ़ाते जाएँगे तो वह रकम उतनी ही बड़ी-बड़ी होती जाएगी।
हमारा जीवन भी उसी प्रकार शून्य होता है। यदि उसमें हम सत्कर्मों को न जोड़ें तो। तब हमारे उस जीवन का कोई मूल्य नहीं रह जाता। मनुष्य अपने खाते में जितने अधिक शुभकर्म जोड़ता जाता है उतना ही संसार में उसका मूल्य बढ़ता जाता है। वह जीरो से हीरो बनने लगता है। अर्थात वह संसार में महान बनकर सबके हृदयों में विराजमान हो जाता है।
मनुष्य का दिमाग उसे ईश्वर ने वरदन स्वरूप दिया है। विवेक शक्ति उसे ब्रह्माण्ड के अन्य जीवों से विशेष बनाती है। वह अपने दिमाग या विवेक का उपयोग यदि नहीं करता तब सभी लोग उसे सदा ही मूर्ख समझते हैं यानि शून्य या जीरो। उसके लिए महामूर्ख, गोबर गणेश, मिट्टी का माधो, गधा, अक्ल से पैदल इत्यादि विशेषणों का वे प्रयोग करते हैं।
इससे भी अधिक यदि किसी मनुष्य का जन्म से ही दिमाग नहीं होता तो मेंटली रिटार्टिड कहा जाता है। दूसरे शब्दों में यदि कहें तो वह मानव तन पाकर भी शून्य जैसा ही होता है। उसे अपनी कोई समझ नहीं होती पशुवत विचरण करता हुआ वह अपने घर-परिवार वालों को एक बोझ की तरह लगता है। उसके जन्म पर किसी को भी प्रसन्नता नहीं होती। उसके इस दुनिया से विदा होने पर सभी संबंधी राहत की साँस अवश्य लेते हैं।
विचार यह करना है कि हम शून्य होने से बचना चाहते हैं या नहीं? मेरे विचार में कोई भी मनुष्य शून्य होना नहीं चाहेगा। उसका प्रयास यही होना चाहिए कि ऐसे कौन से कार्य वह करे कि दूसरों को सदा ही उसकी अनुपस्थिति अखरे। वह हमेशा सभी के आकर्षण का केन्द्र बना रहना चाहता है।
चाहने मात्र से यह सब सम्भव नहीं हो सकता। उसके लिए मनुष्य को अपने आपको योग्य पात्र बनना होता है। मनुष्य को यह पात्रता कमानी होती है जो सदा ही समाज के नियमों के अनुसार आचरण करने से मिलती है।
मनुष्य के शुभकर्मों की अधिकता जब होती है तब उस जीव को मनुष्य का जन्म मिलता है। अपने पूर्वकृत अशुभ कर्मों को भोग लेने के पश्चात ही जीव को उनसे छुटकारा मिलता है उससे पहले कदापि नहीं। अन्यथा वह चौरासी लाख योनियों में अपने अशुभ कर्मों के फल को भोगने के लिए बस बारबार चक्कर काटता रहता है और कष्ट भोगता है।
इस जन्म और मृत्यु के बंधन से जीव जब तक मुक्त नहीं हो जाता तब तक उसे इस भवसागर के भंवर में गोते खाने पड़ते हैं इसके अतिरिक्त उसके पास और कोई चारा नहीं होता। इसलिए जब तक शरीर स्वस्थ है और मृत्यु उससे दूर है तब तक उसे अपने पुण्य कर्मों की सूची को बढ़ाते रहना चाहिए और शून्यता की इस दुखदायी स्थिति से बचने का यथासंभव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp
गुरुवार, 16 नवंबर 2017
धन की सुरक्षा
परिश्रम से कमाए हुए अपने धन की सुरक्षा करना मनुष्य के लिए बहुत आवश्यक है। धन से प्रायः सभी आवश्यक कार्य पूरे किए जाते हैं। मनुष्य इसे कमाने के लिए दिन-रात एक कर देता है। अपना सारा सुख-चैन होम करके कोल्हू के बैल की तरह खटता रहता है तब जाकर वह धनार्जन कर पाता है। यही धन है जो उसके ऐशो-आराम का माध्यम या साधन बनता है। मनुष्य सिर उठाकर शान से चलता है। उसके चेहरे की चमक ही उसकी रईसी का बखान कर देती है।
जो लोग धन का उपार्जन नहीं कर पाते वे अभावों में अपना सारा जीवन व्यतीत करते हैं। उनके अपने प्रियजन भी उनसे किनारा करने में बिल्कुल देर नहीं लगाते। हर समय उनका चेहरा मुरझाया हुआ दिखाई देता है। वे सदा चिन्तित, उदास और परेशान दिखाई देते हैं। उनका सारा जीवन जोड़-तोड़ करते हुए बीतता है। एक समस्या का निदान वे करते हैं तो दूसरी समस्या उन्हें मुँह चिढ़ाती हुई सी सामने प्रकट हो जाती है। वे फिर कतर-ब्यौन्त करते हुए ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं।
धन का संरक्षण करने के लिए निम्न श्लोक हमें उपाय बता रहा है-
उपार्जितानां वित्तानां त्याग एव हि रक्षणम्।
तडागोदरसंस्थानां परीवाह इवाम्भसाम्।।
अर्थात कमाए हुए धन का त्याग करने से ही उसका रक्षण होता है। जैसे तालाब का पानी बहते रहने सेे साफ रहता है।
यह श्लोक समझ रहा है कि धन को यदि बहुत अधिक सम्हालकर रखा जाए, उसे न अपने लिए खर्च किया जाए और न अपनों के लिए तो उस धन से भी एक प्रकार की सड़ान्ध आने लगती है। साँप की तरह केंचुली मारकर बैठने वाले सोचते हैं-
चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए
उनका धन किसी के उपयोग में नही आता। वे अपने परिजनों सहित अभावों में जीवन व्यतीत करते हैं।
धन की सुरक्षा होती है उसके सदुपयोग से। उसे परोपकार के कार्यों में लगाने से या देश, धर्म, समाज के लिए दान देने से। इसे ही धन का त्याग भी कह सकते हैं। ऐसे श्रेष्ठजन ही संसार में त्यागी अथवा महान कहलाते हैं। उन्हें सर्वत्र सम्मान दिया जाता है।
यहाँ कवि ने उदाहरण देकर अपनी बात को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वे कहते हैं कि पानी जो हमारी जीवनदायिनी शक्ति है उसे यदि बहुत समय तक एक स्थान पर या एक बर्तन में रोककर रख दिया जाए तो कुछ समय पश्चात उससे दुर्गन्ध आने लगती है, उसमें कीड़े भी पड़ने लगते हैं। इसलिए जल को बाँधकर या रोककर रखने का प्रयास कभी नहीं करना चाहिए। उसे सदा प्रवहणशील होना चाहिए। बहता पानी कभी दुर्गन्ध नहीं देता।
इस प्रकार धन और जल दोनों में कवि ने समानता प्रदर्शित की है। वास्तव में सच्चाई भी यही है कि जल यदि दुर्गन्ध देने लगे तो उसे उपयोग में नहीं लाया जाता, फैंक दिया जाता है। मनीषी कहते हैं कि धन का यदि सदुपयोग न किया जाए तो उसका हरण चोर-डाकू कर सकते हैं। आने वाली पीढ़ी समय रहते अभावों में जीवन जीने को विवश होती है। जब बाद में बिना परिश्रम किए आसानी से धन मिल जाता है तो वह उसका दुरूपयोग करके उसे बरबाद कर देती है।
इसलिए अपने जीवनकाल में अपनी मेहनत से कमाए हुए धन का अतिसंग्रह न करते हुए उसे सदा अपने और अपनों की आवश्यकताओं को पूर्ण करने में व्यय करना चाहिए। जो समाज हमें बहुत कुछ देता है उसे उसकी भलाई के कार्यों में लगाकर, एक अच्छा मनुष्य होने का परिचय देना चाहिए। इससे धन का सदुपयोग भी होता है और मनुष्य को यश भी मिलता है।
चन्द्र प्रभा सूद
Email : cprabas59@gmail.com
Blog : http//prabhavmanthan.blogpost.com/2015/5blogpost_29html
Twitter : http//tco/86whejp