भौतिक संसार के क्रियाकलापों को करने में हम इतना अधिक व्यस्त रहते हैं कि अपने विषय में सोचने का समय निकाल ही नहीं पाते। इसलिए हम स्वयं से नित्य प्रति दूर और दूर होते जाते हैं।
इसके विपरीत जो अपने अंतस में विराजमान ईश्वर को पाने के लिए आत्म साधना में लीन हो जाते हैं वे भौतिक संसार के सभी कार्य व्यवहार करते हुए भी वे विदेहराज जनक की तरह ऊपर उठ जाते हैं। उनके सभी भौतिक कार्य केवल मात्र आवश्यकता पूर्ति के लिए ही रह जाते हैं। उनमें उनका मन नहीं रमता। वे बारंबार नाम जाप की ओर प्रवृत्त होते रहते हैं। उस दिव्य आनन्द का रसास्वादन करते रहना चाहते हैं।
आत्मरमण करने वाले लोग व्यवहार में कैसे होते हैं? इस विषय में इष्टोपदेश का कथन है कि-
ब्रुवन्नपि न हि ब्रूते गच्छन्नपि न गच्छति।
स्थिरीकृतात्मवस्तु पश्यन्नपि न पश्यति॥
अर्थात अपनी आत्मा में स्थिर रहने वाले व्यक्ति बोलते हुए भी नहीं बोलते, जाते हुए नहीं जाते और देखते हुए नहीं देखते।
इस विषय में यह सब पढ़कर और सुनकर बड़ा विचित्र लगता है पर सच्चाई यही है। वे सबके साथ बैठे हुए भी अकेले होते हैं क्योंकि उन्हें बतरस में आनन्द का अनुभव नहीं होता। यदि किसी प्रश्न का उत्तर उन्हें देना पड़े तो हाँ या हूँ करके टाल देते हैं। कहीं भी जाते समय अपने ध्यान में मग्न रहते हैं। यदि वे अपनी भौतिक नजरों से कहीं देखते हुए लगते हैं तो भी वास्तव में दूसरो को न देखकर अपने अतस में झाँक रहे होते हैं।
आत्मरमण करने वाले स्वयं में इतने खोए रहते हैं अथवा आत्म अभ्यास में इतना अधिक जुटे रहते हैं कि किसी के पास बैठे रहते हुए भी अपनी साधना में रत रहते हैं। किसी को उनके साधना में लीन होने का पता ही नहीं चल पाता। इसीलिए बैठते-उठते, सोते-जागते, चलते-फिरते प्रभु के नाम का भजन करते रहते हैं या साधना करते रहते हैं।
भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमद्भगवद्गीता में इन लोगों के विषय में हमें बताया है कि जो सदा ही आत्मरमण करने वाले होते हैं वे कैसे होते हैं-
यस्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानव:।
आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्य न विद्यते॥
अर्थात जिसकी अपनी आत्मा में प्रीति होती है, जो आत्मा में ही तृप्त रहता है और अपनी आत्मा में ही सन्तुष्ट रहता है, उसके लिए कुछ भी कर्त्तव्य नहीं होता।
जो व्यक्ति आत्म साधना में लगा रहता है उसे पुन: पुन: आत्मानन्द को उसी प्रकार अनुभव करने की इच्छा होती है जैसे हम अपनी प्रिय भौतिक वस्तुओं का बार-बार आनन्द लेना चाहते हैं। अपने अंतस को खोजने में लगा हुआ व्यक्ति आत्मानन्द का इतना अभ्यासी हो जाता है कि उसे सारे भौतिक सुख-साधन बेमायने लगने लगते हैं। वह सांसारिक कार्यों का सम्पादन करते हुए भी उनमें लिप्त नहीं होता अर्थात निर्लिप्त रहता है।
हमारे ऋषि-मुनि और भगवान कृष्ण बारबार यही उपदेश देते हैं कि ससार में जल में कमल की निर्लिप्त होकर मनुष्य को रहना चाहिए। इससे मनुष्य में कर्त्तापन का अभिमान नहीं आता। वह अपने सभी कृत कार्यों का श्रेय उस परमपिता परमात्मा को देता हुआ आत्मोन्नति के मार्ग पर प्रशस्त होता है।
आत्मरमण करने वाले लोगों को इस भौतिक संसार के लोग आम भाषा में पागल कह सकते हैं परन्तु वे इस बात से अनजान रहते हैं वे क्या खो रहे हैं और ये पागल साधक क्या पा रहे हैं? आत्माभ्यासी लोग ही जीवन का वास्तविक आनन्द लेते हुए अपने सुखद पारलौकिक भविष्य को सुरक्षित करने में सफल हो जाते हैं दुनिया के जंजालो में फंसे हुए अन्य लोग नहीं।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 22 जनवरी 2018
आत्मरमण
रविवार, 21 जनवरी 2018
बगुला भक्त
बगुला भक्तों के लिए प्रायः कहा जाता है-
'मुँह में राम बगल में छुरी।'
इस उक्ति का अर्थ मुझे कुछ ऐसा लगता है कि ईश्वर की उपासना करो तो सच्चे मन से। वहाँ दिखावा नहीं होना चाहिए। आप किससे भक्त होने का सर्टिफिकेट या तमगा चाहते हैं। इस भौतिक संसार से यदि यह प्रशंसा पा ली कि अमुक व्यक्ति बड़ा भक्त है या बहुत बड़ा दानी है तो उससे क्या फर्क पड़ेगा? जिसकी उपासना के लिए सब ढोंग कर रहे हो यदि उसने अस्वीकृत कर दिया तो सब व्यर्थ हो जाएगा।
बगुले को भक्त क्यों कहते हैं? पहले यह जानना आवश्यक है तभी जान सकेंगे कि इंसान को बगुला भक्त क्यों कहा गया है? कहते हैं कि जब बगुला जब मछली पकड़ने में असमर्थ हो गया है तब उसने एक तरकीब सोची। वह तालाब में एक टांग पर खड़ा हो गया। उसे देखकर मछलियों ने सोचा अब यह भक्त बन गया है। इसलिए इससे डरने की कोई आवश्यकता नहीं। वे बेचारी मछलियाँ उसके षडयंत्र को समझ नहीं सकीं। मस्ती से तालाब में इधर-उधर अठखेलियाँ करने लगीं। अब बगुले की मौज हो गई। जो मछली उसके पास आती उसे सबकी नजर बचाकर उसे खा लेता। तो यह थी भक्त बने बगुले की सच्चाई।
मनुष्यों में जो मनुष्य अपने आचार-व्यवहार एवं चरित्र से वास्तव में ईश्वर का भक्त है उसे यह बताने या दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं होती कि वह सच्चा भक्त है। जैसे हीरे को अपने मूल्यवान होने का प्रमाण किसी को भी नहीं देने की जरूरत नहीं होती। जौहरी उसका मूल्य स्वयं ही लगा लेता है।
जो लोग आयुपर्यन्त लूट-खसौट करते हैं, चोरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार आदि कुकर्मों में लिप्त रहते हैं वे मंदिर में जाकर कितनी भी घंटियाँ बजा लें ईश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता। बेशक वे सुखी होने का दिखावा करें परन्तु मन में हर समय ही भयभीत रहते हैं।
कभी उन्हें अपनी सफेदपोशी का डर होता है तो कभी कानून के शिकंजे में जकड़े जाने का भय सताता है। अपने घर-परिवार के सदस्यों के मनमाने व्यवहार से पीड़ित रहते हैं। कहते हैं- 'जैसा खाओ अन्न वैसा होगा मन।' नाजायज तरीके से कमाए धन का सभी दुरूपयोग करते हैं।
मंदिरों या धार्मिक स्थानों पर गुप्त दान के नाम लाखों रूपयों नकद रूप में या सोने-चाँदी के आभूषण एक ही व्यक्ति क्या ईमानदारी व सच्चाई की कमाई से कभी दे सकता है? इसका उत्तर सभी न में ही देंगे। ईश्वर ऐसे धन को दान में प्राप्त करके कभी प्रसन्न नहीं होता। ऐसे लोगों की कमाई में बरकत भी नहीं होती।
पूजा, अर्चना और दान उन्हीं लोगों का फलीभूत होता है जो ईमानदारी व सच्चाई से कमाते हैं। ऐसे लोगों के पैसे में बहुत बरकत होती है। मेरी बात पर विश्वास न करके अपने आसपास इसको कसौटी पर परख लें तभी मानें।
कुछ लोग अपने जीवन में दुष्कर्मों की ओर प्रवृत्त रहते हैं और घंटों-घंटों पूजापाठ करते हैं उनका यह सब निष्फल हो जाता है। वे शायद सोचते हैं कि पूजापाठ करने से उनके पाप कट जाएँगे पर ऐसा नहीं होता। वे भूल जाते हैं- 'अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।'
अर्थात जो भी अच्छे या बुरे कर्म मनुष्य करता है उन दोनों का ही फल उसे भोगना पड़ता है।
अपने आपको ईश्वर की दृष्टि में श्रेष्ठ सिद्ध करना चाहिए। दुनियावी प्रदर्शन से बचना चाहिए। जिस मालिक के नाम पर सारे आडम्बर कर रहे हैं वह तो सर्वज्ञ है। आँखें बंद कर लेने से जैसे बिल्ली नहीं भाग जाती उसी प्रकार अपने कर्मों से भी जीव नहीं बच सकता। फल भोगते समय बहुत कष्ट होता है। घर-परिवार सहित सारी दुनिया से मनुष्य छल कर सकता है पर स्वयं से भागकर नहीं जा सकता। अतः बगुला भक्त न बनकर सच्चा भक्त बनें।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 20 जनवरी 2018
धन और बिमारी
बिमारी खरगोश की तरह आती है और कछुए की तरह जाती है। धन कछुए की तरह आता है और खरगोश की तरह जाता है। इन पंक्तियों को पढ़कर मेरा इस विषय पर कुछ लिखने का मन हुआ। सो मैं यह आलेख लिख रही हूँ।
यह अक्षरश: सत्य है कि बीमारी और दुख-कष्ट बिन मौसम बरसात की तरह चले आते हैँ। आते समय तो खरगोश जैसी तेजी से आकर मनुष्य को अनायास ही घेर लेते हैं और दिन-रात परेशान करते हैं। तब हम चाहते हैं कि जिस फुर्ती से वे आए हैं उसी तरह पलक झपकते ही वे चले जाएँ। ऐसा हो नहीं पाता क्योंकि वे तो मटकते-मटकते कछुए की-सी चाल चलते हुए और हमारे धैर्य की परीक्षा लेकर ही वापिस लौटते हैं।
बिमारी, कष्ट, दुख और परेशानियाँ हमारे इस भौतिक जीवन का ही हिस्सा हैं। चाहे-अनचाहे हर स्थिति में हर मनुष्य को इन्हें भोगना पड़ता है। यहाँ उसकी इच्छा नहीं पूछी जाती। पूर्वजन्म कृत कर्मों के ही अनुसार उसे बस केवल अपने भोगों को भोगकर उनसे मुक्त होना होता है। जब इन कुकर्मों को स्वेच्छा से प्रसन्नता पूर्वक हम करते हैं तो उनका दुष्परिणाम भी तो हमें अकेले को ही भोगना होता है।
सृष्टि का यह अटल नियम है कि जैसे हम बोते हैं वैसा ही काटते हैं। इसी तरह हमने अपने कर्मों की जैसी भी फसल पूर्व जन्मों में बोयी थी वैसी ही तो काटनी पड़ेगी। यानि उसी हिसाब से ये बिमारी, कष्ट और परेशानी हमें भोगकर ही काटने होंगे। इन सबसे बचना असम्भव ही नहीं नामुमकिन है। फिर रोते-झींकते भोगेंगे तो भी ठीक है और फिर यदि हंसते हुए उस ईश्वरीय इच्छा के आगे अपना सिर झुका देंगे तो मन की पीड़ा कुछ हद तक कम हो जाएगी।
बिमारी-हारी और कष्ट-परेशानी ने जितना समय हमें नचाना है वे तो अपना नाच नचाएँगी ही। अब उसके लिए समय की कोई सीमा तय नहीं की जा सकती। ये सब हमारे अपने भोगों का खट्टा, तीखा व कटु भोग है जो समयानुसार हमें मिल रहा है।
अब हम धन की बात करते हैं। सारा जीवन मनुष्य पापड़ बेलता रहता है। झूठ-सच, छल-फरेब सब करता है। वह चोरी करने और डाका डालने तक से परहेज नहीं करता। रिश्वतखोर, भ्रष्टाचारी तक बन जाता है। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह परिश्रम करता है तब जाकर अपना व घर-परिवार का पोषण कर पाता है।
कहते हैं पानी की एक-एक बूँद के डलते रहने से मटका भरता है उसी प्रकार पैसा-पैसा करके धन को जोड़ा जाता है। अर्थात कछुए की तरह मन्थर गति से या सुस्त चाल से चलते हुए सालों-साल लग जाते है उसे अपने लिए पर्याप्त धन एकत्रित करने में।
खून-पसीने से कमाए हुए धन में यदि सेंध लग जाए अर्थात् मनुष्य को या उसकी सन्तान, किसी को भी नशे, रेस आदि की बुरी लत लग जाए तो इन कुटेवों से धन की बरबादी खरगोश की चाल से होने लगती है। उसके खजाने में बड़े-बड़े छेद हो जाते है जो उसे सड़क तक पर भी लाकर खड़ा कर देते हैं।
अपने पूर्व जन्मों में किए गए सत्कर्मों अथवा कुकर्मो की कुण्डली हम नहीं बना सकते पर अपने वर्तमान में ऐसा प्रयास हमें अवश्य करना चाहिए कि खरगोश की तरह भागकर आए दुख हमें न दबोचने पाएँ। उनके कछुए की तरह जाने की भी हमें कभी प्रतीक्षा न करनी पड़े।
इसी प्रकार एक-एक पैसा करके कछुए की चाल की तरह जोड़े धन में कोई ऐसा छेद न होने पाए कि वह खरगोश की चाल से भागता हुआ हमें मुँह चिढ़ाता हुआ हमसे दूर चला जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 19 जनवरी 2018
प्रकृति माँ की गोद
प्रकृति से मनुष्य का अटूट रिश्ता है। प्रकृति को हम माँ कहते हैं। हम जितना प्रकृति से दूर हो रहे हैं उतना ही कष्ट पा रहे हैं। सुनने में बड़ा अजीब लग रहा है पर वास्तविकता यही है। हम सभी दिन प्रतिदिन कृत्रिम जीवन जी रहे हैं।
हमारे आचार-व्यवहार में बनावटीपन आ रहा है। हमें इस बात का पता ही नहीं चला कि हम कब इस ओर बढ़ गए?
कामकाज की आपाधापी में हम स्वयं मशीन बनते जा रहे हैं। ऐसा लगता है हमारे पास फुर्सत के पल मानो बचते ही नहीं हैं। यह ठीक भी है। यदि आराम की ओर ध्यान देंगे तो जीवन की रेस में पिछड़ जाएंगे।
हमें पुस्तकों और बड़े-बजुर्गों ने यही सिखाया था कि- early to bed and early to rise makes a man healthy, wealthy and wise. पर आज हम इस सत्य को भूल चुके हैं। इसका कारण है हमारी दिनचर्चा में बदलाव।
हम रात देर से सोते हैं और प्रातः उसी तरह देरी से जाग कर उठते हैं। स्कूलों में काम करने वालों की बात नहीं कर रही। आज हम शादी-ब्याह, पार्टियों, कलबों से देर रात लौटते हैं तो प्रात: जल्दी उठना नहीं हो पाता। हमारे सभी कार्यक्रम देर रात ही सम्पन्न होते हैं।
नौकरी या व्यापार में भी कोई समय सीमा नहीं रहती। परिणाम हमें अपने स्वास्थ्य की कीमत से चुकाना पड़ता है। नित नयी बिमारियाँ हमें जकड़ लेती हैं। उनसे छुटकारा पाने के लिये डाक्टरों व अस्पतालों की जेब भरनी पड़ती है। आखिर इलाज वही होता है- सैर करो, योगासन करो, भोजन नियम से निश्चित समय पर करो, छुट्टी लेकर किसी हिल स्टेशन पर कुछ दिन बिताओ आदि।
इसका सीधा-सा अर्थ है प्रकृति के समीप जाओ। अपना ध्यान स्वयं रखो। जब अपने स्वास्थ्य व पैसे को गंवा कर हमें फिर प्रकृति की ओर लौटना ही है तो समय रहते हम क्यों न चेत जाएँ, वह हमारे लिए बहुत अच्छा रहेगा।
प्रकृति माता की गोद में जाने से हमें निराशा नहीं उत्साह मिलेगा। हम जीवन जीने की नई ऊर्जा प्राप्त करेंगे। तो आओ आज से हम प्रकृति के पास जाने और उसे हानि न पहुँचाने का अपने मन में संकल्प करें तथा दूसरों को भी समझाएँ।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 18 जनवरी 2018
बत्तीस दाँतों में जीभ
बत्तीस दाँतों के बीच हमारी जीभ सुरक्षित रहती है। इसका कारण है कि दाँत कठोर होते हैं। जब निकलते हैं तो भी परेशान करते हैं और जब हमसे विदा लेते हैं तब भी कष्ट देते हैं। कितनी ही कठोर वस्तु क्यों न हो उसे ये दाँत पल भर में चूरा कर देते हैं। इसी कठोरता के कारण सुख के साथ-साथ दुख का कारण भी बनते हैं। अपने इस कठोर व्यवहार के कारण ये किसी प्रकार का समझौता नहीं कर पाते। तभी आयुपर्यन्त साथ नहीं निभाते बल्कि बीच में ही साथ छोड़कर विदा ले लेते हैं।
ये सदा ही अकड़कर रहते हैं झुकना इनका स्वभाव नहीं। यह तो ईश्वरीय नियम है कि किसी का भी घमंड स्वीकार्य नहीं होता। महाविद्वान रावण का अहंकार हो या भगवान कृष्ण के मामा कंस हो या अपने को स्वयंभू भगवान कहने वाले हिरण्यकश्यप का अहम हो सभी नष्ट हो जाते हैं। इतिहास साक्षी है कि बड़े-बड़े साम्राज्य तक अपनी गर्वोक्तियों के कारण नष्ट हो गए।
मुँह में रहने वाली जीभ लचकदार है इसीलिए समझौता कर लेती और मृत्यु तक साथ निभाती है। यह है तो पर चमड़े की जो समय-असमय फिसल ही जाती है जिसका खामियाजा मनुष्य को कभी-कभी तो आयुपर्यन्त भुगतना पड़ता है। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हमारे सामने है महाभारत का युद्ध है। द्रौपदी यदि दुर्योधन को कठोर शब्दों से आहत न करती तो शायद उस महाविनाश से बचा जा सकता था जिसका नुकसान हमारा देश शताब्दियों बाद भी आज तक भुगत रहा है।
इसीलिए हमारे बड़े-बजुर्ग कहा करते हैं- 'यह जीभ राज कराती है नहीं तो मिट्टी में मिला देती है।' मुझे यह सब बताने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आप सभी सुधी जन जानते हैं कि इतिहास भरा पड़ा है ऐसे उदाहरणों से।
यह जीभ बड़ी ही चटोरी है। यह ऐसी इन्द्रिय है जिसको वश में करना आवश्यक है।
जब तब हमें स्वादिष्ट व्यंजनों के लिए ललचाती रहती है। जहाँ चटपटा देखा इसकी लार टपकने लगती है। इसकी इस आदत के कारण बहुधा मनुष्य को मुसीबत का सामना करना पड़ता है। आप कहेंगे यह कैसे? इसके उत्तर में यही कह सकती हूँ कि हर खाद्य पदार्थ हर व्यक्ति को सूट नहीं करता। कई अपरिहार्य कारणों से हमें किन्हीं खाद्यान्नों को खाने के लिए डाक्टर मना करते हैं पर यह हमारी जीभ माने तब न। हमें ललचाती रहती है और हम उन को खाकर और अधिक बीमार व लाचार हो जाते हैं। जब रोग बढ़ता है तब पछताते हैं कि काश समय रहते गलत खानपान से परहेज करते तो स्वस्थ रहते। डाक्टरों के पास जाकर पैसा व समय बरबाद न करते।
सादा भोजन खाने के बजाय चटपटा भोजन चटखारे ले-लेकर खाना इसका स्वभाव है। इसका चटोरापन शांत करने के लिए मनुष्य अथक प्रयास करता है। सारे पाप-पुण्य इसी के कारण करता रहता है। चोरी-डकैती, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी, किसी का गला काटना आदि काटने मनुष्य स्वयं को रोक नहीं पाता जिनका अंत विनाशकारी होता है।
हमें यथासंभव दाँतों की तरह कठोर न बनकर फलदार वृक्ष की तरह झुकने की प्रवृत्ति वाला बनना चाहिए तभी अधिक समय तक सरवाइव कर सकते हैं। जीभ की तरह नरम व लचीला होना चाहिए ताकि जीवन भर साथ निभा सके परंतु उसकी तरह लालची या स्वाद का गुलाम नहीं बनना चाहिए जिससे जीवन में अनचाहे ही दुखों-परेशानियों को बुलावा(न्यौता) दे दिया जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 17 जनवरी 2018
नकारात्मक विचारों से बचें
समय पल-पल करके बीतता जा रहा है, इसे मनुष्य एक चेतावनी समझ सकता है। जो भी उसने योजना बनाई हुई है, उसे साकार कर लेना चाहिए। ताकि बाद में पश्चाताप करने की उसे कभी आवश्यकता न पड़े। यदि मनुष्य कोई षडयन्त्र करने का विचार कर रहा है तो समय रहते चेत जाना चाहिए। उसे उस नकारात्मक कार्य को करने से यथासम्भव बचना चाहिए। उसका दुष्परिणाम तब भुगतना पड़ता है तो बहुत कष्टों का सामना करना पड़ता है।
एक बोध कथा की चर्चा करना चाहती हूँ जिसे बहुत से लोगों ने पढ़ा होगा। एक दोहा सबके उत्थान का कारक बना। बहुत समय से राज्य का भोग करते हुए एक राजा के बाल सफेद होने लगे थे। एक दिन उसने अपने दरबार में उत्सव रखने का विचार किया। अतः अपने गुरु तथा मित्र देश के राजाओं को भी आमन्त्रित किया। उत्सव को रोचक बनाने के लिए अपने राज्य की सुप्रसिद्ध नर्तकी को बुला भेजा। राजा ने कुछ स्वर्ण मुद्राएँ अपने गुरु को दीं ताकि नर्तकी के अच्छे नृत्य पर वे उसे पुरस्कृत कर सकें। सारी रात उसका नृत्य चलता रहा। सुबह होने वाली थी, नर्तकी ने देखा कि उसका तबले वाला ऊँघने लगा है तो उसे जगाने के लिए नर्तकी ने निम्न दोहा पढ़ा -
बहु बीती, थोड़ी रही, पल पल गयी बिहाई।
एक पलक के कारने, न कलंक लग जाए॥
अब इस दोहे का अर्थ अलग-अलग व्यक्तियों ने अपनी-अपनी बुद्धि के अनुरूप अर्थ किया। वह तबले वाला सतर्क होकर बजाने लगा। जब ये बात गुरु ने सुनी तो उसने सारी मोहरे उस नर्तकी को दे दीं। उसी दोहे को सुनकर राजकुमारी ने अपना नौलखा हार दे दिया और राजकुमार ने अपना मुकट उतारकर दे दिया। राजा ने कहा - 'नर्तकी, तुमने बस एक दोहा सुनाकर सबको लूट लिया है।'
जब ये बात राजा के गुरु ने सुनी तो उनके नेत्रो में आँसू आ गए और कहने लगे - 'राजा, इसे नर्तकी न कह यह अब मेरी गुरु है। इसने मेरी आँखे खोल दी हैं। मै सारी उम्र जंगलो में तपस्या करता रहा और आखरी समय मुजरा देखकर अपनी साधना नष्ट करने आ गया। भाई मै तो चला।'
राजकुमारी ने कहा - आप मेरी शादी नहीं करवा रहे थे, आज मैंने आपके महावत के साथ भागकर अपना जीवन बर्बाद कर लेना था। इसने मुझे सुमति दी है कि कभी तो तेरी शादी होगी। क्यों अपने पिता को इस आयु में कलंकित करती है?'
राजकुमार ने कहा - 'आप मुझे राज्य नहीं दे रहे थे। मैं सिपाहियों के साथ मिलकर आपका कत्ल करवाने का घृणित कार्य करने वाला था। इसने समझाया - 'आखिर राज्य तो तुम्हेँ ही मिलना है। क्यों अपने पिता के खून का कलंक अपने सिर पर लेते हो?'
जब राजा ने ये सारी बातें सुनी तो उसे भी आत्मज्ञान हुआ - ' गुरु मौजूद हैं, क्यों न मै अभी राजकुमार का राजतिलक कर दूँ।'
उसी समय राजा ने अपने बेटे का राजतिलक कर दिया और बेटी से कहा - 'बेटी! मैं जल्दी ही योग्य वर देखकर तुम्हारा विवाह कर दूँगा।'
यह सब देखकर नर्तकी ने कहा - 'मेरे एक दोहे से इतने लोग सुधर गए पर मैं आज तक नहीं सुधरी। आज से मैं भी अपना धन्धा बन्द करती हूँ। हे प्रभु! आज से मै भी तेरे नाम का सुमिरन करूँगी।'
समझने की बात है कि दुनिया को बदलते देर नहीं लगती। दोहे की दो पंक्तियाँ से भी ह्रदय परिवर्तन हो सकता है। केवल थोड़ा धैर्य रख कर चिन्तन और मनन करने की आवश्यकता होती है। इस धरती पर विद्यमान सब पदार्थ यहीं धरे रह जाते हैं। मनुष्य अपने साथ न कुछ भी लेकर आता है और न ही कुछ लेकर जा सकता है। वह मुट्ठी बाँधे खाली हाथ इस संसार में आता है और उसी प्रकार अपनी सारी धन-दौलत छोड़कर विदा लेनी होती है। यही सृष्टि का अटल नियम है जो किसी भी व्यक्ति विशेष के लिए भी नहीं बदला जा सकता।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 15 जनवरी 2018
कंक्रीट के जंगल में हम
कंक्रीट के जंगल में रहते-रहते हम सभी शहर वासी संवेदना से रहित होते जा रहे हैं। ऊँची-ऊँची बहुमंजिली इमारतें हमारी प्रगति व वैभव का प्रतीक हैं। एक जैसे बने ये आलिशान भवन मानो हमें मुँह चिढ़ा रहे हैं।
इनमें रहने वाले हम दिन-प्रतिदिन अपने में सिमटते जा रहे हैं। मैं, मेरे बच्चे और मेरा परिवार बस। इसके आगे हमारी सोच अपने दरवाजे बंद कर लेती है। आज हम मात्र केवल यही सोचते हैं कि अमुक व्यक्ति से संबंध रखने से मुझे क्या लाभ मिलेगा? जहाँ लाभ नहीं वहाँ संबंध भी नहीं चाहे रक्त संबंध ही क्यों न हों? अगर वे हमारी कसौटी पर खरे न उतरें तो हम उनसे किनारा करने में भी नहीं हिचकिचाते। हमें किसी मित्र-संबंधी की भी परवाह नहीं है। हम बस अपने में सिमट कर रहना पसंद करते हैं।
अपने आसपास की हमें कोई चिन्ता नहीं। पड़ौसी के घर में कोई सुख है या दुख, उनके घर चूल्हा जला या नहीं हम इन सबसे अनजान हैं। या यूँ कहें कि हम ये सब जानना ही नहीं चाहते। हमारे द्वार पर कोई याचक आ जाए तो उसे अपमानित करके भगा देते हैं। और अपनी जरूरत होने पर गधे को भी बाप बनाने में नहीं हिचकिचाते।
कंक्रीट के जंगल में ईंट, पत्थर, सीमेन्ट, लौहे आदि की तरह हमारे मन भी कठोर बनते जा रहे हैं। हमारे सामने चाहे किसी का एक्सीडेंट हो जाए या चाहे कोई मर भी जाए तो हमारे दिल नहीं पसीजते।
यदि हम हरियाली वाले जंगलों में रहते तो शायद हमारे हृदयों में संवेदनाएं बनी रहतीं और हम इतने निष्ठुर न होते।
'वसुधैव कुटुम्बकम्' की विशाल दृष्टि वाले हम अपने संकुचित दृष्टिकोण के कारण अपने जीवन मूल्यों से दूर होते जा रहे हैं।
हमें यत्न पूर्वक अपने आपको सहिष्णु व सहृदय बनाना होगा तभी सामाजिक प्राणी वाली छवि पर फिर से खरे उतर सकेंगे।
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