शनिवार, 24 मार्च 2018

जीवन की सार्थकता

जनमानस को जीवन में मार्गदर्शन करने वाले महापुरुष यदि मिल जाएँ तो मनुष्य का जीवन सफल हो जाता है। इसी कड़ी में भर्तृहरि जी का एक श्लोक पढ़ा। उसमें कवि ने बहुत ही महत्त्वपूर्ण चर्चा की है। कवि हमें समझा रहे हैं-
क्षान्तिश्चेत्कवचेन किं, किमरिभिः क्रोधोऽस्ति चेद्देहिनाम्।
ज्ञातिश्चेदनलेन किं यदि सुहृद्दिव्यौषधै: किं फलम्।।
किं सर्पैर्यदि दुर्जनाः, किमु धनैर्विद्यानवद्या यदि।
व्रीडा चेत्किमु भूषणैः सुकविता यद्यस्ति राज्येन किम्।।
अर्थात यदि मनुष्य धैर्यवान है तो उसे किसी भी अन्य कवच की क्या आवश्यकता? यदि व्यक्ति क्रोधी है तो उसे शत्रुओं की क्या आवश्यकता? यदि वह बन्धु-बान्धवों से घिरा रहता हैं तो उसे अन्य किसी अग्नि की क्या आवश्यकता? यदि उसके मित्र सच्चे हैं तो उसे किसी भी बीमारी के लिए औषधियों की क्या जरूरत? यदि वह दुर्जनों से घिरा रहता है तो उसे साँपों से डरने की क्या आवश्यकता? यदि वह विद्वान है तो उसे धन-दौलत की क्या आवश्यकता? यदि मनुष्य में लज्जा है तो उसे अन्य आभूषणों की क्या आवश्यकता? यदि वह विद्वान कवि है तो उसे किसी राजा की क्या आवश्यकता?
         कवि स्पष्ट कर रहे हैं कि मनुष्य का सबसे बड़ा कवच होता है धैर्य। ऐसे व्यक्ति को किसी भी अन्य कवच की आवश्यकता नहीं होती। धैर्यशीलता व्यक्ति का सबसे बड़ा गुण होता है। ये लोग दूसरों को क्षमा कर देते हैं। अपने मन में किसी के प्रति द्वेष की भावना नहीं रखते। इसलिए वे सदा अपने शान्त मन से बुराई करने वालों का स्वागत करते हैं। जब रखेगे उसका प्रतिकार करने के स्थान पर वे शान्ति का व्यवहार करेंगे तो दूसरा कब तक विरोध करता रहेगा।
        यदि व्यक्ति क्रोधी है तो उसे शत्रुओं की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि क्रोध मनुष्य के अपने शरीर में रहने वाला सबसे बड़ा शत्रु है। वह उसके विवेक का हरण कर लेता है। इससे मनुष्य के सोचने-समझने की शक्ति नष्ट होती है। क्रोध में मनुष्य अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करता है। अपने बनते हुए कार्य बिगाड़ देता है, इससे उसको हानि उठानी पड़ सकती है। क्रोध में इन्सान अपने रिश्तों तक की पहचान भूल जाता है।
          जिस मनुष्य को अपने बन्धु-बान्धवों से घिरे रहने का सौभाग्य मिलता है, उससे बढ़कर सौभाग्यशाली कोई और मनुष्य इस संसार में नहीं हो सकता। उसे अन्य किसी अग्नि यानी शक्ति की कोई आवश्यकता नहीं होती। मनुष्य अपने बन्धुओं से पहचाना जाता है। उनका साथ उसकी सबसे बड़ी पूँजी होती है, ताकत होती है। उसके सुख-दुख में वे उसके साथ कन्धे-से-कन्धा मिलाकर खड़े होते हैं।
        मनुष्य के पास सच्चे और अच्छे मित्र हों तो उसे किसी भी बीमारी के लिए औषधियों की आवश्यकता नहीं होती। सद् मित्रों की संगति से उसकी सर्वविध उन्नति होती है। ऐसी संगति में उसके दुर्गुण धीरे-धीरे नष्ट होते रहते हैं। उनके संसर्ग में वह कुन्दन की तरह चमकता है। इस तरह मानसिक और आत्मिक रूप से वह स्वस्थ राहट है। इसलिए औषधियों की आवश्यकता उसे अपेक्षाकृत न के बराबर होती है।
         दुर्जनों से घिरे रहने वाले मनुष्य को तो साँपों से डरने की कोई आवश्यकता नहीं होती। दुर्जनों का संसर्ग मनुष्य को कुमार्गगामी बनाता है। वह कब पतन के मार्ग पर चल पड़ता है, उसे पता ही नहीं चलता। उसके मौकापरस्त मित्र सदा अवसर की तलाश में रहते हैं। मौका मिलते ही अपने मित्र को साँप की तरह डसने में उन्हें कोई परहेज नहीं होता। इसीलिए दुर्जनों की संगति से बचने की शिक्षा मनुष्य को मनीषी देते हैं।
          विद्वान मनुष्य को धन-दौलत की नहीं ज्ञान की आवश्यकता होती है। उसका ज्ञान ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी होता है। इसीलिए उसका अधिकांश समय अध्ययन और विद्वानों की संगति में ही व्यतीत होता है। इसलिए वह भौतिक सुख-साधनों के पीछे पागलों की तरह नहीं भागता। वह जानता है कि उसका लक्ष्य संसार के मकड़जाल में फँसना नहीं है। उसे तो बस ज्ञानार्जन करना है औऱ प्रभुभक्ति करते हुए मोक्ष की प्राप्ति करनी है।
          लज्जाशील मनुष्य को इन भौतिक आभूषणों की आवश्यकता अनुभव नहीं होती। वे अपने दायित्वों का निर्वहण पूर्णरूपेण करते हैं। वे देश, धर्म और समाज के नियमों के विरूद्ध कोई कोई कार्य नहीं करते। उनका पूर्ण रूप से पालन करते हैं। उन्हें समाज का, घर-परिवार का भय होता है। इसलिए उन्हें किसी प्रकार के स्वर्णादि आभूषणों की आवश्यकता नहीं होती।
        मनुष्य यदि विद्वान कवि है तो उसे किसी राजा की आवश्यकता नहीं होती। वह अपने जीवन में किसी भी राजदरबार में राजकवि नहीं बनना चाहता। अनावश्यक ही राजाओं का झूठा प्रशस्तिगान करके अपने स्वाभिमान को गिरवी नहीं रखना चाहता। राजदरबारी कवि बन जाने से उनके अपने स्वतन्त्र अध्ययन में बाधा आती है।
         इस श्लोक के माध्यम से कवि हम लोगों को सही मार्ग दर्शाना चाहता है। मनुष्य को सदा सोचविचार करके अपने जीवन में कदम आगे बढ़ाना चाहिए। अपने विवेक का आश्रय लेकर आगे कदम बढ़ाना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 23 मार्च 2018

स्त्री भोग्या नहीं सहयोगी

पितृसत्तात्मक या पुरुषप्रधान समाज में पुरुष ने 'येन केन प्रकारेण' यानी साम, दाम, दण्ड, भेद का सहारा लेकर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया है और वह स्वयम्भू बन बैठा है। स्त्री को उसने मात्र भोग्या मान लिया है। वह कन्धे-से-कन्धा मिलाकर चलने वाली अपनी सहधर्मिणी या सहयोगिनी स्त्री को पैर की जूती समझने की भूल कर बैठा है। अन्ततः उसे उपभोग या उपयोगिता की वस्तु मानने लगा। इसका सटीक उदाहरण है बाजारवाद। वहाँ स्त्री को एक कॉमोडिटी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। प्रायः विज्ञापनों में उसे अर्धनग्न दिखाकर अपने प्रोडक्ट को बेचने का प्रयास किया जाता है। ऐसी वस्तुओं के विज्ञापन में उसे दिखाया जाता है जहाँ उसके दिखाए जाने का कोई औचित्य ही प्रतीत नहीं होता।
       पुरुष स्त्री को सदा लाचार, बेबस, बेचारी और असहाय ही देखना चाहता है, जिसके बिना मानो उसका गुजरा नहीं हो सकता। वह स्त्री उसे कदापि नहीं भाती जो साहसी हो, बौद्धिक रूप में उससे आगे हो, उसे मात देने की क्षमता रखती हो। इसीलिए उन्हें महिला बॉस फूटी आँख नहीं सुहाती। उनके अधीन काम करने में पुरुषों की ईगो हर्ट होती है यानी उनकी हेठी होती है। वे तो सोचते हैं कि स्त्री सहज सुलभ होती है, अतः अपने अधीनस्थ महिलाकर्मियों का यदा कदा शोषण करने को वे अपना अधिकार समझ लेते हैं। उनका विरोध करना सहन नहीं कर पाते।
        यह भी शायद एक कारण हो सकता है स्त्रियों को दबाकर रखने का कि लम्बे समय तक हमारा देश मुगलों के अधीन रहा। सुन्दर स्त्री या लड़की को वे जबरदस्ती उठाकर ले जाते थे। इसलिए सुरक्षा की दृष्टि से उन पर कई पाबन्दियाँ लगाई गई होंगीं। परन्तु अब तो देश स्वतन्त्र है, ऐसी किसी हेकड़ी की गुँजाइश नहीं है। फिर भी स्त्री को उसका मनचाहा न देना तो अनुचित ही कहा जाएगा।
         आज स्त्रियाँ राजनीति, फ़िल्म, व्यवसाय, नौकरी, खेल, विज्ञान, लेखन, पायलट, किसी तरह की गाड़ी चलाना यानी हर क्षेत्र में पुरुषों को मात देती हुई आगे बढ़ रही हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वे किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से कम नहीं हैं। फिर भी वह अपने दम्भ में रहता है। वह स्त्री की बौद्धिकता को मन से स्वीकार नहीं करना चाहता। यदि वह उसके बौद्धिक गुण की प्रशंसा कर ले तो उसका मिथ्याभिमान आड़े आ जाता है। उसके झूठे अहं को ठेस लग जाती है।
        पुरुष का यह दोगलापन ही कहा जा सकता है कि अपने मित्र के रूप में उसे एक आधुनिक नारी की तलाश रहती है जो मॉड हो, उसके साथ क्लब या पार्टी में जा सके। परन्तु जब पत्नी की बात आती है तो वह उसे घरेलू ही चाहिए होती है। वह स्वयं विवाहेतर सम्बन्ध चाहे बना ले पर उसकी पत्नी सीता या सावित्री ही होनी चाहिए। वह पत्नी से जब चाहे बेवफाई कर ले, उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं होना चाहिए। कारण, वह खुदमुख्तार है, उस पर कोई अँगुली उठाने की धृष्टता कैसे कर सकता है? परन्तु यदि उसकी पत्नी से अज्ञानतावश भी कोई चूक हो जाए तो वह सहन नहीं कर पाता। स् समय उसकी अग्नि परीक्षा लेने के लिए कमर कसकर तैयार रहता है।
          आजकल बहुत से युवा पुरुष इस बात को समझने लगे हैं कि स्त्रियों में योग्यता की कमी नहीं है। उन्हें तिरस्कृत करके, उन्हें नीचा दिखाकर काम नहीं चलेगा। उनके साथ कदम मिलाकर चलने में ही भलाई है। इसलिए वह उन्हें अपने सहयोगी के रूप में मानने लगा है। इसके साथ ही एकल परिवारों के चलते भी दोनों पति-पत्नी को मिलकर ही गृहस्थी की गाड़ी चलानी होती है। इसलिए चाहे मजबूरी से कहें या स्वेच्छा वे अब कुछ-कुछ समझौते करने लगे हैं।
          यदि एक दूसरे को नीचा दिखाने का प्रयास किया जाता रहेगा तो सारा मूल्यवान समय बस उठा-पटक में ही व्यतीत होता रहेगा। ऐसे में कोई सकारात्मक कार्य नहीं हो सकेगा। इस उधेड़बुन के कारण किसी समस्या का कोई समाधान नहीं निकल सकेगा। स्त्री और पुरुष परस्पर सहयोग कर सकें तभी सफलता स्वयं दरवाजे तक चलकर आएगी।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 22 मार्च 2018

ईश्वर के कृपा पात्र

ईश्वर की दृष्टि में वे लोग उसकी कृपा के पात्र होते हैं जो सच्चे मन से और लग्न से उसकी आराधना करते हैं। सहृदय परोपकारी सज्जन लोगों को वह स्वयं पसन्द करता है। जो लोग छल-कपट करते हैं, कलुषित हृदय वाले होते हैं, वे उसको प्रिय नहीं होते। वह उन लोगों को समय समय पर सुधार जाने के लिए चेतावनी देता रहता है। यह उन पर निर्भर करता है कि वह अपने आचार-व्यवहार को सुधारना चाहते हैं अथवा नहीं।
           कुछ दिन पूर्व वट्सअप पर एक सन्त की कथा पढ़ी थी जो बहुत प्रेरक थी। इसमें वे एक देवदूत की डायरी देखते हैं जिसमें उनका नाम ईश्वर के प्रिय लोगों की सूची में था। इस कथा को आप सुधी जनों के साथ साझा करना चाहती हूँ। आप लोगों को भी निश्चित ही यह पसन्द आएगी।
           एक सन्त ईश्वर भक्ति में इतना तल्लीन रहते थे कि उन्हें दिन-दुनिया की कोई ख़बर नहीं रहती थी। उनके मुख-मण्डल पर सदा अलौकिक तेज झलकता था। उनसे प्रभावित होकर लोग दूर-दूर से उनके दर्शन के लिए आते थे। वे निस्पृह रहकर सबको उपदेश देते थे।
          वे प्रतिदिन प्रात: चार बजे उठकर भगवत भजन करते हुए अपनी मस्ती में चले जा रहे थे कि उनकी नजर एक देवदूत पर पड़ी जिसके हाथ में एक डायरी थी। उस सन्त ने फरिश्ते से ये डायरी के विषय में पूछा। फरिश्ते बताया, "डायरी में उन लोगों के नाम हैं जो ईश्वर का स्मरण करते हैं।"
          सन्त के मन में डायरी में अपना नाम देखने की इच्छा हुई। फरिश्ते ने उन्हें अपना नाम देखने के लिए डायरी सन्त को दे दी। जब उन्होंने डायरी खोलकर देखी तो उनका नाम उसमें कहीं भी नहीं था। सन्त थोड़ा मुस्कुराते हुए अपनी मस्ती में, प्रभु का नाम जपते हुए वहाँ से चले गये।
          दूसरे दिन भी वही फरिश्ता उन्हें दिखाई दिया पर सन्त ने अनदेखा कर दिया। तभी उस फरिश्ते ने उन्हें डायरी देखने के लिए कहा। ज्योंहि उन्होंने डायरी खोली तो देखा कि सबसे ऊपर उन्हीं का नाम है। इस पर संत हँसकर उस फरिश्ते से पूछा, "क्या भगवान के घर पर भी दो-दो डायरियाँ हैं? कल वाली डायरी में मेरा नाम नहीं था पर आज सबसे ऊपर है।"
        यह सुनकर फरिश्ते ने कहा, "कल आपने जो डायरी देखी थी, उसमें उन लोगों के नाम थे जो ईश्वर से प्यार करते हैं। आज वाली डायरी में उन लोगों के नाम है, जिन्हें ईश्वर स्वयं प्यार करता है।"
         इतना सुनते ही सन्त रोने लगे और बहुत समय तक सिर झुकाए खड़े रहे। रोते हुए वे कहने लगे, "मालिक यदि मैं कल तुझ पर जरा-सा भी अविश्वास कर लेता तो मेरा नाम कही नहीं होता। मेरी थोड़ी-सी सहनशीलता का तुमने मुझ अभागे को इतना बड़ा पुरस्कार दे दिया। तू सच में बहुत दयालु है मालिक। तुझसे अधिक प्यार करने वाला कोई और हो ही नहीं सकता।"
        यह कथा हैम मनुष्यों को यही शिक्षा देती है कि ईश्वर का प्रिय भाजन बनने के लिए किसी विशेष तामझाम की आवश्यकता नहीं होती। बस अपनी सच्ची भावना से उसका सदा स्मरण करना चाहिए। ईश्वर की भक्ति सच्चे मन से न करके जो उसका प्रदर्शन करते हैं, वे परमात्मा के साथ नहीं स्वयं के साथ ही छल करते हैं। ऐसे ढोंगी लोगों को इस दुनिया के लोग भी पसन्द नहीं करते तो फिर वह मालिक कैसे उन्हें अपना प्रिय मान सकता है?
        ईश्वर की उपासना करने में अपनी अन्तिम साँस तक डटे रहना चाहिए। अपने मन में प्रभु के प्रति पूर्ण आस्था और विश्वस रखना चाहिए। धैर्य का दामन भूलकर भी नहीं छोड़ना चाहिए। देर-सवेर उसकी कृपा की वर्षा अवश्य होगी, यही सत्य है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 21 मार्च 2018

बुजुर्गों की दुर्दशा

हमारी भारतीय संस्कृति में माता-पिता को ईश्वर का रूप कहा जाता है। इसीलिए घर के बड़े-बुजुर्ग घर की शान कहे जाते थे, उनके परामर्श के बिना कभी कोई भी कार्य नहीं किया जाता था। हर स्थान पर उन्हें मान देते हुए आगे रखा जाता था। आज बहुत से युवा उन्हीं को फालतू मानकर तिरस्कृत कर रहे हैं। वे सोचते हैं कि ये बुजुर्ग बिना वजह कमरा घेरकर बैठे हुए हैं। ये परलोकवासी हों तो उनका कमरा खाली हो जाए। उनकी बातें उन्हें बकझक प्रतीत होती हैं। उनकी चिन्ता करना तो दूर उनके विषय में वे चर्चा भी तक नहीं करना चाहते। दूसरों के घर के बुजुर्ग उन्हें बहुत अच्छे लगते हैं पर अपने घर के बुजुर्ग माता-पिता उन्हें फूटी आँख नहीं सुहाते।
         इसलिए बुजुर्गों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है। उन्हें दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूर्ण करने में भी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। दिन-प्रतिदिन अशक्त होते वे अपने कार्यों को करने में भी असमर्थ होते जा रहे हैं। वृद्धावस्था में जीवन यापन करना वाकई उनके लिए समस्या बनता जा रहा है। जिन बुजुर्गो के पास प्रभूत धन है, वे फाईव स्टार ओल्ड होम्स में सुविधा से रह सकते हैं। यहाँ भी पैसा प्रधान हो रहा है। परन्तु जिन बुजुर्गों के पास पर्याप्त साधन नहीं है, वे दरबदर की ठोकरें खाने के लिए विवश हैं। उन्हें न कोई घर में पूछता है और न ही ओल्ड होम्स में। उनकी व्यथा-कथा सुनकर या पढ़कर रौंगटे खड़े हो जाते हैं और मन बहुत ही व्यथित हो जाता है।
        बुजुर्गों की स्थिति घर में ही नहीं बाहर भी चिन्ताजनक है। इस विषय में कुछ समय पूर्व एक सर्वेक्षण कराया गया था और वह समाचार पत्र में प्रकाशित किया गया था। उसके अनुसार लगभग 44℅ बुजुर्ग कहते हैं कि सार्वजनिक स्थानों पर उनके साथ दुर्व्यवहार किया जाता है। 53℅ बुजुर्ग कहते हैं कि भारतीय समाज उनके साथ भेदभाव करता है। बैगलोर के 70℅ बुजुर्ग कहते हैं कि पार्क में टहलना उनके लिए बुरे सपने की तरह है।
         हेल्पेज इंडियंस के द्वारा कराए गए एक सर्वे के अनुसार-
दुनिया के लिए सबसे बेहतरीन और सबसे खराब जगहों में वैश्विक रैंकिंग में स्विट्जरलैंड का नाम सबसे अच्छी जगह और भारत का नाम सबसे खराब में शुमार किया गया है। हेल्पेज इंटरनेशनल ऑफ चैरिटीज की ओर से तैयार ग्लोबल एंड वाच इंडेक्स में 96 देशों में भारत को 71वें नंबर पर रखा है।
         इस सर्वेक्षण के अनुसार घर का सिरमौर कहे जाने वाले बुजुर्गों की ऐसी दुर्दशा के लिए हम सभी उत्तरदायी हैं। बस में, मेट्रो में सीट आरक्षित होने पर भी बुजुर्गों को बहुधा माँगकर सीट लेनी पड़ती है। सार्वजनिक स्थानों पर भी उनके साथ बुरे व्यवहार की खबरें यदा कदा प्रकाश में आती रहती हैं। धन, सम्पत्ति अथवा व्यापार को माता-पिता की इच्छा से या धोखे से हथियाकर उन्हें बेघर करने वाली नालायक सन्तति को लानत देते हुए समाचार गाहे-बगाहे प्रकाशित होते रहते हैं।
         आधुनिकता की अन्धी दौड़ में पैसे के पीछे भागते हुए हम भटकने लगे हैं। अपने नैतिक दायित्वों से मुँह मोड़ते जा रहे हैं। यह स्थिति वास्तव में बहुत ही कष्टप्रद है।भारत अपने नैतिक आदर्शों के लिए और विश्व को शिक्षित करने के कारण ही विश्वगुरु कहलाता था, विश्व में एक उदाहरण था। आज वह 96 देशों के सर्वे में लुढ़कता हुआ 71 वें पायदान पर जा पहुँचा है।
          बच्चे चैन की बाँसुरी बजाएँ, खूब ऐश करें और उनके बुजुर्ग माता-पिता असहाय अवस्था में दाने-दाने के लिए मोहताज हो जाएँ। अथवा अन्तिम अस्त्र आत्महत्या का मार्ग चुनने के लिए विवश हो जाएँ तो ऐसी संवेदनशील सन्तान से मनुष्य का बेऔलाद होना ही अच्छा है। उनके मन में यह सन्ताप तो नहीं होगा कि बच्चे होते तो बुढ़ापे की लाठी बनते।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 20 मार्च 2018

शाकाहारियों की श्रेणियाँ

सदियों से शाकाहार अथवा मांसाहार के विषय में चर्चा होती रहती है। कुछ लोग शाकाहार के पक्षधर हैं तो कुछ मांसाहार के। दोनों ही अपने समर्थन में अकाट्य तर्क देने का प्रयास करते हैं। इस विषय में सबके अपने-अपने विचार हैं। किसी भी व्यक्ति को अनावश्यक रूप से बाध्य नहीं किया जा सकता कि वह शाकाहारी बने या मांसाहारी। आजकल विश्व बहुत से ऐसे लोग हैं जो शाकाहार की ओर कदम बढ़ा रहे हैं। शायद वे इस आहार को खाकर थक गए हैं अथवा बोर हो गए हैं।
         मांसाहारी लोग तो स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे मांसाहार का सेवन करते हैं। वहाँ पर तो किसी किन्तु या परन्तु की गुँजाइश ही नहीं है। न ही वे यह कहने में जरा भी झिझकते हैं कि वे मांसाहारी हैं। वहाँ पर खाने की वैरायटी बहुत अधिक है। वे विभिन्न प्रकार के जलचर, नभचर और भूचर जीवों को अपने भोजन में सम्मिलित करते हैं। यह बात अलग है कि मांसाहार में किसी व्यक्ति को किसी जीव का मांस खाना पसन्द नहीं आता तो किसी को अन्य जीव का। फिर भी वे खाते तो मांसाहार ही हैं।
        शाकाहारी लोग शाकाहार का सेवन तो करते हैं परन्तु वे उसके साथ 'पर' शब्द का भी प्रयोग करते हैं। कहने को तो वे शाकाहारी होते हैं किन्तु अण्डे को भी वे शाकाहार का ही एक रूप मानते हैं। इसलिए कुछ लोगों को शुद्ध शाकाहारी कहा जा सकता है और कुछ लोग शाकाहारी कहलाते हैं। यानी इस प्रकार से शाकाहारी लोगों की बहुत-सी श्रेणियाँ बन जाती हैं। बहुत समय पहले एक विशलेषण में पढ़ा था कि भारत में शाकाहारी लोग सात प्रकार के हैं-
           इस श्रेणी में सबसे पहले वे लोग आते हैं जो शुद्ध शाकाहारी हैं। वे किसी भी रूप में मांसाहार का सेवन नहीं करते। न ही वे अण्डा खाते हैं और न ही इस प्रकार का कोई अन्य खाद्य पदार्थ चखते हैं।
           दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं जो स्वयं को शाकाहारी ही कहते हैं पर अण्डे का सेवन कर लेते हैं। उनके अनुसार अण्डा आजकल शाकाहार में ही गिना जाने लगा है। किसी भी विधि से बना हुआ अण्डा वे खा लेते हैं परन्तु चिकन आदि अन्य किसी भी प्रकार का मांस वे नहीं खाते।
          तीसरी श्रेणी वाले शाकाहारी लोग अण्डे वाला केक एवं पेस्ट्री खा लेते हैं। किन्तु किसी भी तरह से बने हुए अण्डे का सेवन नहीं करते और न ही वे किसी अन्य प्रकार के मीट का सेवन करते हैं।
          चौथी श्रेणी के शाकाहारी कहलाने वाले वे लोग हैं जो मांसाहार का सेवन नहीं करते पर वे मीट की तरी खा लेते हैं, उसका पीस नहीं खाते। चिकन बिरयानी में से चावल खा लेते हैं किन्तु चिकन का पीस निकालकर अलग कर देते हैं, उसे खाते नहीं हैं।
          शाकाहारियों की पाँचवीं श्रेणी वह है जिनके घर पर मांसाहार नहीं पकाया जाता। वे लोग नियमित मांसाहार का भक्षण नहीं करते। इसलिए वे कभी-कभार पार्टी या होटल आदि में जाकर मांसाहार का सेवन कर लेते हैं। उन्हें इससे परहेज नहीं होता। यानी वे घर से बाहर खा लेते हैं पर घर में नहीं खाते।
         छटी श्रेणी उन लोगों की है जो मांसाहार खाते तो नहीं है पर उसका सेवन केवल उस समय करते हैं जब वे दोस्तों के साथ बैठकर शराब पीते हैं। और जब वे दारू नहीं पीते तो मांसाहार भी नहीं खाते।
         अन्त में सातवीं श्रेणी के तथाकथित शाकाहारियों की चर्चा करते हैं जो अपनी सुविधा से कभी शाकाहारी बन जाते हैं तो कभी मांसाहारी। यानी बुधवार, शुक्रवार और रविवार को वे मांसाहार का भक्षण कर लेते हैं। परन्तु मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को इष्ट का दिन मानते हुए वे मांसाहार को बिल्कुल हाथ नहीं लगाते।
          इस विशलेषण से मांसाहारियों को नहीं पर शाकाहारियों को श्रेणीबद्ध किया जा सकता है। कुछ लोग अपनी सुविधा से अपने आहार में परिवर्तन करते रहते हैं। कभी वे शाकाहारी बन जाते हैं तो कभी मांसाहारी।
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सोमवार, 19 मार्च 2018

अधिक सीधा होना

आवश्यकता से अधिक सीधा होना मनुष्य के लिए हितकर नहीं होता। उसे समय-समय पर हानि उठानी पड़ती है। सीधे होने का अर्थ होता है सरल होना, छल-कपट से दूर रहना, दुनिया में होने वाले दुष्कृत्यों में लिप्त न होना। ऐसे व्यक्ति को लोग उसे मूर्ख समझने की भूल कर बैठते हैं। जिनके मन में मैल भर होता है उन्हें सच्चे और सीधे लोग पिछड़े हुए प्रतीत होते हैं।    आम भाषा में ऐसे लोगों को बैकवर्ड कहकर अपमानित किया जाता है।
        बहुत समय पहले एक कथा पढ़ी थी कि एक साँप लोगों को बहुत परेशान करता था। उसने कई लोगों को काट लिया था। जिससे कुछ लोगों की मृत्यु भी हो गई। उसकी हरकतों से दुखी होकर, लोग इकट्ठे होकर एक महात्मा जी के पास गए। उनसे प्रार्थना की कि वे उनकी सहायता करें। महात्मा जी उस स्थान पर गए जहाँ साँप रहता था।
उन्होंने उससे कहा- "तुम लोगों को काटते हो, उन्हें परेशान करते हो, यह तो बहुत गलत बात है।"
साँप ने महात्मा जी से पूछा, "काटना तो मेरा स्वभाव है। इसे मैं कैसे छोड़ सकता हूँ?"
महात्मा जी ने क्रुद्ध होते हुए उससे कहा, "तुझ अधमी जीव को तो नरक में भी जगह नहीं मिले सकेगी।"
इस पर साँप ने पूछा, "मुझे क्या करना चाहिए।"
उन्होंने कहा, "तुम लोगों को दुखी करना छोड़ दो। इससे तुम्हारा कल्याण होगा।"
साँप ने महात्मा जी को आश्वासन देते हुए कहा, "मैं आपकी बात समझ गया। अब से मैं किसी को नहीं काटूँगा।"
         अब साँप अपने स्वभाव के विपरीत साधु स्वभाव का बन गया। उसने लोगों को काटना छोड़ दिया। बस फिर क्या था, शरारती बच्चों ने उसकी नाक में दम करना शुरू कर दिया। कभी वे उसकी पूँछ मरोड़ देते तो कभी उस पर पत्थर फैंक देते। धीरे-धीरे साँप की दुर्दशा होने लगी। एक दिन लहूलुहान हुआ वह महात्मा जी के पास पहुँचा और कहने लगा, "महात्मा जी, मैंने आपको वचन दिया था कि अब मैं किसी को नहीं काटूँगा।मैंने अपने वचन की रक्षा की। पर देखिए तो उन बच्चों ने मेरी कैसी दुर्दशा कर दी है।"
यह सुनकर महात्मा जी ने उससे कहा, "मैंने तुझे लोगों को न काटने के लिए कहा था। यह तो नहीं कहा था कि आत्मरक्षा के लिए लोगों पर फुफकारना छोड़ दो।"
        अब साँप को समझ आ गई कि सरलता एक बहुत बड़ा गुण है। उसे अवश्य अपनाना चाहिए पर सताए जाने उसका प्रतिकार अवश्य करना चाहिए। परन्तु अपनी आत्मरक्षा के लिए फुफकारना भी आवश्यक है। जिससे लोग डरकर भाग जाएँ और सताएँ नहीं अन्यथा विष रहित साँप कोई भी नहीं डरता।
        निम्नलिखित श्लोक में भर्तृहरि जी ने 'नीतिशतकम्' ग्रन्थ में उदाहरण सहित इस बात को हमें समझाने का प्रयास किया है-
नात्यन्तं सरलेन भाव्यं गत्वा पश्य वनस्थलीम्। छिद्यन्ते सरलास्तत्र कुब्जास्तिष्ठन्ति पादपाः।।
अर्थात अपने व्यवहार में बहुत सीधे न रहें। आप यदि वन जाकर देखते है तो पाएँगे कि जो वृक्ष सीधे उगते हैं उन्हें काट लिया गया और जो पेड़ आड़े-तिरछे होते हैं, वे खड़े हैं।
         इस श्लोक से यही समझ आ रहा है कि अधिक सीधे होने पर पेड़ भी काट लिए जाते हैं। जो टेढ़े पेड़ होते हैं उन्हें छोड़ दिया जाता है। यानी आवश्यकता से अधिक सरल होने वालों को सदा हानि उठानी पड़ती है। टेढ़े या बुरे लोग उसी तरह छोड़ दिए जाते हैं जैसे दुष्ट ग्रहों को सब त्याग देते हैं। उनसे प्रकोप से बचने के लिए उपाय करते हैं। सरल-सहृदय होना बहुत अच्छे गुण हैं, पर इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हर कोई कुचलकर चल दे। उस समय मनुष्य बस ठगा हुआ सा देखता रह जाए।
         एक छोटी-सी चींटी जो किसी को भी नुकसान नहीं पहुँचती है। यदि उसे छेड़ा जाए तो वह प्रतिकार करती है। इसी प्रकार मनुष्य को भी अवसर आने पर विरोध करना चाहिए। साथ ही क्रोध का भी प्रदर्शन करना चाहिए। यहाँ एक बात और कहना चाहती हूँ कि दुष्ट अपनी दुष्टता से बाज नहीं आते तो अपने सद् गुणों का परित्याग नहीं करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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