मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

दोहरा चरित्र

मनुष्य को शरीर एक साधन के रूप में ईश्वर ने उपहार स्वरूप दिया है। उसका उपयोग अपने जीवन की यात्रा को पूर्ण करने के लिए दिया है। परन्तु हम मनुष्य इसे साधन न मानकर साध्य बना लेते हैं। मनुष्य इस शरीर पर मान करता है, सारा समय उसे सजता-संवारता रहता है। वह विभिन्न प्रकार के प्रसाधनों का उपयोग करता है। नित नए फैशन के वस्त्राभूषण पहनकर सबसे सुन्दर दिखने का प्रयास करता है। सारा जीवन यही सोचता रहता है कि कोई उससे बाजी जीतकर आगे न बढ़ जाए।
          परन्तु जब मनुष्य की मृत्यु होती है तब उसका वही शरीर निर्जीव हो जाता है। सारा साजो-सामान धरा-का-धरा रह जाता है। अपने प्रियजन भी उसे अधिक समय तक सहन नहीं कर पाते और उसे उसी के घर से निकलकर अग्नि के सुपुर्द कर देते हैं। इसका कारण है कि शरीर से प्राणों के निकल जाने पर उसमें कुछ नहीं बचता। यदि उसे उस अवस्था में एक-दो दिन रख दिया जाए तो उस निर्जीव शरीर से दुर्गन्ध आने लगती है। उससे बीमारियों के फैलने का डर हो जाता है।
         हमारी भारतीय संस्कृति के अनुसार लोग मुर्दा इन्सान को कन्धा देना बहुत पुण्य का कार्य समझते हैं​। इसी प्रकार यदि जिन्दा इन्सान को कन्धा या सहारा देना भी पुण्य का कार्य समझ लिया जाए तो बहुत से लोगों की जिन्दगी संवर जाएगी, आसान हो जाएगी​। अभावों में जीने वाले लोगों को जीवन यापन करने में सुविधा हो जाएगी। इसे चाहें तो पुण्य का कार्य मानकर ही किया जाए तब भी समाज का भला ही होगा। उसके बदले में जो उन लोगों के आशीष मिलेंगे वही मनुष्य की पूँजी होती है।
         अब यहाँ मैं कहना चाहती हूँ कि अपने जीवनकाल में अपने माता-पिता की सेवा कर लेनी चाहिए। जब वे तस्वीर बनकर दीवार पर टंग जाएँगे तब उन्हें पूजने कोई लाभ नहीं होता। उस समय तो मात्र प्रदर्शन ही रह जाता है। जीते जी यदि उनकी कीमत नहीं समझी या उनकी अवहेलना करते रहे तो उनके प्रति अपने दायित्वों का निर्वहण तो नहीं हो सकेगा। यह तो अपने कर्तव्यों से मुँह मोड़कर भागने वाली बात हो गई। जिन माता-पिता को ईश्वर का रूप मानकर उनकी सेवा-सुश्रुषा करनी चाहिए थी उन्हें दर बदर की ठोकरें खाने के लिए बेसहारा छोड़ देना किसी भी तरह बुद्धिमत्ता नहीं कही जा सकती।
          मन्दिर में जाकर पत्थर की मूर्ति पर माथा रगड़कर की गई पूजा तब तक फलदायी नहीं हो सकती जब तक माता-पिता विवशता वाला जीवन व्यतीत कर रहें हैं। मन्दिर में जाकर पूजा अवश्य कीजिए पर घर में जीवित माता-पिता की अर्चना कहीं अधिक फलदायी होती है। जिसके माता-पिता अपने हृदय से आशीर्वाद देते हैं, उसके जैसा भाग्यशाली और कोई मनुष्य नहीं हो सकता। यह आज तक यह बात समझ में नहीं आ सकी कि जीवित मनुष्यों से किसी कारण से अथवा झूठे अहं के कारण लोग नफरत करके पत्थरों से इतनी मोहब्बत क्योंकर करते हैं?
         यदि गणेश जी का वाहन मूषक की मूर्ति हो तो उसकी भी पूजा करते हैं। बीकानेर के पास स्थित करनी माता के मन्दिर में घूमते हुए चूहों का गंदा व झूठ किया प्रसाद भी लोग खा लेते हैं। इसी तरह अपने दोष को दूर करने के लिए सर्प की मूर्ति की अर्चना लोग करते हैं। अपनी मनोकामना की पूर्ति हेतु गाय की मूर्ति की पूजा करते हैं। परन्तु वास्तविक जीवन में घर में आए चूहे को पिंजरे में कैद कर लेता हैं। यदि साँप कहीं दिखाई दे जाए तो उसे वहीं लाठी से मार देते हैं। घर के दरवाजे पर आई गाय को एक रोटी तक नहीं दे सकते। उसे लाठी मारकर भगा देते हैं।
         कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य का यह जीवन बहुत से पुण्यकर्मों के उदय होने पर मिलता है। इस जीवन को व्यर्थ ही नहीं गँवाना चाहिए। सारा समय अपने शरीर का ध्यान रखने के साथ-साथ अपने घर-परिवार, बन्धु-बान्धवों के प्रति अपने दायित्वों का निर्वहण करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 23 अप्रैल 2018

मूर्ख से दूरी

बुद्धिमान को मूर्ख मनुष्य से यथासम्भव दूरी बनाकर रखनी चाहिए। मूर्ख को ज्ञात ही नहीं होता कि उसे क्या करना चाहिए और क्या नहीं? वह अपनी बुद्धि का सकारात्मक उपयोग न करके नकारात्मक प्रयोग करता है। यदि वह विचार करके अपने कार्य कर ले तो उसे स्वयं ही समझ आ जाएगा कि कहाँ पर उससे चूक हो रही है। फिर वह अपनी भूल का यथाशीघ्र सुधार कर सकता है। समस्या तो यही होती है कि उसे स्वयं पर नियन्त्रण ही नहीं होता। इस कारण वह अपना और अपने हितैषियों का अनजाने ही अहित कर बैठता है।
          आचार्य चाणक्य मूर्ख व्यक्ति के विषय में तर्कपूर्ण कहते हैं-
मूर्खस्तु  परिहर्तव्यः  प्रत्यक्षो   द्विपदः  पशुः।                                                                                            भिनत्ति वाक्यशल्येन निर्दृशाः कण्टका यथा।।                                                                                                                                                                   
अर्थात मूर्ख को त्याग देना उचित है क्योंकि वह दो पैरों वाला पशु है। उसमें काँटें दिखायी तो नहीं पड़ते पर वह वाक्य रूपी शल्य से बार-बार  काँटे बोता रहता है।  
          आचार्य चाणक्य ने मूर्ख के विषय में बहुत अच्छा विश्लेषण किया है। मूर्ख व्यक्ति मनुष्य होते हुए भी पशु है। वह चार पैर वाला न सही पर दो पैर वाला पशु है। वह अनर्गल प्रलाप करता रहता है। उसे अपनी वाणी पर नियन्त्रण नहीं होता। इसलिए वह ऐसे शब्दों अथवा वाक्यों का प्रयोग कर बैठता है जो सामने वाले के हृदय में काँटे की तरह गढ़ जाते हैं। उस फाँस को निकालने में वर्षों बीत जाते हैं। इस प्रकार वह मूर्ख दूसरों को व्यथित करता रहता है।
         बार-बार दूसरों पर शब्दों के विषैले बाण चलाने वाले मनुष्य को कोई भी क्योंकर पसन्द करेगा। उसकी बेलगाम बातों से कोई भी व्यक्ति आहत होना नहीं चाहेगा। फिर वह कोई अपना प्रिय बन्धु-बान्धव हो या अप्रिय शत्रु। उसके माता-पिता, भाई-बहन, अपने बच्चे व उसकी पत्नी तक उसके व्यवहार से नाखुश रहते हैं। समाज में हो रही उसकी इस आलोचना से वे व्यथित होते रहते हैं परन्तु अपनी विवशता के कारण वे कुछ कर नहीं पाते।
         उसे कभी अपनी गलती का अहसास ही नहीं होता। उसकी प्रकृति ही ऐसी हो जाती है कि उसे दूसरों को चोट पहुँचाकर आनन्द की अनुभूति होती है। वह बस उठा-पटक में ही लगा रहता है और अपना समय बर्बाद करता रहता है। वह अपनी इस नकारात्मक सोच में मानो महारत हासिल करके स्वयं पर इतराता है। धीरे-धीरे ऐसे व्यक्ति से लोग किनारा करने लगते हैं और फिर वह अकेला पड़ने लगता है। इसका कारण है कि मनुष्य एक बार उसके अनुचित व्यवहार के लिए उसे क्षमा कर देगा अथवा दूसरी बार माफ कर देगा। कोई भी मनुष्य बार-बार अपनी अवमानना को सहन नहीं कर सकता। यह मानवीय प्रवृत्ति है और सत्य भी है।
          कभी-न-कभी तो ऐसे मनुष्य के लिए इस प्रकार का कठोर कदम उठाना ही पड़ता है और उसे पाठ पढ़ाना पड़ता है। यह उसके लिए बहुत आवश्यक होता है। फिर भी यदि उसके भेजे में खुराफातें करने का भूत सवार हो तो उसका सामाजिक रूप से बहिष्कार कर देना चाहिए। ऐसे मूर्ख का होना या न होना किसी के लिए कोई मायने नहीं रखता। इसीलिए मनीषी कहते हैं-
                मूर्ख मित्र से शत्रु अच्छा।
यानी शत्रु का तो पता होता है कि वह शत्रुता निभाएगा, वार भी करेगा। मूर्ख मित्र का कोई भरोसा नहीं होता कि वह कब घात कर बैठे। इसलिए उससे यथासम्भव दूरी बनाकर रखने में ही समझदारी है।   
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रविवार, 22 अप्रैल 2018

शिकायतों का पुलिन्दा

हम सभी शिकायतों का एक पुलिन्दा बाँधकर, सहेजकर अपने पास रखते हैं। हर समय उनका पिष्टपेषण करते रहते हैं। इस तरह अपने मन में नित्य प्रति दूसरों के लिए जहर घोलते रहते हैं। इसका परिणाम होता है अपने मधुर सम्बन्धों में कड़वाहट आ जाती है। जो रिश्ते बहुत ही प्यारे होते हैं, बहुत नाजुक होते हैं, उनमें एक गाँठ तो पड़ ही जाती है। उसे खोल पाना किसी के लिए भी नामुमकिन तो नहीं परन्तु बहुत कठिन अवश्य हो जाता है।
           विचार इस विषय पर करना है कि आखिर मनुष्यों को एक-दूसरे से शिकायत क्यों रहती है? इसके पीछे क्या कारण हो सकते हैं? इन शिकायतों से किसी को हासिल क्या होता है? हम सब शिकायत करना क्यों नहीं छोड़ सकते?
          हर मनुष्य को दूसरे मनुष्य से शिकायत इसलिए होती है क्योंकि वह उसकी इच्छा के अनुसार कार्य नहीं करता। ईश्वर ने हर मनुष्य को बुद्धि दी है। इसलिए वे अपने समक्ष किसी और की बुद्धि को अपने से महान नहीं मानते। वे सोचते हैं जो हमने कार्य कर दिया है वही अच्छा है और हमने जो कह दिया वही पत्थर पर लकीर है। सभी हमारे कहे अनुसार चलें। सारे फसाद की जड़ मिथ्या यह अहंभाव है जो किसी की कही सही बात को मानने के लिए तैयार नहीं हो पाता कि दूसरा ठीक बात कह रहा है या भले के लिए कह रहा है।
          प्रायः लोग दूसरे के कुछ कहने अथवा समझाने को गलत अर्थ में लेते हैं। वे सोचते हैं कि फलाँ व्यक्ति होता कौन है हमें कुछ कहने वाला? यानी वे अपने मामले में परामर्श देने को अनाधिकार चेष्टा मानते हैं। इसलिए उससे रुष्ट हो जाते हैं। कभी-कभी सम्बन्ध भी इस दम्भ की बलि चढ़ जाते हैं। घर के बड़े बुजुर्ग या मित्र हितकारी व तर्कसंगत परामर्श देते हैं परन्तु वे अपने मनोनुकूल नहीं होते। इसलिए वे प्रियजन भी अप्रिय लगने लगते हैं।
          पति को अपनी पत्नी से, पत्नी को अपने पति से,  माता-पिता को अपनी सन्तान से, बच्चों को अपने माता-पिता से, भाई को अपनी बहन से, बहन को अपने भाई से, मित्र को मित्र से, अध्यापक को शिष्यों से, शिष्यों को अध्यापक से, हर पड़ौसी को अपने ही दूसरे पड़ौसी से, मकान मालिक को किराएदार से, किराएदार को मकान मालिक से, बॉस को अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से, कर्मचारियों को अपने बॉस से,  राजा को प्रजा से, प्रजा को राजा से शिकायत रहती है। यानी सभी लोग ही इस शिकायत रूपी गम्भीर बीमारी से ग्रस्त दिखाई देते हैं।
           घर में होने वाली नित्य की शिकायतों से घर का माहौल खराब होता है। भाई-बन्धुओं में इससे खींचतान होती रहती है। कार्यालय का वातावरण विषैला हो जाता है। आस-पड़ौस में रहने का आनन्द नहीं आता। मकान मालिक और किराएदार का आपसी तालमेल बिगड़ता है। देश में अराजकता का साम्राज्य हो जाता है। कहने का अर्थ है कि इस शिकायत से सर्वत्र विनाश की ही गन्ध आती है। आपसी भाईचारा समाप्त होता है।
          आजकल हर व्यक्ति स्वयं को सबसे अधिक बुद्धिमान समझता है, इसलिए यह समस्या दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। यही कारण है कि सारा समय शिकवे-शिकायतों का दौर चलता ही रहता है। कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे की विवशता को भी सुनने के लिए तैयार नहीं होता। जहाँ पर भी दो लोग मिलते हैं, वहीं शिकायतों का पिटारा खुल जाता है। बात कहाँ तक चली जाएगी, इसे कोई नहीं जानता। कोई भी व्यक्ति शिकायत करेगा तो मूड दोनों का ही खराब होगा। कोई किसी की बात न सुनना चाहता है और न ही मानना चाहता है। फिर इन शिकायतों के आदान-प्रदान का मेरे विचार में कोई औचित्य नहीं रह जाता।
         इन शिकायतों को दूसरे से करने पर कुछ भी हासिल नहीं होता। इससे शिकायतकर्ता या शिकायत सुनने वाला कोई एक भी सन्तुष्ट नहीं होता। तो फिर इसका कोई लाभ किसी को भी नहीं होता। कभी-कभी तो इस शिकायत पुराण के कारण मनमुटाव इतना अधिक बढ़ जाता है कि बातचीत के सारे रास्ते ही बन्द हो जाते हैं और पीढ़ियों की शत्रुता जन्म ले लेती है। फिर करते रहो भुगतान पीढ़ी-दर-पीढ़ी।
          सुनने-सुनाने और शिकवे-शिकायतों का यह सिलसिला थमने वाला नहीं है। प्रयास यही करना चाहिए कि दूसरे की बात को मन से न लगाया जाए। अपने मन को बड़ा बनाकर दूसरे को उसकी गलती के लिए उसे क्षमा कर देना चाहिए। इससे कटुता कम होती है और अपना मन अशान्त नहीं होता। एक क्षमा रूपी अस्त्र के मूल्य पर अपनी मानसिक शान्ति प्राप्त करने का यह सौदा बुरा नहीं है। इस नेक सुझाव पर विचार अवश्य कीजिएगा।
      परमपिता परमात्मा हमें झोलियाँ भर-भरकर बिनमाँगे नेमते देता रहता है। फिर भी हम उससे सदा ही शिकायत करते रहते हैं। प्रभु से शिकायत करने के स्थान पर कृतज्ञता ज्ञापन करनी चाहिए। किसी भी कष्ट के समय प्रार्थना करनी चाहिए कि मालिक तेरी कृपा से मेरा कष्ट दूर हो रहा है, प्रभु अपनी कृपा हम पर बनाए रखना। ऐसा एक बार कीजिए फिर देखिए उस ईश्वर का चमत्कार।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 21 अप्रैल 2018

अन्धेर नगरी

'अन्धेर नगरी चौपट राजा' का अर्थ यही है कि राजा यानी शासक मूर्खतापूर्ण और निरंकुश व्यवहार करता है तो वह नगर या देश अन्धेर नगरी का शिकार हो जाता है। राजा की तरह प्रजा भी लक्ष्यहीन होकर भटक जाती है। वहाँ शासन सुशासन न होकर कुशासन हो जाता है। सभी लोग एक-दूसरे के प्रति असहिष्णु हो जाते हैं। उन्हें किसी की भावनाओं की कद्र नहीं होती। ऐसे देश में लूटपाट, चोरबाजारी, भ्रष्टाचार, दूसरे का गला काटना आदि रोजमर्रा की बात हो जाती है।
          'अन्धेर नगरी चौपट राजा' हिन्दी के सुप्रसिद्ध साहित्यकार भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का सर्वाधिक लोकप्रिय नाटक है। छह अंकों के इस नाटक में विवेकहीन और निरंकुश शासन व्यवस्था पर करारा व्यंग्य करते हुए उसे अपने ही कर्मों द्वारा नष्ट होते दिखाया गया है।     
         न्याय व्यवस्था का एक ऐसा चौपट उदाहरण आज हम एक कहानी के माध्यम से देखते हैं जिसके लेखक का नाम नहीं ज्ञात। इसमें 'अँधा बाँटे रेवड़ी फिर फिर अपने को देत' वाली बात चरितार्थ होती है। यह कथा बताती है कि जिससे स्वार्थ सिद्ध होता है, उसी के पक्ष में न्याय किया जाना चाहिए। थोड़े से परिवर्तन और भाषागत शुद्धियों के साथ कथा आप सबके लिए प्रस्तुत है।
         एक बार एक हंस और हंसिनी सुरम्य वातावरण में भटकते हुए, उजड़े वीरान और रेगिस्तान के इलाके में पहुँच जाते हैं। हंसिनी ने हंस से कहा- "ये किस उजड़े इलाके में हम आ गये हैं? यहाँ न तो जल है, न जंगल और न ही ठण्डी हवाएँ हैं। यहाँ पर हमारा जीना मुश्किल हो जायेगा।"
         भटकते-भटकते शाम हो गयी तो हंस ने हंसिनी से कहा- "किसी तरह आज की रात इस जंगल में बीता लो, सुबह हम लोग शहर की ओर लौट चलेंगे।"
         धीरे-धीरे रात घिर आई। जिस पेड़ के नीचे हंस और हंसिनी रुके थे, उस पर एक उल्लू बैठा हुआ था। वह जोर-जोर से चिल्लाने लगा था। उसकी आवाज सुनकर हंसिनी ने हंस से कहा- "अरे! यहाँ तो रात में सो भी नहीं सकते। यहाँ उल्लू तो चिल्ला रहा है।"
         हंस ने फिर हंसिनी को समझाया- "किसी तरह रात काट लो, मुझे अब समझ में आ गया है कि ये इलाका वीरान क्यों है? ऐसे उल्लू जिस इलाके में रहेंगे वह तो वीरान और उजड़ा हुआ रहेगा ही।"
         पेड़ पर बैठा उल्लू दोनों की बातें सुन रहा था। सुबह हुई, उल्लू नीचे आया और उसने कहा- "हंस भाई, मेरी वजह से आप दोनों को रात में तकलीफ हुई, कृपया आप लोग मुझे माफ कर दीजिए।"
         हंस ने कहा- "कोई बात नही भैया, आपका धन्यवाद।"
          यह कहकर जैसे ही हंस अपनी हंसिनी को लेकर आगे बढ़ा पीछे से उल्लू चिल्लाया- "अरे! यह हंस मेरी पत्नी को लेकर कहाँ जा रहा है।"
          हंस चौंका- "उसने कहा, आपकी पत्नी? अरे भाई, यह हंसिनी है, मेरी पत्नी है, मेरे साथ आई थी, मेरे साथ जा रही है।"
          उल्लू ने कहा- "तुम झूठ बोल रहे हो, खामोश हो जाओ, ये मेरी पत्नी है।"
          दोनों के बीच विवाद बहुत बढ़ गया। पूरे इलाके के लोग एकत्र हो गये। कई गावों की जनता आकर बैठ गई। पंचायत बुलाई गयी। पंच लोग भी आ गये और बोले- "भाई, किस बात का विवाद है?"
          लोगों ने बताया कि उल्लू कह रहा है- "हंसिनी उसकी पत्नी है और हंस कह रहा है कि हंसिनी उसकी पत्नी है।"
         लम्बी बैठक और पंचायत के बाद पंच लोग किनारे हो गये और उन्होंने कहा- "भाई, बात तो यह सही है कि हंसिनी हंस की ही पत्नी है, लेकिन ये हंस और हंसिनी तो अभी थोड़ी देर में इस गाँव से चले जाएँगे। हमारे बीच में तो उल्लू को ही रहना है। इसलिए फैसला उल्लू के ही हक में ही सुनाना चाहिए।"
         फिर पंचों ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा- "सारे तथ्यों और सबूतों की जाँच करने के बाद यह पंचायत इस नतीजे पर पहुँची है कि हंसिनी उल्लू की ही पत्नी है और हंस को तत्काल गाँव छोड़ने का हुक्म दिया जाता है।"
           यह सुनते ही हंस हैरान हो गया। वह रोने, चीखने और चिल्लाने लगा- "पंचायत ने गलत फैसला सुनाया है। यह उल्लू मेरी पत्नी पर जबर्दस्ती हक जता रहा है।"
           रोते-चीखते हुए जब वह आगे बढ़ने लगा तब उल्लू ने हंस को आवाज लगाई- "ऐ मित्र हंस, रुको।"
           हंस ने रोते हुए कहा- "भैया, अब क्या करोगे? मेरी पत्नी तो तुमने ले ही ली, अब क्या तुम मेरी जान भी लोगे?"
           उल्लू ने कहा- "नहीं मित्र, ये हंसिनी आपकी पत्नी थी, है और रहेगी। लेकिन कल रात जब मैं चिल्ला रहा था तो आपने अपनी पत्नी से कहा था कि यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ उल्लू रहता है। मित्र, ये इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए नहीं है कि यहाँ उल्लू रहता है। यह इलाका उजड़ा और वीरान इसलिए है क्योंकि यहाँ पर ऐसे पंच रहते हैं जो उल्लुओं के हक में फैसला सुनाते हैं।"
         इस कथा को लिखने का उद्देश्य मात्र इतना है कि शासक को अपने राजधर्म का पालन सदा ईमानदारी और सच्चाई से करना चाहिए। उसे नीर-क्षीर विवेकी होना चाहिए। दूसरों की बातों में नहीं आना चाहिए यानी कान का कच्चा नहीं होना चाहिए। उसके लिए पारदर्शिता का होना बहुत आवश्यक होता है। राजा यदि उच्च चरित्रवान होगा तो प्रजा भी तदनुसार आचरण करेगी क्योंकि शासक को पितातुल्य माना जाता है। उसे अपनी प्रजा के साथ सहृदयता और समानता का व्यवहार करते हुए आदर्श स्थापित करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 20 अप्रैल 2018

मनुस्मृति का दण्ड विधान

प्रचीनकाल में भारतीय दण्ड विधान स्मृति ग्रन्थों में मिलता है। स्मृतियाँ इक्कीस मानी जाती हैं। मनुस्मृति इनमें प्रमुख है। इन ग्रंथों में कई विषयों पर चर्चा मिलती है, जिन्हें बड़ी सरलता से समझाने का प्रयास किया जा सकता है। यद्यपि कुछ लोग मनुस्मृति की आलोचना करते हैं, परन्तु यदि गहराई से इसका अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि इसमें जो भी ज्ञान दिया गया है, वह सारगर्भित, जीवनोपयोगी और महत्वपूर्ण है।
           देश कुमार जी ने जनवरी 2018 में इस विषय पर अपने विचार विस्तार से रखे थे। उनका कथन था कि शूद्र को दण्ड विधान में इस तरह का आरक्षण सम्बन्धी अद्भुत उल्लेख विश्व में दूसरे किसी ग्रन्थ में नहीं मिलता है। वे मनुस्मृति में आरक्षण की चर्चा करते हैं। मैं उनकी तरह तो नहीं पर सार रूप में भारतीय दण्ड विधान का एक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अपने विचार रख रही हूँ।
         हमारे भारत में अभी तक दण्डविधान अंग्रेजों द्वारा बनाई गई दण्ड व्यवस्था पर आधारित है। हालांकि कुछ-कुछ परिवर्तन उसमें किए गए हैं, पर अभी भी बहुत सुधार की आवश्यकता है। उसके अनुसार एक अपराध के लिए एक ही प्रकार के दण्ड की व्यवस्था है। यानी उस अपराध की प्रकृति को चाहे कोई जानता है अथवा नहीं जानता, सबके लिए उतना ही दण्ड निश्चित है। ऐसा माना जाता है कि कानून के प्रति अज्ञानता का होना क्षमा के योग्य नहीं होता।
           मनुस्मृति के आठवें अध्याय में उल्लिखित दण्डविधान का एक उदाहरण देखते हैं जहाँ एक ही प्रकार की चोरी जैसे निकृष्ट कर्म के लिए चारों वर्गों यानी ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र को क्या दण्ड मिलना चाहिए, बड़ी ही स्पष्टता से बताया गया है-
         अष्टापाद्यं तु शूद्रस्य स्तेये भवति किल्बिषम्।
         षोडशैव तु वैश्यस्य द्वात्रिंशत्क्षत्रियस्य च।।
         ब्राह्मणस्य चतुःषष्टिः पूर्णं वापि शतं भवेत्।
         द्विगुणा वा चतुःषष्टिस्तद्दोषगुणविद्धि सः।।
अर्थात चोरी जैसा कर्म करने पर राजा को चाहिए कि वह शूद्र को उस वस्तु के मूल्य का आठ गुना, वैश्य को सोलह गुना, क्षत्रिय को बत्तीस गुना अर्थदण्ड दे। ब्राह्मण को चौसठ गुना या पूरा सौ गुना दण्ड दे।
          मनु महाराज का यह कथन स्पष्ट है कि चोरी जैसे दुष्कृत्य के लिए सजा तो मिलनी चाहिए पर व्यक्ति की योग्यता के अनुसार। सबसे अधिक दण्ड ब्राह्मण के लिए निर्धारित किया है। इसका कारण है उसका ज्ञानवान होना। उसका कार्य पठन-पाठन का है। इसलिए वह कानून का जानकार है। यदि वह अपराध करता है तो उसे अधिकतम दण्ड मिलना चाहिए। क्षत्रिय का कार्य सुरक्षा करने का होता है। यदि सुरक्षा करने के स्थान पर चोरी जैसा जघन्य अपराध कर बैठता है तो उसे वस्तु के मूल्य का बत्तीस गुणा आर्थिक दण्ड मिलना चाहिए।
           वैश्य का कार्य व्यापार करना होता है। यदि वह ऐसा दुष्कर्म करता है तो उसे वस्तु का मूल्य का सोलह गुणा आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए। शुद्र क्योंकि सेवा कार्य करता है और वह पढ़ा न होने के कारण कानून का जानकार नहीं होता, इसलिए उसे वस्तु के मूल्य का आठ गुणा आर्थिक दण्ड दिया जाना चाहिए। बहुत आसान-सा फार्मूला है।
        यहाँ मैं एक बार फिर स्पष्ट करना चाहती हूँ कि शास्त्रों में वर्ण व्यवस्था कर्म के अनुसार मानी जाती है जन्म के अनुसार नहीं। किसी कुल में जन्म लेने से वह उसी कुल का नहीं हो जाता अपितु जिस व्यवसाय में वह जाता है, वही उसका वर्ण होता है। यानी ब्राह्मण का बेटा शुद्र भी हो सकता है और क्षत्रिय या वैश्य भी। क्षत्रिय का पुत्र ब्राह्मण, वैश्य या शूद्र कुछ भी हो सकता है। वैश्य का पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय या शूद्र कुछ भी कहला सकता है। इसी प्रकार शुद्र का पुत्र ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य कोर्ई भी व्यवसाय अपना सकता है। उसका वर्ण तदनुसार ही कहलाता था। कालान्तर में न जाने कब ये वर्ण अन्य बुराइयों की तरह रूढ़ हो गए।
       वास्तव में ऐसी बढ़िया न्याय व्यवस्था औऱ कोई हो ही नहीं सकती। अपने मनीषियों की सराहना किए बिना रहा नहीं जाता जिन्होंने अपराध रोकने के लिए इतने कड़े कानून बनाए थे। धन्य हैं ऐसे मनीषी।
चन्द्र प्रभा सूद
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