अपने भाइयों को राखी बाँधने वाली सभी बहनों और अपनी बहनों से राखी बँधवाने वाले सभी भाइयों को रक्षा बन्धन के इस पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ। ईश्वर भाई और बहनों की जोड़ी को सदा सलामत रखे।
भाई-बहन का सम्बन्ध अटूट है और ईश्वर की ओर दिया गया एक अनमोल उपहार है। ये दोनों अर्थात भाई और बहन एक-दूसरे के पूरक हैं। भाई यदि घर की शान है तो बहन घर का मान होती है। बहन के लिए भाई का और भाई के लिए बहन का प्यार अमूल्य होता है।
भारतीय संस्कृति में बहन एक अनमोल बन्धन माना जाता है। मृत्युपर्यन्त भाई इस रिश्ते को अपना कर्तव्य के समझकर अपनी हैसियत के अनुसार भली भाँति निभाता है। इसी रिश्ते के प्रतीक-स्वरूप रक्षाबन्धन व भैयादूज त्योहार हैं। ये सामाजिक त्योहार भाई-बहन के प्रगाढ़ बन्धन के प्रतीक हैं। रक्षाबन्धन जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इस त्योहार में बहन भाई को राखी के स्वरूप में रक्षाकवच बाँधती है और भाई उसे यथाशक्ति उपहार देकर आयुपर्यन्त रक्षा करने का वचन देता है। भैयादूज पर बहन भाई के माथे पर तिलक लगाती है भाई सामर्थ्यानुसार बहन को उपहार देता है। भाई चाहे छोटा हो या बड़ा हमेशा बहन का सहारा बनता है।
यद्यपि आज के भौतिकतावादी युग में ये सम्बन्ध भी अछूता नहीं रहा। कहीं-कहीं किन्हीं परिवारों में धन-संपत्ति को लेकर भाई-बहन के संबंधों में कुछ कड़वाहट अवश्य आ गई हैं। पर वे कुछ परिवार अंगुलियों पर गिने जा सकते हैं।
यहाँ मैं एक बात और स्पष्ट करना चाहती हूँ कि जिस धर्म में अपने रक्त सम्बन्धों में विवाह की अनुमति है वहाँ भी सगे भाई-बहन में विवाह निषिद्ध है।
इस कथन का यही तात्पर्य है कि भाई-बहन का संबंध बहुत ही पवित्र है इसे उन दोनों को ही सच्चे मन से निभाना चाहिए।
यहाँ हम यह भी जोड़ सकते हैं कि भारतीय संस्कृति में यदि सगी बहन न होते हुए किसी युवती को बहन मान लिया जाता है तो उसके साथ भी ताउम्र वैसा ही संबंध निभाया जाता है जैसा रिश्ता सगी बहन के साथ निभाया जाता है।
ईश्वर भाई और बहन के इस रिश्ते की पवित्रता बनाए रखे।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 25 अगस्त 2018
राखी का पर्व
शुक्रवार, 24 अगस्त 2018
कल्पवृक्ष
हम लोगों ने देवलोक में होने वाले कल्पवृक्ष और कामधेनु के विषय में पढ़ा भी है और सुना भी है। कहते हैं ये दोनों मनुष्य की मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर मनुष्य जो भी कामना करता है, वह अवश्य पूर्ण हो जाती है। हमारे शरीर में हमारा मस्तिष्क कल्पवृक्ष की भाँति होता है। मनुष्य जिस चीज की उत्कट कामना करता है, वह देर-सवेर उसे अवश्य मिल जाती है। जैसी-जैसी कामना वह करता है, उसी के अनुरूप निश्चित ही उसे उसका फल मिलता रहता है।
जीवन में आगे बढ़ने के लिए मनुष्य को अपने विचारों पर नियन्त्रण रखना चाहिए। मनुष्य के विचारों से ही उसका जीवन स्वर्गमय बनता है या नरकमय। जीवन में सुख या दुख आते हैं, उसके लिए बहुधा उसकी सोच कारण बनती है। मनुष्य के विचार अलादीन के चिराग की तरह होते है। उनसे वह जो माँगता है वह उसे मिल जाता है। यदि उसकी सोच सकारात्मक होगी तो वह अपने जीवनकाल में सकारात्मक कार्य करके प्रसिद्ध हो जाता है और अनुकरणीय बन जाता है।
इसके विपरीत कुछ लोगों को जीवन में दुख-परेशानियाँ ही मिलती हैं क्योंकि वे सदा अशुभ की ही कामना करते हैं। मनुष्य पहले छककर खा लेता है, फिर कहता है अब तो पेट में दर्द होगा या गैस बनेगी और परेशान करेगी। वास्तव में वैसा हो जाता है। बारिश में मजे लेकर भीगता है और साथ ही कहता है अब तो मुझे खाँसी-जुकाम या बुखार हो जाएगा। अन्ततः वह बीमार पड़ जाता है। कभी कहता है कि कहीं मेरा पैर फिसल गया तो टाँग में फ्रेक्चर हो जाएगा। जरा-सा कष्ट अथवा परेशानी का सामना करना पड़ जाए तो वह अपनी किस्मत को कोसने लगता है। फिर तो सचमुच ही उसकी किस्मत उसे धोखा दे जाती है यानी खराब हो जाती हैं। बड़े-बुजुर्ग कहते हैं-
जैसी सोच वैसी मुराद।
इस प्रकार हमारा अवचेतन मन कल्पवृक्ष की तरह हमारी इच्छाओं को ईमानदारी से पूर्ण कर देता है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह अपने मस्तिष्क में सुविचारों को प्रवेश करने की अनुमति दे और कुविचारों को झटक दे। यदि कुविचार मानस में समा जाएँगे तो फिर उनका दुष्परिणाम उसे अवश्य ही भुगतना पड़ेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को सदा सकारात्मक विचारों को प्रश्रय देना चाहिए और नकारात्मक विचारों से मुँह मोड़ लेना चाहिए।
इसी सम्बन्ध में एक कहानी वाट्सअप पर पड़ी थी, कुछ संशोधन के बाद आपके साथ साझा कर रही हूँ। किसी घने जंगल में कल्पवृक्ष की भाँति एक इच्छापूर्ति वृक्ष था। उसके नीचे बैठ कर कोई भी मनुष्य कामना करता था तो वह तत्क्षण पूर्ण हो जाती थी। यह बात बहुत कम लोग जानते थे। उस घने जंगल में जाने का कोई साहस ही नहीं जुटा पाता था। संयोग से एक बार थका हुआ व्यापारी उस वृक्ष के नीचे आराम करने के लिए बैठ गया। थकावट के कारण उसे पता ही नहीं चला कि कब वह सो गया। जागते ही उसे बहुत जोर की भूख लगी, उसने आस पास देखकर सोचा- "काश कुछ खाने को मिल जाए और मेरा पेट भर जाए।"
तत्काल स्वादिष्ट पकवानों से भरी थाली हवा में तैरती हुई उसके सामने आ गई। व्यापारी ने भरपेट खाना खाया और भूख शान्त होने के बाद सोचने लगा, "काश कुछ पीने को भी मिल जाता तो अच्छा होता।"
तत्काल उसके सामने हवा में तैरते हुए अनेक शरबत आ गए। शरबत पीने के बाद वह आराम से बैठ कर सोचने लगा, "कहीं मैं सपना तो नहीं देख रहा हूँ। हवा से खाना-पानी प्रकट होते पहले कभी नहीं देखा है और न ही सुना है। अवश्य ही इस पेड़ पर कोई ऐसा भूत रहता होगा जो पहले खिला-पिलाकर बाद में मुझे भी खा जाएगा।"
उसके ऐसा सोचते ही पलक झपकते उसके सामने एक भूत आ गया और उसे खा गया।
यह कहानी हमें यही समझा रही है कि मनुष्य की जैसी सोच होती है, उसे वैसा ही फल मिलता है। यदि उसने नकारात्मक न सोचा होता तो शायद वह उस जंगल से सुरक्षित निकल जाता। घर जाकर परिवार के साथ आराम से रहता। परन्तु ऐसा हो नहीं सका। अपनी नकारात्मक सोच के कारण उसकी मृत्यु वहीं जंगल में ही हो गई। अपने आसपास ऐसी विचारधारा के लोग हमें मिल जाते हैं। कई बार उन पर क्रोध भी आता है कि जब पता है कि फ़लाँ कार्य करके हानि होगी तो उस काम को करो ही नहीं। यदि कर लिया तो फिर परेशान मत होवो।
हम अपनी सोच का दायरा जब तक नहीं बदलेंगे, तब तक सुखी नहीं रह सकते, दुख और कष्ट हमें सताते ही रहेंगे। अपने कल्पवृक्ष के नीचे बैठकर शुभ की कामना करने से अच्छा ही होगा और सदा अशुभ सोचने से अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे। इसलिए सावधानी बरतना बहुत आवश्यक है।
चन्द्र प्रभा सूद
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जीते जी की माया
'सब जीते जी की माया है' या 'मुँह देखे की माया है' ऐसी उक्तियाँ हमें प्रायः सुनने को मिल जाती हैं। इनके पीछे छिपा सार बहुत ही गम्भीर और मन को कष्ट देने वाला होता है। अपनों से जाने-अनजाने दूरी बन जाती है परन्तु सामने पड़ जाने पर ऐसे प्रदर्शित किया जाता है कि उस व्यक्ति विशेष से बढ़कर इस दुनिया में कोई और सगा है ही नहीं। उस समय मनुष्य का मन आह्लादित होने के स्थान पर मनन करने के लिए विवश हो जाता है।
बहुत विचित्र है इस दुनिया का दस्तूर है कि कोई व्यक्ति कितना भी प्रिय हो, उसके बिना जीने की कल्पना करना भी चाहे कठिन हो, उसकी मृत्यु के बारे में सोचने मात्र से ही बेशक दिल दहल जाता हो। परन्तु वास्तविकता कुछ अलग ही बयान करती है। अपना प्रियतम व्यक्ति जब काल के गाल में समा जाता है, तब उसे कुछ समय भी सहन करना दुश्वार हो जाता है। उसे घर से निकालने के लिए मनुष्य बेसब्र हो जाता है।
उस समय कोई हमदर्द या सगा नहीं रह जाता। जिसे काँटा चुभने पर या जरा-सी चोट लगने पर हम बेचैन हो जाते हैं, सारा घर सिर पर उठा लेते हैं, उसी लाश बन चुके व्यक्ति को शमशान में ले जाकर, शीघ्र ही उसे अग्नि के सुपुर्द करने में हम समय नहीं लगते। तब उसे अपने उसी घर से ही बेदखल कर देते हैं जिसे उसने बहुत ही हसरतों से बनाया होता है। यह वही समय होता है जब अपने लोग ही पूछ्ने लगते हैं कि अभी और कितना समय लगेगा इसके संस्कार में। इससे विचित्र और क्या हो सकता है इस संसार में?
अपना कहे जाना वाला मनुष्य भी ऐसी अवस्था में पराया हो जाता है। उसके साथ किसी को भी सुहानुभूति शेष नहीं बचती। उससे छुटकारा पाने का हर सम्भव प्रयास देखते-ही-देखते शीघ्र कर लिया जाता है। फिर कहते हैं-
आज मरे कल दूसरा दिन।
मनुष्य नहीं, उसकी यादें शेष अवश्य बच जाती हैं। उन्हें अपने हृदय में संजोकर रख लिया जाता है।
मनुष्य को अपने जीवनकाल में ऐसे कार्य कर लेने चाहिए कि उसकी मृत्यु के बाद भी लोग उसका नाम सम्मान से लें, हिकारत से नहीं। जो लोग अपने जीवन में कुछ विशेष नहीं कर पाते बल्कि उनका जीवन समाज के लिए भार बन जाता है, वे जीते-जी मर जाते हैं। ऐसे लोग दूसरों को कष्ट देते हैं, उनको पीड़ा देकर सुख का अनुभव करते हैं। ये देश, धर्म, घर-परिवार और समाज के विरोधी कार्य करने में परहेज नहीं करते। अमानवीय कार्य करने वालों का नाम भी कोई अपनी जिह्वा से नहीं लेना चाहता। ऐसे लोगों का होना-न-होना एक बराबर होता है।
इनके अतिरिक्त कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो अपना जीवन जीने में असमर्थ रहते हैं यानी सारा जीवन अभावों में जीते हैं। वे न अपनी आवश्यकताओं को पूर्ण कर पाते हैं और न ही अपने परिवारी जनों की आवश्यकताओं को। ऐसे लोगों का जन्म भी इस संसार में भार की तरह होता है। ये लोग समाज में अपनी कोई पहचान नहीं बना पाते। इसलिए इनका जीवन मृत तुल्य कहलाता है।
इनके अतिरिक्त कुछ लोग मर कर भी अमर हो जाते हैं। ये वही लोग होते हैं जो अपना जीवन देश, धर्म, समाज को समर्पित कर देते हैं। सहृदय, परोपकारी, दयावान लोग इस संसार की वास्तविक पूँजी होते हैं। अपने सद् कृत्यों के कारण मरणोपरान्त भी युगों-युगों तक याद किए जाते हैं। अपने आदशों का पालन करने वाले ये लोग वास्तव में जीवन जीते हैं। इन्हीं लोगों की बदौलत समाज चलता है।
जीवन उन्हीं लोगों का सफल होता है जो समाज के दिग्दर्शक बनते हैं। आने वाली पीढ़ियाँ उनके कार्यों के कारण युगों तक उन पर मान करती हैं। जीवन और मृत्यु शाश्वत हैं। इन दोनों को मात देकर अमर हो जाने वाले ही महापुरुष कहलाते हैं। ऐसे ही लोगों का जन्म धरा पर सफल होता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 22 अगस्त 2018
पुस्तक की स्थिति
आज समय और परिस्थितियाँ बदल रही हैं। पुस्तकें पढ़ने की प्रवृत्ति मानो कहीं खो रही है। दुर्भाग्य की बात है कि बच्चे पढ़ने के नाम से ही दूर भागने लगते हैं। अपनी पाठ्य पुस्तकों के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने में बच्चों की कमतर होती प्रवृत्ति वास्तव में चिन्ता का विषय बनती जा रही है। बड़े हो जाने पर उनकी यह आदत और अधिक परिपक्व हो जाती है।
इसके लिए अकेले बच्चों को दोष नहीं दिया जा सकता। आज कम्पीटिशन के इस युग में माता-पिता प्रायः बच्चों को अपने विषय के अतिरिक्त अन्य पुस्तकें पढ़ने से निरुत्साहित करते हैं। वे शायद इसे समय की बरबादी मानते हैं। हम इस बात से कदापि इन्कार नहीं कर सकते कि विषयेतर पुस्तकें पढ़ने से पढ़ाई के तनाव से मुक्ति मिलती है। मन और मस्तिष्क को एक प्रकार की नवीन स्फूर्ति व ऊर्जा मिलती है।
जिस व्यक्ति ने पुस्तकों को मित्र बना लिया, उसे किसी अन्य की आवश्यकता नहीं रह जाती। उसे कभी अकेलेपन का अहसास ही नहीं होता। पुस्तकें ज्ञान का अथाह भण्डार होती हैं। जितना मनुष्य इस ज्ञान के सागर में गहरे पैठता जाता है, गोते लगाना सीख लेता है, वह उतने ही मोती चुनकर ले आता है। ऐसे उस महामानव की विद्वत्ता के समक्ष कोई भी अन्य व्यक्ति नहीं ठहर सकता। सभी उसकी विद्वत्ता के कायल हो जाते हैं। ऐसे ही विद्वान नीर-क्षीर विवेकी कहलाते हैं।
साहित्य सदा से ही लिखा और पढ़ा जाता रहा है। ये हमारी धरोहर है। हमारे साँस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक मूल्यों का ज्ञान हमें अपने इन महान ग्रन्थों से ही प्राप्त होता है। प्राचीन महान विरासत को जानने-समझने में ये हमारी सहायता करते हैं। किसी भी प्रकार के अनुसन्धान को करने के लिए हमें इन ग्रन्थों की महती आवश्यकता होती है।
भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम में इन पुस्तकों का बहुत बड़ा योगदान रहा है, इसे नकारा नहीं जा सकता। उस समय के बहुत-से कवियों और लेखकों ने जनजागृति करने के अपने दायित्व को बखूबी निभाया था।
आज यह त्रासदी है कि पुस्तकों के विक्रय की समस्या दिन-प्रतिदिन विकराल रूप धारण करती जा रही है। सरकारी खरीद कम होती जा रही है। लोग स्वयं खरीदकर पुस्तकें पढ़ना नहीं चाहते। वे चाहते हैं कि उन्हें उपहार में मिल जाएँ और इसके लिए अपनी जेब से राशि व्यय न करनी पड़े। इस संकुचित सोच के चलते साहित्य को क्षति हो रही है। ऐसा प्रतीत होता है मानो आजकल फिर से प्राचीन काल वाला 'बार्टर सिस्टम' आ गया है। तुम अपनी पुस्तक मुझे भेंट करो और मैं अपनी पुस्तक तुम्हें भेंटस्वरूप में दूँगा।
कुछ लोगों की संकीर्ण मानसिकता को इसी से परखा जा सकता है कि साझा संकलनों में छपकर भी उस पुस्तक की प्रति क्रय नहीं करना चाहते। बताइए भला यह भी कोई बात हुई? ये तथाकथित महान साहित्यकार जब दूसरे रचनाकारों को नहीं पढ़ना चाहते तो दूसरों से यह आशा करना ही व्यर्थ है कि वे उन्हें पढ़ें।
डर इस बात का है कि कहीं पुस्तकें कबाड़ी बाजार से ही खरीदने के लिए न मिलने लगें। आजकल दिल्ली के दरिया गंज क्षेत्र में रविवार के साप्ताहिक बाजार में पुस्तकें औने-पौने भाव पर मिलती हैं। और भी न जाने ऐसे कितने बाजारों में ये पुस्तकें मिलती हैं। इसीलिए ही शायद किसी विद्वान ने व्यथित होकर इतना कड़वा सच लिखा है -
'जब किताबें सड़क के किनारे पर रखकर बिकेगी और जूते काँच के शोरूम में, तब यह समझ जाना चाहिए कि लोगों को ज्ञान की नहीं जूते की जरुरत है।'
कहने का तात्पर्य यही है कि एवंविध साहित्य लेखन की इस दुर्दशा के लिए लेखक व प्रकाशक सभी उत्तरदायी हैं। सभी सुधीजनों से अनुरोध है कि साहित्य को पल्लवित और पोषित करने के लिए सहृदय बनें। बच्चों में पढ़ने की आदत विकसित करनी चाहिए। दो-चार कामिक्स उन्हें दिलवाकर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री नहीं समझनी चाहिए। जब तक बच्चों में अपने साहित्य-संस्कार घुट्टी में नहीं दिए जाएँगे, तब तक साहित्य का उद्धार नहीं हो सकता। कम्प्यूटर से चाहे कितना ही ज्ञान क्यों न मिल जाए, पुस्तक पढ़ने की उनकी आदत छूटनी नहीं चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 21 अगस्त 2018
व्रत क्या है?
व्रत शब्द का अर्थ होता है नियम का पालन करना। सारी प्रकृति यानी सूर्य, चन्द्रमा, वायु आदि सभी अपने-अपने व्रत का पालन करती है। हर मौसम अपने समय पर आता है। और तो और पशु-पक्षी तथा सभी जलचर व नभचर भी अपने लिए निश्चित नियमों का पालन करते हैं।
हम मनुष्य ही इस सृष्टि के ऐसे जीव हैं जो किसी नियम का पालन नहीं करना चाहते। जहाँ भी हमें सुविधा लगती है, हम उसके अनुसार नियमों को मोड़ लेना चाहते हैं। हमारी यही इच्छा होती है कि हम नियमों का उल्लँघन भले ही करें परन्तु हमें कोई रोके या टोके नहीं।
लोग भूखे रहने को व्रत की संज्ञा देते हैं। सारा दिन भूखे रहकर अपने शरीर को कष्ट देना किसी तरह से उचित नहीं कहा जा सकता और न ही उसे व्रत कह सकते हैं। इस प्रकार करने से न किसी की आयु बढ़ती है और न ही घटती है। यदि ऐसे व्रतों से आयु बढ़ने लगे तो इस संसार में कोई मरेगा ही नहीं।
कुछ लोग अपने चारों ओर अग्नि जलाकर, कुछ लोग गड्डा खोदकर उसमें बैठकर, कुछ लोग एक टाँग पर खड़े होकर, कुछ लोग पेड़ पर लटककर साधना करने को व्रत का नाम देते हैं। ये सभी तरीके दूसरों को लुभाने के लिए प्रदर्शन मात्र हो सकते हैं परन्तु व्रत नहीं कहे जा सकते।
व्रत किसे कहते हैं, इसके विषय मे पद्मपुराण का कथन है-
हिंसातोSलीकत: स्तेयान्मैथुनाद् द्रव्यसंग्रहात्।
विरतिर्व्रतमुद्दिष्टं विधेयं तस्य धारणात्।।
अर्थात हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील (दुष्चरित्रता) और परिग्रह से विरक्त होना व्रत कहलाता है। ऐसा व्रत अवश्य ही धारण करना चाहिए।
वास्तव में मनुष्य यदि इन दुर्गुणों का त्याग करने का व्रत ले सके तो बहुत सारे अपराध करने से बच जाएगा। इससे समाज में होने वाले अपराध कम हो जाएँगे। तब न्याय व्यवस्था के चाबुक की आवश्यकता भी नहीं रह जाएगी।
व्रतों के विषय में भर्तृहरि जी नीतिशतकम् में कहते हैं -
प्रदानं प्रच्छन्नं गृहयुतगते संभ्रमविधि:।
प्रियं कृत्वा मौनं सदसि कथनं नाप्युपकृति:॥
अनुत्सेको लक्ष्म्यानिरभिभवसारा: पर कथा:।
सतां केनाद्दिष्टं विषमसिधाराव्रतमिदम्॥
अर्थात दान को गोपनीय रखना, अतिथि सत्कार करना, प्रिय करके भी शान्त रहना, सभा में उपकार का उल्लेख न करना, धन मे गर्व न करना, परचर्चा मे निन्दा को स्थान न देना- ये सज्जनों के विषम व्रत किसने बनाए हैं?
सज्जनों की प्रकृति में ही होता है इन कठोर व्रतों का पालन करना। बिना किसी प्रयास के ही वे इन नियमों का पालन करते हैं। कहते हैं दान इस प्रकार करना चाहिए कि एक हाथ से दो और दूसरे हाथ को ज्ञात न होने पाए। बहुत ही मुश्किल है पर सज्जन इसे निभाते हैं। परोपकार करके उसका ढिंढोरा नहीं पीटते, सरल व सहृदय होते हैं, उनमें रत्तीभर भी अहंकार नहीं होता है। वे किसी की निन्दा-चुगली करने में रुचि नहीं रखते।
ये सभी वाकई कठोर व्रत हैं जिनका पालन करना बच्चों का खेल नहीं है। पद्मपुराण में बताए गए और भर्तृहरि जी द्वारा सुझाए गए व्रतों का पालन करना ही श्रेयस्कर है। अनावश्यक रूप से स्वयं को कष्ट देकर, समाज के समक्ष प्रदर्शन करने के लिए रखे जाने वाले व्रतों का कोई औचित्य नहीं है।
हमारे आदी ग्रन्थों वेदों में तथाकथित व्रतों का विधान नहीं है। पश्चातवर्ती किन्हीं अज्ञ विद्वानों ने अनावश्यक ही शरीर को कष्ट देने वाले व्रतों को अपने स्वार्थ के लिए प्रचारित किया। साथ ही जन साधारण को इनका पालन न करने पर अमंगल होने का डर दिखाया।
अन्त में सुधी मित्रों से अनुरोध है कि इन खोखले ढकोसलों का त्याग कीजिए। उनके स्थान पर व्रत लीजिए झूठ न बोलने का, चोरी आदि अनैतिक कार्य न करने का, दुर्बलों को सताने के स्थान पर रक्षा करने का, देश, धर्म व समाज के लिए हितकर कार्यो को करने का व्रत लें।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 20 अगस्त 2018
शरीर दुबारा नहीं मिलता
वह सब कुछ मनुष्य पुनः पुन: परिश्रम करके प्राप्त कर सकता है जिनकी वह कामना करता है। सुख-सुविधा के सारे साधन वह स्वयं अपने और अपने परिवारी जनों के लिए देर-सवेर जुटा ही लेता है। उसके ईमानदार प्रयत्न कर्म बनकर उसके जीवन को समृद्ध बनाते हैं। इस जीवन में भौतिक ऐश्वर्य कमा लेना सरल एवं सहज होता है। घर, गाड़ी, फ्रिज, टीवी आदि को मनुष्य अपने स्टेंडर्ड के अनुसार या खराब हो जाने की स्थिति में समय-समय पर बदलता रहता है।
जिस शरीर को माध्यम बनाकर वह इतराता फिरता है, उसे एक बार यदि खो दिया तो भौतिक वस्तुओं की भाँति पुनः प्राप्त करना असम्भव होता है। शरीर से प्राण निकल गए तो वह मिट्टी के ढेर के समान अनुपयोगी हो जाता है। अपने परम प्रियजन भी उसे कुछ घण्टे तक सहन नहीं कर सकते। जल्दी से उस प्राणरहित शरीर या शव को अग्नि को समर्पित करने का प्रयास करते हैं। कहने का तात्पर्य यही है कि मानव का यह शरीर जीव को बहुत ही कठिनता से प्राप्त होता है।
निम्न श्लोक में कवि ने बड़े ही सुन्दर शब्दों में समझाया है-
पुनर्वित्तं पुनर्मित्रं पुनर्भार्या पुनर्मही।
एतत्सर्वं पुनर्लभ्यं न शरीरं पुनः पुनः॥
अर्थात् धन-संपति, मित्र, स्त्री, राज्य बार-बार मिल सकते हैं। परन्तु मनुष्य का शरीर केवल एक ही बार प्राप्त होता है, बार-बार नहीं।
कवि इस श्लोक के माध्यम से हमें समझाने का प्रयास कर रहा है कि धन-सम्पत्ति यदि किसी कारण से नष्ट हो जाए तो मनुष्य दिन-रात मेहनत करके पुनः जुटा लेता है। यदि कोई मित्र साथ छोड़ दे अथवा एक प्रदेश से दूसरे स्थान पर नौकरी-व्यवसाय के कारण अन्यत्र जाने से पुराने मित्र पीछे छूट जाएँ तो पुनः नए मित्र बना लिए जाते हैं। पत्नी की मृत्यु हो जाने पा पुनः विवाह किया जा सकता है। यदि राज्य पर किसी शत्रु राजा का अधिकार हो जाए तो अपनी सेना को एकत्र करके राज्य को वापिस पाया जा सकता है।
जीव को मनुष्य का यह शरीर बहुत ही पुण्य कर्मों के सञ्चय होने के पश्चात मिलता है। एक बार शरीर के अग्नि में समर्पित हो जाने के उपरान्त इसे पुनः प्राप्त करना असम्भव होता है। पुनर्जन्म होगा भी तो कोई आवश्यक नहीं कि फिर से मानव का यही शरीर मिलेगा या यही बन्धु-बान्धव मिलेंगे। मनीषियों का कथन है कि अपने कर्मों के भोग के अनुसार चौरासी लाख योनियों में से किसी एक में जीव का जन्म होता है। वह योनि कोई भी हो सकती है यानी भूचर, जलचर या नभचर किसी भी रूप में जीव का जन्म होता है।
शुभकर्मों की अधिकता होने पर ही जीव को पुनः मनुष्य का शरीर मिलता है। उस समय उसके माता-पिता और अन्य परिजन भी उसे अपने कर्मानुसार ही मिलते हैं। पूर्वजन्म की कोई स्मृति उसके स्मृतिपटल पर शेष नहीं रहती। यही विधि का विधान है। यदि ऐसा न होता तो जीव के लिए जीना बहुत कठिन हो जाता है। उस समय जीव अपने पुराने जन्म की स्मृतियों में ही भटकता रह जाता, उन्हीं में खोया रहता और नए जन्म में रच बस नहीं पाता।
मनुष्य को सदा यह स्मरण रखना चाहिए कि अगला जन्म उसे अपने कर्मों के अनुसार मिलेगा। जिस भी शरीर को वह पाना चाहता है, उसके कर्म भी उसी के अनुसार होने चाहिए। अपने जीवनकाल में सदा शुभकार्य करके इस देह का सदुपयोग करना चाहिए। जो मनुष्य प्रतिदिन सत्कर्म करते हैं, कदाचार से दूर रहते हैं, वास्तव में उनका जीवन सफल हुआ माना जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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