सूप (छाज) की भाँति मनुष्य का स्वभाव होना चाहिए यानि सार तत्व को ग्रहण करने वाला होना चाहिए और जो कुछ भी अनावश्यक है अर्थात कूड़ा है उसे उड़ा देने वाला होना चाहिए। यह वास्तव में बहुत ही व्यावहारिक ज्ञान है।
सूप में जब अनाज को साफ करने के लिए फटका जाता है तो उसमें जो भी कूड़ा-कर्कट होता है वह आगे आ जाता है जिसे फैंक दिया जाता है। यह क्रम तब तक चलता है जब तक अनाज साफ न हो जाए। सूप का यही स्वभाव है कि वह साफ-सुथरी वस्तुओं को अपने पास रखता है और उनमें पड़े कूड़े को उड़ाकर अलग कर देता है।
यदि मनुष्य जीवन में आने वाले कटु-मधुर अनुभवों से कुछ सकारात्मक शिक्षा यानि सार तत्व ग्रहण कर लेता है तो उसका जीवन सफल हो जाता है। परन्तु यदि नकारात्मक ज्ञान यानि व्यर्थ बातों में स्वयं को उलझाए रखता है तो उसका जीवन दूभर हो जाएगा।
जीवन का सार तत्त्व यही है कि मनुष्य ईमानदारी और सच्चाई से अपनी रोजी-रोटी कमाए। किसी से ईर्ष्या-द्वेष न करे। अपने पारिवारिक, सामाजिक और धार्मिक दायित्वों को यथाशक्ति पूर्ण करे। अपने देश के प्रति वफादारी निभाए। बिना किसी पूर्वाग्रह के घर में आने वाले सभी अतिथियों का खुले मन से स्वागत करे। सच्चे मन से ईश्वर का स्मरण नियमपूर्वक करता रहे।
धर्म व समाज विरोधी कार्य मनुष्य जीवन में व्यर्थ के व्यवहार हैं। उनसे यथासंभव बचना चाहिए क्योंकि बुराइयों की जड़ वे मनुष्य के लिए कष्ट का कारण बनते हैं।
ज्यों-ज्यों मनुष्य जीवन में उन्नति करता है त्यों-त्यों उसमें दुर्गुणों के आने की संभावना बढ़ जाती है। यदि उस समय वह याद रखे कि मुझे इन दुर्गुणों से बचना है, अपने जीवन में इन्हें स्थान नहीं देना है तो वह अपनी परीक्षा में खरा उतरता है।
ऐसे व्यक्ति की सुगन्ध उसके बिना कुछ कहे चारों ओर स्वयं ही फैल जाती है। वह सबके लिए आदर्श बन जाता है, सबके लिए उदाहरण बन जाता है। लोग उसके जैसा बनने का यत्न करने लगते हैं। उसे अपने सिर माथे पर बिठाते हैं।
ऐसा सारग्राही व्यक्ति ही पथप्रदर्शक बनकर नेतृत्व करता है। लोग उसके सद् परामर्श से अपने जीवन को सफल बनाने का प्रयास करते हैं।
मानव मन बहुत ही चंचल है। यह यहाँ-वहाँ कभी भी, कहीं भी भटकता रहता है। यह मन क्षणिक लालच, तुच्छ स्वार्थ अथवा भय के कारण शीघ्र ही विचलित हो जाता है। उस समय सभी जीवन मूल्य, जो सार हैं उन्हें ताक पर रखने में हिचचिकाता नहीं है। तब वह गलत रास्ते का चुनाव कर भटक जाता है। फिर समय बीतते वह कूड़े-कर्कट की तरह बाहर निकालकर फैंक दिया जाता है।
इसीलिए हमारे मनीषी समझाते हैं कि दुनिया के आकर्षणों में फंसकर स्वयं को दुखों की भट्टी में मत झोंको। ऐसा करके मनुष्य न स्वयं को कष्ट देता है अपितु अपने उन प्रियजनों के लिए भी दारुण दुख का कारण बन जाता है जिन्हें अपने जीवन काल में गर्म हवा तक नहीं लगने देना चाहता। यदि थोथेपन को अपनाने या उस मार्ग पर चलने का विचार मन में आए तो उसके दुष्परिणाम सोचते हुए उसे झटक दो या उड़ा दो, इसी में बुद्धिमत्ता है। इसीलिए कबीरदास कहते हैं -
साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय।
सार-सार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय।।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019
मनुष्य का स्वभाव
बुधवार, 9 अक्टूबर 2019
भावनाओं का आवेश
भावनाओं के क्षणिक आवेश में बहकर हम किसी ओर का नहीं स्वयं का ही नुकसान कर लेते हैं। यह आवेग एक प्रकार से ज्वर के समान होता है जिसके ताप में जलते हुए हम स्वयं ही कष्ट प्राप्त करते हैं। इससे बाहर निकलने का रास्ता भी हमें स्वयं ही खोजना होता है।
हम आवेश में क्यों आ जाते हैं? यह हमारा नुकसान क्यों और किसलिए करता है? इन प्रश्नों को हल करना बहुत आवश्यक है।
एक कहानी पढ़ी थी कि एक ब्राह्मण और ब्राह्मणी अपने छोटे से बच्चे के साथ किसी गाँव में रहते थे। उनकी आर्थिक स्थिति कुछ अच्छी नहीं थी। एक बार ब्राह्मणी स्नान करने के लिए नदी पर गई, तो ब्राह्मण को शिशु की देखभाल के लिए कह गई। ब्राह्मणी के जाने के बाद उसे श्राद्ध लेने के लिए उसे राजमहल से न्योता आया।
अब वह परेशान कि बच्चे को कहाँ छोड़े? ऐसा सोचते हुए उसके मन में विचार आया कि अपने पुत्र की तरह पाले हुए नेवले को बच्चे की रक्षा में छोड़कर चला जाता हूँ। ऐसा करके वह राजमहल चला जाता है। इसी बीच एक साँप बालक की ओर बढ़ता है और वह नेवला उसे मार देता है।
जब ब्राह्मण वापिस आता है तो नेवले के मुँह पर लगे खून को देखकर दुखी होता है। उसे लगता है कि इस नेवले ने मेरे बच्चे को मार दिया है। ब्राह्मण उसे उसी क्षण मार देता है। पर घर के भीतर जाकर साँप को मरा हुआ देखता है तो सब समझ जाता है। अपने पर परोपकार करने वाले नेवले को मारकर पश्चाताप करता है।
इसी प्रकार क्षणिक आवेश में आकर हम अपनों को स्वयं से दूर कर लेते हैं। उस समय हम कहते हैं जीवन भर इसकी शक्ल नहीं देखेंगे। घर-परिवार में किसी की जरा सी गलती या स्वयं में हुई गलतफहमी के कारण किसीका त्याग कर देना समझदारी नहीं कहलाती।
इसी प्रकार दोस्तों में कभी-कभी होने वाले मनमुटाव के कारण अपने प्रिय दोस्तों से जानलेवा दुश्मनी तक लोग निभाने लगते हैं।
नौकरी अथवा व्यापार के क्षेत्र में भी यदाकदा अपरिहार्य कारणों से मतभेद हो जाते हैं। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि हम उन लोगों को अपना शत्रु ही मानकर बैठ जाएँ।
यह आवेश हमारे सोचने-समझने की शक्ति का शत्रु होता है। जरा-सा गुस्सा आने पर हम अपने वश में नहीं रहते और दूसरे को दोषी मानते हुए उससे किनारा कर लेते हैं। चाहे उसके लिए बाद में मन-ही-मन कितना ही दुखी व परेशान क्यों न होना पड़े। हम कठोर बनकर दुनिया को अपने फैसले पर डटे रहते हुए दिखाना चाहते हैं। अपनी नाक नीची न हो जाए इस के लिए हमें चाहे हानि ही क्यों न उठानी पड़ जाए पर हमारी जिद्द पूरी होनी चाहिए।
इस आवेश से हम बच सकते हैं यदि पुनर्विचार कर लें तो। ईश्वर ने मनुष्यों को बुद्धि का वरदान दिया है जो हमें सृष्टि के सभी जीवों से विशेष बनाता है। यदि हम इस नेमत का सदुपयोग नहीं करेंगे तो मनुष्यों और पशुओं में कोई अन्तर नहीं रह जाएगा। मनुष्य अपने विवेक से काम लेकर बहुत से अनावश्यक कष्टों से बचकर निकल सकता है। इसी लिए कहते हैं-
'अविवेक: परमापदां पदम्।'
अर्थात अविवेक सभी मुसीबतों की जड़ है। अत: अपने निर्णय विवेक से लेने चाहिए। बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए जिससे हमें अपनों से दूर रहकर उनके वियोग में वर्षों तक घुलना न पड़े।चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 8 अक्टूबर 2019
मनुष्यों की श्रेणियाँ
हमारा बहुत से लोगों के साथ हमारा सम्पर्क होता है, जो आसपास रहने वाले या काम करने वाले होते हैं। सबकी प्रकृति अलग-अलग होती है। हर व्यक्ति के आचरण और व्यवहार में हमें विभिन्नता दिखाई देती है। जिस प्रकार मनुष्य रंग-रूप में एक जैसे नहीं दिखाई देते उसी प्रकार उनकी आदतों में भी अन्तर स्पष्ट ही लक्षित होता है।
सामाज में रहते हुए वे सब के साथ कैसे रहते हैं? वे दूसरों के साथ कैसा व्यहार करते हैं? समाज उनकी स्थिति कैसी होती है?
उसके अनुसार उन्हें हम चार श्रेणियों में इस प्रकार विभाजित कर सकते हैं-
1. उदार 2. दाता 3. कंजूस और
4. मक्खीचूस।
सबसे पहले हम उदार लोगों की चर्चा करते हैं। ये महानुभाव सारी पृथ्वी के जीवों को अपने हृदय से लगाकर रखने का जज़्बा रखते हैं। ये परोपकारी लोग सभी के चहेते होते हैं। हर व्यक्ति इनसे अपना सम्पर्क साधना चाहता है। ये निस्वार्थ भाव से सबके सुख-दुख में साथ निभाते हैं। लोग इनके पास अपनी परेशानियों के साथ आते हैं और प्रसन्न होकर वापिस लौटते हैं। किसी के रहस्यों को सार्वजनिक करके उसे उपहास का पात्र नहीं बनाते। बहुत ही गम्भीर व सज्जन इन लोगों को महापुरुषों की तरह समाज पूजता है।
दूसरे प्रकार के लोग दाता होते हैं जो दान देने में कभी पीछे नहीं हटते, सदैव तत्पर रहते हैं। सामाजिक एवं धार्मिक सभी प्रकार की संस्थाओं को वे दिल खोलकर दान देते हैं। जहाँ किसी जरूरत मन्द को देखते हैं, बिना किसी को पता चले उसकी सहायता करते हैं। अपने-पराये का भेदभाव किए बिना ही बादलों की तरह निस्वार्थ भाव से मदद करने में हिचकिचाते नहीं हैं। लोग अपने कष्ट के समय में इनकी उदारता से कृतार्थ होते हैं। समाज में इन लोगों का एक स्थान होता है। अपने सरल स्वभाव के कारण ये लोग हर जगह पर सम्मानित किए जाते हैं।
तीसरे प्रकार के लोग कंजूस होते हैं। वे हर किसी से मोलभाव करते रहते हैं। अपने घर-परिवार, पत्नी और बच्चों की सभी आवश्यकताओं को पूरा करते हैं। अतिथि सत्कार करने में भी घबराते नहीं हैं परन्तु पैसे को दाँतों से पकड़ते हैं। सामने इनका लिहाज करते हुए चाहे कोई कुछ न कहे पर पीठ पीछे कंजूस कहकर मजाक अवश्य ही उड़ाते हैं।
चौथे प्रकार के लोगों को आम भाषा में मक्खीचूस कहते हैं। ये ऐसे लोग होते हैं जो न खाते हैं और न खाने देते हैं। हर समय पैसे को लेकर झिकझिक करते रहते हैं। इनके लिए कहा जाता है-
'चमड़ी जाय पर दमड़ी न जाए।'
ये लोग धन पर साँप की तरह कुण्डली मारकर बैठे रहते हैं। लोग पीठ पीछे तो क्या सामने भी इनको चिढ़ाते हैं। पर इन चिकने घड़ों पर कोई असर नहीं होता। ये लोग दाँत निपोर कर रह जाते हैं। इनसे घर-परिवार के जन व भाई-बन्धु आदि सभी परेशान रहते हैं। किए गए अपमान का भी इन लोगों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। ये जस के तस ही रहते हैं। जीते जी ये किसी की जरूरत को पूरा नहीं करते। परिवार के लोग आवश्यक वस्तुओं के लिए भी तरसते रहते हैं और ये उसे फिजूलखर्ची बताकर अपना पल्लू झाड़ लेते हैं। पर इनकी मृत्यु के बाद इनके घर के लोग उस पैसे को बिना दर्द के उड़ाते हैं।
हमें स्वयं तय करना है कि हम किस श्रेणी का बनना चाहते हैं। सबकी आँखों का तारा बनकर हम सुख भोगना चाहते हैं या लोगों के व्यंग्य बाणों को सहन करना अपनी नियति बनाना चाहते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 7 अक्टूबर 2019
आपसी कलह
घर-परिवार की आपसी कलह परिवार का समूल नाश कर देती है। घर टूटकर बिखर जाता है। परिवारी जन एक-दूसरे की शक्ल तक देखना पसन्द नहीं करते। चाहे बाद में सभी सदस्यों को अफसोस ही क्यों न हो। पर तीर कमान से निकल जाए तो वापिस नहीं आता। इसी तरह से कार्यालय आदि में बॉस और कर्मचारियों की परस्पर होने वाली तू तू मैं मैं भी वहाँ विनाश का कारण बन जाती है। आपसी कलह से कभी भी किसी का भला नहीं होता। कोई भी समस्या हो, मिल-बैठकर उसका हल निकालना अच्छा होता है।
कलह चाहे आम परिवार की हो या राजघराने की हो, दोनों का हश्र एक ही होता है, यानी अलगाव, टूटन या बिखराव। आम परिवार में क्लेश का प्रमुख कारण धन का अभाव माना जाता है। परन्तु राजघरानों में या धनी परिवारों में धन कोई कारण नहीं होता। वहाँ सत्ता की लड़ाई प्रमुख कारण होती है। इसी कारण वहाँ दुश्मनी जन्म लेगी है। सभी सदस्य एक-दूसरे को नीचा दिखाने की होड़ में लगे रहते हैं, इस कारण वे कठोर वचनों का आदान-प्रदान करते रहते हैं।
मित्रता भी परस्पर कटु बोलने से टूट जाती है। मित्र बिना कुछ सोचे-समझे एक-दूसरे पर कीचड़ उछालने लग जाते हैं। लोग तमाशा देखते हैं और पीठ पीछे मजाक बनाते हैं। कोई व्यक्ति जब कुमार्ग पर चलने लगता है, तो वह सबकी नजरों से गिर जाता है। लोग उसका तिरस्कार करने लगते हैं। क्रोध में आकर धीरे-धीरे वह अलग-थलग पड़ जाता है। तब उस दुष्प्रवृत्ति वाले व्यक्ति का साथी बनने से लोग कतराने लगते हैं।
'पञ्चतन्त्रम्' ग्रन्थ के इस श्लोक में पण्डित विष्णु शर्मा ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में बताया है-
कलहान्तानि हर्म्याणि
कुवाक्यान्तं च सौहृदम् ।
कुराजान्तानि राष्ट्राणि
कुकर्मान्तं यशो नृणाम् ॥
अर्थात् आपसी कलह और वैमनस्य के कारण परिवार नष्ट हो जाते हैं, भले ही वह राजघराना क्यों न हो। कटु वचन कहने से दोस्ती समाप्त हो जाती है। जब कोई व्यक्ति बुरे कर्म करने लगता है तो वह लोगों में अपना मान-सम्मान खो देता है । यदि राजा (शासक) अयोग्य और दुष्ट प्रवृत्ति का हो तो राष्ट्र का नाश हो जाता है।
इस श्लोक का सार यही है कि आपसी कलह और वैमनस्य सदा विनाश को जन्म देते हैं। कटु शब्दों का प्रयोग मित्रता का शत्रु होता है। दुष्कर्म करने वाला व्यक्ति समाज में अपने मान-सम्मान को नष्ट कर देता है। अयोग्य शासक यदि दुर्भाग्य से किसी देश को मिल जाए तो वह उसे बर्बाद कर देता है।
किसी देश में यदि अयोग्य राजा हो, तो वह स्वयं को योग्य सिद्ध करने के लिए उठा-पटक करता रहता है। इसी कारण वह समाज में हँसी का पात्र बनता है। जो भी व्यक्ति उसकी हाँ में हाँ मिलता है, वही उसका प्रिय बन जाता है। वह अपने स्वार्थों की पूर्ति में व्यस्त रहता है, उसे देश की भलाई से कोई लेना देना नहीं होता। ऐसे देश की प्रजा भी लूट-खसौट करने लगती है। इस तरह राजा यानी शासक और प्रजा मिलकर देश का अहित करने लगते हैं।
ऐसे रणकता वाले देश पट पड़ौसी राज्य अपनी नजर गड़ाए रहते हैं। ऐसे अराजक देश को पड़ौसी राज्य सदा अपने अधीन करने की फिराक में लगे रहते हैं। इसलिए शासक यदि व्यभिचारी, भ्रष्टाचारी, अत्याचारी, लूट-खसौट करने वाला और प्रजा का हितचिन्तक न हो, तो उस शासक को जनता को एकजुट होकर सत्ता से शीघ्र उखाड़ फेंकना चाहिए। उसे सत्ता पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं होता।
हर रिश्ते में धैर्य और सहृदयता की आवश्यकता होती है। उन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए प्रेमपूर्वक व्यवहार तथा समानता का व्यवहार करना चाहिए। सदा प्रयास यही करना चाहिए कि बिखराव की स्थिति न बनने पाए, उससे पहले ही आपस में मिल-बैठकर कोई हल निकल लिया जाए। इस तरह करने से कोई छोटा नहीं हो जाता, अपितु वह महान बन जाता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 6 अक्टूबर 2019
धन की उपादेयता
अर्थ यानि धन की हम सब के ही जीवन में बहुत उपादेयता है इसके बिना जीवन नरक के समान कष्टदायक हो जाता है। छोटे-से-छोटा और बड़े-से-बड़ा कोई भी कार्य इसके बिना सम्भव नहीं हो पाता। इसको कमाने के जलिए बहुत यत्न करने पड़ते हैं। दिन-रात कोल्हू के बैल की तरह जुटे रहकर मनुष्य को अथक परिश्रम करना पड़ता है।
जिस धन को कमाने के लिए हम अपना सारा सुख-चैन गंवा देते हैं वह कभी किसी का होकर नहीं रहता। कबीरदास जी कहते हैं-
माया महा ठगिनी हम जानी।
कबीर जी के कहने का तात्पर्य है कि यह माया बहुत ही बड़ी ठग है और बहुत चंचल है। इसका कोई स्थायी निवास नहीं है। यह स्वेच्छा से कहीं भी चली जाती है। किसी की गुलाम बनकर भी नहीं रहती है। कोई भी व्यक्ति इसे अपनी तिजोरी में ताला लगाकर न रख सकता है और न ही रोक सकता है। न ही कोई मनुष्य यह दावा कर सकता है कि सात पुश्तों के लिए जो धन उसने जोड़-तोड़ करके जमा कर लिया है वह सुरक्षित रह पाएगा। यह सबको झाँसा देती रहती है। आज यह लक्ष्मी राजा के पास है, तो कल उसे कंगाल बनाते हुए रंक के पास चली जाएगी और उसे मालामाल कर देगी।
धन की इन्हीं विशेषताओं को देख व समझकर चेतावनी देते हुए महान विचारक हमें समझा रहे हैं-
पूत कपूत तो का धन संचै।
पूत सपूत तो का धन संचै॥
इन पंक्तियों का अर्थ है यदि सन्तान योग्य होगी तो अपनी मेहनत से धन कमा लेगी। आपकी कमाई धन-सम्पत्ति को बढ़ा लेगी। इसलिए धन को कमाने के लिए मारामारी मत करो। अपनी ईमानदारी व सच्चाई के रास्ते पर चलते रहो। इसके विपरीत यदि सन्तान अयोग्य होगी या कपूत होगी तो खुद तो कमाएगी नहीं पर आपका कमाया धन व्यसनों में अवश्य बरबाद कर देगी। ऐसी स्थिति में आप नाजायज तरीकों से धन कमाने का विचार त्याग दो।
धन के पीछे अपना सुख-चैन गंवाकर दिन-रात दीवानों की तरह मत भागो, यह साथ भी नहीं निभाएगा। धन जिस समय घर में आता है तो सुख और समृद्धि अपने साथ लेकर आता है। इसे दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि पैसा बोलने लगता है।
इसके विपरीत जब किसी के घर में धन जायज-नाजायज किसी भी तरीके से आता है तो अपने साथ बहुत सारे व्यसनों और बुराइयों को लेकर आता है। ये कुटेव उसके घर की जड़ों तक को हिला देते हैं। तब से उस व्यक्ति की बरबादी की कहानी आरम्भ हो जाती है।
जैसी कमाई करोगे वैसा ही अन्न घर में आएगा। तभी मनीषी हमें समझाते हैं-
जैसा खाओगे अन्न वैसा होगा मन।
सात्विक अन्न खाकर बच्चे सुसंस्कारी व आज्ञाकारी बनते हैं। ऐसे बच्चे माता-पिता, घर-परिवार व बन्धु-बान्धवों सबकी उम्मीदों पर खरे उतरते हैं।
दूसरी ओर पापकर्म से कमाए अन्न को खाकर बच्चे संस्कारवान नहीं बनते बल्कि उद्दण्ड होते हैं। वे नैतिक-अनैतिक सभी प्रकार के ही कार्यों में संलिप्त रहते हैं। इन बच्चों से कदापि शुभ की कामना नहीं की जा सकती।
धन हमारी सभी आवश्यकताओं का पूरक है, पर सब कुछ नहीं है। इससे हम भौतिक सुख-साधन एकत्र कर सकते हैं पर स्वास्थ्य, प्रेम, जीवन, आज्ञाकारी सन्तान व रिश्ते-नाते नहीं खरीद सकते।
अपने बच्चों को संस्कारी व योग्य बनाइए ताकि अपनी आवश्यकताओं को वे स्वयं के बूते पर पूर्ण कर सकें। उन्हें आपके पैसे की जरूरत ही न हो। अन्यथा आप कितनी भी समृद्धि उनके लिए छोड़कर जाइए वे यही कहेंगे कि हमारे माता-पिता ने हमारे लिए किया क्या है?
अपने जीवन में सदाचरण से कमाकर अपनी सारी इच्छाओं को पूर्ण कीजिए। परिवार का भरण-पोषण और अतिथि सत्कार करके मानसिक सुख व शान्ति प्राप्त करने का यत्न कीजिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 5 अक्टूबर 2019
जीवन साथी का चुनाव
हर युवा अपने जीवन साथी को लेकर एक सपना बुनता है। यह निश्चित है कि वह अपने जीवन साथी में कुछ विशेष गुणों को देखना चाहता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना दृष्टिकोण होता है। वह अपने साथी को अपने ही सोचे हुए उन मापदण्डों पर खरा उतरता हुआ देखना चाहता है।
आज युवाओं में प्रेम के मायने बदल गए हैं। भौतिक युग की चकाचौंध ने उनकी आँखों पर पैसे की पट्टी बाँध दी है। पैसे के पीछे भागते हुए वे किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। आपसी विश्वास और वचनबद्धता टूटती हुई दिखाई देती है। सभी तो नहीं परन्तु शायद कुछ युवा मौज मस्ती को ही सब कुछ मानने लगे हैं। इसीलिए उनमें प्रायः वैमनस्य की स्थितियाँ बन जाती हैं।
युवाओं को अपने भावी जीवन के प्रति सजग रहना चाहिए। उन्हें यथासम्भव ऐसा कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए जो भविष्य में उनके लिए मुसीबत बन जाए। उनका नया गृहस्थ जीवन सुखदायी होने के बजाय कष्टदायी बन जाए। फिर उस समय चिड़िया हाथ से निकल जाने के बाद पश्चाताप करने जैसी स्थिति बन जाती है। तब युवा से न उगलते बनता है और न ही निगलते।
युवाओं को अपने जीवन साथी का चुनाव करते समय सबसे पहले उसके गुण, कर्म व स्वभाव को परखना चाहिए। उसके चरित्र अथवा चाल-चलन को महत्त्व देना चाहिए। जो व्यक्ति अपने घर-परिवार में मिलजुल कर नहीं रह सकता वह किसी के साथ भी सामञ्जस्य नहीं बिठा सकता। उसकी संगति कैसी है? वह किन लोगों के साथ उठता-बैठता है? यह जानना भी बहुत महत्त्वपूर्ण होता है। यदि उसकी संगति अच्छे लोगों से नहीं होगी तब वह अपनी कमाई तो बरबाद करेगा ही, साथ ही माता-पिता की मेहनत से कमाई गई धन-संपत्ति को नष्ट करने में देर नहीं लगाएगा। घर के माहौल को देखते ही सयाने लोग बहुत कुछ समझ जाते हैं। इसलिए उनकी राय को महत्त्व देना चाहिए।
फिल्मों व टीवी की चकाचौंध को देखकर आजकल कुछ नवयुवक फिल्मी हीरोइनों जैसी पत्नी चाहते हैं और नवयुवतियाँ फिल्मी हीरो जैसे पति चाहती हैं। वे इस बात को भूल जाते हैं कि फिल्म वाले सिर्फ़ अपने किरदार का फिल्मी तरीके से पर्दे पर अभिनय करते हैं। असल जीवन में वे भी आम लोगों की ही तरह अपने घर-परिवार के लिए समर्पित होते हैं।
दो युवाओं को परस्पर संबंध जोड़ते समय यह बात अवश्य सोचनी चाहिए कि उस घर में पैसा यदि अपनी अपेक्षा से थोड़ा कम भी हो परन्तु परिवारी जन आपस में सामञ्जस्य पूर्वक रहते हैं, वे प्यार को ही अपनी पूँजी मानते हैं तो ऐसे घर में किया गया बच्चों का संबंध हमेशा सुखदायक होता है। ऐसे परिवारों में प्रायः तालमेल बिठाने में अधिक दिक्कतें नहीं आतीं।
आज का युवावर्ग बहुत समझदार है वह अपना भला-बुरा अच्छी तरह जानता है। उसे बस जरा-सी सूझबूझ से सम्हालने की आवश्यकता है। यदि सकारात्मक राह उसे दिखाई जाए तो वह निश्चित ही सही फैसले लेगा। अपने जीवन में वह कभी पीछे मुड़कर देखने की स्थिति में नहीं भटकेगा। स्वयं तो वह सही राह पर चलेगा ही और देश का एक जिम्मेदार नागरिक बनकर वह आने वाली पीढ़ी का भी सही मार्गदर्शक बनेगा।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019
सुन्दर प्रकृति
ईश्वर निर्मित यह सम्पूर्ण प्रकृति बहुत ही सुन्दर है। इसका सौन्दर्य मनमोहक है। इसके किसी भी अंश पर यदि ध्यान दिया जाए तो उसकी सुन्दरता में मन खो जाना चाहता है। इसे जितना भी गहराई से हम निहारते हैं वह उतना ही मन में गहरे उतरती जाती है।
एक-से-एक सुन्दर पक्षी हमें दिखाई देते हैं। उनको देखते ही रह जाने का मन करता है। ऊषाकाल में होने वाली उनकी चहचहाहट इस सृष्टि में सदा नवजीवन का संचार करती है। पक्षियों का कलरव जीवनदायनी शक्ति होता है। मोर का नृत्य, तोते की वाचालता, कोयल का मधुर गान किसी को भी प्रभावित कर लेते हैं। इनका मासूम सौन्दर्य तब इनका शत्रु बन जाता है जब हम मनुष्य अपने मनोरंजन के लिए इन्हें पिंजरों में कैद कर लेते हैं।
इसी प्रकार हम पशुओं के सौंदर्य के विषय में भी कह सकते हैं। हिरण आदि पशु अपने अबोधपन के कारण बहुत ही मोहक लगते हैं। पशुजगत हमारे लिए बहुत ही उपयोगी है। इन्हें हम पालतू बनाकर या कैद इनसे हम विभिन्न प्रकार के कार्यों को कराते हैं।
समुद्र व समुद्री जीव यानि जलचर सदा से ही हमारे आकर्षण का केन्द्र रहे हैं। इन्हें भी हम सजावट का सामान समझते हैं। हद तो हम मनुष्य तब पार करते हैं जब इन मासूम सुन्दर जीव-जन्तुओं को मारकर खा जाते हैं।
सुन्दर और रंग-बिरंगी, मनभावन तितलियाँ इधर-उधर उड़ती हुई बच्चों के साथ-साथ बड़ों का ध्यान भी आकर्षित करती हैं। इन्हें भी पकड़कर बच्चे मनोरंजन करते हैं। विभिन्न प्रकार के सुन्दर, मोहक व सुगन्धित फूल पूरे वातावरण को महका देते हैं। इन्हें तोड़कर हम अपने स्वार्थों की पूर्ति करते है।
इसी प्रकार नदियाँ, झरने, जल प्रपात व समुद्र भी हमें पल-पल पुकारते हैं। इनका सुन्दर रूप हर किसी को मोह लेता है। लोग इन्हें निहारने के लिए दूर-दूर से अपना समय व पैसा व्यय करके जाते हैं।
पर्वतों की सुन्दरता का बखान क्या किया जाए? इनके सौन्दर्य प्रेमी न जाने कितने कष्ट उठाकर इन्हें निहारने आते हैं। इनके आकर्षण में बंधे हुए लोग स्वयं को तरोताजा बनाने के लिए अपने साथियों या परिवार के साथ आते हैं। कामकाज की आपाधापी और शहरों के शोर-शराबे से दूर इन शान्त पर्वतों की गोद में समय व्यतीत करके ताजगी के साथ आत्मसंतोष भी मिलता है।
यदि पहाड़ों की चोटियाँ बर्फ से ढकी हों, रास्तों पर बर्फ का साम्राज्य हो, पेड़ों पर लटकती सफेद बर्फ हो और चारों ओर बर्फ की सफेद चादर बिछी हो तो उस दृश्य के क्या कहने? यह श्वेतिमा मन को आनन्द से सराबोर कर देती है।
ग्रह-नक्षत्र, चाँद-सितारे हमेशा से ही मनुष्यों के लिए रहस्य रहे हैं। इन सबकी गाथाएँ हम समय--समय पर सुनते व पढ़ते रहते हैं।
कहने का तात्पर्य है कि इस सृष्टि की प्रत्येक रचना को हम निहारने लगें और उसमें डूबते चले जाएँ तो उस मालिक की प्रशंसा करने की इच्छा होती है। उसने चारों ओर इतनी अधिक सुन्दरता भर दी है जिसकी हम कभी स्वप्न में भी कल्पना नहीं कर सकते। उस प्रभु की सृष्टि में कोई कमी निकालने की सामर्थ्य हम इन्सानों में तो बिल्कुल नहीं है।
ईश्वर ने इस सृष्टि को बहुत सुन्दर बनाया है और वह चाहता है कि हम अपने व्यवहार अथवा अपने दुष्कृत्यों से इसे दूषित न करें। हम उसे उसी ही तरह सम्भाल कर रखें, जैसा कि उसने इसे बनाया है।
चन्द्र प्रभा सूद
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