रविवार, 15 फ़रवरी 2026

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर

नदी का अन्तिम लक्ष्य सागर में समा जाना होता है। सागर तक पहुँचने की उसकी तड़प ही उसे सफल बनाती है। अपने रास्ते में आने वाली सारी बाधाओं को बिना रुके पार करते हुए वह अपने लक्ष्य को भेद लेती है। इसी प्रकार यदि मनुष्य अपने अन्तिम लक्ष्य मोक्ष को पाना चाहे तो वह सहजता से उसे प्राप्त कर सकता है। हम सभी जानते हैं कि मनुष्य जीवन का लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होता है। जब तक वह अपने लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेता वह जन्म और मरण के चक्र में भटकता रहता है। 
             मनुष्य इस असार संसार में आकर सब भूल जाता है। वह मोह-माया का दामन थाम लेता है। इसलिए वह अपने लक्ष्य से दूर होता जाता है। यदि वह अपने लक्ष्य का सन्धान करने का मन बना ले तो उसके लिए कुछ भी कठिन नहीं। परमपिता परमात्मा से एकाकार होने की उसकी तड़प उसे अपने उद्देश्य से भटकाने में सफल नहीं हो सकती। अपने लक्ष्य की ओर उसका बढ़ता हुआ कदम ही उसे इच्छित सफलता दिला सकता है।
             नदी को सागर से मिलने की और उसमें एकाकार होने की बहुत जल्दी होती है। वह अपने उद्गम स्थल से निकलते हुए वह रास्ता रोकने वाली चट्टानों की परवाह किए बिना, उबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरती हुई अन्ततः सागर में जाकर समा जाती है। दिन-रात का उसे कोई ख्याल नहीं रहता। हर मौसम के वारों को झेलती हुई वह निरन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ती चली जाती है। कोई भी बाधा ऐसी नहीं होती जो उसे अपने लक्ष्य से भटका सके। उसकी एकाग्रता ही उसकी सफलता की कसौटी होती है।
             हम मनुष्य बाँध बनाकर उसके प्रवाह को रोकते हैं। जगह-जगह उसमें हम कचरा डालते हैं। कभी-कभी आँधी और तूफान भी उसका रास्ता रोकने का यत्न करते हैं। फिर भी वह इन सभी व्यवधानों को सदा ही अनदेखा करके अन्त में अपने गन्तव्य सागर तक पहुँच जाती है। सबसे मुख्य बात यह है कि वह बिना विश्राम किए अनवरत मीलों लम्बी यात्रा करती चली जाती है। उसके लिए  दिन-रात, मौसम और सबसे बढ़कर हम इन्सानों की बाधाऍं उसे नहीं रोक सकतीं।
              इस सत्य से हम इन्कार नहीं कर सकते कि सागर में मिल जाने के बाद से उसका मीठा जल भी खारा हो जाता है। उसका अपना कोई अस्तित्व नहीं रह जाता। वह सागर का ही एक रूप बन जाती है। उसका अपना नाम, उसकी पहचान समाप्त हो जाती है। फिर भी उसकी तड़प सागर के साथ उसे एकरूप कर देती है।
             मनुष्य के मन में भी यदि ईश्वर को पा लेने की तड़प बलवती हो जाए तो वह भी मीराबाई की तरह संसार सागर के अगणित थपेड़ों को झेलता हुआ, उनसे बिना डरे और बिना रुके अपनी निश्चित डगर पर चल पड़ता है। सुखों की नरम मुलायम छाँव और दुखों के पहाड़ कदापि उसका रास्ता नहीं रोक सकते। ये सब रूकावटें उसके लिए कोई मायने नहीं रखते। इस दुनिया के प्रलोभन उसके लिए मिट्टी के ढेले के समान व्यर्थ हो जाते हैं। वह इन प्रलोभनों में फंसकर अपना जीवन बर्बाद नहीं करता। वह बस अपने लक्ष्य की ओर टकटकी लगाए देखता रहता है।
             संसार के लुभावने यह मोह-माया के जाल उसके पैरों की बेड़ियाँ नहीं बन सकते। वह महात्मा बुद्ध की तरह एक ही पल में, एक ही झटके में उन सब जंजीरों को तोड़कर मुक्त हो जाने की सामर्थ्य रखता है। ऐसे ही लोग युगों-युगों तक स्मरण किए जाते हैं। इनके मार्गदर्शन का लाभ अनेक लोग उठाते हैं।
              अब पतंगे को ही देख लीजिए। लौ का दीवाना, उसे पाने की चाहत में वह अपने प्राणों की आहुति तक दे डालता है। पर अपने लक्ष्य से नहीं भटकता। ऐसा दिव्य समर्पण भाव अन्यत्र कहाँ मिल सकता है? अपने प्राणों की परवाह किए बिना पतंगा अपने लक्ष्य को पाने के लिए सदैव कटिबद्ध रहता है। पतंगे जैसी दीवानगी यदि हो तो मनुष्य का लक्ष्य उसे शीशे की तरह साफ-साफ चमकता हुआ दिखाई दे सकता है। जिसे वह चाहे तो सरलता से हाथ बढ़ाकर पा सकता है।
             नदी और पतंगे दोनों के उदाहरण इसी बात को स्पष्ट करते हैं कि जब तक प्रेम की तड़प न हो तो मनुष्य इस संसार के सम्बन्धों को नहीं निभा सकता। क्योंकि माता-पिता, पति-पत्नी, भाई-बहन, मित्र, नाते-रिश्ते यानी हर भौतिक सम्बन्ध प्यार के बिना अधूरा रहता है। जितना प्रेम का खिंचाव होता है, सम्बन्ध उतना ही प्रगाढ़ बनता है। तो फिर प्रभु को प्रेम की तड़प के बिना किस प्रकार पाया जा सकता है? 
             मालिक को पाने के लिए सच्ची तड़प का होना बहुत आवश्यक है। तभी मनुष्य उसके पास जाने, उससे मिलने, उसे जानने, उसमें एकाकार हो जाने के सभी प्रयत्न कर सकता है और फिर अन्तत: अपने इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने में भी सफलता प्राप्त कर सकता है।
चन्द्र प्रभा सूद 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें