सोमवार, 16 फ़रवरी 2026

गुरु-शिष्य सम्बन्ध

गुरु और शिष्य के सम्बन्धों की चर्चा प्राय: होती रहती है। पुरातन वैदिक परम्परा में गुरु-शिष्य के सम्बन्ध बहुत महत्वपूर्ण थे। शिष्य गुरु के आश्रम में जाकर शिक्षा ग्रहण करते थे। गुरु अपने शिष्यों को पुत्रवत मानते थे। गुरु अपने शिष्यों का सम्पूर्ण व्यय वहन करते थे। अपनी शिक्षा पूर्ण करके शिष्य अपने घर वापिस लौटते थे। 
              आधुनिक काल में गुरु-शिष्य परम्परा के मायने बदल गए हैं। आज के इस भौतिक युग में जहाँ अर्थ प्रधान हो गया है, वहाँ इस रिश्ते में भी स्वार्थपरता बढ़ गई है। ये सम्बन्ध भी अब धन की कसौटी पर कसे जाने लगे हैं। जिस गुरु के पास बेहिसाब धन-दौलत व सम्पत्ति का अम्बार है, वह बड़ा गुरु कहलाता है। इसी तरह जो जितना मनुष्य धनवान है, वह उतना बड़ा शिष्य कहलाता है। उस धनिक को रिझाने के लिए गुरु भी नानाविध उपाय करते रहते हैं।
           धन और स्वार्थ के कारण जुड़े गुरु-शिष्य के सम्बन्धों में कहीं पारदर्शिता नहीं दिखाई देती। मुझे इसका यही कारण समझ में आता है कि जब तक इन दोनों के स्वार्थों की पूर्ति होती रहती है, वे परस्पर एक-दूसरे के साथ जुड़े रहते हैं और जहाँ स्वार्थ खत्म हो जाता है, वहीं उनके सम्बन्धों को भी धत्ता दिखा दिया जाता है। फिर आरम्भ होता है एक नए गुरु और एक नए शिष्य की तलाश का खेल। यह क्रम अनवरत चलता रहता है। यहॉं समर्पण की भावना नहीं होती, मात्र प्रदर्शन होता है।
               वे गुरु तो आज चिराग लेकर खोजने पर भी नहीं मिलते, जिनके विषय में हमारे ग्रन्थों में कहा गया था-
         गुरुर्बह्मा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वर:।
    गुरु: साक्षात् परमब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नम:॥
अर्थात् गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु महेश्वर है। गुरु साक्षात् परम ब्रह्म है, उसे हम प्रणाम करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि इस श्लोक के अनुसार गुरु को ईश्वर से भी महान बना दिया गया।
            और भी बहुत कुछ गुरु की प्रशस्ति में गाया गया। बड़े दुख का विषय है कि ऐसे गुरु अब शायद ही उपलब्ध हैं जो शिष्य को अपनी सन्तान के  समान मानते थे, वे उसकी उन्नति में प्रसन्न होते थे। उनका प्रयास यही होता था कि जितना ज्ञान उनके पास है वे अपने शिष्य को सौंप दें। वे अपने शिष्य का स्वार्थ रहित होकर सर्वांगीण विकास करते थे। ऐसे वे महान गुरु शायद विरल ही हैं। ऐसी महान गुरु-शिष्य परम्परा को हम शीश नवाकर प्रणाम करते हैं।
              गुरु का नाम लेते ही उन तथाकथित धर्मगुरुओं की ओर आज बरबस ध्यान चला जाता है, जिनके आश्रमों में दुराचार व कदाचार धड़ल्ले से होता है। अपने भक्तों को अपरिग्रह का उपदेश देने वाले ऐसे गुरुओं के आश्रमों में आप सब देश-विदेश से नाजायज तरीके से आई हुई दौलत के अम्बार देख सकते हैं। हिरण्यकश्यप के शायद वे वंशज हैं जिन्हें स्वयं को ईश्वर कहने में भी उन्हें रंचमात्र भी संकोच नहीं होता। धर्म, समाज और न्याय व्यवस्था की नजर में दोषी कुछ आज सलाखों के पीछे भी बन्द हैं।
              गुरु के नाम पर वे कलंक है जो अपनी बेटी कही जाने वाली शिष्या से दुराचार अथवा बलात्कार जैसे घिनौने कर्म करने से नहीं घबराते। अपने शिष्यओं का अपहरण व उनकी हत्या करते हुए उनके हाथ नहीं काँपने और न ही उनका मानस उन्हें कचोटता है।
              जहाँ तक मेरा विचार है यह सारी गिरावट महामारत काल से आरम्भ हुई। उस समय अन्य मर्यादाओं के साथ इस मर्यादा का भी हनन हुआ। गुरु द्रोणाचार्य ने अपने एकनिष्ठ शिष्य भील पुत्र एकलव्य से दाहिने हाथ का अंगूठा दक्षिणा में इसलिए माँग लिया कि वे राजाश्रित गुरु थे। वे नहीं चाहते थे कि राजकुमार अर्जुन से बड़ा कोई और धनुर्धर इस विश्व में हो।
               महारथी कर्ण ने धोखे से अपने गुरु से युद्धकौशल सीखा और गुरु ने उसे क्षमा करने के स्थान पर श्राप दे दिया, 'जब तुझे मेरी सिखाई हुई इस विद्या की सबसे अधिक आवश्यकता होगी, उस समय तेरा यह ज्ञान व्यर्थ हो जाएगा।' इस अभिशाप का परिणाम महान दानवीर कर्ण की मृत्यु के रूप में हमारे समक्ष आया।
             गुरु गोरखनाथ जैसे शिष्य किसी गुरु को चिराग लेकर ढूँढने पर भी नहीं मिलेंगे। उन्होंने संसार की वासना से ग्रस्त अपने गुरु को सन्मार्ग दिखाया। फिर उन्हें सांसारिक वासनाओं से मुक्त करवाकर वैराग्य की ओर लौटाकर ले आए।
              आर्यसमाज के प्रवर्तक प्रातः स्मरणीय स्वामी दयानन्द सरस्वती जी ने अपने गुरु स्वामी विरजानन्द जी का नाम इतिहास में अमर कर दिया। 
आधुनिक काल के ये दोनों गुरु-शिष्य परम्परा का सटीक उदाहरण कहे जा सकते हैं।
             ऐसे महान, सद् गुणी गुरु और ऐसे महान शिष्य तो बस अब किस्से कहानियों में सुनने व पढ़ने के लिए रह गए हैं। अब तो ऐसी आशा नहीं दिखाई देती कि फिर कभी महान गुरु-शिष्य परम्परा हमें भविष्य में दिखाई देगी।
चन्द्र प्रभा सूद 

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