रविवार, 19 अप्रैल 2026

दान धर्म का पालन करना

दान धर्म का पालन करना

दान करना मनुष्य का धर्म है जो उसे आत्मसन्तोष देता है। किसी जरूरतमन्द की समय पर सहायता करना भी दान कहलाता है। वह मनुष्य कदापि नहीं हो सकता जिसके मन में दया, ममता, करुणा आदि मानवोचित गुण विद्यमान न हों। हमारे महान ग्रन्थ और मनीषी दान देने को महत्त्व देते हैं। मनुष्य में जितनी भी सामर्थ्य हो उसके अनुसार ही उसे अन्न, वस्त्रादि का दान देना चाहिए। दान मनुष्य को इस प्रकार करना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर नहीं होनी चाहिए। 
            दान धर्म का अर्थ होता है अपनी सामर्थ्य के अनुसार बिना किसी स्वार्थ या प्रतिफल की अपेक्षा के किसी जरूरतमन्द को स्वेच्छा से धन, भोजन, वस्त्र, ज्ञान या अन्य वस्तुऍं निस्वार्थ भाव से समर्पित की जाऍं। यह हिन्दू धर्म में एक कर्तव्य, आत्म-शुद्धि का साधन और करुणा का सर्वोच्च गुण माना गया है जो इस लोक में सुख और परलोक में कल्याण लाता है। हमारे शास्त्र कहते हैं -
         दाऍं हाथ से दान दो पर बाऍं हाथ को
          पता नहीं चलना चाहिए। 
अर्थात् ऐसा भी कह सकते हैं कि दान और पुण्य जैसे कार्य एकान्त में होने चाहिए। दान ढिंढोरा पीटकर नहीं करना चाहिए अपितु गुप्त रूप से करने चाहिए। तभी वह दान फलीभूत होता है।
         पद्म पुराण का इस विषय में यह कथन है - 
       सच्चे मन से किया गया दान 
       मनुष्य को सुख और शान्ति प्रदान करता है। 
          सामाजिक प्रणी मनुष्य समाज से बहुत कुछ लेता है। इसलिए उसका कर्त्तव्य बनता है कि उस समाज की भलाई के लिए अपनी नेक कमाई का कुछ अंश दान में देना चाहिए। कबीरदास जी  दान देने के लिए कहते हैं-
        चिड़ी चोंच भर ले गई नदी न घटयो नीर।
        दान देत धन न घटे कह गए दास कबीर॥
अर्थात् कबीरदास का कहना है कि नदी की विशाल जलराशि से चिड़िया अपनी चोंच में जरा-सा जल ले लेती है तो नदी का पानी कम नहीं होता। उसी प्रकार दान देने से धन में कोई कमी नहीं आती बल्कि उसमें बढ़ोत्तरी होती है।
            दान के विभिन्न रूप हैं। जरूरतमन्दों की सहायता करने से दुखों का निवारण और पापों का प्रायश्चित किया जाता है। किसी को भयमुक्त या सुरक्षित महसूस कराना अभयदान कहलाता है। अस्पताल में मरीज के लिए खून या दवाओं का प्रबन्ध करना यानी दवाई या चिकित्सा सहायता प्रदान करना औषधि दान कहा जाता है। भूखे व्यक्ति को भोजन कराना सबसे बड़ा दान माना जाता है। भोजन या अनाज का दान करने को अन्नदान कहते हैं। शिक्षा का दान सबसे महत्त्वपूर्ण होता है। किसी गरीब बच्चे की पढ़ाई का खर्च उठाना या उसे शिक्षित करके उसके जीवन को सुधारना होता है। सर्दियों में बेघर लोगों को कम्बल या कपड़े बॉंटने को वस्त्रदान कहते हैं।
             दान का अप्रत्यक्ष यह लाभ होता है कि मनुष्य का यश चारों दिशाओं में फैलता है। दानवीर कर्ण, राजा हरिश्चन्द्र आदि को आज तक उनके दान के कार्यों के लिए याद किया जाता है। इसके अतिरिक्त पुण्य कार्यों में यह दानकार्य भी जुड़ जाता है जिससे हमारे इहलोक के साथ-साथ परलोक भी सुधरता है। मनुष्य को ऐसी मानसिक शान्ति भी मिलती है जो अमूल्य है। इसी शान्ति की खोज में वह तीर्थों, जंगलों तथा तथाकथित गुरुओं के पास जाकर भटकता है।
            इस विषय में एक उदाहरण दिया जाता है कि स्नान बन्द बाथरूम में किया जाता है, सड़क या चौराहे पर नहीं। दान और पुण्य छिपाने से बढ़ते है और बताने से नष्ट हो जाते है अर्थात् उसका महत्त्व नहीं रह जाता। 
            यह इन्सानी कमजोरी है कि वह राई जितना छोटा-सा उपकार का काम करके उसे पहाड़ जितना बड़ा करके बताता है। यद्यपि शुभकार्य करके उसका ढिंढोरा पीटा जाए तो लोग ऐसे व्यक्ति को घमण्डी कहते हैं। ऐसे व्यक्ति से सहायता लेने में भी उन्हें संकोच होने लगता है। दान देकर हर स्थान पर अपने नाम के पत्थर लगवाने का अर्थ यही है कि वर्षों तक लोग याद रखें कि फलाँ व्यक्ति ने दान दिया था। बताइए दान आत्मतोष के लिए दिया जाता है। फिर इस प्रकार से उसका आत्मप्रचार किसलिए करना?
            ईश्वर में हम चौबीसों घण्टे अपने लिए कुछ-न-कुछ माँगते रहते हैं और वह हमें हमारे कर्मों के अनुसार भरपूर देता है। हमें देकर न जतलाता है और न पछताता है। उसका गुणगान अथवा धन्यवाद करने में हम सदा कंजूसी बरतते हैं, पर आशा यही करते हैं कि हमने जिसकी सहायता की है वह हमारे समक्ष हमेशा नतमस्तक रहे।         
          विद्या का दान सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। ज्ञान का दीपक जलाने से आने वाली पीढ़ियाँ ज्ञानवान होकर, मार्गदर्शक बनकर अपने देश, धर्म व समाज का हित करने में सक्षम बनती हैं। 
          दूसरो की होड़ में दान देने के नाम पर सब कुछ नहीं लुटा देना चाहिए। अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करने और उनकी आवश्यकताओं को पूर्ण करने तथा अतिथियों के आदर-सत्कार से जो धन शेष बचे उसका कुछ अंश दान करके सामाजिक यज्ञ में सबको आहुति देनी चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद 

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