बाड़ खेत को खाने लग जाए तो
बाड़ को खेत की सुरक्षा के लिए लगाया जाता है परन्तु यदि यही बाढ़ किसी कारण से खेत को खाने लग जाए तो उस खेत की सुरक्षा कोई नहीं कर सकता। इसका अर्थ हुआ कि कोई भी कितना भी यत्न कर ले पर उस खेत को बर्बाद होने से नहीं बचाया जा सकता।
बाड़ खेत को खा रही है, यह एक मुहावरा है। इसका प्रयोग अक्सर ऐसी स्थिति का वर्णन करने के लिए किया जाता है जहॉं कोई वस्तु किसी के संसाधनों या अवसरों को दूर ले जाई जा रही हो। यह किसी ऐसे व्यक्ति या स्थिति का भी उल्लेख हो सकता है जो रचनात्मकता या प्रगति को बाधित कर रहा है। इस मुहावरे का प्रयोग प्रायः एक बाधा के सामने हताशा या लाचारी की भावना व्यक्त करने के लिए किया जाता है।
इसी प्रकार जिस व्यक्ति को सुरक्षा का उत्तरदायित्व सौंपा गया है यदि वही अमानत में खयानत करने लग जाए तब बहुत ही कठिनाई होने लगती है। हमने ऐसे कई काण्ड होते हुए देखे हैं जहाँ उसी के किसी सुरक्षाकर्मी ने ही हत्या कर दी हो। इसका सबसे बड़ा उदाहरण पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गान्धी की हत्या का हैं।
इसी प्रकार घर अथवा कार्यालय में नियुक्त किए गए सुरक्षाकर्मी स्वयं या किसी दूसरे की सहायता लेकर जरा-सी नाराजगी होने पर अपने स्वामी को मौत के घाट उतार देते हैं। घर के किसी मासूम बच्चे का अपहरण करके फिरौती में मोटी रकम तक वसूलते हैं। यदि उनका मनचाहा किसी कारण से न हो पाए तो उस बच्चे को मौत की नींद भी सुला देते हैं। ऐसे उदाहरण प्राय: सोशल मीडिया, टी.वी. एवं समाचार पत्रों की सुर्खियाँ बनते रहते हैं।
'हरिवंश पुराण' में महर्षि वेदव्यास जी ने कहा है -
निर्वाप्यते ज्वलन्नग्निर्जलेन सुमहानपि।
उत्तिष्ठेद् यद्यसौ तस्मात्तस्य शान्ति: कुतोन्यत:॥ अर्थात् प्रज्ज्वलित अग्नि कितनी ही विराट क्यों न हो, अन्त में जल के द्वारा शान्त कर दी जाती है। पर यदि जल से ही अग्नि उत्पन्न होने लगे तो अन्य किस पदार्थ से उसको शान्त किया जा सकता है? यानी उसे शान्त नहीं किया जा सकता।
इस श्लोक में दर्शाए गए सत्य से हम सभी भली-भाँति परिचित है। कहीं भी आग लग जाए तो हम उस पर पानी डालकर बुझाते हैं। परन्तु यदि उसी पानी से बनी बिजली से आग भड़क जाए तो वहाँ पानी का प्रयोग नहीं किया जाता। तब उस आग पर मिट्टी डाली जाती है। इसका कारण यह है कि आग पर पानी डालने से करेण्ट आ जाता है, इससे कई जानें जाने का डर होता है।
इतिहास का अध्ययन करने पर भी हमें ऐसे अनेक ऐसे उदाहरण मिलते हैं जहाँ इस प्रकार के खूनी खेल खेलने में किसी-न-किसी विभीषण का ही हाथ होता था। अन्यथा विरोधी राजाओं को कहाँ पता होता था उस राजा विशेष में विद्यमान उनकी कमजोरियों का।
खजाने का रक्षक ही यदि हेराफेरी मास्टर हों तो उस खजाने को लुटने में अधिक समय नहीं लगता। लोगों के खून-पसीने की गाढ़ी कमाई बिना समय व्यर्थ हुए नष्ट हो जाती है। इस तरह लक्ष्मी के अपार भण्डार कुत्सित मानसिकता के कारण बर्बाद कर दिए जाते हैं।
सबसे बढ़कर देश के शासक ही यदि देश को बर्बादी के कगार पर ले जाएँ तो ऐसी सम्भावना होती है कि वह देश किसी अन्य देश के कब्जे में शीघ्र आने वाला है । देश में उसके रक्षक नेता ही यदि भक्षक बन जाएँ अर्थात् नेता चोरबाजारी करने वाले, भ्रष्टाचार में लिप्त, रिश्वतखोरी को प्रश्रय देने वाले, हेराफेरी करने वाले, दूसरों का गला काटने, अपराधियों की शरणस्थली बनने जैसे जघन्य अपराधों में लिप्त हो जाएँगे तो उस देश का ईश्वर ही मालिक है।
ऐसी स्थिति में उस देश में शासन नाम की कोई चीज नहीं रहती। वहाँ केवल स्वार्थ हावी होने लगते हैं। वहॉं अराजकता का वातावरण बन जाता है। सभी नेता जब देश से अधिक अपने स्वार्थों को महत्त्व देने लगते हैं तब वह देश रसातल की ओर जाने लगता है।
यदि हम चाहते हैं कि बाड़ खेत को न खाए, हमारा खजाना सुरक्षित रहे अथवा हमारे देश का अहित करने वाला कोई भी मनुष्य न हो तो हम सबको मिलकर इसके लिए साझा प्रयास करना होगा। भीतरघात करने वाले जयचन्दों को शीघ्र पहचानकर उनका सामाजिक तौर से बहिष्कार करना होगा। तभी हर प्रकार से हमारे जान और माल की सुरक्षा हो सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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