आत्ममुग्ध व्यक्ति
हम सभी आत्ममुग्ध रहते हैं। हम केवल अपने बारे में बात करना चाहते हैं, अपनी प्रशंसा सुनना चाहते हैं। जरा-सी आलोचना को हम सहन नहीं कर पाते। उस समय हमारा मन करता है कि इस आलोचक को काले पानी भेज दें अथवा उसका वो हाल करें कि जिन्दगी भर याद रखे, वह उसे भूल न पाए। सोचना अलग बात होती है किन्तु उस पर आचरण करना अलग बात।
आत्ममुग्ध व्यक्ति अपनी ही परछाई, रूप, प्रतिभा या व्यक्तित्व पर अत्यधिक मुग्ध रहता है। ऐसा व्यक्ति केवल अपने बारे में ही सोचते हैं। वे सदैव अपनी आवश्यकताओं को सबसे ऊपर रखते हैं। दूसरों से हमेशा अपनी तारीफ सुनने की उम्मीद करते हैं। दूसरों की भावनाओं या तकलीफों की उन्हें बिल्कुल भी परवाह न होती। वे अपनी छोटी-सी आलोचना या असहमति होने पर भड़क उठते हैं। उनका यह मानना होता है कि विशेष व्यवहार पाना उनका अधिकार है।
महात्मा बुद्ध ने इसीलिए किसी समय यह कहा था, 'आप पूरे ब्रह्माण्ड में कहीं भी ऐसा व्यक्ति खोज लें जो आपको आपसे ज्यादा प्यार करता हो, आप पाएँगे कि जितना प्यार आप खुद से कर सकते हैं उतना कोई आपसे नहीं कर सकता।'
जब हम खुश होते हैं तब यदि गहराई से विचार करते हुए अपने अन्तस् को टटोलें तो पता चलेगा कि जिस वस्तु ने हमें परेशान किया हुआ था, वह हमें खुशियाँ दे रही है। इसके विपरीत जब हम दुखी होते हैं तब मनन करने पर पता चलता है कि वस्तुत: जिसके लिए हम व्यथित हो रहे थे, वही हमारी प्रसन्नता का कारण है।
अपनी खुशियों को ग्रहण लगाना उचित नहीं है। यदि हम सभी अपने भीतर विद्यमान क्रोध को हवा दते रहेंगे तो हम स्वयं ही अपने पैर पर कुल्हाड़ी मारने का काम करेंगे। इस क्रोध से बड़ा मनुष्य का कोई और शत्रु नहीं है। वह मनुष्य के विवेक पर प्रहार करके उसे कुण्ठित करता है। क्रोध करना ऐसा है मानो एक गर्म कोयले को उठाकर किसी दूसरे पर फैंक दिया गया हो। दूसरे को तो वह बाद में जलाएगा लेकिन पहले तो वह आपना ही हाथ जलाएगा।
क्रोधी व्यक्ति को कोई दण्ड दे या न दे परन्तु उसका क्रोध स्वयं ही उसे सबसे अलग करके दण्ड दे देता है। अपनी इज्जत अपने हाथ में होती है। इसीलिए अनावश्यक क्रोध करने वाले से लोग दूरी बनाकर रखते हैं। उनका कोई भरोसा नहीं होता कि वे कब अनर्गल प्रलाप करते हुए सामने वाले का अपमान करने लगें।
जब तक मनुष्य जीवित है और वह साँस ले रहा है तब तक कदम-कदम पर उसे टकराव मिलता रहेगा, विरोध का सामना करना पड़ेगा। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि मनुष्य अपना आपा खोने लगे। ऐसा करके वह अनजाने में अपने शत्रुओं की संख्या में वृद्धि करता है। पीठ पीछे जो बोलते है उन्हें बोलने देना चाहिए। यदि कोई सामने बुराई करे तो उस पर विचार अवश्य करना चाहिए।
जिस प्रकार सूर्य और चन्द्रमा छिपाए नहीं छिप सकते, उसी तरह सत्य भी बहुत समय तक छिपाकर नहीं रखा जा सकता। जब सच्चाई सामने आती है तो वे झूठे लोग बगलें झाँकने लगते हैं। यदि मनुष्य सही रास्ते पर चल रहा है तो लोगों से देर-सवेर सम्मान और लगाव मिलता रहता है। यही उसकी पूँजी होती है।
इस क्रोध से मुक्ति पाना बहुत सरल है। इन्सान अपने हृदय में यदि शान्त रहने का अभ्यास कर ले तो इसे वश में किया जा सकता है अन्यथा दुर्वासा ऋषि की तरह कभी सम्मान नहीं पाता। शान्ति का वास हमारे अपने हृदय में होता है, उसे तीर्थों, जंगलों या तथाकथित गुरुओं के पास जाकर तलाशने का कोई लाभ नहीं होता। इसे बाहर ढूँढने से केवल धन और समय की बर्बादी होती है। फिर मन अशान्त हो जाता है।
हमारे अतिरिक्त हमें कोई और इस क्रोध रूपी शत्रु से नहीं बचा सकता। हमें अपने सही रास्ते का चुनाव करके स्वयं ही उस पर चलना पड़ता है। जबरदस्ती हाथ पकड़कर व्यक्ति को कोई दूसरा नहीं चला सकता।
जो बीत गया उसके बारे में अधिक नहीं सोचना चाहिए और न ही पिष्टपेषण करते हुए अनावश्यक क्रोध करना चाहिए। भविष्य के गर्भ मे क्या है? उसके विषय में सोचते हुए सुनहरे सपने नहीं देखने चाहिए। यदि किसी भी कारणवश वे सपने पूरे न हो सकें तो फिर मनुष्य को अपनी क्षमताओं पर क्रोध आने लगता है। केवल वर्तमान हमारा अपना है, उसी पर ध्यान केन्द्रित करके आगे बढ़ते रहना चाहिए।
आत्मकेन्द्रित बनकर सदा अपनी कमियों का सुधार करना चाहिए। अपने दोषों को इंगित करने वालों पर क्रोध न करके उनसे मिलने वाले प्रहारों से स्वयं को बचाते हुए जीवन की कठिन डगर पर बढ़ते रहना बुद्धिमानी होती है।
चन्द्र प्रभा सूद
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