शुक्रवार, 21 अगस्त 2026

टूटते तारे से विश मॉंगना

टूटते तारे से विश माँगना

हमारे मन में यह अवधारणा घर कर गई है कि जब टूटता हुआ तारा दिखाई दे तो उसी समय कोई विश माँग लो अथवा कामना करो तो वह पूरी हो जाती है। कहते हैं कि यह टूटता हुआ तारा है जो सब लोगों की मनोकामनाओं को पूर्ण करता है।‌ लोगों को लगता है कि इस विशेष पल में भगवान उनकी पुकार आसानी से सुन लेता है। शायद यह उम्मीद और सकारात्मक सोच का एक तरीका है। 
         मेरे विचार से इसका कारण शायद यही है कि उसे टूटने और अपने भाई-बन्धुओं से बिछुड़ने का दर्द ज्ञात होता है। तभी तो वह सब लोगों को उनके हिस्से की सारी खुशियाँ देना चाहता है।
            इसके विपरीत विज्ञान के अनुसार यह केवल अन्तरिक्ष में होने वाली एक प्राकृतिक घटना होती  है। वैज्ञानिकों का मानना है कि वास्तव में कोई तारा टूटता नहीं है। अन्तरिक्ष के धूल और पत्थर के टुकड़े पृथ्वी के वायुमंडल में आते हैं। हवा के साथ रगड़ खाने से इनमें चमक और आग पैदा होती है।
         प्राचीन यूनान के खगोलशास्त्री टॉलेमी ने माना था कि भगवान कभी-कभी आसमान से झॉंकते हैं और तारे नीचे गिर जाते हैं।
        कभी हम किसी उद्देश्य को लेकर चलते हैं और कभी निरुद्देश्य भटकते रहते हैं। जिन्दगी की कड़वी सच्चाई हमें तब ज्ञात होती है जब पेड़ों से टूटकर गिरे हुए फूलों ने अपनी व्यथा बताते हुए कहा कि दूसरों को खुशबू देने वाले प्रायः कुचल दिए जाते हैं।
        यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि जो निःस्वार्थ महापुरुष दुनिया का मार्गदर्शन करना चाहते हैं उन्हें स्वामी दयानन्द की तरह विषपान करना पड़ता है और ईसा की तरह सूली पर चढ़ जाना पड़ता है।फिर भी ये महानुभाव अपने साथ अत्याचार करने वालों को कोई सजा दिए बिना क्षमा करके अपनी सहृदयता और महानता का परिचय देते रहे हैं।
        हमारे परतन्त्र भारत देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्ति दिलवाने वाले रणबॉंकुरों ने उन विदेशियों के अत्याचारों का विरोध करने के लिए अपनी आहुति दे दी और हंसते-हंसते फॉंसी के फंदे का वरण कर लिया।        
        यदि कोई नजरअंदाज करता है तो निश्चिन्त रहिए, उसका बुरा मत मानिए। इस संसार में जो भी मूल्यवान लोग होते हैं, उन सब हीरों का सम्मान करने की बात यह जनसाधारण नहीं समझ सकता। इसी प्रकार मंहगी वस्तुएँ जो लोगों की पहुँच से बाहर होती हैं, उसे दूर की कौड़ी कहकर वे उन्हें नजरंअदाज कर देते हैं।
        जब अपनी गलती का पता लग जाए उसी समय क्षमा याचना कर लेनी चाहिए। साथ ही अपने दुष्कमों अथवा दुर्व्यसनों का अविलम्ब त्याग कर देना चाहिए। उसमें की गई देर कष्टदायक होती है। इसके पीछे सार यही है कि हम यात्रा करते हुए जितनी अधिक दूर चले जाते हैं, वापिस लौटने में हमें उतना ही अधिक समय लगता है। 
        इसमें बिल्कुल सन्देह नहीं है कि इस संसार में दूसरों पर हँसने के स्थान पर मनुष्य को स्वयं पर हँसते रहना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसा कर पाता है तो दुनिया उसके पीछे-पीछे चलने लगती है। अन्यथा दुखों और परेशानियों के कारण हर समय आँसू बहाते रहने वालों के आँसू सूख जाते हैं। फिर उन आँसुओं को मनुष्य की आँखो में भी जगह नहीं मिल पाती। यानी चाहकर भी व्यक्ति की आँखों में आँसू नहीं आते।
          जो भी अपने साथ अच्छा या बुरा हो रहा है, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर सन्तोष कर लेना चाहिए। उसके न्याय पर कभी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि वह सबसे बड़ा न्यायाधीश है। उसका न्याय बड़ा ही विचित्र होता है। वह स्वयं ही दुनिया में सन्तुलन बनाकर रखता है। 
          सयाने कहते हैं कि जब दाँत थे तो चबाने के लिए दाने खरीदने की सामर्थ्य नहीं थी और अब जब खाने के लिए दाँत नहीं हैं तो मनुष्य के पास दाने खरीदने की हैसियत हो गई है।
         इसी कड़ी में यह उदाहरण भी ले सकते हैं कि जो व्यक्ति हाड़तोड़ परिश्रम करता है और सौ-सौ किलो अनाज के बोरे उठा लेता हैं, उसके पास उसे खरीदने के लिए धन नहीं होता। इसके विपरीत जो नाजों से, शानो-शौकत में पला-बड़ा है, वह सौ किलो अनाज खरीद सकता है पर उसे उठा नहीं सकता।
        इसलिए कोई भी कार्य करने से पहले मनुष्य को दस बार उसके परिणाम के विषय में सोच लेना चाहिए। इस बार में कोई सन्देह नहीं है कि मनुष्य जैसी करनी करेगा, उसका भुगतान उसे वैसा ही करना पड़ेगा।
          इसीलिए मनीषी हम लोगों को सदैव यह सद् परामर्श देते हैं कि मनुष्य को अपने जीवन काल में ऐसे कर्म करने चाहिए कि मृत्यु के बाद इन्सान हँसते हुए इस दुनिया से विदा ले सके। समाज के अन्य लोग उसकी अच्छाइयों और सद् गुणों को याद करके रोते रहें।
चन्द्र प्रभा सूद

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