मनुष्य जीवन भर अपने खाने-पहनने की और अपनी स्वयं की सुध बिसराकर पैसे के पीछे दीवाना होकर भागता रहता है। वह भूल जाता है कि यह मृगतृष्णा उसे बस यहाँ-वहाँ भटकाती रहेगी और फिर कहीं का भी नहीं छोड़ेगी।
मनुष्य इस विषय पर कभी विचार ही नहीं करना चाहता कि इस संसार में क्या यह धन-दौलत किसी की अपनी बन पाई है? यह उसे क्या-क्या दे सकती है? उसके बदले में उससे क्या-क्या छीनने में सफल हो सकती है?
यह पैसा, यह धन-दौलत मनुष्य को मखमली बिस्तर दिलवा सकती है परन्तु प्रफुल्लतादायक अच्छी और गहरी नींद कभी नहीं दे सकती। इसी तरह यह दौलत भोजन तो दे सकती है पर भूख को दे पाना उसके बूते से बाहर है। व्यवहार में देखा जाए तो दौलत हमें पहनने के लिए अच्छे-से-अच्छे कपड़े खरीदकर दे सकती है परन्तु हमारे लिए सुन्दरता नहीं खरीद सकती। यह पैसा ऐशो-आराम के साधन दे सकता है परन्तु सुकून के दो पल हमारे लिए नहीं जुटा सकता।
इसी प्रकार धन-दौलत जिस पर हम इतना गर्व करते हैं वह हमें अच्छी-से-अच्छी चिकित्सा सुविधाएँ दे सकती है परन्तु अच्छा स्वास्थ्य अथवा जीवन खरीदकर नहीं दे सकती। बच्चों को यह बिगाड़ सकती है, उन्हें हठी व मानी बना सकती है पर सन्तान को आज्ञाकारी नहीं बना पाती। यह मनुष्य को ऐशो-आराम क साधन दे सकती है परन्तु सुख-सौभाग्य नहीं दे सकती। उसकी पसन्द के नाते-रिश्तेदार देना उसके बस की बात नहीं। ईश्वर ने जो नाते-रिश्तेदार दे दिए सो दे दिए। किसी से प्यार अथवा किसी का विश्वास आदि कुछ भी तो नहीं दिला सकती। यह मनुष्य के घर कुव्यसनों का डेरा बना सकती है पर उसे सन्मार्ग पर चलाने के लिए उसका हाथ नहीं थामती। उसे गर्त में गिरते देखती रहती है परन्तु उसे सम्भलने के लिए प्रेरित नहीं करती। अत: इस पर इतना इतराना या मान करना उचित नहीं है।
हम यह भी जानते हैं कि यह माया बहुत ही चंचल है, ठगिनी है। हमारे विवेक को भ्रमित कर देती है। यह दौलत भले-चंगे इन्सान को अपने जाल में फंसाकर उसे भ्रष्ट बना देती है। उसे अपनों से दूर अकेला कर देने का षडयन्त्र करती रहती है। जब वह अपने उद्देश्य में सफल हो जाती है तब धत्ता बताकर चल देती है।
कहने का तात्पर्य यही है कि जब मनुष्य उसके मायाजाल में पूरी तरह उलझ जाता है तब उसे ठोकर मार देती है तथा इठलाते हुए शान से किसी और के पास चली जाती है। बेचारे मनुष्य को तो पता भी नहीं चलता और उसका सब कुछ लुट जाता है और वह नष्ट हो जाता है। वह कंगाल बनकर अपने दुर्भाग्य को कोसता रहता है। मनुष्य उसके हाथ की कठपुतली बना बस सोचता ही रह जाता है कि यह सब कैसे हो गया? क्यों हो गया?
वह है कि मुस्कुराते हुए दूर खड़ी होकर उसकी इस बर्बादी का आनन्द लेती रहती है। पलक झपकते ही यह माया राजा को रंक बना देती है और रंक को राजा के सिंहासन पर विराजमान कर देती है। इसके खेल बहुत निराले हैं जो आम आदमी की समझ से बाहर हैं।
इसलिए सयाने कहते हैं कि पैसा हाथ का मैल है। इस पर गर्व नहीं करना चाहिए। किसी को कलम पकड़ाकर वारा न्यारा कर देती है। दूसरी ओर हाड़तोड़ मेहनत करने वाले से जीवन भर आँख मिचौली का खेल खेलती रहती है। इसकी आशा में संसार में आया हुआ मनुष्य अपने जीवन से हार जाता है।
इस धन-दौलत पर घमण्ड न करके इसे देश, धर्म और समाज के हित के लिए खर्च करना चाहिए। घर-परिवार के सभी सदस्यो को भौतिक सुख-सुविधाएँ प्रदान करते हुए इसे परोपकार के कार्यों में लगा देना चाहिए। समय पर यथोचित दान देने में ही इस धन-दौलत की सार्थकता है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 6 फ़रवरी 2016
दौलत की मृगतृष्णा
शुक्रवार, 5 फ़रवरी 2016
बच्चों को संस्कार
अपनी आने वाली नई पीढ़ी को संस्कारित करना हम सभी का दायित्व होता है। यदि सभी माता-पिता यह दायित्व पूरी तरह निभा पाएँ तो हमारी आने वाली पीढ़ी अपने सस्कारों को, अपनी मर्यादाओं को भली-भाँति समझेगी और उनका पालन अवश्य करेगी। आने वाली समझदार पीढ़ी कभी अपनी राह से नहीं भटकेगी।
छोटे बच्चे गीली मिट्टी की तरह होते हैं, उन्हें जैसा आकार हम देना चाहेंगे वे वैसे ही बन जाएँगे। हम देखते हैं कि कुम्हार बड़ी ही लगन से गीली मिट्टी से मनचाहे रूप-रंग देकर अनेक सुन्दर वस्तुएँ गढ़ता है। उन्हें हम देखते हैं और उनकी प्रशंसा करते नही थकते। हम उनको खरीदकर अपने घर की शोभा बढ़ाते हैं। उसी तरह माता-पिता के संस्कारों का प्रभाव बच्चों के जीवन से प्रत्यक्ष झलकता है।
किसान हल जोतकर खेत तैयार करणा है और उसमें बीज बोता है। उस खेत में यदि समय पर वर्षा न हो तो फसल तबाह हो जाती है। किसान का नुकसान तो उससे होता ही है और साथ ही देश में खाद्यान्न का अभाव भी हो जाता है।
यदि बच्चों को समय रहते संस्कार न दिए जाएँ तो वे बिगड़ जाते हैं। इसलिए समाज उन माता-पिता का तिरस्कार करता है। ऐसे संस्कारहीन बच्चे भी अपने माता-पिता के लिए भी जीवन भर का अभिशाप बन जाते हैं। समाज में कभी उन्हें यथोचित सम्मान भी नहीं मिलता।
अच्छे संस्कारों से वंचित रहने वाले बच्चे हठी, मनमानी करने वाले, उद्दण्ड और छोटे-बड़े किसी का लिहाज न करने वाले होते हैं। ऐसे बच्चों को कोई भी पसन्द नहीं करता। उनसे दोस्ती करना भी बुरा माना जाता है। अपने घर में भी उन्हें कोई बुलाना नहीं चाहता। इसका कारण लोगों के मन में एक डर रहता है कि वे उनके घर पर आकर तोड़फोड़ या उठापटक करेंगे। उसे अस्त-व्यस्त कर देंगे और मना करने पर वे सभी लोगों के साथ अभद्र व्यवहार करेंगे जिसका कुप्रभाव उनके अपने बच्चों पर पड़ सकता है।
अपने बच्चों को सद्संस्कार देना हर माता-पिता का नैतिक कर्त्तव्य होता है। यदि अपने अहंकारवश अथवा आपसी वैमनस्य के कारण इस महत्त्वपूर्ण दायित्व को निभाने से वे चूक जाते हैं तो अपने और अपने बच्चों के दुर्भाग्य के लिए वे स्वयं ही जिम्मेदार कहलाते हैं।
ऐसे माता-पिता अपने बच्चों का जीवन बरबाद करने के लिए वास्तव में उनके शत्रु कहलाते हैं। बड़े होकर बच्चे जब उन्हें दोष देते हैं तब उन्हें अपार कष्ट होता है। उस समय अपने उन ऐसे बच्चों को दोष देते रहना अथवा दुत्कारना समझदारी नहीं कहलाती। समय रहते यदि सावधानी बरती होती तो बाद में पश्चाताप करने की आवश्यकता न पड़ती।
एक ही कार्य हो सकता है, चाहे तो बच्चों को संस्कारी बनाकर घर, परिवार, समाज और देश का सबल स्तम्भ बनाएँ अथवा अपने सुख-आराम को सर्वोपरि मानकर बच्चों संस्कार न देकर उनका भविष्य बिगाड़ दें। बच्चे चाहे कहें या न कहें पर घर में होने वाली सभी गतिविधियों को बड़ी बारीकी से देखते हैं। उन सबका असर भी बच्चों के कोमल मन पर गहराई से पड़ता है जिसका प्रभाव आजीवन रहता है। उसी के अनुरूप वे सबके बारे में अपनी राय बना लेते हैं।
घर के सभी सदस्यों को छोटों और बड़ों के साथ मर्यादित व्यवहार करना चाहिए।
संस्कार कोई ऐसा खिलौना नहीं है जिसे धन के मद में चूर माता-पिता बाजार से खरीदकर बच्चे को सौंप सकें। उसके लिए माता और पिता को कठिन तपस्या करनी पड़ती है। उन्हें तथा परिवार के अन्य सदस्यों को अपने आचार-व्यवहार की शुद्धता पर ध्यान देना पड़ता है, तब जाकर बच्चे संस्कारवान बनते हैं। बड़े होकर माता-पिता का नाम रौशन करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 4 फ़रवरी 2016
सज्जन दीपक की तरह
सज्जनों या महापुरुषों का जीवन दीपक की तरह होता है जो अपना सब सुख-चैन किनारे करके दिन-रात दूसरों के जीवन में प्रकाश करते रहते हैं। किसी के जीवन को प्रकाशित करने वाला मनुष्य हमेशा महान कहलाता है।
दीपक सदा अंधकार को दूर करके प्रकाश करता है। ऐसा करके दीपक को तो कुछ नहीं मिलता। उसका जलना उसकी प्रकृति है जो महत्त्वपूर्ण होती है। कितने भी आँधी-तूफान आ जाएँ, दीपक की लौ थरथरा सकती है परन्तु वह बुझता नहीं है। स्वयं को कष्ट देकर भी वह दूसरों का हित करता है, प्रकाश देता है। यही उस छोटे से दीपक की विशेषता होती है जो उसे अन्य पदार्थों से विशेष बना देती है।
छोटे से दीपक का जीवन इसलिए महान अथवा पूज्य नहीं होता कि वह जलता रहता है अपितु इसलिए वन्दनीय होता है कि निस्वार्थ भाव से दूसरों के लिए जलता है। ऐसा कार्य विरले ही कर सकते हैं। अपनी जलने की पीड़ा को अनदेखा करते हुए वह महान परोपकार करता है।
सोचने की बात यह है कि दीपक जैसी छोटी-सी वस्तु जब ऐसा महान कार्य कर सकती है तो हम मनुष्य क्यों पीछे रह जाते हैं?
इसका कारण है हमारा स्वार्थ। वह हमें अपना कदम पीछे लौटा ले जाने के लिए विवश कर देता है। हम अपने घर-परिवार तक सीमित होते जा रहे हैं। हमारी संवेदनाएँ शायद शून्य होती जा रही हैं। बहुधा अपनी समस्याओं के चलते चाहकर भी हम दूसरों के बारे में सोच नहीं पाते। इसीलिए हम जरूरतमन्दों का सान्त्वना नहीं दे पाते।
परोपकारी जीव अपने जीवन में आने वाली कठिनाइयों को अनदेखा करके भी दूसरों के प्रति चिन्तित रहते हैं, उनके कष्टों को दूर करने का उपाय करते हैं। जहाँ तक हो सके उनका सम्बल बनते हैं। उनका एकमात्र ध्येय दूसरों के प्रति सहानुभूति का भाव रखना होता है।
परोपकारी सज्जन जो भी इस ब्रह्माण्ड से लेते है, उसे भलाई के कार्यो में लगा देते हैं। उनके अपने पास कुछ बचे या नहीं वे अपने इस महान उद्देश्य से पीछे नहीं हटते। तन, मन और धन से वह माता प्रकृति की तरह सभी जीवों पर उपकार करते हैं।
इनके पास जो भी व्यक्ति अपनी कोई भी समस्या लेकर आते हैं, उसका समाधान निकालकर उनकी सहायता करते हैं। ये सभी के विश्वासपात्र होते हैं। कैसी भी समस्या व्यक्ति के जीवन में आ जाए, इनके साथ बिना हिचकिचाए साझा की जा सकती है। इनका हृदय इतना विशाल और गम्भीर होता है कि वे अपने भीतर सागर की तरह सब कुछ समेट लेते हैं। किसी के भी रहस्य को दूसरों के समक्ष किसी भी स्थिति में चटखारे लेकर न सुनाना उनका स्वभाव होता है।
उनके साथ कोई कैसा भी व्यवहार क्यों न करे, वे किसी का भी तिरस्कार नहीं करते हैं। वे अपने अथवा पराए सभी लोगों का खुले दिल से स्वागत करते हैं क्योंकि उनकी नजर में कोई भी पराया नहीं होता। वे प्राणिमात्र को अपना समझते हैं।
हर रिश्ते का सम्मान करना उनका स्वभाव होता है। छोटे-बड़े, ऊँच-नीच, रंग-रूप, जात-पात आदि किसी भी कारण से भेदभाव करना उनकी प्रकृति में नहीं होता। सभी के साथ समानता और अपनेपन का व्यवहार करते हैं। किसी का अहित करने के विषय में वे स्वप्न में भी नहीं सोचते।
ऐसे महत् जन ही संसार के दीपक होते हैं। सबका हित साधने वाले महापुरुष देश, धर्म और समाज के अमूल्य रत्न होते हैं जो इतिहास में अमर हो जाते हैं। युगों तक उनकी चर्चाएँ होती रहती हैं। इन्हें सहेजकर रखना सबका दायित्व होता है। जिस मार्ग पर ये चलते हैं, वही आने वाली पीढ़ियों का रास्ता बन जाता है। उस पथ का अनुसरण करके अपने जीवन को धन्य बना सकते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 3 फ़रवरी 2016
मानव मन की सोच
मानव मन की सोच जैसी होती है उसे यह संसार वैसा ही दिखाई देता है। यदि उसकी सोच का दायरा विस्तृत होगा यानि वह अच्छी, भली अथवा सुन्दर होगी तो उसे सारा संसार अच्छा, भला और सुन्दर नजर आएगा अन्यथा मन के भावों के विपरीत होने पर सब बदसूरत दिखाई देता है। उस बदसूरती में उसे अच्छाई कम और बुराई अधिक दिखेगी। तब उसे यह संसार रहने लायक नहीं प्रतीत होगा।
मनुष्य के मन में जब खुशी अथवा उल्लास होता है तब वह चाहता है कि हर व्यक्ति उसके साथ उसकी खुशी बाँटे और उसमें शामिल हो। उस समय उसे सारी कायनात अपनी तरह प्रसन्न प्रतीत होती है। उसे लगता है कि सारी प्रकृति उसका साथ दे रही है। उसके साथ रो रही है, हँस रही है, नाच-गा रही है अथवा चारों ओर अपनी खुशबू बिखेर रही है।
इसके विपरीत जब वह दुखों और परेशानियों से घिरा होता है तो उसे लगता है कि सारा जमाना उसका दुश्मन हो गया है। ईश्वर भी उससे नाराज होकर परेशान कर रहा है। सारी प्रकृति उसे उदास और बदरंग दिखाई देती है। उस समय उसे ऐसा लगता है मानो उसके साथ ही वह उत्साह रहित हो गई है।
मनुष्य के मन में ईर्ष्या, द्वेष, घृणा आदि भाव होते हैं तो उसे चारों ओर नफरत का व्यापार होता दिखाई देता है। तब उसे लगने लगता है कि आपसी भाईचारा सब खत्म हो गया है और सभी एक-दूसरे की टाँग खींचने में लगे हुए हैं। परस्पर नफरत के कारण कोई किसी को आगे बढ़ते हुए नहीं देखना चाहता, सबका खून सफेद हो गया है।
क्रोधित होने पर वह दुनिया को आग लगा देना चाहता है। मन में प्यार का भाव आने पर सभी उसे अपने लगने लगते हैं। उसे लगता है यह संसार मानो प्यार का सागर है जिसमें नहाकर सभी सराबोर हो रहे हैं। सब कुछ अच्छा और भला प्रतीत होता है। वह स्वयं भी सबसे प्रेम से मिल-जुलकर रहना चाहता है।
चोर को सभी लोग चोर दिखते हैं। हेराफेरी व चालबाजी करने वाले को सभी हेराफेरी करने वाले और चालबाज दिखाई देते हैं। भ्रष्टाचारी, चोरबाजारी करने वाले को सब भ्रष्ट लगते हैं।
सरल व सहज स्वभाव वालों को सभी सरल और सीधे लगते हैं। सज्जनों को सब सज्जन लगते हैं और मूर्खों को सब मूर्ख। पागल पूरी दुनिया को ही पागल समझते हैं। वीरों के लिए सभी वीर होते हैं और कायरों के लिए सब कायर होते हैं। सच्चे लोगों को सब सच्चे और झूठों को सब झूठे लगते हैं। इसीलिए असत्यवादी किसी पर विश्वास नहीं करते।
रैदास जी ने कहा था-
मन चंगा तो कठौती में गंगा।
अर्थात् यदि मन शुद्ध पवित्र हो तो उनके पास जो कठौती है, उसमें रखा हुआ पानी गंगाजल हो सकता है।
तुलसीदास जी ने भी मन के इन्हीं भावों के विषय में कहा था-
जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।
अर्थात् जैसी मनुष्य की भावना होती है उसे ईश्वर उसी रूप में दिखाई देता है।
तुलसीदास जी के कथन के अनुसार यदि हम विश्लेषण करें तो मनुष्य के मन के भावों के अनुसार ही उसे संसार और संसार के लोग दिखाई देते हैं।
इन सबसे अलग हटकर अन्य जीवों के विषय में देखें तो कह सकते हैं कि पशु-पक्षी आदि अन्य जीव भी प्रेम, घृणा और हिंसा की भावना समझते हैं। प्रेम की बदौलत शेर जैसे खूँखार, हाथी जैसे शक्तिशाली और साँप जैसे जहरीले जीव पालतू बनाए जा सकते हैं।
हम सार रूप में यही कह सकते हैं कि हमारे अन्तस् के भावों का प्रभाव दूसरे के ऊपर पड़ता है और उसी के अनुसार वे व्यवहार करते हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016
इन्सान का स्वभाव
इन्सान के स्वभाव की यह विशेषता है कि वह स्वयं को हर परिस्थिति के अनुसार ढाल लेता है। उसके हालात कैसे भी क्यों न हों वह डटकर उनका सामना करता है। पीठ दिखाकर भाग जाना उसकी प्रकृति में नहीं होता है। कुछ अपवाद यहाँ अवश्य मिल सकते हैं।
मनुष्य मौसम की तरह ही पल-पल बदलता रहता है। कभी वह क्रोधित होता है तो कभी प्यार करता है। इसी तरह कभी वह अकेला रहना चाहता है तो कभी सबके साथ मिलकर, नाच-गाकर सदा मस्त रहना चाहता है। ईर्ष्या, राग, द्वेष, घृणा, प्रेम, क्रूरता, वात्सल्य, करुणा आदि भाव उसे नया-नया रूप देते रहते हैं। यही कारण है कि कभी हमें ऐसा लगने लगता है कि इस व्यक्ति विशेष से बढ़कर हमारा अपना कोई और नहीं है परन्तु कभी वही हमें अजनबी-सा प्रतीत होता है।
मानव स्वभाव का यह नित्यप्रति परिवर्तन उसकी तत्कालीन परिस्थियों पर निर्भर करता है। जीवन के हालात उसके मानस को झकझोरते रहते हैं। इसीलिए कभी-कभी वह एक सामान्य-सा इन्सान प्रतीत होता है। यही समय होता है जब वह हमारा अपना होता है। उस समय वह धरातल पर रहता हुआ दूसरों के दुख-दर्द को समझने वाला होता है। उस समय घर-परिवारी जनों और भाई-बन्धुओं के साथ उसके मधुर सम्बन्ध होते हैं। सभी मिल-जुलकर अपने जीवन को प्रसन्नतापूर्वक चलाते हैं।
इसके विपरीत कभी असामान्य स्थितियों के चलते वही व्यक्ति हमें अपनी पहुँच से बहुत दूर दिखाई देता है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं होता कि वह हमसे रूठा हुआ है या बहुत घमण्डी हो गया है। हो सकता वह अपने घर, परिवार अथवा कार्यक्षेत्र की किसी परेशानी में उलझा हुआ हो। इसके अतिरिक्त उसे कोई शरीरिक या मानसिक पीड़ा भी हो सकती है। इनमें से कोई भी कारण उसके अनमनेपन का हो सकता है। शायद तभी वह इस प्रकार का विचित्र व्यवहार कर रहा हो।
मनुष्य के जीवन में समयानुसार सुख-दुख, लाभ-हानि, जय-पराजय आदि स्थितियाँ आती रहती हैं। यही सब उसके स्वभाव या मूड परिवर्तन का कारण बन जाते हैं। उसके नित्य आचरण में इन सबका प्रभाव हो जाना स्वाभाविक होता है।
जब वह प्रसन्न होता है और अपने जीवन से सन्तुष्ट होता है, तब उसका व्यवहार संतुलित होता है। उस समय वह सारे अपनों की खुशियों के लिए जीता है। सबको साथ लेकर चलने की बातें करने लगता है। घर-परिवार और बन्धु-बान्धवों में सामञ्जस्य बनाते हुए उनके साथ समय व्यतीत करता है। सब लोग उसकी तारीफ करते नहीं थकते।
परन्तु जब वह स्वयं कष्ट में होता है तब वह अपने जीवन से उदासीन हो जाता है। ऐसे निरुत्साहित व्यक्ति को सबसे अलग-थलग एकान्त में रहना रुचिकर लगता है। कोई भी आवाज उसे चिड़चिड़ा बना देती है। जब उसके मन में अवसाद हो जाता है तब संसार के हर किसी व्यक्ति से अथवा हर क्रिया कलाप से उसका मोहभंग हो जाता है और उसे सबसे घृणा होने लगती है।
वह स्वयं को दुनिया का सबसे अधिक दुर्भाग्यहीन व्यक्ति मानने लगता है। वह सोचता है कि वह इस पृथ्वी पर भार है। उसकी जरूरत न अपनों को है और न किसी को है। इस तरह वह मायूसी में घिरता चला जाता है।
इस प्रकार अपने अस्थिर स्वभाव के कारण मनुष्य का स्थान सबके हृदयों में बदलता रहता है। अपने ऊपर नियन्त्रण रखते हुए अन्तस के भावों को प्रकट नहीं होने देना चाहिए। यत्न यही करना चाहिए कि हमारे कारण किसी दूसरे को किसी तरह की परेशानी न हो।
चन्द्र प्रभा सूद
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सोमवार, 1 फ़रवरी 2016
बेटे और बेटी में अन्तर
बेटी और बेटे में लिंगभेद का भाव उनके पैदा होने से ही आरम्भ हो जाता है। यद्यपि एक ही माता-पिता की दोनों ही सन्तान होते हैं और एक ही कोख से उनका जन्म होता है। फिर भी यह भेदभाव युक्त व्यवहार प्रायः हर घर में देखने को मिलता है।
कहने और सुनने में यह बहुत अच्छा लगता है कि हमारे घर में बेटी व बेटे दोनों के साथ एक जैसा व्यवहार किया जाता है। यह सच है कि बहुत से माता-पिता आज दोनों की पढ़ाई-लिखाई के विषय में सोचने लगे हैं। उन्हें समान सुख-सुविधाएँ भी दी जाने लगी हैं। दोनों के खान-पान और रहन-सहन में भी आजादी दी जा रही है।
उन घरों की लड़कियाँ उच्च शिक्षा ग्रहण करके उच्च पदों पर आसीन हैं। ज्ञान, विज्ञान, राजनीति, साहित्य, व्यापार आदि हर क्षेत्र में वह अग्रणी बन रही हैं। यही कारण है कि वे हर क्षेत्र अपने झण्डे गाढ़ रही हैं। भारत की पूर्व प्रधानमन्त्री श्रीमति इन्दिरा गाधी और राष्ट्रपति श्रीमति प्रतिभा पाटिल से हम सभी परिचचित हैं। अपने क्षेत्र की आधुनिक सफल महिलाओं लता मंगेशकर, कल्पना चावला, इन्दिरा नूई आदि को भी नहीं भूल सकते।
प्रश्न यह है कि ऐसे लोग कितने हैं जिनकी सोच का ऐसा विस्तृत दायरा है? मेरे विचार में इनका प्रतिशत आज भी बहुत कम है।
बहुत से माता-पिता लड़के और लड़की के खाने-पीने, सोने-जागने, हँसने-खेलने आदि में भी अन्तर करते हैं। जो अच्छा, पौष्टिक व स्वास्थ्यवर्धक खाद्य हैं वे बेटे को दिए जाते हैं, बेटी को नहीं। इस कारण उनमें पौष्टिकता की कमी हो जाने से एनिमिया आदि कई रोग होते हैं।
लड़का देर तक सोए और घर या बाहर का कोई भी काम न करे तब भी उसके लाड़ लड़ाए जाते हैं। दूसरी ओर लड़की से आशा की जाती है कि वह सवेरे उठकर घर के काम-काज में हाथ बटाए। हर खेल लड़का खेल सकता है और कितना भी समय वह घर से बाहर रह सकता है परन्तु लड़की के लिए यहाँ भी बन्धन रहता है। कुछ ही खेल खेलने की उसे आज्ञा मिलती है और घर से बाहर अधिक समय रहने की उसे आज्ञा नहीं मिलती। लड़की को जोर से बोलने अथवा हँसने पर यह कहकर टोक दिया जाता है कि उसे पराए घर जाना है। इसलिए उसका व्यवहार सदा संयमित होना चाहिए। लड़कों को यहाँ भी छूट दे दी जाती है।
पैदा होने के बाद वह होश सम्भालती है तभी से उसे यह घुट्टी में पिलाया जाता है कि उसे अपने बाबुल का यह घर छोड़कर ससुराल जाना है। उसे घरेलू कार्यों, सिलाई, कढ़ाई, बुनाई आदि में दक्ष होना चाहिए। उसका ऊँचा बोलना, जिद करना आदि अनुचित कार्य हैं। उसे उच्च शिक्षा दिलाने में आज भी बहुत से माता-पिता आनाकानी करते हैं। बहुत से माता-पिता उसे नौकरी भी नहीं करने देते।
वह अपने भाई के साथ बराबरी के व्यवहार की माँग नहीं कर सकती। दोनों यदि कहीं से आते है तो लड़की से ही अपेक्षा की जाती है कि आराम न करके भाई को चाय-पानी लाकर दे। वह नवाब बना खुद होकर पानी का गिलास भी न ले। ऐसे व्यवहार लड़की के मन को तार-तार कर देते हैं। उसे लगने लगता है कि सारे बन्धन उसी के लिए हैं। उसे क्यों लड़की का यह जन्म ईश्वर ने दिया है।
धार्मिक स्थलों पर उसके प्रवेश का मुद्दा आजकल सुर्खियों में है जो बहुत ही गरमाया हुआ है। आज इक्कीसवीं सदी में हम जी रहे है। फिर भी यह बेटे और बेटी के लिए व्यवहार में यह भेदभाव समझ में नहीं आता जो कन्या भ्रूण को गर्भ में ही नष्ट करा देता है। संवैधानिक रूप से उसे माता-पिता की सम्पत्ति में अधिकार प्राप्त है। फिर भी प्राय: उसे वंचित रखा जाता है। बेटे को ही सब कुछ सौंप दिया जाता है चाहे वह उस योग्य हो या नहीं। यदि कोई बहन विरोध करे तो उसे तिरस्कृत किया जाता है।
आज एकल परिवारों के चलते समय और परिस्थितियों की माँग है कि दोनों को ही घर-बाहर के कार्यों में दक्ष होना चाहिए। बिना पूर्वाग्रह के दोनों के लिए समानता का व्यवहार अपेक्षित है। बेटियों को यदि समान अवसर दिए जाएँ तो निस्सन्देह वे हर क्षेत्र में चमत्कार कर सकती हैं।
चन्द्र प्रभा सूद
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