गुरुवार, 25 अगस्त 2016

सकारात्मक सोच अपनाएँ

अपने द्वारा निर्धारित लक्ष्य पर पहुँचने के मनुष्य यदि लिए कटिबद्ध हो गया हो तब उसे नकारात्मक लोगों की निराशाजनक बातों की ओर कदापि ध्यान नहीं देना चाहिए। उनके सामने उसे बहरा अथवा मूर्ख बन जाने का ढोंग करना चाहिए। तब फिर उन्हें अनदेखा करके उसे अपने लक्ष्य का संधान कर लेना चाहिए।
         ये निराशावादी लोग कभी किसी को प्रोत्साहित कर ही नहीं सकते। इनके हर कार्य के साथ किन्तु, परन्तु जुड़ा रहता है। हर कार्य में सफलता या लाभ के विषय में न सोचकर ये हर समय असफलताओं की लम्बी लिस्ट लेकर बैठ जाते हैं। ये लोग हर समय रोते-झींकते रहते हैं। परेशानियों के साथ इनका चोली-दामन का साथ रहता है जिसे छोड़ना नहीं चाहते बल्कि जबरदस्ती गले गलाते हैं।
        इसीलिए न ये स्वयं कोई साहसिक कार्य कर सकते हैं और न किसी दूसरे को करने देना चाहते हैं। सबको हतोत्साहित करके बस अपने दायित्व को पूरा कर लेते हैं। यही कारण है कि जीवन में सफलता इनके आगे-आगे भागती रहती है और ये उसे पाने के लिए उसके पीछे भरसक दौड़ लगाते रहते हैं।
        साहसी मनुष्य को चाहिए कि जब भी वह किसी कार्य करने के बारे में ठोस योजना बनाए तब सकारात्मक विचार वाले सज्जनों से परामर्श ले। उनकी मूल्यवान सोच कभी उसे डूबने नहीं देगी। वे सदा ऐसी सलाह देंगे जिससे  दूसरों की उन्नति होती रहे।
         एक बोध कथा की यहाँ चर्चा करना चाहती हूँ। एक मेंढक ने पेड़ की चोटी पर चढ़ने के विषय में विचार किया और फिर वह आगे बढ़ने लगता है। उसे उस पेड़ पर चढ़ता देखकर बाकी के सारे मेंढक शोर मचाने लगते हैं- "ये असंभव कार्य है आज तक कोई भी मेंढक पेड़ पर नहीं चढ़ सका। यह नहीं हो सकता है, तुम पेड़ पर नहीं चढ़ पाओगे। इसलिए अच्छा यही है कि तुम लौटकर वापिस आ जाओ।" मेंढक का संकल्प और दृढ़ निश्चय रंग लाया और आखिरकार वह पेड़ की चोटी पर पहुँच ही जाता है।
         इसका कारण यही है कि वह मेंढक बहरा होता है और अपने साथियों की बात नहीं सुन सका। सारे मेंढकों को चिल्लाते हुए देखकर उसने अपने मन में यही सोचा कि आज वह एक आश्चर्यजनक और ऐतिहासिक कार्य करने जा रहा है। उसके सभी साथी उसका उत्साह बढ़ा रहे हैं। इससे वह और अधिक जोश से भर जाता है और अन्ततः अथक संघर्ष करते हुए असम्भव कार्य को कर गुजरता है।
         यह बोधकथा हमें यही सिखाती है कि मनुष्य चाहे तो क्या नहीं कर सकता?  उसकी संकल्पशक्ति दृढ होनी चाहिए जो किसी भी परिस्थिति में डाँवाडोल नहीं होनी चाहिए। इस दृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर वह अनेकानेक साहसिक कार्य कर लेता है।
          वे कार्य कोई भी हो सकते हैं- चाहे आकाश को नापना हो, ग्रह-नक्षत्रों आदि की जानकारी जुटाना हो, ऊँचे पर्वतों का सीना चीरकर सुविधाजनक यातायात के लिए रेल या सड़क मार्ग बनाना हो, समुद्र पर पुल बनाना या जहाज चलाना हो, हिमालय की चढ़ाई करनी हो अथवा फिर खूँखार जंगली जानवरों को वश में करना हो।
         कैसा भी कठिन या असम्भव कार्य हो वे मानो चुटकी बजाते ही कर लेते हैं। वे मुसीबतों से कभी घबराते नहीं हैं। तभी तो सच्चे पराक्रमी कहलाते हैं। सकारात्मक सोच वाले यही लोग इतिहास रचते हैं और उन हैरतअँगेज कारनामों को आने वाली पीढ़ियाँ पढ़ती हैं। उनमें से भी कुछ लोग उन्हीं के पदचिह्नों का अनुगमन करते हुए धारा के विपरीत चलते हुए इतिहास में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाते हैं।
         इसीलिए मनीषियों का सद्परामर्श सभी सकारात्मक सोच वालों के लिए है कि  यत्नपूर्वक नकारात्मक सोच वालों से किनारा कर लेना चाहिए। उनके विचारों को सुनने की यदि मजबूरी सामने आ जाए तो उसे अनसुना करते हुए आगे बढ़ते चलो।
चन्द्र प्रभा सूद
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बुधवार, 24 अगस्त 2016

ज्ञान, धन व विश्वास

ज्ञान, धन और विश्वास इन तीनों का मनुष्य के जीवन में बहुत महत्त्व है। इनके बिना मनुष्य का कोई मूल्य नहीं होता। ये तीनों वास्तव में उसके प्रिय और सच्चे मित्र हैं जो चौबीसों घण्टे उसके साथ ही रहते हैं। ज्ञान उसका मार्गदर्शन करता रहता है, धन उसकी दैनन्दिन आवश्यकताओं को पूर्ण करता है और उसकी विश्वास की पूँजी हर कदम पर उसकी सहायक बनती है।
          यदि इन तीनों के विषय में विचार करें और ढूँढने लगें तो सोचिए ये हमें कहाँ मिलेंगे?
        आज की परिस्थितियों में यह ज्ञान धार्मिक स्थलों और विद्या का मन्दिर कहे जाने वाले स्कूलों में मिलता है जहाँ इसका व्यापार किया जाता है। धर्म स्थलों में धर्म के ठेकेदार अपने ज्ञान का दुरूपयोग करते हुए जन साधारण को गुमराह करते हैं। उन्हें धर्म के नाम पर बाँटते हैं और मारकाट करवाते हैं। अपने विरोध में सिर उठाने वालों पर अत्याचार करते हैं और समाज में अनाचार फैलाते हैं। लोगों को अपरिग्रह का पाठ पढ़ाने वाले तथाकथित ज्ञानी विद्वान समाज को उल्लू बनाकर अपना स्वार्थ सिद्ध करते रहते हैं।
          बच्चों को विद्यालय में स्कूली शिक्षा यानी किताबी ज्ञान ही मिल सकता है। मोटी डोनेशन लेकर जहाँ दाखिला दिया जाता है और मोटी फीस लेकर पढ़ाई कराई जाती है, उन विद्यालयों और कालेजों में पढ़ने वाले छात्र सदा ही नियम-कानून को धत्ता दिखाते हैं। अपने अध्यापकों का भी सम्मान नहीं करते। व्यापारी मैनेजमेन्ट लूट-खसौट करने पर लगी रहती है और शिक्षक अपने व्यवसाय के प्रति दृढ़प्रतिज्ञ नहीं हैं। वे भी सदा अपना हितसाधक बने रहते हैं।
        ऐसे ज्ञान का दुरूपयोग किया जा रहा है जो मनुष्य का इहलोक और परलोक दोनों को संवारता है। यह सब हर संवेदनशील व्यक्ति को पीड़ा देता है।
         धन प्रायः उन अमीरों के पास मिलता है जो हर तरह की जुगत भिड़ाते रहते हैं। इसके लिए वे ईमानदारी, सच्चाई और नियम-कानून को ताक पर रख देते हैं। वे चोरबाजारी, भ्रष्टाचारी, रिश्वतखोरी, धोखाधड़ी आदि को प्रश्रय देते हैं। इस क्रम में यदि किसी की पीठ मे छुरा घोंपना पड़े या जिस सीढ़ी से ऊपर चढ़े हैं उसे ठोकर मारकर गिराना पड़े तो वे कदापि परहेज नहीं करते। उनका उद्देश्य मात्र धन कमाना होता है और कुछ नहीं। जबकि यह धन केवल भौतिक सुख-सुविधाएँ खरीद सकता है परन्तु स्वास्थ्य, शान्ति, संस्कारी या आज्ञाकारी सन्तान, सहृदय बन्धु-बान्धव, रिश्तों में परस्पर विश्वास आदि को जीवन में नहीं खरीद सकता।
         विश्वास मनुष्य के लिए बहुत ही महत्त्वपूर्ण होता है। एक बार यदि यह जीवन से निकल गया तो फिर कभी वापिस नहीं लौटता। आज के भौतिक युग में मानो विश्वास बेचारा तोड़ने के लिए ही होता है। हर रिश्ते को निभाने के लिए विश्वास बहुत आवश्यक होता है जिसका मान नहीं रखा जाता।
         आज बहुत से भाई, बहन, माता, पिता, पति, पत्नी, मित्र, पड़ौसी, नेता, अभिनेता एक-दूसरे के साथ विश्वासघात करने में परहेज नहीं कर रहे। वे तो दूसरे की आँख में धूल झौंककर बड़े खुश होते हैं। वचनबद्धता तो उनके लिए एक प्रकार से खिलवाड़ बनती जा रही है।
        मनुष्य किसी का विश्वास तोड़ता है अथवा कोई अन्य उसका विश्वास खण्डित करता है तो दोनों ही स्थितियों में उसे पुनः जमा पाना बहुत कठिन हो जाता है। यह विश्वास काँच की तरह होता है जो एक बार टूटकर बिखर जाता है तो उसे समेटना मुश्किल हो जाता है।
         ज्ञान, धन और विश्वास मनुष्य के परम मित्र हैं किन्तु जहाँ सावधानी हटी वहीं दुर्घटना घट जाती है। यानी मनुष्य को उसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। इन तीनों के भरोसे मनुष्य चमत्कार करता है। समाज में अपना स्थान बनाता है। इनमें से किसी की भी कमी उसको सबकी नजरों से गिरा देती है। तब वह हीरे सा मूल्यवान होते हुए भी सबकी नजरों मे काँच की तरह बेकार हो जाता है जिसे फैंकने में परहेज नहीं किया जाता।
चन्द्र प्रभा सूद
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मंगलवार, 23 अगस्त 2016

सुनो अधिक बोलो काम

ईश्वर ने मनुष्य को कान दो दिए हैं पर मुँह एक दिया है। इससे यही अर्थ लगाया जा सकता है कि प्रभु का यह स्पष्ट सन्देश है कि सुनो अधिक और बोलो कम। सभी जानते हैं कि कानों का काम है सुनना और मुँह का काम है बोलना।
          अब विचार इस विषय पर करना है कि मनुष्य को क्या सुनना चाहिए और क्या नहीं? इसी प्रकार क्या बोलना चाहिए और क्या नहीं?
         मनुष्य को सदा ही अच्छा सुनना चाहिए और अच्छा बोलना चाहिए। अच्छा सुनने का तात्पर्य है अपने देश, धर्म, समाज और घर-परिवार के हितकर शब्द सुनने चाहिए। अपने सद् ग्रन्थों एवं महापुरुषों के उपदेशों तथा आदर्शों के विषय में सुनना चाहिए।
          महाजनों की सुसंगति में रहते हुए, उनके सुवचनों का लाभ उठाते हुए अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए। समष्टि का भला करने वाले या लाभ पहुँचाने वाले सद् वाक्यों को सुनना सदा ही सबको आनन्दित करता रहता है।
         दुर्जनों से और उनके कठोर वचनों को सुनने से बचना चाहिए। उनके अपशब्द व गाली-गलौज सुनने से दूर रहना मनुष्य के लिए आवश्यक है। इनके अतिरिक्त ऐसे वचन भी नहीं सुनने चाहिए जिनमें किसी की निन्दा-चुगली की गई हो या तोड़फोड़ करने की बात हो।
          देश, धर्म, समाज तथा घर-परिवार को तोड़ने वाले दुर्वचनों को सुनने से बचना चाहिए। दूसरों को हानि पहुँचाने वाले जिन वचनों में षडयन्त्र की बू आ रही हो उन्हें सुनने से परहेज करना चाहिए।
         एवंविध बोलते समय वाणी पर नियन्त्रण रखना चाहिए। इसीलिए कहते हैं- 'पहले तोलो फिर बोलो।' ऐसे बोलने से हमेशा बचने का यत्न करना चाहिए जिससे किसी के मन को कष्ट हो या किसी का हृदय छलनी हो जाए। अपनी तरफ से प्रयास यही होना चाहिए कि दूसरे के मन को हरणे वाले बोल बोले जाएँ।
          वाणी की सरलता और सहजता का पुट उसमें होना चाहिए, छल-फरेब वाली भाषा का प्रयोग मनुष्य को कदापि नहीं करना चाहिए। दूसरों के जख्मों पर मलहम लगाने वाले वचन सबको पसन्द आते हैं।
         किसी मनुष्य के साथ यदि कोई भी व्यक्ति अपने रहस्यों को साझा करता है तो उसे इस बात का पूर्ण विश्वास होता है कि जिसके पास जाकर वह अपना मन हल्का कर रहा है, वह उन्हें अपने अंतस में ही समाकर रख लेगा तथा उन्हें किसी के सामने कभी, किसी भी परिस्थिति में प्रकट नहीं करेगा।
         उसे यह भी विश्वास होता है कि वह स्वयं लोगों के सामने न तो उसका उपहास करेगा और किसी दूसरे को भी उसकी छिछालेदार नहीं करने देगा। जिस व्यक्ति पर लोग इतना विश्वास करते हैं, उससे महान कोई और हो ही नहीं सकता।
         इस प्रकार बोलने और सुनने में यदि अनुशासन का पालन किया जाए तो होने वाले बहुत से झगड़ों से छुटकारा पाया जा सकता है। वाणी से किया गया प्रहार बहुत गहरा घाव करता है। इस प्रकार के तीक्ष्ण वारों को करने से मनुष्य को यथासम्भव बचना चाहिए।
          मन में दूसरों के गूढ़ रहस्यों को सदा छुपाकर रखने वाला और वाणी का संयम रखने वाला मनुष्य वास्तव में महान होता है। ऐसे महापुरुषों को समाज अपना नेता मानकर उसके बताए मार्ग पर चलने लगते हैं।
         इन सबसे भी बढ़कर प्रत्येक मनुष्य को  उस परमपिता का यशोगान भी अपनी वाणी से सदैव करना चाहिए और उसी की प्रार्थनाओं को अपने इन कानों से सुनना भी चाहिए। तभी इन दो कानों और इस मुँह की सार्थकता है। अपने अंतस में ईश्वरोचित गुणों का समावेश करने का यथासम्भव प्रयास करना चाहिए।
चन्द्र प्रभा सूद
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रविवार, 21 अगस्त 2016

पैसे का दम्भ

एक लघुकथा पोस्ट कर रही हूँ। नमन तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा है। वह मध्यमवर्गीय परिवार का एक साधारण-सा बच्चा है। उसका पिता ड्राइवर है। वह सातवीं कक्षा में पढ़ता है। पढ़ने में वह कोई विशेष योग्यता वाला छात्र नहीं है। खेलों के क्षेत्र में भी वह अपने विद्यालय का नामी विद्यार्थी नहीं है।
          उसके पिता की आमदनी इतनी नहीं थी कि वे तीन बच्चों और अपने माता-पिता सहित सात लोगों की सारी आवश्यकताएँ सरलता से पूरी कर सके। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि वह अपने बेटे को किसी अच्छे और बड़े स्कूल में पढ़ाए। वह नहीं चाहता कि उसका बेटा उसकी तरह ही अभावों में अपना जीवन व्यतीत करे।
         इधर सरकार ने कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए एक नई स्कीम शुरू की है। इसमें सभी स्कूलों को आदेश दिया गया कि वे आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को अपने स्कूल में प्रवेश दें। नमन के पिता ने उसका दाखिला एक प्रतिष्ठित स्कूल में करवाने के लिए बहुत मेहनत की। अन्तत: नमन को वहाँ प्रवेश मिल ही गया।
        आगे की उसकी यात्रा उसके लिए इतनी सरल नहीं थी। वहाँ स्कूल में बड़े घरों के बच्चे बढ़िया बेग, लंच बाक्स और अपने पर्स में खूब सारे पैसे लाते थे। वे नमन का मजाक उड़ाते थे।
        उसके सामने जब स्कूल की कैन्टीन से जब तरह-तरह की मंहगे खाद्य खाते थे तो उसका मन भी ललचाता था। अपनी मजबूरी पर वह चुप रह जाता था। खेल के मैदान में भी वे उसे चिढ़ाते रहते थे। कभी-कभी अड़ंगी देकर नीचे भी गिरा दिया करते थे।
          एक दिन तो हद हो गई जब उसकी कक्षा के कुछ बच्चों ने उसे क्लास में रखे कूड़ेदान में बिठा दिया। जब उसने इसका प्रतिरोध किया तो उसे कहने लगे- "तू हमारी बराबरी करेगा? तेरा बाप ड्राइवर है तो बड़ा होकर तू भी ड्राइवरी करेगा।"
         उन पैसे वाले बच्चों की इस हरकत पर उसे गुस्सा बहुत आया। अपने घरेलू हालात और अपनी बेबसी पर उसे बहुत रोना भी आ रहा था परन्तु वह अपना मन मसोसकर चुप रह गया।
चन्द्र प्रभा सूद
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शनिवार, 20 अगस्त 2016

सुसंस्कृत वाणी

सुसंस्कृत वाणी ही मनुष्य का वास्तविक आभूषण होती है। यदि बोलते समय ध्यान न रखा जाए अथवा अभद्र भाषा का प्रयोग किया जाए या गाली-गलौच किया जाए तो उसे वाणी का संस्कार कदापि नहीं कहा जा सकता। वाणी की सरलता और शुद्धता उसके संस्कारों पर निर्भर करती है।
         भर्तृहरि जी ने बहुत ही सुन्दर शब्दों में सुसंस्कृत वाणी का महत्त्व बताते हुए व्याख्या की है -
         केयूरा न विभूषयन्ति  पुरुषं हारा न  चन्द्रोज्ज्वला।
          न स्नानं न विलेपनं  न कुसुमं  नालंकृता  मूर्धजा।।
          वाण्येका  समलंकरोति  पुरुषं या संस्कृता धार्यते।
          क्षीयन्ते खलु भूषणानि  सततं वाग्भूषणं भूषमम्।।
अर्थात न बाजूबन्द आदि आभूषण मनुष्य को सजाते हैं और न ही चन्द्रमा के समान चमकते हुए हार। सुगन्धित जल से स्नान करने, लेप लगाने, फूलों से बाल सजाने से भी कोई सुन्दर नहीं बन जाता। मनुष्य केवल संस्कारित वाणी से सुशोभित होता है जिसे वह धारण करता है। सभी भौतिक आभूषण नष्ट हो जाते हैं परन्तु वाणी रूपी आभूषण कभी नष्ट नहीं होता।
        यह श्लोक हमें चेतावनी दे रहा है कि सम्पूर्ण भौतिक ऐश्वर्य, धन-सम्पत्ति नश्वर हैं। इन सबका कुछ भी पता नहीं रहता कि ये कब तक साथ निभा सकेंगे। मनुष्य की वाणी चाहे कौए की तरह कर्कश हो अथवा कोयल की भाँति मधुर हमेशा दूसरों को याद रहती है। उसी के अनुसार लोग उस व्यक्ति विशेष के बारे में अपनी राय बना लेते हैं और फिर उसी के अनुरूप व्यवहार करते हैं।
         इसी भाव को दर्शाती हुई एक कथा को यहाँ साझा करना चाहती हूँ  जो मूलरूप से संस्कृत भाषा में लिखी गई है। एक राजा अपने मन्त्री और सेवकों के साथ जंगल में विहार के लिए गया। जब वे थक गए तब आराम करने लगे। राजा को बहुत जोर की प्यास लगी। सामने एक झोंपड़ी थी जिसमें एक अन्धा फकीर रहता था।
          राजा ने अपने सेवक को पानी लाने के लिए भेजा। उसने वहाँ जाकर उस फकीर से कहा - ‘‘अरे अन्धे! एक लोटा जल देना, राजा प्यासा है।” उसने कहा- ‘‘भाग जा, मैं तुझ जैसे मूर्ख सेवक को जल नहीं देता।” सेवक यह सुनकर निराश होकर वापिस लौट गया।
         फिर राजा का मन्त्री वहाँ जल लेने पहुँचा और कहा- ‘‘अन्धे, भाई एक लोटा जल शीघ्रता से दे दो राजा को प्यास लगी है।” अन्धे ने उसे भी पानी देने से इन्कार करते हुए कहा- "मैं तुझ मन्त्री को भी जल नहीं दूँगा।"
         यह सुनकर राजा उन दोनों के साथ स्वयं उस झोपड़ी में पहुँचा और अभिवादन करते हुए बोला- ‘‘बाबा जी! बहुत प्यास लगी है, गला सूख रहा है, थोड़ा-सा जल दे सकते हैं।” अन्धे फकीर ने कहा- "महाराज! बैठिए अभी जल पिलाता हूँ।"
          राजा ने पूछा- ‘‘महात्मन्! आपने चक्षुहीन होकर भी कैसे जान लिया कि पहला सेवक है, दूसरा मन्त्री है और मैं तीसरा राजा हूँ।”
         अन्धे फकीर ने हँसते हुए कहा- ‘‘महाराज! व्यक्ति की पहचान उसकी वाणी से होती है, उसके लिये आँखों से देखने की आवश्यकता नहीं होती। आप तीनों के बोलने के तरीके से ही मैंने पहचान लिया कि पहला सेवक है, दूसरा मन्त्री और तीसरे आप स्वय हैं।”
        मनुष्य बातचीत के माध्यम से अपनी पहचान और स्थान बनाता है। जितना वह उन्नति के शिखर पर चढ़ता जाता है उतनी ही उसकी वाणी संयमित होनी चाहिए। अन्यथा वह दूसरों का स्वार्थ साधने के माध्यम के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं रह जाता। अपने आसपास लोगों से बातचीत करके, उनके बोलने के लहजे से मनुष्य बहुत कुछ उनके विषय में जान सकता है।
         बच्चों को अनुशासन की शिक्षा देने के लिए वाणी की कठोरता आवश्यक होती है परन्तु आम व्यवहार में नहीं। मनुष्य की वाणी की मधुरता ही उसे सबके सिरों पर विराजमान कर देती है और उसकी कठोरता दूसरों की नजरों से गिरा देती है। इसीलिए वाणी को मनुष्य का वास्तविक आभूषण माना गया है।
चन्द्र प्रभा सूद
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शुक्रवार, 19 अगस्त 2016

जन्म से मृत्यु तक

मनुष्य का जन्म जब इस संसार में होता है तब वह खाली हाथ मुठ्ठी बाँधे हुए आता है और जब यहाँ से विदा लेने लगता है तब भी मुठ्ठी खोले खाली हाथ ही चला जाता है। इसका अर्थ यही है कि मनुष्य इस दुनिया में न कुछ लेकर आता है और न ही कुछ लेकर जाता है। तब यह मारकाट, हेराफेरी, रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार, उठापटक आदि मनुष्य किसके लिए करता है?
        जन्म और मृत्यु नदी के दो छोरों की तरह हैं जो कभी आपस में नहीं मिल पाते। धरती और आसमान की तरह ये दोनों बस एक दूसरे को निहारते रहते हैं। रस्सी के एक छोर से दूसरे छोर तक की दूरी तक बड़ी सावधानी से चलते हुए पार करनी पड़ती है। जहाँ चूक हुई वहीँ सब बर्बाद हो जाता है।
         प्रातःकाल जब सूर्योदय होता है तो उस समय मानो नवसृष्टि का आह्वान होता है। प्रकृति में चारों ओर प्रसन्नता की लहर दौड़ जाती है, हर कोना सूर्य के प्रकाश में जगमगाने लगता है। पक्षियों का कलरव नवगीत बन जाता है। उसी प्रकार नव शिशु के जन्म पर घर-परिवार में आनन्द-मंगल छा जाता है। नन्हा शिशु नई उमंग और उत्साह का प्रतीक बनकर खुशियाँ बिखेरता है।
        अपने उदय के पश्चात पल-पल करके सूर्य दिन का अपना चक्र पूर्ण करता हुआ फिर अपने अवसान यानी सूर्यास्त की ओर बढ़ता जाता है। उसी प्रकार मनुष्य क्षण-क्षण करके अपने इस जीवनक्रम को पूर्ण करता हुआ अपने अन्त अर्थात मृत्यु की ओर कदम बढ़ाता चलता है।
          सूर्य की उदय से अस्त तक की यात्रा यूँ ही सरलता से निर्विघ्न समाप्त नहीं हो जाती। उसके लिए उसे भी संघर्ष करना पड़ता है। कभी किसी ग्रह के उसके मार्ग में आ जाने से उसे ग्रहण लग जाता है और कभी-कभार काले घने बादल आकर उसे ढक लेते हैं। उस समय दिन में ही रात्रि का आभास होने लगता है। तब वह हार नहीं मानता और बादलों के बीच से निकालकर पुनः चमकने लगता है।
       मनुष्य की जन्म से मृत्यु तक की यात्रा भी कष्टों और संघर्षों से भरी रहती है। कदम-कदम पर उसके लिए काँटे बिछाने वालों की कमी नहीं होती। उसके दुःख और उसकी परेशानियाँ उसे चैन नहीं लेने देते। दुखों की बदली छँटने तक उसकी दयनीय दशा में उसे कोई सहारा नहीं देता बल्कि और भाई-बंधुओं की तरह उसकी अपनी परछाई तक साथ छोड़ देती है।
          अपने और अपने परिवार के लिए तो सभी जी लेते हैं। वास्तव में जीना उन्हीं का सफल होता है जो दूसरों के लिए अपना जीवन दाँव पर लगा देते हैं। उन्हें ही संसार सदा स्मरण करता है। यह बात हमेशा याद रखनी चाहिए कि मृत्यु अवश्यम्भावी है।
         सूर्य कष्टों का सामना करते हुए भी अपने अहं का त्याग नहीं करता। दोपहर यानी उसके यौवन काल के समय का उसका प्रचण्ड तेज असहनीय होता है। उसी प्रकार मनुष्य का अहं उसे ले डूबता है। काल की ओर बढ़ते हुए उसके लिए अहंकार उचित नहीं है।
          जिस प्रकार रात्रि सम्पूर्ण संसार के विश्राम के लिए होती है उसी प्रकार मृत्यु भी मनुष्य के लिए जन्म से अब तक की सारी थकान मिटाने के लिए माँ की गोद की तरह सुखदायिनी होती है। इस मृत्यु से घबराना नहीं चाहिए बल्कि प्रसन्नता से इसकी प्रतीक्षा करते रहना चाहिए।
         इस दुनिया का चलन भी बहुत विचित्र है, वह जीवित रहते मनुष्य की सुध नहीं लेती। उसके कष्टों में उससे सहानुभूति भी नहीं रखती। एक इन्सान दूसरे इन्सान को सहारा देने से कतराता है। परन्तु जब उसकी मृत्यु हो जाती है तो फिर वही सब लोग कन्धा देने के लिए पहुँच जाते हैं। इसका कारण यही है कि मृतक को अन्तिम यात्रा के लिए कन्धा देना भारतीय परम्परा के अनुसार पुण्य का कार्य माना जाता है।
          जहाँ तक हो सके समाज में रहते हुए दूसरों की सहायता अवश्य करनी चाहिए। हो सकता है कि उनके दिए गए आशीषों के फलस्वरूप अपने बन्द ताले की चाबी मिल जाए और मनुष्य का इहलोक-परलोक दोनों ही सुधर जाएँ। उसे चौरासी लाख योनियों वाले जन्म-मरण के बन्धन से मुक्ति मिल जाए।
चन्द्र प्रभा सूद
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गुरुवार, 18 अगस्त 2016

न्याय-अन्याय

इतिहास की ओर दृष्टि डालें तो आज तक कोई भी युग ऐसा नहीं हुआ जिसमें न्याय-अन्याय न हुआ हो और आगे आने वाले समय में भी शायद इस अभिशाप से बचा जा सके। इसका कारण है परस्पर अहंकार का टकराव।
         रामायण काल में भगवान श्रीराम का अगले दिन होने वाला राज्यतिलक सहसा वनवास में बदल जाना कैकेयी के अहंकार और स्वार्थ का परिणाम था। यहाँ श्रीराम के प्रति अन्याय किया गया जिसे उन्होंने से सहर्ष स्वीकार कर लिया।
         शूर्पणखा की नाक काटना, अहिल्या का अपमान होना व उसका मूर्तिवत हो जाना, बाली व रावण जैसे योद्धाओं का वध होना, भगवती सीता का हरण और उनकी अग्नि परीक्षा तथा गर्भावस्था में पुनः निष्कासन सभी इसी न्याय-अन्याय की कसौटी पर परखे जा सकते हैं।
        इसी प्रकार महाभारत काल में भी न्याय-अन्याय का चला यह चक्र बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सकता है। कौरवों द्वारा पाण्डवों का राज्य हथियाना, धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर का जुए के खेल में भाइयों और द्रौपदी को हार जाना, कौरवों का अन्यायपूर्ण राज्य करना और अन्ततः होने वाला महाभारत का युद्ध जिसमें सारे नियमों को अनदेखा करके छल-छद्म का सहारा लिया गया। इस युद्ध ने इतना भयंकर विनाश कर दिया।
        ये सब उन सबके अहं का परिणाम ही कहा जा सकता है। महाभारत काल में नैतिक-अनैतिक, न्याय-अन्याय आदि के सभी नियमों को ताक पर रख दिया गया था जिसका परिणाम का हम आज तक भुगतान रहे हैं और न जाने कब तक भोगेंगे?
          उसके पश्चात मुगलों के शासनकाल का भयावह रूप हमें आज तक सताता है। उस समय जबरदस्ती तलवार के बल से लोगों का धर्म परिवर्तन कराना और न मानने पर नृशंसता करना, बहु-बेटियों का अपहरण करना, जन साधारण पर अत्याचार करना, मन्दिरों को ध्वस्त करना आदि बहुत से अन्यायपूर्ण कार्य किए गए। इसके फलस्वरूप देश में अशिक्षा, सती प्रथा, बाल विवाह जैसी कुरीतियों का जन्म हुआ जिनसे महापुरुषों के अथक प्रयत्नों के बाद भी आज तक हम मुक्त नहीं हो सके।
         अंग्रेजों के शासन काल में भी कुछ कम अन्याय नहीं हुआ। निहत्थों पर गोली चलना, लोगों को बन्धुआ मजदूर बना लेना, चलती ट्रेन से किसी भी नागरिक को नीचे फैंक देना, स्वतन्त्रता सेनानियों को फाँसी देना व् काले पानी भेजन, जन साधारण पर अनेक प्रकार के अत्याचार करना आदि  इन अंग्रेजों का शगल था।
          ये तो थे न्याय-अन्याय के इतिहास से सम्बन्धित कुछ ऐसे उदाहरण जिन्हें प्रायः सभी लोग जानते हैं। इनके अतिरिक्त भी न जाने कितने शासकों और उनके चमचों के द्वारा जनता अन्याय का शिकार होती रही है। जिस भी कालखण्ड के विषय में पढ़ने लगो तो उस समय में हुए अन्याय और अत्याचार के विषय में पढ़कर मन उदास और परेशान हो जाता है।
          आज राजतन्त्र नहीं प्रजातन्त्र है पर जन साधरण को किसी प्रकार की राहत नहीं मिली है। सत्ता में कोई भी आए, उसे तो बस पिसना ही है। अन्याय का सामना करना ही उसकी विवशता है। पुरातन युग की तरह आज भी राजपुरुषों का विरोध करना अपनी मौत को बुलावा देना ही होता है।
          प्रतिदिन टी वी, समाचार पत्रों और सोशल मिडीया में ऐसी दुखद खबरें हम सुनते और देखते रहते हैं। आज ह्यूमन राइट वाले बहुत एक्टिव हो रहे हैं किन्तु वे भी किसी को न्याय दिलाने में समर्थ नहीं हो रहे। ऐसा प्रतीत होता है कि सर्वत्र होने वाला अन्याय शायद अधिक मुखर हो रहा है और इसीलिए उसका ही बोलबाला है। बहुत हो-हल्ला होता है परन्तु परिणाम वही ढाक के तीन पात ही दिखाई देता है।
         केवल भारत में ही नहीं पूरे विश्व में कमोबेश यही स्थिति है। कहीं भी किसी भी व्यक्ति ने जरा-सा सिर उठाने का दुस्साहस किया नहीं कि बस उसकी आफत आई समझो।
           बेशक इक्कीसवीं सदी में हम जी रहे हैं परन्तु सामन्तवादी सोच से अभी भी हम बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इसलिए आज न्याय-अन्याय की जिम्मेदारी किसको दी जाए, यह समझ नहीं आ रहा।
चन्द्र प्रभा सूद
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